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देश की भलाई के लिए लाईन में लगने से कैसी परेशानी

देश की भलाई के लिए लाईन में लगने से कैसी परेशानी

”जब लोग फ्री जियो सिम के लिए घंटों तक लाईन में लग सकते हैं तो फिर देश की भलाई के लिए लाईन में लगने से कैसी परेशानी सर,’’ ये कहा दिल्ली में बाल काटने बाले विमलेश ठाकुर ने। सीतामढ़ी, बिहार, से 1996 में दिल्ली आए विमलेश का एक अति साधारण ‘हेयर कटिंग सैलून’ दक्षिण दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में है। शनिवार रात को खाना खाने के बाद टहलते हुए मैं अकस्मात रोड साइड पर चलने वाली नाई की दुकानों जैसे अनेक ‘सैलून’ में पहुंचा था। बातों-बातों में ही बात ‘नोटबन्दी’ पर पहुंच गयी।

मैंने पूछा कि तुम्हारे धंधे पर तो बड़ा असर पड़ा होगा? विमलेश बाल काटने के 50 रूपये लेते हैं। तो उन्होंने कहा कि नहीं साहब, हमारी सेल तो पहले जैसी ही है। हमको छुट्टे पैसे की कोई तकलीफ नहीं है। जब मैंने कहा कि आपके मुख्यमंत्री तो बड़े नाराज है नोटबन्दी से। अपनी पैनी कैंची से साइड के बाल कुतरते हुए विमलेश ने कहा कि ”केजरीवाल साहब तो हर बात की निन्दा ही करते है सर, उनका तो बस रहने ही दीजिए।’’

इससे पहले उसी दिन सुबह साढ़े दस बजे के करीब मैं एचडीएफसी बैंक गया था। शनिवार सीनियर सिटीजन को नकद निकासी का दिन था। वहां मिले सत्तर साल से ऊपर के श्री और श्रीमती भादुड़ी। श्रीमती भादुड़ी के पैर में तकलीफ थी सो चलने और खड़े होने में दिक्कत हो रही थी। पहली मंजिल के फ्लैट से उतर कर पैदल चलकर बैंक जाना और फिर आधा घंटे बाद नंबर आना किसी भी बुजुर्ग की नाराजगी का सबब बन सकता है। मैंने उनसे पूछा कि इस मारामारी से बहुत तकलीफ हो रही होगी? अपनी उंगली पर न छूटने वाल स्याही का निशान लगवाते हुए भादुड़ी साहब बोले, ”तकलीफ तो है मगर ये काम तो अच्छा ही है। ये तो बहुत पहले ही होना चाहिए था।’’ उनका मतलब कालेधन पर रोक लगाने से था। अब प्रधानमंत्री का नोटबन्दी का कदम कितना असरदार होगा, इससे कितना कालाधन बाहर आएगा और समाज में कितनी शुचिता स्थापित होगी? जैसा कि बीजेपी का दावा है, ये तो समय तय करेगा। मगर पिछले दस दिनों में दिल्ली, भोपाल और मुंबई में कई आमजनों से बात करने पर कुछ बातें साफ होती हैं।

पहला, आमतौर पर लोग प्रधानमंत्री मोदी की मंशा को साफ और नेकनीयत मान रहे हैं। उन्हें लगता है कई दशकों से बेईमानी, रिश्वतखोरी और लूट का धंधा देश में जारी है। उसके लिए मोदी का ये कठोर कदम जरूरी था। ठीक उसी तरह जैसे बुखार को दूर करने के लिए कुनैन की कड़वी गोली जरूरी होती है।

लोगों को तकलीफें है, जैसा कि शुक्रवार को बैंक मैनेजर और श्रीमति रूप शर्मा, जो एक केबल मैगजीन निकालती है, के बीच हो रही कहासुनी के वक्त मैंने देखा। बैंक की पुरानी ग्राहक श्रीमति रूप शर्मा को नकदी चाहिए थी और बैंक में नकदी नहीं थी। उनका कहना था, कि ”मुझे अपने साथ काम करने वालों को कुछ-कुछ सौ रूपये देने हैं। मेरा काम तो क्रेडिट कार्ड से चल रहा है मगर ड्राईवर, काम वाली और अनेक सहायक को तो थोड़े पैसे चाहिए ही। उनका काम कैसे चलेगा?’’ बात में वजन है। जिन लोगों के पास प्लास्टिक मनी का जरिया नहीं है वे क्या करें? प्रशासनिक तन्ज को इस बारे में क्या कदम उठाते वक्त नहीं सोचना चाहिए था? दिलचस्प बात है कि काफी चीख-चिल्लाहट के बाद उनके लिए नकदी का इंतजाम बैंक की कर्मठ कर्मी मोनिका कपूर ने कर ही दिया। मैं तब से सोच रहा हूं कि लोग अपने ही पैसों के लिए इतनी तकलीफें उठाने को क्यों तैयार है? इसका कुछ-कुछ उत्तर मिला मुझे नवी मुंबई में टैक्सी चला रहे विनोद से। नोटबन्दी की घोषणा के दो दिन बाद मैंने उससे पूछा था कि ”तुम्हें तो तकलीफ हो रही होगी?’’ उसने मुस्कुराते हुए कहा था कि ”मेरी तकलीफ जो है सो है मगर अब बड़ा मजा आएगा क्योंकि मेरे कारपोरेटर प्रमोद काम्बले (बदला हुआ नाम) का सारा पैसा अब कहां  जाएगा?’’

विनोद के साधारण से बयान में समाज के अन्दर अन्तर्निहित गुस्सा, क्षोभ, कुछ न कर पाने की अकुलाहट और कुछ परिमाण में संपन्न लोगों के प्रति ईष्र्या का गहरा भाव छिपा हुआ है। साधारण जनों को मोदी के इस कदम के बाद व्यवस्था का दुरूपयोग कर बेशुमार दौलत जमा करने वाले धन्नासेठों, अफसरों, राजनेताओं, प्रोफेशनल मीडिया से जुड़े लोगों और भ्रष्ट न्यायाधीशों की तरफ देखकर लगता है ”अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’’ और ये सोचकर उनका कलेजा ठंडा होता है।

रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, संसाधनों की खुली लूट-खसोट से त्रस्त लोगों को नोटबन्दी में उम्मीद की एक किरण नजर आती है। अपनी परेशानी को वो एक बड़े मकसद से जुड़ा देखकर तसल्ली कर लेते हैं। मूल बात है मकसद का बड़ा होना। अभी तक लोगों को लगता है कि नोटबन्दी के पीछे छोटे स्वार्थ नहीं बल्कि बड़े लक्ष्य हैं। इस मायने में उसकी सफलता की कुंजी उन बड़े उद्देश्यों को हासिल करने में ही है। लोग तब तक ही तकलीफें सहन करेंगे जब तक उन्हें लगेगा कि उनका त्याग किसी बड़े यज्ञ की समिधा का एक भाग है।

उमेश उपाध्याय

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