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मुझे शहीद हो लेने दे, बेटा

मुझे शहीद हो लेने दे, बेटा

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा: आज आप कुछ उदास लग रहे हैं।

पिता: नहीं बेटा। कुछ नहीं, यूं ही।

बेटा: नहीं। कुछ बात तो है।

पिता: बेटा, मुझे दु:ख हो रहा है कि मैंने अपने जीवन में तुम लोगों के लिये कुछ नहीं किया।

बेटा: क्या बात कर रहे हैं, पिताजी। इस घर में सब कुछ आपका दिया ही तो है। आपकी नेक कमाई ही तो आज हम खा रहे हैं।

पिता: खाक खा रहे हो। तीसरे दिन तो इस घर में रोटी के लाले पड़े होते हैं।

बेटा: पर पिताजी, जो भी रूखी-सूखी खाते हैं, खाते तो इज्जत से हैं ना। किसी के आगे हाथ तो नहीं पसारते।

पिता: तू मेरा दिल रखने के लिये यूं ही बातें मत बना। सच तो सच ही है। मैं सच बोल रहा हूं।

बेटा: कुछ भी हो पिताजी, हम इसी में सुखी हैं, सन्तुष्ट हैं।

पिता: बेटा, मैंने फैसला कर लिया है कि मैं अब शहीद हो जाऊंगा देश के लिये।

बेटा: क्या बातें कर रहे हैं, पिताजी? आप कोई फौज में हैं जो शहीद हो जायेंगे?

पिता: बेटा, तू ठीक ही कह रहा है। मैं फौज में भर्ती होना चाहता था। मैं भर्ती होने गया भी। पर मेरा कद छोटा था और छाती भी कम चौड़ी निकली। इसी लिये हार कर मैंने चपड़ासी की नौकरी कर ली। यही मेरी और तुम्हारी बदकिस्मती बन गई।

बेटा: भूत में जो हुआ वह हुआ। उस पर सोच कर आप क्यों अपना मन दु:खी कर रहे हैं? भविष्य की सोचो।

पिता: भविष्य की ही तो सोच रहा हूं। यही तो मैं कर रहा हूं।

बेटा: फिर पिताजी, देश तो 70 साल पूर्व आज़ाद हो गया था। आजादी की लड़ाई चल रही होती तो भी आप उस में भाग ले सकते थे। तब आप शहीद हो गये होते तो हम छाती तान कर कह सकते थे कि हम आप जैसे एक महान शहीद की सन्तान हैं।

पिता: वहीं तो अब मैं करने जा रहा हूं।

बेटा: पर कैसे?

पिता: मैं आत्महत्या कर शहीद हो जाऊंगा।

बेटा: पिताजी, लगता है आप तो अपना ही उपदेश भूल गये जो आप हमें देते हैं। आपने हमें सदा समझाया कि आत्महत्या एक पाप है। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति नर्क में जाता है। आप हमें बताते हैं कि कोई भी धर्म इसकी इजाजत नहीं देता।

पिता: बेटा, मैं मानता हूं कि मैं तुम्हें यही उपदेश देता था। पर अब समय बदल गया है। हालात बदल गये हैं। राजनीति बदल गई है। अब तो आत्महत्या को शहीद जैसा सम्मान मिल रहा है।

बेटा: पिताजी, आज क्या बदल गया है, इसकी बात छोड़ो। हमें तो आपकी बात पर चलना है। हमें अपने धर्म का पालन करना है।

पिता: अब तू मुझे वह मत पढ़ा जो मैं तुम्हें सिखाता था। अब तू मेरा प्लान सुन। अब मैं अपनी आत्महत्या कर लूंगा। पीछे एक पत्र छोड़ जाऊंगा कि मैंने किस मुद्दे पर अपनी जान दी है।

बेटा: पिताजी, आपके पास मुद्दा क्या है जो इतनी बात कर रहे हैं?

पिता: बेटा, तू नादान है। तुझे आज की राजनीति का ज्ञान ही नहीं है।

बेटा: यह तो पिताजी, है। मुझे तो राजनीति की अक्षरमाला का भी ज्ञान नहीं है।

पिता: बेटा, आजकी राजनीति में कोई मुद्दा इतना छोटा नहीं होता कि उसे लेकर कोई प्रदर्शन नहीं किया जा सकता हो। कोई आन्दोलन खड़ा नहीं किया जा सकता हो। बन्ध का आयोजन नहीं हो  सकता हो। हिंसा नहीं की जा सकती हो।

बेटा: इतनी राजनीति तो पिताजी मैं भी समझने लगा हूं।

पिता: उधर शहीद की परिभाषा भी बदल गई है। शहीद माने जाने के लिये अब देश की रक्षा के लिये ही अपनी जान देने की आवश्कता नहीं है। देश के लिये मर मिटने की जरूरत नहीं है। अब तो राजनीति में आत्महत्या को भी सम्मानित किया जा रहा है। मैं भी यही करने जा रहा हूं।

बेटा: पिताजी, आत्महत्या तो कायर लोग करते हैं।

पिता: ठीक है पर इसका महिमामण्डन तो राजनीति के लोग कर ही लेते हैं अपने स्वार्थ के लिये। तुझे पता नहीं कि पिछले दो-तीन साल में कई आत्महत्या कर्ताओं को शहीद बना दिया गया है?

बेटा: कुछ भी हो। गलत तो गलत ही है ना।

पिता: राजनीति में कुछ गलत नहीं होता। राजनीति गलत को ठीक और ठीक को गलत साबित कर सकती है।

बेटा: पर पिताजी, इस उम्र में आप कब और कैसे राजनीतिज्ञ बन गये?

पिता: बेटा, हालात सब समझा देते हैं, सब बना देते हैं।

बेटा: पिताजी, हमें इस राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है।

पिता: नहीं। हमें बहुत कूछ लेना है। मैं जन्तरमन्तर पर आत्महत्या करूंगा सब के सामने। पीछे एक नोट छोड़ जाऊंगा कि प्रधानमंत्री का काफिला जा रहा था। मैं उनके दर्शन के लिये दोनों हाथ जोड़ कर घंटों प्रतीक्षा में खड़ा था। जब प्रधानमंत्री निकले तो मैंने हाथ हिलाकर उनका अभिवादन करना चाहा। मैंने चिल्ला-चिल्ला कर उनको पुकारा भी। उनके जिन्दाबाद के नारे भी लगाये पर उन्होंने मेरी ओर देखा तक नहीं। मेरे नमस्कार का जवाब तक नहीं दिया।

बेटा: पिताजी, तो क्या हो गया? उन्हें नमस्कार करने वाले सैंकड़ों लोग खड़े होते हैं। लोग इस बात से प्रभावित नहीं होंगे क्योंकि वह तो सब को हाथ हिलाकर उनका अभिवादन स्वीकार करते हैं।

पिता: बेटा, मैं इसे ही मुद्दा बना दूंगा ना। वह जनता के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने लाल किले की प्राचीर से घोषणा की थी कि मैं प्रधान मंत्री नहीं जनता का प्रधान सेवक हूं। तो फिर यह प्रधान सेवक आम जनता के नमस्कार का जवाब क्यों नहीं देता? यह आम आदमी का अपमान है।

बेटा: उससे क्या होगा?

पिता: ज्योंहि यह नोट जनता के हाथ आयेगा तो तुझे पता है कि दिल्ली में तो आम आदमी की सरकार है। वह तो इसे अपनी पार्टी का मुद्दा बना लेंगे। वह कहेंगे कि यह आम आदमी का अपमान है जिसे वह किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं करेंगे। जन्तरमन्तर पर हज़ारों लोग इक_ा हो जायेंगे चाहे तमाशबीन ही सही। मुख्यमंत्री सारा जरूरी-गैरजरूरी सब काम छोड़ कर भागे-भागे आयेंगे। यदि सरकारी गाड़ी न मिली तो वह पैदल ही भागे-भागे आ पहुंचेंगे।

बेटा: पैदल ही क्यों? वह सरकारी गाड़ी की प्रतीक्षा क्यों नहीं करेंगे?

पिता: बेटा, इसलिये कि राजनीति में जो पहल करता है राजनीतिक लाभ वही हड़प लेता है। उन्हें डर रहेगा कि कहीं राहुल गांधी पहले न पहुंच जायें और उनकी सारी राजनीति चौपट कर दें। वह तो यह कभी नहीं होने देंगे कि मेरी आत्महत्या का राजनीतिक लाभ कोई दूसरा ही लूट ले जाये और वह भी दिल्ली में जहां उनकी आम आदमी की सरकार है।

बेटा: फिर क्या होगा?

पिता: वह सब तेरे पास दौड़ेंगे। उन्हें मेरे बारे कुछ पता तो होगा नहीं, पर फिर भी मेरी तारीफों की पुल बांध देंगे। कहेंगे कि इस महान आत्मा की शहादत व्यर्थ नहीं जाने देंगे। वह प्रधानमंत्री का त्यागपत्र मांगेंगे। राष्ट्रपति से गुहार लगायेंगे कि वह प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दें क्योंकि उन्हीं के अपमानजनक व्यवहार से त्रस्त होकर ही तो मुझे आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। वह कहेंगे कि यह अपमान मेरा नहीं आम आदमी का है। कई गाडिय़ां तुम्हें व सारे परिवार को लेने आ जायेंगी। जीवन में पहली बार तुम भी कार में बैठने का सौभाग्य प्राप्त कर लोगे। तुम्हें सिर-आंखों पर बिठा लेंगे।

बेटा: फिर क्या हो जायेगा?

पिता: मुख्यमंत्री मुझे शहीद घोषित कर देंगे। यह महान कार्य कर मैंने जनता और राजनीति पर जो एहसान किया है उससे खुश होकर वह तुम्हें एक करोड़ रूपये और हो सकता है उससे अधिक भी देकर अपने आपको धन्य समझें। समाचार पत्रों व टीवी चैनलों में मेरी फोटो छपेगी बार-बार। हमारे घर पर मेला जैसा लग जायेगा। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े नेता मेरी महान कुर्बानी पर मेरी और मेरे परिवार की तारीफें करते न थकेंगे। मेरी कुर्बानी की तुलना बड़े-बड़े महान नेताओं से की जाने लगेगी।

बेटा: तो फिर?

पिता: बस देखते जाना। जो हमारे रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी व जानकार मुझे गाली देने में भी अपना अपमान समझते थे वह मेरी तारीफों के पुल बांध कर अपने आपको धन्य समझने लगेंगे। पंजाब, यूपी व उत्तराखण्ड में शीघ्र ही चुनाव होने वाले हैं। सभी पार्टियां मेरे परिवार को करोड़ों की सहायता करेंगे। सब में होड़ लग जायेगी कि मेरा बेटा उनके पक्ष में प्रचार करे। तुम्हारे लिये अपनी थैलियां खोल देंगे। क्या सैकुलर और क्या साम्प्रदायिक पार्टियां सभी तेरे दरवाजे पर दस्तक देंगे। बस एक काम जरूर करना। मैं तुम्हें पहले ही अपना प्रोग्राम बता दूंगा। तुम सब को चाय अवश्य पिलाना। घर में चाय-पत्ती, दूध व चीनी का प्रबंध कर रखना।

बेटा: पिताजी, अब आगे बन्द करो यह ड्रामा।

पिता: पर तू रोने क्यों लगा है?

बेटा: हमें नहीं चाहिये यह शहादत। नहीं चाहिये किसी से कोई खैरात। हमें जो रूखी-सूखी मिलती है, हमें उस में ही सन्तोष है। आपके मन में ऐसी बात आई ही क्यों और कैसे? वैसे तो मुझे पता है कि मेरे इस कहने पर ही आप कुछ ऐसा नहीं करेंगे। पर यह याद रखना कि यदि आपने ऐसा कुछ किया तो समझ लो कि आपका सारा परिवार ही तबाह हो जायेगा। इससे पहले कि कोई आपको शहीद करार दे मैं, मेरी मां, मेरी पत्नि और सब बच्चे आमहत्या कर लेंगे। यह आप याद रखो।

पिता: बेटा, खुश रहो। मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। मुझे भी न ऐसी घटिया सम्मान चाहिये और न पैसा।

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