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सृष्टि और सृष्टा

सृष्टि और सृष्टा

आजकल की परिस्थितियों को देखकर सभी लोग भयभीत रहते हैं। जीवन में कुछ न कुछ अनहोनी होने की आशंका हमेशा बनी रहती है, न होने वाली घटना भी बार-बार सामने आ जाती है, कभी-कभी हम कोई सपना देखते है लेकिन किसी बड़ी दुर्घटना के कारण सपने टूटने का डर बना रहता है। इस कठिन परिस्थितियों में हम अपनों का हाथ थामे बैठते हैं तो कभी-कभी वह हाथ भी छूट जाता है। उस समय हमारे मस्तिष्क में एक ही बात घूमती रहती है कि अब परमात्मा पर ही विश्वास करना चाहिए।

परमात्मा के ऊपर विश्वास करने से पहले अपने ऊपर विश्वास रखना अति आवश्यक है। परमात्मा और स्वयं के ऊपर विश्वास एक दूसरे के परिपूरक हैं, क्योंकि मनुष्य को जैसे-जैसे अपने ऊपर विश्वास बढ़ता जाता है, अंतत: यह भगवन के रूप में रूपांतरी हो जाता है। किसी नए कार्य को करने की क्षमता ही आत्मविश्वास है। हम सभी के अंदर कुछ न कुछ सृष्टि करने की क्षमता होनी चाहिए। नित्य-नियमित रूप से यदि कोई व्यक्ति अगर एक भी कार्य अपने सामर्थं से करने में सफल होता है तो वह एक महान व्यक्ति हो जायेगा

भले छोटी सी चीज क्यों ना हो लेकिन हम जब सृष्टा अथवा सृजना कर पाते हैं तो आत्म संतोष लाभ करते हैं। यही आत्म संतोष लाभ हमें पुन: नया कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। धीरे-धीरे यह एक अभ्यास बन जाता है। हमें कुछ बड़ा करने की ताकत मिल जाती है।

सृष्टि ही ईश्वर है, यह बोलना गलत नहीं होगा। जहां सृष्टि है, वहां देव है और जहां विनाश है वहां दानव है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ बड़ा सृष्टा करने की क्षमता नहीं होती है। लेकिन प्रत्येक प्राणी को कुछ नया करने की इच्छा  अवश्य रखनी चाहिये। एक नारी को भी सृष्टि  के रूप में जाना जाता हैं। क्योंकि एक नारी मां के रूप में न केवल एक शिशु को जन्म देती है बल्कि उसे ज्ञान, बुद्धि और दक्षता प्रदान कर एक सम्पूर्ण सक्षम मनुष्य बनाती है। प्रत्येक गृहणी अपने गृहकार्य के माध्यम से हमेशा कुछ न कुछ सृष्टि करती रहती  है, उसके द्वारा बनाया गया भोजन भी एक सृष्टि का ही रूप है। बिना पकी हुई सब्जी भी कार्य में नहीं आती। कर्मरत महिला जहां रहती है, वहां स्व्यं लक्ष्मी जी का वास होता है।

मन में इच्छाशक्ति हो तो कोई दैनिक गृहकार्य से भी समय निकाल कर कोई कुछ नया सृष्टि करने का प्रयास कर सकता है। एक छोटा बच्चा भी बचपन में केवल सुनने का काम करने को छोड़ कर स्वत: कुछ सृष्टि करने का प्रयास करता है।

सृष्टि करने से मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ता हैं, वही आत्मविश्वास उसे दुनिया में कठिन से कठिन परिस्थितियों को सामना करने के लिए हिम्मत देता है। सृष्टि कोई भी हो वह कला, साहित्य, विज्ञान किसी भी प्रकार में हो सकता है। हम मनुष्य अपनी रूचि के अनुसार सृष्टि कर सकते है। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत एक प्रगतिशील देश है और  हमारे देश में प्रत्येक व्यक्ति इसी स्वभाव का होता है।

जापान जैसा छोटा देश अपने नागरिकों की कार्य करने कि दक्षता के कारण इतना उपर आ सका है। अपना कार्य करने की क्षमता हमारे अंदर की दक्षता को केवल बढ़ाती ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी मजबूत बनाती है। सृष्टा करने के माध्यम से हम अपने हृदय को भी सहज बनाते हैं। एक प्रफुल्लित हृदय ही रोगमुक्त हो सकता है। कभी-कभी बच्चा बनना भी सेहत के लिए लाभदायक हो जाता है। हमारा सृष्टा ही हमें जीने की नयी दिशा दिखाता है।

 उपाली अपराजिता रथ

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