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अन्ना हजारे जनांदोलन का चेहरा या विपक्ष का मुखौटा

अन्ना हजारे जनांदोलन का चेहरा या विपक्ष का मुखौटा

By रवि शंकर

अन्ना हजारे फिर आंदोलन कर रहे हैं। इस बार उनका आंदोलन मोदी सरकार के विरूद्ध है। वे क्यों आंदोलन कर रहे हैं, कहना कठिन है। उन्होंने दिल्ली चुनावों से पहले जब आंदोलन करने की धमकी मोदी सरकार को दी थी, तो जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन करने की बात कही थी, लेकिन जब वे दिल्ली पहुंचे तो आंदोलन का स्वर, उद्देश्य और साथी सभी बदल गए। नए आंदोलन की पहली श्रृंखला में वे भूमि अधिग्रहण कानून में मोदी सरकार द्वारा अध्यादेश द्वारा किए गए संशोधनों के विरोध में जंतर मंतर पर बैठे। जेल भरो अभियान का आह्वान किया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अन्ना ने अपना जनलोकपाल का मुद्दा छोड़ कर भूमि अधिग्रहण का मुद्दा पकड़ लिया? आखिर क्यों राजनीतिक लोगों को मंच पर स्थान नहीं दूंगा की सिंह गर्जना करने के बाद अन्ना अरविंद केजरीवाल सहित चंद संदेहास्पद राजनीतिक लोगों के साथ मंच पर बैठे? इन सवालों का उत्तर देश की जनता उनसे मांगने वाली है, जैसे कि वे देश की सरकार से उत्तर मांगते आए हैं।

हैरत की बात यह है कि अन्ना के इस आंदोलन में अन्ना के पहले आंदोलन की पूरी-पूरी छाप दिखी। अन्ना का पहला आंदोलन यूपीए सरकार के खिलाफ बाबा रामदेव आंदोलन की हवा निकालने के लिए खड़ा किया गया था। जो लोग उनके साथ खड़ा होकर जनलोकपाल-जनलोकपाल चिल्ला रहे थे, लगभग वे सभी सरकार की लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी के सदस्य थे। ऐसे में यह पूरा आंदोलन ही संदेह के घेरे में था। रही-सही कसर अन्ना ने बिना मांगों के पूरा हुए अनशन तोड़ कर निकाल दी थी। बाद में उस आंदोलन से एक राजनीतिक दल का उदय हुआ जो आज भाजपा विरोध की धुरी बना हुआ है। इस प्रकार से देखा जाए तो शुरूआत से लेकर अंत तक अन्ना का आंदोलन एक राजनीतिक आंदोलन दिखता है जिसका उद्देश्य भाजपा का विरोध करना है।

ऐसे राजनीतिक आंदोलन को पहले गैर राजनीतिक बताने और दिखाने की अन्ना की कोशिश भी पुरानी है। इस बार भी उन्होंने किसी भी राजनीतिक व्यक्ति को मंच पर स्थान नहीं दिए जाने की घोषणा की। परंतु बाद में न केवल उनके पट्टशिष्य अरविंद केजरीवाल मंच पर नजर आए, बल्कि अतुल अंजान जैसे अनेक वामपंथी राजनेता भी मंच पर से भाषण दे रहे थे। मेधा पाटेकर पिछला लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं, वे भी मंच पर थीं। वाइको मंच पर थे। परंतु अन्ना को इनसे कोई परहेज करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। वहीं दूसरी ओर जंतर मंतर पर पूरी तरह गैर राजनीतिक व्यक्तित्व पी.वी. राजगोपाल भी स्टेज सजा कर बैठे थे। ये भी भूमि अधिग्रहण कानून में मोदी सरकार के संशोधनों के खिलाफ आंदोलन और पदयात्रा करते हुए जंतर मंतर पहुंचे थे, परंतु अन्ना ने एक बार भी इनके मंच पर जाना उचित नहीं समझा।

जानने लायक बात यह है कि आवास के लिए जमीन का अधिकार, भूमि संरक्षण परिषद का गठन, आदिवासियों को जमीन पर अधिकार समेत पांच मांगों को लेकर यह आंदोलन चलाया जा रहा है। धरने और किसान-आदिवासियों के दिल्ली कूच का आयोजन एकता परिषद के पी.वी. राजगोपाल ने किया है। पलवल से दिल्ली की पद यात्रा के बाद किसानों-आदिवासियों का महामोर्चा 24 फरवरी की शाम को दिल्ली के संसद मार्ग पहुंच पाया था। इस बीच 24 को इसी संगठन के धरने में अन्ना हजारे और शाम को अरविंद केजरीवाल शामिल हुए। मीडिया के लिए इन दिनों ये दोनों ही चेहरे बिकाऊ हैं, लिहाजा खबरों का पूरा फोकस इन्हीं दोनों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। पी.वी. राजगोपाल और उनके साथियों को मीडिया में अधिक स्थान नहीं मिल पाया।

बहरहाल, अन्ना इस आंदोलन में शामिल होने के लिए जिंदल के चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली पहुंचे। समस्त मोदी विरोधी गुट उनके साथ खड़े दिखे। ऐसे में अन्ना की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश द्वारा इस कानून में मोदी सरकार जो भी संशोधन कर रही है, उससे पूरी तरह असहमति रखते हुए भी अन्ना के इस आंदोलन में खड़ा हो पाना थोड़ा कठिन है। साफ दिख रहा है कि वे यहां केवल राजनीतिक विपक्ष का मुखौटा बन कर खड़े हैं कोई जनांदोलन का चेहरा बन कर नहीं।

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