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हिमालय को सुरक्षित रखने में हो रही कोताही

हिमालय को सुरक्षित रखने में हो रही कोताही

‘हिमालय का कब्रिस्तान’ वर्ष 2013 में उत्तराखंड के पवित्र केदारनाथ में आई बाढ़ व भूस्खंलन तथा इसके   कारण हुई भयंकर त्रासदी जिसमे हजारों लोग मृत्यु को प्राप्त हो गए, का वर्णन करती है। लेखक अपनी भावनाओं को प्रकट करते हुए, भावनात्मक होकर लिखते है कि शमशान में शिव बसते हैं, लेकिन जहां शिव बसें, वहां कभी श्मशान नहीं होता।

Layout 1लेखक आगे लिखते है कि केदारनाथ की त्रासदी के बाद भगवन भोले शंकर के इस पवित्र स्थान पर मनुष्यों से ज्यादा गिद्धों की संख्या प्रतीत  हो रही थी, जो कही न कही हमारे मस्तिष्क को गहरा विचार करने पर विवश करता है। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने भारत के विभिन्न राज्यों में विभिन्न समय में हुई अचानक प्रलय तथा इससे हुई  भयंकर दुर्घटनाओं को आंकड़ों के अनुसार प्रस्तुत किया है। यह आंकड़े विभिन्न सरकारों द्धारा त्रासदी से बचने हेतु उठाये गए कदमो पर भी प्रश्न खड़ा करता है। अपनी पुस्तक में लेखक लिखते है कि हिमालय के साथ दिक्कत यह है कि हम मनुष्य  या तो हिमालय की सुंदरता को देखते है या हिमालय को  देव-तुल्य मानते हुए आस्था के रूप में। दु:ख की बात  यह है कि सरकारों की मानवीय नीतियां भी यहीं से शुरू होती है और खत्म भी यही हो जाती है।

हिमालय का कब्रिस्तान

लेखक   : लक्ष्मी प्रसाद पंत

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

मूल्य                : 275 रु.

पृष्ठ              : 216

विडम्बना तो यह है कि हम जहां एक तरफ हिमालय को दैवीय रूप में देखते है वहीं दूसरी तरफ जब कोई पत्थर गिरता है तो हम उसे भगवान के द्वारा दी गई दैवीय आपदा के रूप में देखते है। चाहे वो भूकंप हो या भूस्खलन। हिमालय के पानी को हमने डिब्बाबंद तो बनाया ही है, बस इसका बोतलबंद रूप आना बाकि  है। संक्षेप में, हिमालय की याद तभी आती है जब मई-जून की गर्म हवायें किसी गांव-शहर की सरहद में दाखिल होकर हमें तड़पा देने की हद तक ज्यादा तपा देती हैं। पहाड़ों को लेकर हमारा रुझान बच्चों की गर्मी की छुटियों तक ही सीमित है। आश्चर्य होता है,  हिमालय हमारे लिए   इन तत्कालित जरूरतों से ज्यादा कुछ नहीं है। और मान  भी ले कि हिमालय को पहचानने का हमारा यही हुनर है, लेकिन फिर सोचिये वैसा हिमालय आपको कैसा लगेगा जिसमें न बर्फ हो, न बादल हो, न हरियाली।

लेखक विभिन्न सरकारों पर कटाक्ष करते हुए  लिखते है कि केदारनाथ की तबाही, कश्मीर में आया जलजला और नेपाल का भूकंप यही संकेत दे रहे हैं कि  हम सब तबाही की एक और नयी तारीख की प्रतीक्षा कर रहें है।

लेखक ने नेपाल में आयी तबाही का उदाहरण देते हुए यह समझाने का प्रयास किया है कि तबाही किसी  भी सरकार से पूछ कर नहीं आती, इसलिये सरकारों को आपदा को रोकने के लिये सावधानीपूर्वक कड़ा कदम उठाना चाहीये। जिससे किसी भी प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण तबाही को रोका जा सके।

लक्ष्मी प्रसाद पंत द्वारा लिखी गई यह पुस्तक पाठकों का ध्यान हिमालय के प्रति सोचने को विवश करती है। यह पुस्तक हिमालय के ऊपर कृत्रिम दुराचार को पुरजोर ढंग से उठाती है।

रवि मिश्रा

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