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‘आप’ में कितना पानी

‘आप’ में कितना पानी

पंजाब चुनाव अकाली-भाजपा गठजोड़, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सभी के लिए राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई है। यही तय करेगा कि केजरीवाल के अगले लोकसभा चुनाव के दावे में कितना है दम

एक चुनाव कितनों के लिए जीवन-मरण का सवाल बन जाता है, उसका नमूना पंजाब के विधानसभा चुनावों से बेहतर शायद ही कहीं देखने को मिले। राज्य में सत्तारूढ़ अकाली दल-भाजपा गठजोड़ सरकार के लिए तो यह लाज बचाने और सियासी हवा को काबू में रखने की चुनौती है। कांग्रेस और खासकर उसके राज्य मुखिया अमरिंदर सिंह के लिए तो यह वाकई आर-पार की लड़ाई है। अमरिंदर के राजनैतिक करियर के लिए यह आखिरी मौका की तरह है तो कांग्रेस और उसके उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए अगले लोकसभा चुनाव में अपनी दावेदारी बचाए रखने के लिए यह तिनके का सहारा की तरह साबित होने जा रहा है। तीसरे बड़े दावेदार आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल के लिए पंजाब में कमतर प्रदर्शन उनकी अगली सियासी संभावनाओं पर पानी फेर सकता है।

इस चुनाव में अपने राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई और भी कई नामी-गिरामी नेता व्यक्तिगत स्तर पर भी लड़ रहे हैं। इस सूची में सबसे ऊपर पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्धू पति-पत्नी हैं। सिद्धू ने भाजपा में कुछ नेताओं और अकाली दल से लंबे समय के मनमुटाव के बाद पार्टी छोड़ी तो वे पूरे जोशोखरोश में थे। उन्हें राज्य में बह रही सत्ता विरोधी हवा में अपने भाग्य चमकाने का अच्छा मौका दिख रहा था। फिर आम आदमी पार्टी से न्यौता मिला तो उनकी बांछें खिल गईं। अभी एक-दो महीने पहले तक राज्य में सत्ता विरोधी लहर में केजरीवाल की गुड्डी जो सबसे ऊंची उड़ती दिख रही थी।

लेकिन केजरीवाल भला अपने अलावा दूसरा शक्ति या आकर्षण केंद्र बनते भला कैसे देख सकते थे। सो, सिद्धू की मुंहमांगी मुख्यमंत्री पद की शर्त ठुकरा दी गई और सिद्धू ने अलग मोर्चा बनाने का ऐलान किया। सिद्धू का दांव उलटा पड़ता दिखा। लेकिन अपने पाले में ज्यादा से ज्यादा नेताओं को जुटाने की फिराक में लगे अमरिंदर ने आखिर उन्हें सहारा दिया। इसी तरह आप से निकाले गए सुच्चा सिंह छोटेपुरा का रसूख भी काफी रहा है पर अब उनके राजनैतिक करियर के लिए भी यह आर-पार की लड़ाई है।

इन लड़ाइयों के बीच सबसे दिलचस्प और अनोखा दांव आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का ही है। आखिर, 2014 के लोकसभा चुनावों में भी पंजाब ने ही अलग बयार बहाई थी और आम आदमी पार्टी की वहां जमीन तैयार कर दी थी। अकाली दल के राज में पंजाब नशे के कारोबार से ऐसा पस्त हुआ कि पूरे देश में बह रही मोदी लहर का वहां कोई असर नहीं दिखा। पंजाब के लोग अकाली दल में उप-मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह बादल के रिश्तेदार पूर्व कांग्रेसी मजीठिया को इस नशे का कारोबार बढऩे के लिए दोषी मानने लगे। शायद लोगों में यह भावना भी घर करने लगी कि अकाली और कांग्रेस की मिलीभगत रहती है।

इसलिए दोनों पार्टियों से उकताए लोगों ने 2014 में नई-नई आम आदमी पार्टी की ओर उम्मीद की नजर से देखा और उसके चार सांसद जितवा दिए। लेकिन दिल्ली चुनावों के बाद केजरीवाल ने पार्टी से  प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को निकालद्म तो पंजाब के दो सांसद भी उनके साथ चले गए। लेकिन केजरीवाल ने अपने दो सिपाहियों संजय सिंह और दुर्गेश पाठक को वहां लगाया और सांसद भगवंत मान को आगे किया। यह अलग बात है कि संजय सिंह, दुर्गेश पाठक और मान तीनों के खिलाफ तरह-तरह के आरोप उछले हैं और इनकी सीडी भी तैयार हुई है। शायद इन वजहों से दो-तीन महीने आम आदमी पार्टी के पक्ष में बह रही हवा इन दिनों कुछ कमजोर पड़ी है। इसमें विवादों की वजह से रसूख वाले छोटेपुरा को पार्टी से निकालने का भी फर्क पड़ा है।

हालांकि पंजाब में आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के पक्ष में आकर्षण का एक बड़ा कारण वहां दलित वोट हैं। दिल्ली में जिस तरह दलितों में आम आदमी पार्टी का आकर्षण बढ़ा, उसका असर पंजाब में भी दिखा। दरअसल पंजाब सबसे बड़ी दलित आबादी वाला राज्य है। वहां दलित 30 फीसदी के आसपास हैं। लेकिन ये लोग अरसे कांग्रेस के वोटर रहे हैं। कभी कांशीराम के असर से बहुजन समाज पार्टी की थोड़ी-बहुत पैठ बनी थी लेकिन मोटे तौर पर यह कांग्रेस का वोट बैंक रहा है। लेकिन कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद दलितों में आम आदमी पार्टी का आकर्षण बढ़ा है।

अमरिंदर सिंह के लिए सबसे बड़ी चुनौती शायद दलित वोट बैंक को बचाए रखने की है। वे इसके लिए संत रविदास पीठों पर कई बार मत्था टेक आए हैं। अगर कांग्रेस और अमरिंदर दलित वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अपनी ओर करने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर पहुंच जाएगी। हाल के कुछ दिनों में ऐसा होता भी दिख रहा है। इसीलिए कहा जा रहा है कि अमरिंदर के खिलाफ स्वीश बैक खातों की जांच तेज कर दी गई है क्योंकि भाजपा-आकली दल गठजोड़ अमरिंदर को बहुत मजबूत होता नहीं देखना चाहेगा।

हालांकि ये अभी शुरुआती दिन ही हैं। चुनावों के ऐलान के बाद ही जो नजारे उभरेंगे, उससे बहुत कुछ तय होने वाला है। केंद्र में मोदी सरकार का नोटबंदी के दांव का असर भी तब तक दिखने लगेगा। नोटबंदी से जैसे परेशानियां बढ़ रही हैं, वैसे भाजपा-आकाली गठजोड़ के लिए दिक्कतें बढ़ती जाएंगी। कहते हैं, पंजाब में किसानों के धान भी अभी नहीं बिक पाए हैं। नोटबंदी का उस पर बुरा असर पड़ा है। फिर नई फसल की बुआई भी पैसे की तंगी से प्रभावित हो रही है। केजरीवाल ने इसे सबसे पहले भांप लिया और सरकार के इस कदम का विरोध शुरू कर दिया। इस पर कांग्रेस का रुख उतना साफ नहीं है। इस नाराजगी का भी केजरीवाल को लाभ मिल सकता है।

कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के लिए पंजाब का चुनाव अस्तित्व की लड़ाई की तरह है। दिल्ली में केंद्र, उपराज्यपाल नजीब जंग और उसकी सरकार इस कदर उलझी हुई है कि एक मायने में सरकार ठप्प-सी है। उसके पास सस्ती बिजली-पानी के अलावा दिल्ली के लोगों को दिखाने को कुछ नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उसकी योजनाओं से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ पाया है। मोहल्ला क्लीनिक का नायाब विचार भी अभी ठीक से अमल में नहीं आ पाया है। विभिन्न आरोपों में उसके विधायकों की गिरफ्तारियां जारी हैं। 21 विधायकों पर संसदीय सचिव की विवादास्पद नियुक्ति के मामले में सदन की सदस्यता गंवाने की तलवार लटक रही है।

इसलिए उसे दिल्ली से बाहर हर हाल में अपनी ताकत दिखानी पड़ेगी, तभी उसका सियासी पारा कुछ बढ़ सकता है। अरविंद केजरीवाल भी लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हमले करके खुद को मोदी विरोधी राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश लगातार करते रहते हैं। हाल में नोटबंदी के विरोध में सबसे पहले गरजने वालों में केजरीवाल और ममता बनर्जी ही थे। उनके बाद ही मायावती और मुलायम की पार्टियों ने झंडा बुलंद किया। कांग्रेस तो शुरू में दुविधा में ही थी। लेकिन केजरीवाल की इस मोदी विरोधी राजनीति का दांव तभी आगे बढ़ पाएगा, जब वे दिल्ली के बाहर अपनी ताकत दिखा पाएंगे।

इसी वजह से केजरीवाल ने दिल्ली को लगभग भुलाकर पंजाब, गोवा और गुजरात में ध्यान लगाना शुरू कर दिया। उन्होंने दिल्ली में अपने मंत्रियों को भी इन तीन राज्यों में प्रचार के हिसाब से बांट दिया। हालांकि पंजाब में आम आदमी पार्टी में नेता पद को लेकर विवाद की गुंजाइश बनी हुई है। बहरहाल, दांव ऊंचे हैं इसलिए देखना है पंजाब के लोग किसे अपनी राजनैतिक अस्तित्व रक्षा का मौका देते हैं।

 हरिमोहन मिश्र

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