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पंजाब में आतंक फैलने से लाभ किसको होगा?

पंजाब में आतंक फैलने से लाभ किसको होगा?

पिछले दिनों 27 नवम्बर को कुछ बदमाशों ने पुलिस की वर्दी में पंजाब की नाभा जेल पर हमला कर दिया। अत्याधुनिक हथियारों का प्रयोग करते हुए वे जेल से छह छंटे हुए बदमाशों को छुड़ा कर ले गए। इनमें खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट के तथाकथित मुखिया हरमोहिन्द्र सिंह मिंटू भी था। एक अन्य आतंकवादी कश्मीर सिंह के अलावा पंजाब में सक्रिय चार बाहुबली हरजिन्दर सिंह भुल्लर, कुलप्रीत सिंह, गुरप्रीत सिंह सेखों और मनप्रीत टुंडा भी भागने वालों में शामिल थे। यह अलग बात है कि पंजाब पुलिस ने तुरन्त हरकत में आते हुए, पूरी साजि़श के मास्टरमाईंड को तो गिरफ़्तार किया ही, महिन्द्रा सिंह पिंटू को भी जो गोवा होते हुए विदेश भाग जाने की फिराक में था, पकड़ लिया। पिछले कुछ सालों से बिहार की तर्ज पर पंजाब में भी बाहुबलियों के अनेक गिरोह सक्रिय हो गए हैं। पंजाब की राजनीति अभी तक बाहुबलियों के प्रभाव से मुक्त थी। गैंगवार इसकी राजनैतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं थी। लेकिन अब धीरे-धीरे बनता जा रहा है। पंजाब पुलिस के डीजीपी सुरेश अरोड़ा स्वयं मानते हैं कि इस समय प्रदेश में अपराधियों के 57 गिरोह या गैंग सक्रिय हैं।  इनकी आपस में तो टक्कर होती ही रहती है, सुपारी लेकर अपराध करने का धंधा भी पंजाब में इनकी ही देन है। कहा जाता है कि इन बाहुबलियों को राजनैतिक संरक्षण भी प्राप्त रहता है। पुलिस की अंदर से मिली-भगत भी हो सकती है। पिछले साल ही 37 बाहुबली पुलिस की गिरफ्त से भागने में कामयाब रहे। जानकार सूत्रों का यह भी कहना है कि ये बाहुबली जेल के अन्दर से भी अपनी गतिविधियां बदस्तूर जारी रखते हैं। बहुत से बाहुबलियों ने अपनी छवि राबिनहुड टाइप की बना ली है और राजनीति में भी सक्रिय हो रहे हैं। मई 2016 में आपसी गैंगवार में मारे गए एक बाहुबली जसविन्दर सिंह उर्फ रौकी के दाह-संस्कार के अवसर पर पचास हजार के आसपास  की संख्या में लोग एकत्रित हुए और इसमें अकाली दल, सोनिया कांग्रेस और बसपा तक के नेता शामिल हुए। रौकी पंजाब विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका था और उसने 39000 वोट हासिल किए थे। ध्यान रहे, मारे गए बाहुबली को पंजाब सरकार ने सुरक्षा प्रदान कर रखी थी। पंजाब में कुछ सीमा तक पुलिस, राजनीतिज्ञों और अपराधियों का अजीब सा गठबन्धन बन गया लगता है। इसका लाभ पंजाब में आतंकवाद को पुन: सक्रिय करवाने के काम में लगी ताक़तें भी उठाती हैं। पंजाब में आतंकवादी संगठन भी पुन: सक्रिय होने के प्रयासों में लगे हुए हैं। पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रादेशिक सह संघचालक ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा को मोटरसाइकिल सवार आतंकियों ने गोली मार कर मार दिया था और अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गए। तब भी यह आरोप लगे थे कि हो सकता है अन्दर के ही कुछ लोग मिले हुए हों। नाभा जेल पर हमले में भी कुछ जेल अधिकारियों और पुलिस बालों की भी मिलीभगत पाई गई है। लाखों का लेन देन हुआ। लेकिन इस पूरे कांड पर सोनिया कांग्रेस के पंजाब के मुखिया कैप्टन अमरेन्द्र सिंह और आम आदमी पार्टी की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली है। इनका कहना है कि नाभा जेल मामले में सरकार की मिली भगत है। आम आदमी पार्टी के सेनापति अरविन्द केजरीवाल की बातों को गंभीरतापूर्वक न भी लिया जाए, तो भी अमरेन्द्र सिंह की बात को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के आरोपों पर बात करने के लिए पंजाब की वर्तमान स्थिति को समझना जरुरी है।

पंजाब विधानसभा के चुनाव फरवरी 2017 में होने वाले हैं। पंजाब में चुनावों के साथ-साथ मणिपुर, गोवा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभाओं के लिए भी चुनाव होने वाले हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी और सोनिया कांग्रेस के लिए अपने अस्तित्व की लड़ाई पंजाब के मैदानों में ही लड़ी जाने वाली है। कुछ महीना पहले पांच राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी और पश्चिमी बंगाल की विधानसभाओं के लिए हुए चुनावों में सोनिया कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है, उससे बाहर निकलने का रास्ता पंजाब में ही खोजा जा सकता है। सोनिया कांग्रेस दूसरों से भी बेहतर जानती है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अब उसके लिए कुछ खास बचा नहीं है। मणिपुर में उसके लिए उसी वक्त खतरे की घंटी बज गई थी जब ब्रह्मपुत्र की लहरों पर भारतीय जनता पार्टी का कमल खिल उठा था। रहा गोवा, वहां सोनिया गांधी की पार्टी पिछले चुनावों में ही अप्रासांगिक होने की स्थिति में आ गई थी। जहां तक पंजाब का प्रश्न है, पंजाब की राजनीति में एक बार अकाली दल -भाजपा और दूसरी बार सोनिया कांग्रेस की सरकार बनाने की परम्परा विकसित हो चुकी है। 2012 के चुनावों में अकाली दल- भाजपा ने दूसरी बार भी सरकार बना कर यह परम्परा तोड़ी थी। लेकिन अब 2017 में होने वाले चुनावों में तो सोनिया कांग्रेस ही सरकार बनायेगी, यह धारणा और विश्वास इस पार्टी के नेता कैप्टन अमरेन्द्र सिंह आम जनता में और अपने कार्यकर्ताओं में बनाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी की एंट्री ने सारा मामला गड़बड़ा दिया लगता है। सोनिया कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों के लिए ही यह चुनाव उनके अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। ऐसा नहीं कि सोनिया कांग्रेस ने इसके लिए तैयारी नहीं की या कर नहीं रही है। उन्होंने पंजाब में चुनाव जिताने के लिए बिहार से प्रशान्त किशोर को मोटा वेतन देकर नियुक्त किया है। कहा जाता है कि यही प्रशान्त किशोर 2014 के लोक सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में आंकड़े एकत्रित करने और उनका मूल्यांकन करने का काम करते थे। चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत का श्रेय, इन्होंने अपनी इस अंकगणितीय दक्षता को देना चाहा तो इनका वहां से जाना तय ही था। तब इनको बिहार में जनता दल(यू) ने हायर कर लिया। जब वहां चुनाव खत्म हो गए तो प्रशान्त किशोर को कैप्टन अमरेन्द्र सिंह पंजाब ले आए। कहा जाता है कि कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को पूरा विश्वास है कि किशोर सोनिया कांग्रेस को जिता देगा। पंजाब में एक चुटकुला प्रसिद्ध हो रहा है कि कैप्टन प्रशान्त किशोर के लैपटॉप को बहुत श्रद्धा भाव से देखते हैं। लेकिन किशोर का लैपटॉप सोनिया कांग्रेस की भीतरी फूट को रोक नहीं पाता। इसलिए यदि सोनिया गांधी की फौज पंजाब में अकाली दल को परास्त करके जीत हासिल नहीं कर पाती तो उसकी अपनी फौज के मन में पक्का हो जायेगा कि अब सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी में भारत के ऐतिहासिक मैदानों में अपनी फौजों को जिताने की योग्यता नहीं बची है। तब फौज का मां-बेटे के नेतृत्व से विश्वास उठ जायेगा और वह हार कर तितर-बितर होने की स्थिति में आ जायेगी और एक राजवंश के पराजय-पतन की अंतिम कहानी पंजाब के उन्हीं मैदानों में लिखी जायेगी, जहां कभी मुगलवंश की पराजय की गाथा लिखी गई थी। इसलिए कहा जा सकता है कि सोनिया कांग्रेस के लिए पंजाब की लड़ाई उसके अस्तित्व की लड़ाई है।

दूसरा प्रश्न आम आदमी पार्टी का। आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब की यह लड़ाई इतनी महत्वपूर्ण क्यों बन गई है? लोकसभा के लिए 2014 में हुए चुनावों में आम आदमी पार्टी ने अपने आप को अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करने का असफल प्रयास किया था। सोनिया कांग्रेस के संभावित पतन को भांप कर यह रणनीति बनाई गई थी कि उससे उत्पन्न शून्य को आम आदमी पार्टी भरे और ये चुनाव भारतीय जनता पार्टी बनाम आम आदमी पार्टी के बीच हो रहे हैं, ऐसा आभास होना चाहिए। इसी रणनीति के चलते अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर शहीद होने का स्वांग रचा था और सारे देश में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी खड़े कर दिए थे। खुद वाराणसी में जाकर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पर्चा भरा। लेकिन सारे देश में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की जमानतें जब्त हो गईं थीं। पर एक आश्चर्यजनक घटना भी इन चुनावों में सामने आई थी। पंजाब में आम आदमी पार्टी के चार प्रत्याशी क्रमश संगरूर, पटियाला, फतहगढ़ साहिब और फरीदकोट से लोक सभा का चुनाव जीत गए थे। ये चारों प्रत्याशी पंजाब के मालवा क्षेत्र से जीते थे जो अकाली दल का परंपरागत गढ़ माना जाता है।

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नरेन्द्र मोदी की आंधी में भी अकाली दल केवल चार सीट ही जीत पाया। इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी ने पंजाब से 30.40 प्रतिशत वोट भी हासिल किए। जबकि अकाली दल को 20.30 प्रतिशत और भारतीय जनता पार्टी को 8.70 प्रतिशत मत मिले थे। सोनिया कांग्रेस को 33.10 प्रतिशत मत मिले थे। आम आदमी पार्टी ने चंडीगढ़ लोकसभा चुनाव में भी 24 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे। जाहिर है पहले हल्ले में ही आम आदमी पार्टी पंजाब में सोनिया कांग्रेस और अकाली दल-भाजपा के कद की हो गई। लोकसभा चुनावों के कुछ महीने बाद दिल्ली की विधानसभा के लिए पुन: चुनाव हुए। इन चुनावों में भाजपा की गलत रणनीति के कारण आप ने बेमिसाल विजय हासिल की। विधान सभा की सत्तर सीटों में से उसने 67 सीटें जीत लीं। शेष तीन सीटें भाजपा के खाते में आईं। केजरीवाल एक बार फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए।

अपनी पुरानी गल्तियों को स्वीकार करते व उनसे सबक लेते हुए केजरीवाल ने अपनी रणनीति बदली। नई रणनीति बनी, उंची आवाज में और लगभग गाली की भाषा में केवल नरेन्द्र मोदी को ही निशाना बनाए रखो। उससे देश में भ्रम फैलेगा कि असल मुकाबला केजरीवाल और मोदी के बीच ही है। सत्य- असत्य की चिन्ता मत करो। इतना ध्यान रखो की आवाज ऊंची रहनी चाहिए और भाषा गलियों की लड़ाई के माफिक। पंचतंत्र के शेर और गीदड़ की तर्ज पर शेर चाह कर भी गीदड़ पर आक्रमण नहीं कर सकेगा। क्योंकि हार या जीत, दोनों स्थितियों में भद्द शेर की ही पिटेगी। गीदड़ का कुछ नहीं बिगड़ेगा। नरेन्द्र मोदी की डिग्री को लेकर किया गया हंगामा इसी रणनीति का हिस्सा था। इसी रणनीति के दूसरे हिस्से के अनुसार भाजपा विरोधी दलों के साथ घूमना फिरना शुरु करो। देश के दूसरे हिस्सों में चक्कर लगाते रहो। दूसरे नेताओं के साथ घूमते फिरते देख कर देश की जनता धोखा खा सकती है कि केजरीवाल विपक्ष को संगठित कर सकते हैं और कर रहे हैं। यानि हरकिशन सिंह सुरजीत दिखने की कोशिश। तीसरा, हल्ला मचाते रहो लेकिन देश के किसी हिस्से में पार्टी को चुनाव के मैदान में मत उतारो क्योंकि इससे पार्टी की दयनीय स्थिति का भेद खुल जायेगा और केजरीवाल के हल्ला -गुल्ला और बेवजह राह चलतों के साथ भांगड़ा नृत्य करते रहने की रणनीति के खोखलेपन का पर्दाफाश हो जायेगा।

लेकिन आम आदमी पार्टी एक राजनैतिक पार्टी है और अरविन्द केजरीवाल की महत्वकांक्षा भी आसमान को छूने वाली है। वे रातोंरात केवल मीडिया में अभिनय करके प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। इसके दो तरीके ही हो सकते हैं। पहला, उपर से छलांग लगा कर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टपका जाए। इसका प्रयास वे 2014 के लोकसभा चुनावों में कर चुके हैं और धड़ाम से नीचे गिर भी चुके हैं। दूसरा तरीका नीचे से सीढ़ी दर सीढ़ी प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर बढ़ा जाए। इस बार वे सीढ़ी दर सीढ़ी वाला तरीका आजमाना चाहते हैं। पंजाब उनके लिए नजदीक की सीढ़ी तो है ही, पिछले लोक सभा चुनावों के रिकार्ड को देखते हुए भरोसेमंद सीढ़ी भी कहीं जा सकती है। इसलिए अभी तक केजरीवाल ने अपनी गिद्ध दृष्टि पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों पर ही लगाई हुई है। यहां यह देख लेना भी उचित रहेगा कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के साथ जो लोग जुड़ रहे हैं वे लोग कौन हैं और उन्होंने एक दिन में ही केजरीवाल में कौन सा गुण देख लिया कि वे उसके दरबार में जाकर खड़े हो गए? पंजाब में 1966-76 में नक्सलवादी आन्दोलन चला था, जिसका उस समय मालवा क्षेत्र में खासा प्रभाव पड़ा था। लेकिन नक्सलवादी आन्दोलन द्वारा अपनाई जा रही अमानवीय हिंसा के कारण जल्दी ही पंजाबियों का इस आन्दोलन से मोह भंग हो गया था। पर उस आन्दोलन के कुछ सूत्र अभी भी पंजाब में इधर इधर बिखरे हुए हैं। इसी प्रकार 1980 के दशक में पंजाब में विदेशी ताकतों की शह पर उग्रवादी आन्दोलन शुरु हुआ था। इस आन्दोलन में भी आम लोगों की शमूलियत चाहे गौण थी लेकिन इसके सूत्रधारों ने हिंसा के बल पर ही पंजाब को बंधक बना लिया था। यह आन्दोलन भी पंजाब की आम जनता के सक्रिय सहयोग से समाप्त कर दिया गया, लेकिन आन्दोलन के रेडीकल तत्व अभी भी  किसी उचित मंच की तलाश में रहते हैं। ये दोनों तत्व किसी उचित अवसर की तलाश में ही थे कि आम आदमी पार्टी का राजनैतिक क्षितिज पर उदय हुआ। केजरीवाल को पंजाब में ऐसे तत्वों की तलाश थी और नक्सलवादी व रेडीकल तत्वों को एक ऐसे मंच की तलाश धी, जिसकी आड़ में आम आदमी इन तत्वों का असली चेहरा न देख पाए। पंजाबी की ही एक कहावत के अनुसार, गाय भी भूखी थी और तूडी भी गीली थी। दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए। केजरीवाल अच्छी तरह जानते हैं कि जिन लोगों को वे प्रदेश की गद्दी पर बिठाना चाहते हैं, उनके आने से अराजकता फैलेगी। लेकिन वे पंजाब को अपनी राजनीति में सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, पंजाब के कल्याण-अकल्याण से उनको कुछ लेना-देना नहीं है। पंजाब में अकाली दल के प्रति बढ़ते विरोध को देखते हुए केजरीवाल अपनी इस रणनीति के प्रति आश्वस्त भी हैं। पंजाब फतेह तो आगे की यात्रा की तैयारियां शुरु। लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी की हार का अर्थ  होगा केजरीवाल की भविष्य पर प्रश्नचिन्ह और मोदी विरोधी विरादरी में भी कीमत का अवमूल्यन।

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शिरोमणी अकाली दल

अकाली दल भारत के पुराने राजनैतिक दलों में से एक है। इसकी स्थापना 1920 में हुई थी। लेकिन सत्ता में भागीदारी इस दल की पंजाब के पुनर्गठन के बाद 1967 से ही शुरु हुई। मोटे तौर पर अकाली दल को पंजाब में सिख समाज की पार्टी के तौर पर पहचाना जाता है। लेकिन पिछले कुछ साल से दल प्रयास कर रहा है कि वह हिन्दुओं समेत समस्त पंजाबियों की पार्टी बने। अकाली दल के 56 विधायकों में से 9 हिन्दू हैं और उसके कुछ पदाधिकारी भी हिन्दू हैं। अकाली दल का प्रयास पंजाब के दलित समाज को भी अपने साथ लेने का रहा है लेकिन उसमें उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली। डेरा सच्चा सौदा के विवाद के कारण मालवा में और 2009 में वियाना में दलित संत गुरु रामानन्द की उग्रवादियों द्वारा की गई हत्या के कारण दोआबा में दलित समाज का अकाली दल से ज्यादा मोह भंग हुआ है। लेकिन इन सभी कारकों के बावजूद अकाली दल पंजाब में प्रमुख भूमिका में रहता है। कहा जा सकता है कि वह सारे पंजाबियों की पार्टी बनने का प्रयास कर रही है।

Layout 1टेबल ए के आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि प्रदेश में कैसी भी राजनैतिक हवा क्यों न बह रही हो, अकाली दल औसतन 40 विधानसभा सीटों को जीतने की स्थिति में रहता ही है। अनुकूल राजनैतिक परिस्थिति में दल स्पष्ट बहुमत की ओर भी खिसकने लगता है। लेकिन फिलहाल पंजाब में अकाली दल की स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं कहीं जा सकती। इसका एक कारण तो एंटी- इनकम्बैंसी फैक्टर है ही। अकाली दल पिछले दस साल से सत्ता में है। प्रकाश सिंह बादल फरवरी 1997 में मुख्यमंत्री बने थे। तब से लेकर अब तक वे सत्ता संभाले हुये हैं। बीच में 2002 से 2007 तक सोनिया कांग्रेस के कैप्टन अमरेन्द्र सिंह मुख्यमंत्री बने थे। इस प्रकार 1997 से 2016 तक के उन्नीस साल के कालखंड में बादल परिवार चौदह साल से सत्ता में है। जाहिर है लम्बे काल तक सत्ता में रहने के कारण अकाली दल और बादल परिवार एक दूसरे के पर्यायवाची बन गये हैं। संघर्षों की लम्बी परम्परा के वाहक अकाली दल पर किसी न किसी प्रकार से बादल परिवार ने ही कब्जा जमा लिया है। प्रकाश सिंह स्वयं तो मुख्यमंत्री हैं ही, उनका बेटा माझा के मजीठिया परिवार में विवाहित है और उनकी बेटी भी वहीं के कैरों परिवार में विवाहित हैं। बादल परिवार की छत्रछाया में ये दोनों परिवार भी बादल परिवार की एक्सटैंशन बन गये और इन सभी ने मिल कर अकाली दल पर मुक्कमल कब्जा कर लिया। जाहिर है इस कब्जे से अकाली दल के लोग असहज महसूस कर रहे थे लेकिन 2012 में पंजाब विधानसभा के लिये हुये चुनावों में जब अकाली दल को दूसरी बार भी सफ लता मिल गई तो निश्चित ही पार्टी पर परिवार का शिकंजा और मजबूत हो गये और असंतुष्टों का विद्रोह करने का साहस उसी मात्रा में कम हो गया। (इन चुनावों में 117 सदस्यीय विधानसभा में अकाली दल ने 56 सीटें जीत ली थीं। सोनिया कांग्रेस को 46 सीटें मिलीं थीं।) बादल ने अपने इस दूसरे दौर में अपने बेटे को उप-मुख्यमंत्री की कमान सौंप कर अकाली दल और बादल परिवार का भेद समाप्त कर दिया। इससे अकाली दल के भीतर प्रकाश सिंह बादल के कुनबे के खिलाफ गुस्सा और घनीभूत होने लगा। एक विस्तृत व व्यापक दल एक परिवार में सिमट कर रह जायेगा तो उसका आम जनता से सम्पर्क टूटेगा ही। इतना ही नहीं बल्कि अकाली दल में धीरे-धीरे समाज के लिये समर्पित कार्यकत्र्ताओं के स्थान पर सत्ता-पिपासु लोगों का जमघट होने लगेगा। भ्रष्टाचार के लिये ऐसा वातावरण उर्वरक का काम करता है और चापलूसों की बन आती है। पंजाब की राजनीति में भी ये सभी लक्षण जल्दी ही प्रकट होने लगे थे।

पिछले कुछ सालों में राज्य में नशें का कारोबार बहुत बढ़ गया है। सीमान्त क्षेत्रों में इसका और भी प्रभाव देखा जा सकता है। पंजाब का युवा इन सिंथेटिक नशों की गिरफ्त में बुरी तरह फंस चुका है। अनेक युवकों की नशों से ही मौत हो चुकी है। नशों के कारोबार में बादल परिवार का नाम बार-बार उछलता रहता है। एक्सटैंडड बादल परिवार के सदस्य विक्रम सिंह मजीठिया बार-बार इसका खंडन करते रहते हैं लेकिन आम जन उनके इस खंडन पर विश्वास करते दिखाई नहीं देते।

ऐसे अनेक व्यवसाय हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि बादल परिवार के लोग, विरोधियों को येन-केन-प्रकारेण बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं। रेतबजरी, परिवहन, केवल नेटवर्क का नाम तो बार बार उछलता है। पंजाब के मालवा में कपास की खेती होती है। कपास पर छिड़काव के लिये जो दवाई वितरित की गई वह नकली थी। नकली दवाई से कपास के कीट तो क्या मरते, उल्टे उन्होंने कपास को मार डाला। फसल के नष्ट हो जाने के कारण जगह-जगह किसान मोर्चा लगा रहे हैं। अनेक किसान आत्महत्या भी कर चुके हैं। आम आदमी पार्टी ने अकाली दल के खिलाफ इसी जन-असंतोष का लाभ उठा कर 2014 के लोकसभा चुनाव में चार सीटें जीत ली थीं।

Layout 1अकाली दल की घेराबन्दी दिन-प्रतिदिन मजबूत और भीतरी असंतोष गहरा होता जा रहा है। यदि राजनीति केवल आंकड़ों का खेल होती तो प्रकाश सिंह बादल के सुपुत्र सुखबीर  सिंह बादल, जो संयोगवश अपने पिता के साथ इस समय उपमुख्यमंत्री का दायित्व भी संभाल रहे हैं, लम्बी-चौड़ी सूचियां और गणनाएं दिखाकर सिद्ध कर सकते हैं कि पंजाब में यदि कोई राजनैतिक दल सबसे मजबूत और लोकप्रिय है तो वह अकाली दल ही है। लेकिन राजनीति केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, इसे 87 वर्षीय प्रकाश सिंह बादल से बेहतर और कौन समझ सकता है, जिन्होंने अपने जीवन के 17 साल राजनैतिक आन्दोलनों के चलते जेलों में ही व्यतीत किये हैं। लेकिन बादल शायद यह नहीं जानते कि इस स्थिति के लिये और कोई नहीं, बहुत सीमा तक अकाली दल स्वयं जिम्मेदार है। अकाली दल को चाहिए था घर के भीतर की स्थिति को सुधारने की कोशिश करता। इसके विपरीत अकाली दल ने उन्हीं स्वरों को दबाना शुरु कर दिया जो पंजाब की स्थिति को नंगा कर रहे थे। एक चैनल को केवल नेटवर्क की सहायता से पंजाब में ब्लैक आउट किया गया क्योंकि वह चैनल पंजाब में किसानों की आत्महत्या के मामलों की पड़ताल कर रहा था। एक फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ का गला घोटने की कोशिश हुई क्योंकि फिल्म पंजाब में नशे के कारोबार को नंगा कर रही थी। नशे को समाप्त करने की बजाए फिल्म को समाप्त करने की राजनीति ठीक नहीं कहीं जा सकती।


1.15 लाख करोड़ के निवेश वाले 378 एमओयू पर हस्ताक्षर


पंजाब के पास बेहतरीन बुनियादी ढांचा है। विशेषकर यह बिजली उत्पादन, आइटी और एग्रो फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में हब बनने के लिए तैयार है। इसी परिप्रेक्ष्य में यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि पिछले वर्ष हुए अंतराष्ट्रीय-निवेशक सम्मेलन में 1.15 लाख करोड़ रुपये के निवेशक वाले 378 एमओयू साइन हुए। इस सम्मलेन में सुखबीर  सिंह बादल ने घोषणा की कि पंजाब में नए उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष तौर पर 100 करोड़ रुपये का फंड स्थापित किया जायेगा। इससे नए उद्योग शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी। सुखबीर ने कहा कि मोहाली मैन्यूफैक्चरिंग व आइटी हब के रूप में विकसित हो रहा है। एचडीएफसी बैंक द्वारा उत्तरी भारत का आइटी आपरेशन मोहाली में तब्दील किया जा रहा है। वोडाफोन द्वारा जहां सूबे में मोबाइल व सैटअप बाक्स का मैन्यूफेक्चरिंग प्लांट स्थापित करने का करार हुआ, वहीं अपोलो द्वारा अमृतसर में विश्वस्तरीय अस्पताल भी स्थापित करने का निर्णय लिया गया। उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के अनुसार दुनिया भर की प्रसिद्ध कंपनियों ने सालाना डेढ़ लाख युवाओं को व्यवसायिक प्रशिक्षण देने का पंजाब सरकार के साथ समझौता किया। इसके अलावा गुरु नानक देव विश्वविद्यालय व पंजाबी यूनिवर्सिटी द्वारा लड़कियों को विशेष रूप से प्रशिक्षण देने के लिए पिछड़े क्षेत्रों में 50 हुनर विकास कालेज खोले जाएंगे। पंजाब सरकार ने अपने नागरिकों, खासकर दोआबा व मालवा क्षेत्र के बाशिंदों को वाजिब सर्टिफिकेट और डिग्री से कैप्सूल ट्रेनिंग प्रोग्राम मुहैया कराकर उनकी विदेश जाने की इच्छा को पूरा करने के लिए सभी प्रबंध पूरे कर लिए हैं। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें आस्ट्रेलिया, अमेरिका, सऊदी अरब और श्रमिकों की कमी वाले अन्य देशों में वर्क वीजा हासिल करने के योग्य बनाएगा।


पंजाब में भाजपा

वैसे तो अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना भी पंजाब में ही हुई थी लेकिन पंजाब में कभी जनसंघ/भाजपा का सशक्त या अखिल प्रान्तीय जनाधार नहीं रहा। मोटे तौर पर जनसंघ/भाजपा को शहरी हिन्दुओं की पार्टी माना जाता है। अपने इस विश्लेषण के लिए हम 1966 के बाद की ही चर्चा करेंगे क्योंकि 1966 में पंजाब का पुनर्गठन हुआ था। 1967 से लेकर 1987 तक के विधानसभा चुनावों में भाजपा की स्थिति को जान लेना रोचक होगा। 1967 से लेकर 1992 तक के कालखंड में अकाली दल व जनसंघ/भाजपा में दोस्ती और कभी लड़ाई होती रही है।

इसका अर्थ यह हुआ कि जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी ने कभी भी पंजाब में सभी पूरी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा। 1977 में आपात स्थिति के बाद चुनाव हुआ था और यह चुनाव जनता पार्टी के नाम पर लड़ा गया था। अकाली दल ही नहीं सीपीएम तक से इन चुनावों में समझौता था। तब भी जनता पार्टी ने कुल 25 सीटें ही जीतीं थीं, इनमें से 14 लोग ही पूर्व जनसंघ के थे। 1992 के अपवाद को छोड़ दिया जाए क्योंकि तब मुख्य अकाली दल ने चुनावों का बहिष्कार ही कर रखा था। पूरे पंजाब में 23 प्रतिशत मतदान ही हुआ था। सोनिया कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने उस समय अपना अकाली दल बना लिया था। कैप्टन के अकाली दल के साथ भारतीय जनता पार्टी का समझौता था। पंजाब के इतिहास में पहली बार भाजपा समझौते में अकाली दल से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रहा था। भाजपा ने 66 सीटों पर और कैप्टन अकाली दल ने 58 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। कुछ सीटों पर कैप्टन अकाली दल और भाजपा के बीच दोस्ताना मुक़ाबला था। अकाली दल के बादल धड़े ने चुनावों का बहिष्कार कर रखा था। इसलिए इस चुनाव को जनमत का सूचक नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस चुनाव में पराजित हो जाने के बाद कैप्टन अमरेन्द्र सिंह वापिस सोनिया कांग्रेस में ही चले गए। कुल मिला कर 117 सदस्यीय विधान सभा में भाजपा ने औसतन तीस से चालीस सीटों पर ही चुनाव लड़ा और शून्य से दस के बीच सीटें जीतीं।

1997 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणी अकाली दल में समझौता हुआ जो आज तक चल रहा है। इसके अन्तर्गत विधानसभा की कुल 117 सीटों में से भाजपा को 23 सीटें दे दीं गईं और उसका भौगोलिक क्षेत्र भी चिन्हित कर दिया गया। 1997 से लेकर आज 2016 तक भाजपा उसी लक्ष्मण रेखा की बीच घिरीं हुई है। पार्टी उससे बाहर नहीं जा सकती। इन तेईस सीटों में से तीन से लेकर 18 के बीच भाजपा जीतती रही है।

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अकाली-भाजपा समझौता से भाजपा को लाभ?

अब प्रश्न यह है कि अकाली दल से इस लम्बे गठबन्धन से पंजाब भाजपा को क्या लाभ हुआ और क्या हानि हुई? यदि लाभ की गणना केवल आंकड़ों में ही करनी हो तो कहा जा सकता है कि भाजपा ने अकाली दल के समझौते के कारण ही पहली बार 18 सीटों पर जीत दर्ज करवाने में सफलता हासिल की थी। लेकिन इस सफलता के भीतर ही एक पेंच है। दोनों पार्टियों के समझौते में एक महीन अन्तर को पहचान लेना जरूरी है। क्या भाजपा और अकाली दल का समझौता है या भाजपा अकाली दल की छाया में चल रही है? दोनों स्थितियों में फर्क है।

भाजपा पिछले 1997 से अकाली दल का साझीदार है। लेकिन उसने भाजपा को पूरे राज्य में कुछ गिने-चुने स्थानों पर ही सीमित कर रखा है। अकाली दल ने 1997 से भाजपा को लगभग बीस-बाईस सीटों पर समेट रखा है। उससे ज्यादा सीटें उसे मिल नहीं सकतीं। अकाली दल ने इस बात का खास ख्याल रखा है कि भाजपा को ये सीटें पंजाब के उन हिस्सों में ही मिलें जो हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की सीमा के साथ लगते हों।

भाजपा को दी जाने वाली दूसरी सीटें भी जीटी रोड तक ही सीमित हैं। भाजपा के हिस्से में आने वाली 10 सीटें जीटी रोड के तीन शहरों अमृतसर, जालन्धर, लुधियाना नगर तक ही सिमटी हुई हैं। फगवाड़ा और राजपुरा की सीटें भी जी टी रोड पर ही हैं। शेष दस सीटें भी पंजाब के सीमान्त पर हैं। यानि कुल मिला कर कहा जा सकता है कि अकाली दल ने बहुत ही चतुराई से भाजपा को पंजाब के भीतरी इलाकों से बाहर रखा हुआ है। विशाल मालवा, माझा और दोआबा क्षेत्रों को भाजपा की पहुंच से बाहर कर दिया गया है। तर्क के लिये कहा जा सकता है कि जब इन क्षेत्रों में भाजपा का ज्यादा जनाधार नहीं है तो उसको इन क्षेत्रों में चुनाव लडऩे के लिये कहना एक प्रकार से सीटें गंवाना ही कहा जा सकता है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी एक राजनैतिक दल है, कोई एनजीओ नहीं, जिसने प्रारम्भ में ही अपना आधार क्षेत्र व कार्यक्षेत्र चिन्हित कर लिया है।


ड्रग्स का सच


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विपक्ष पंजाब को एक ड्रग्स पीडि़त राज्य बताते हुए यहां के युवाओं पर ड्रग्स में लिप्त होने का आरोप लगाता रहा है लेकिन हाल ही में पंजाब में हुई पुलिस भर्ती से आयी मेडिकल रिपोर्ट पर दृष्टि डालें तो इस भर्ती में कुल भाग लेने वाले प्रतिभागियों की संख्या पौने चार लाख थी जिसमें से केवल 1.27 प्रतिशत प्रतिभागियों में ही ड्रग्स की मात्रा पायी गयी। यह आंकड़े विपक्ष के आरोपों को खोखला साबित करते हैं, क्योंकि विपक्ष के द्वारा तथा-कथित 80 प्रतिशत युवाओं का ड्रग्स में लिप्त होने के आरोप को तुलनात्मक रूप से देखे तो यह संख्या दो लाख से भी ज्यादा होनी चाहिए थी।


भाजपा को पंजाब में अपना कार्य क्षेत्र बढ़ाना है तो उसे अन्य क्षेत्रों में राजनैतिक गतिविधियां बढ़ानी होगी। एक बार फिर तर्क के लिये ही कहा जा सकता है कि भाजपा सारे पंजाब में ही सदस्यता अभियान चलाती है, उसकी स्थानीय, मंडल व जिला समितियां बनती हैं, बाकायदा उनके चुनाव होते हैं। इन इलाकों के कार्यकर्ता भी पंजाब प्रदेश भाजपा की कार्यकारिणी के सदस्य होते हैं। अत: सारे पंजाब में पार्टी काम कर ही रही है। लेकिन ये सब गतिविधियां, किसी भी राजनैतिक दल के लिये तभी सार्थक होती हैं, जब वह राजनैतिक दल समय आने पर इन इलाकों में चुनाव भी लड़ती है। सभी जानते हैं कि जब तक भाजपा, अकाली दल की सांझीदार है तब तक वह कभी भी इन इलाकों में चुनाव नहीं लड़ेगी। जाहिर है शेष पंजाब में नई पीढ़ी के वे युवक जिनकी राजनीति में रुचि है, अकाली दल, आम आदमी पार्टी, सोनिया कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी में शामिल होगे। और सचमुच ऐसा हो भी रहा है।

भारतीय जनता पार्टी इसकी क्षतिपूर्ति कर सकती थी, यदि उसकी प्रदेश के नीतिगत निर्णयों में सुनवाई होती। लेकिन नीतिगत फैसलों पर अकाली दल का एकाधिकार ही रहा है। नीतिसम्बंधी मामलों में पहले भी भाजपा की सुनवाई नहीं होती थी, लेकिन जब से अकाली दल को अपने बलबूते ही बहुमत मिल गया है तो भाजपा की अवहेलना और भी बढ़ गई है। नीति सम्बंधी निर्णयों में भाजपा की हिस्सेदारी शून्य है लेकिन उन नीतियों के दुष्परिणामों का नुकसान सबसे ज़्यादा भाजपा को ही भुगतना होता है। अकाली दल के इन क्रियाकलापों से उसे स्वयं तो नुकसान हो ही रहा था लेकिन इसकी आंच अब भारतीय जनता पार्टी तक भी पहुंचने लगी थी जो पिछले बीस सालों से अकाली दल की राजनैतिक सांझीदार रहा है। अकाली दल का आम जनता में नकारात्मक इमेज बनता हो तो उसका नुक़सान भाजपा को भी होता है। जब दोनों दलों की सरकार सांझी है तो गुण दोष दोनों में ही हिस्सेदारी निभानी होगी। करे कोई भरे कोई का मुहावरा सच हो रहा है। अकाली दल की कार्यप्रणाली का नुकसान भाजपा को हो रहा है।

भाजपा को 23 सीटें छोडने के बाद शेष 95 सीटें अकाली दल लड़ता है। लेकिन इस का यह अर्थ नहीं की इन सभी सीटों पर उसका सशक्त जनाधार है। 15 से लेकर बीस सीटें तो ऐसी हैं जिन पर वह सोनिया कांग्रेस से 15000 से लेकर 20000 तक के अन्तर से हारता रहता है। ऐसी सीटों में से ही अकाली दल भारतीय जनता पार्टी को कुछ सीटें छोड़ सकता है। लेकिन वह इसके लिये भी तैयार नहीं है क्योंकि इससे पंजाब के भीतर भी भाजपा के पैर फैलते हैं। अकाली दल भाजपा को पूरे प्रदेश में फैलने का अवसर नहीं देना चाहते। वह यह भी नहीं चाहता कि पंजाब भाजपा के भीतर भी सिख नेतृत्व उभरे। बहुत से लोग यह मानते हैं कि पंजाब में नवजात सिंह सिद्धु को वर्तमान हालत तक पहुंचाने में प्रकाश सिंह बादल की भी कलाकारी है।

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क्या भाजपा अकाली दल से समझौता तोड़ सकता है?

बिहार विधान सभा चुनाव के परिणाम आने से पहले पंजाब के राजनैतिक हलकों में यह चर्चा शुरु हो गई थी कि भारतीय जनता पार्टी अकाली दल से अपना सम्बंध तोड़ सकती है। अफवाहों के उस दौर में पंजाब में रेडीकल्ज ने पंख फैलाने शुरु कर दिए थे।

एक के बाद एक, पंजाब के कुछ स्थानों पर गुरु ग्रन्थ साहिब जी के अपमान के मामले सामने आये।  उनको आधार बना कर पंजाब में, खासकर उसके दो क्षेत्रों मालवा और माझा में रास्ते रोके जाने और धरना देने के आन्दोलन शुरु हो गये। इसी के चलते कुछ स्थानों पर पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिससे दो लोग मारे गये। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिये इसकी पृष्ठभूमि को जानना बेहद जरुरी है। पंजाब की सीमा पर, सिरसा नामक स्थान पर एक संत का डेरा है, जो सच्चा सौदा के नाम से विख्यात है। इस डेरा का पंजाब के मालवा में, खास कर वहां के बंचित व दलित समाज पर, काफी प्रभाव है। जब किसी व्यक्ति या डेरा का प्रभाव व्यापक होता है तो उसका राजनैतिक उपयोग या दुरुपयोग भी शुरु हो जाता है। यह डेरा आम तौर पर कांग्रेस का समर्थन करता है। मालवा में ही अकाली दल का प्रभाव है और प्रकाश सिंह बादल और उनका पूरा कुनबा भी यहीं का रहने वाला है। लम्बी राजनीति में डेरा सच्चा सौदा अकाली राजनीति के राह में रोड़ा बनता जा रहा था। पिछले कुछ अरसा से सिख पंथ के कुछ लोग डेरा के मालिक के कुछ कार्यकलापों को सिख पंथ के लिये अपमानजनक बताने लगे थे। इस डेरा के मालिक ने अपना नाम भी काफ ी लम्बा चौड़ा रखा हुआ है। संत गुरमीत राम रहीम सिंह।  इन कारणों को आधार बना कर शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के एक निकाय ने संत को सिख पंथ से निष्कासित कर रखा था। लेकिन संत के अनुयाइयों पर इसका बहुत प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत वे अकाली दल के और ज्यादा खिलाफ हो गये।

लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। अचानक अकाल तख्त ने सच्चा सौदा डेरे के मालिक को अकाल तख्त ने माफी दे दी। इसकी प्रतिक्रिया होनी ही थी। इसका अन्दाजा अकाली दल को नहीं था, ऐसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रकाश सिंह बादल को अकाली दल की राजनीति करते करते ही सात दशक बीते हैं। सच्चा सौदा डेरे के मालिक को अकाल तख़्त द्वारा मुआफी देने से उत्पन्न तनाव में दूसरे समूह भी सक्रिय हो जायेंगे, यह निश्चित ही था। लेकिन प्रश्न यह है कि यह सब जानते बूझते हुये भी प्रकाश सिंह बादल ने सच्चा सौदा डेरे के मालिक को मुआफी क्यों दिलवायी? वैसे प्रत्यक्ष तौर पर तो बादल इस बात से इन्कार ही करेंगे कि इस पूरे घटनाक्रम में उनका या अकाली दल का कोई हाथ है। वे तो यही कहेंगे और कह भी रहे हैं कि यह मामला शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी का था, अकाली दल या पंजाब सरकार का उससे कुछ लेना देना नहीं है। लेकिन सभी जानते हैं कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी पर अकाली दल का ही नियंत्रण हैं।  इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिये आगे के घटनाक्रम को पहले देख लेना होगा। मुआफी देने के कुछ दिन बाद ही कुछ सिक्ख समूहों की प्रतिक्रिया को देखते हुये अकाल तख्त ने अपना फैसला वापिस ले लिया और सच्चा सौदा की स्थिति पूर्ववत हो गई। मुआफी देने और मुआफी देने का फैसला वापिस लेने से इतना तो स्पष्ट है कि प्रकाश सिंह बादल की अकाली दल जन- प्रतिक्रिया का अंदाजा नहीं लगा सकी। पहला प्रश्न फिर भी अनुत्तरित रहता है कि मुआफी दी ही क्यों गई? न तो इसके लिये कहीं से मांग की जा रही थी, न ही कोई आन्दोलन चल रहा था। न ही मालवा क्षेत्र में सच्चा सौदा के उपासक इसके लिये सड़कों पर उतर रहे थे। यह भी निश्चित है कि यह सारा घटनाक्रम संत गुरमीत राम रहीम सिंह को अकाल तख्त द्वारा मुआफ किये जाने के बाद ही शुरु हुआ। इसलिये सारा रहस्य इस मुआफी दिए जाने की राजनीति के भीतर ही छिपा हुआ है। अकाली दल को ऐसी अचानक क्या जरुरत आन पड़ी कि उसने डेरा सच्चा सौदा के साथ जोड़-तोड़ करनी शुरु कर दी? इसका एक ही कारण हो सकता है। भाजपा के साथ गठबन्धन टूटने की अफवाहों से घबरा कर, अकाली दल एक बार फिर,  दलित समाज पर व्यापक प्रभाव रखने वाले डेरा सच्चा सौदा के साथ, तालमेल स्थापित करना चाहता होगा। लेकिन अकाली दल को इसमें सफलता न मिल सके, इसको ध्यान में रखते हुए रेडीकल्ज ने पंजाब में उपरोक्त घटनाओं को अंजाम देना शुरु कर दिया।  लेकिन इसी बीच बिहार विधान सभा के नतीजे भी आ गए। इसमें भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा। सरकार बनाना तो दूर, वह पचास सीटों के आसपास ही सिमट गई। इसके साथ ही पंजाब में भारतीय जनता पार्टी द्वारा अकाली दल के साथ समझौता तोडऩे की चर्चाएं भी बन्द हो गईं। कहा जाने लगा कि बिहार में पराजित भाजपा, अकाली दल से सम्बंध विच्छेद का खतरा नहीं उठा सकती। इसके साथ ही यह प्रकरण भी समाप्त हो गया।

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पंजाब में यदि हालत खराब होती है, आतंकवादियों का भय पुन: व्याप्त होता है, तो इसका सर्वाधिक राजनैतिक लाभ किसे मिल सकता है? यह प्रश्न अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। इसी के उत्तर में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह और आम आदमी पार्टी के आरोपों, कि अकाली दल की सरकार अराजकता फैलाने वाले तत्वों की सहायता कर रही है, के रहस्य को समझा सकता है। अकाली दल को पंजाब की सत्ता से अपदस्थ करने के लिए कांग्रेस पहले भी इसका प्रयोग कर चुकी है। जिसका खामियाजा देश अभी तक भुगत रहा है। ज्ञानी जैल सिंह के कार्यकाल में पंजाब की राजनीति में भिंडरावाला का प्रकरण वास्तव में अकालियों को अपदस्थ करने और अप्रासांगिक करने के लिए ही किया गया था, जिसमें बाद में विदेशी ताकतों ने घी डालने का काम शुरु कर दिया था। कहीं सोनिया कांग्रेस अकालियों को पराजित कंपने के लिए पुन: उसी प्रयोगशाला को स्थापित करने के चक्कर में तो नहीं है?

ध्यान में रखना चाहिए पंजाब में जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं तो पंजाब के शहरी हिन्दुओं और गांव के दलित समाज की ओर से भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है कि वह अकाली दल से अपना सम्बंध विच्छेद करे। ऐसी स्थिति में शहरी हिन्दू और दलित समाज भाग कर किस ओर जाएगा? स्वभाविक ही कांग्रेस की ओर। कहीं कैप्टन अमरेन्द्र सिंह वही जाल तो नहीं बुन रहे? क्योंकि वे जानते हैं कि कम से कम अभी के कुछ महीनों में तो ऐसे हालात का अकाली दल को नुकसान ही होगा, लाभ नहीं हो सकता। इसका लाभ केवल कांग्रेस को ही हो सकता है। तब भला अकाली दल अपने पांवों पर कुल्हाड़ी क्यों मारेगा? तब कहीं केवल अपने राजनैतिक लाभ के लिए ही कांग्रेस ने रेडीकल्ज के प्रति नर्म रुख तो अखतियार नहीं कर लिया है? रहा प्रश्न आम आदमी पार्टी का, जिसकी चुनावों में सहायता करने के लिए कनाडा और अमेरिका में खालिस्तानी समर्थक समूह धन संग्रह के काम में बदस्तूर लगे हुए हैं। बकौल उन्हीं के एक समर्थक के, ‘हमारे काम में सबसे बडी बाधा तो प्रकाश सिंह बाद का अकाली दल है। जब तक वह पंजाब की सत्ता पर जमा हुआ है, तब तक पंजाब में हमारे पैर नहीं लग सकते। इसलिए उसे किसी भी तरह उखाडऩा है। फिलहाल यह काम पंजाब में आम आदमी पार्टी ही कर सकी है। इसलिए उसे जिताना बहुत जरुरी है। एक बार बाद। का अकाली दल उखड़ जाए, फिर आम आदमी पार्टी की हमारे लिए क्या औकात है।’ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों को ही पंजाब की राजनीति में अकाली दल का विरोध करने का अधिकार है, लेकिन उन्हें उस रास्ते पर नहीं जाना चाहिए, विरोध के जिस रास्ते पर ज्ञानी जैल यिंह चल पड़े थे। फिलहाल दोनों उसी रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं।

 कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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