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करिश्माई नेता का अवसान

करिश्माई नेता का अवसान

पुराचि तलैवि (क्रांतिकारी नेता) डॉ. जयराम जयललिता का दैहिक, भावनात्मक और उनके लाखों पार्टी काडरों तथा तमिलनाडु के लोगों के लिए करिश्माई सफर का अंत आखिर 5 दिसंबर को रात 11.30 बजे हो गया। मृत्यु से करीब 75 दिनों तक संघर्ष के बाद आखिर चेन्नई के अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने ऐलान किया कि मुख्यमंत्री ने आखिरी सांसें लीं।

डॉक्टरों का यह ऐलान अप्रत्याशित तो नहीं था फिर भी लाखों लोगों को ऐसा झटका दे गया जिससे लंबे समय तक उबरना आसान नहीं होगा। आखिर इसके साथ ही एक अनोखी साहसी, राजनीति में पारंगत और बेहद बुद्धिमान नेता का तमिलनाडु की राजनीति का अवसान हो गया। इस द्रविड़ राजनीति वाले राज्य में राजनीति अब पहले जैसी रह जाएगी। जयललिता के न होने का असर दिल्ली की राजनीति में भी बदस्तूर पड़ेगा।

पुराचि तलैवि न सिर्फ एक मजबूत क्षेत्रीय नेता थीं, बल्कि उनका नजरिया भी पूरी तरह राष्ट्रीय था। देश की राजधानी में उनकी राजनैतिक ताकत का एहसास शिद्दत से महसूस किया जाता रहा है। चेन्नई में उनकी हर राजनैतिक पहल की धड़कन 2,450 किमी. दूर दिल्ली में सुनाई देती रही है। उन्हें चाहे कोई नफरत करे या प्यार पर कोई भी उन्हें नजरअंदाज करने की नहीं सोच सकता था।

कर्नाटक के मांड्या जिले में मंदिरों के शहर मेलकोट के एक परंपरावादी आयंगर ब्राह्मण परिवार में 1948 में जन्मीं जयललिता का पहले तमिल सिनेमा और बाद में द्रविड़ राजनीति के कठिन डगर का सफर वाकई मार्के का है। इस दौर में उन्हें कितनी साजिशों से रू-ब-रू होना पड़ा, वह तो अभी अलग ही है। मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवारों की परंपरा के मुताबिक आठ साल की जयललिता का 50 और 60 के दशक में बेंगलूरू के बासवनगुडी मोहगे में कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम की शिक्षा लेने के लिए दाखिला कराया गया।

जयललिता की पढ़ाई-लिखाई बेंगलूरू के सेंट माक्र्स रोड पर बिशप कॉटन गल्र्स स्कूल में हुई। उससे अंग्रेजी भाषा में उनकी अच्छी पैठ हो गई। भरतनाट्यम में उनकी महारत को देख परिवार बंगलूरू से मद्रास पहुंच गया, ताकि तमिल फिल्मों में मौका पाया जा सके। वह मामूली शुरुआत एक विशाल करियर की बानगी बना।

युवा आकर्षक जयललिता की शख्सियत में दैहिक सुंदरता के साथ गजब की गरिमा का पुट था। उन्हें तमिल फिल्मों के तब के शहंशाह एमजीआर के साथ काम करने का मौका मिला। कुल मिलाकर उन्होंने एमजीआर के साथ 128 फिल्मों में काम किया। इससे उनके संबंध प्रगाढ़ हो गए। एमजीआर-जया की जोड़ी सुपरहिट थी। इससे उनके संबंधों को लेकर कई तरह की कानाफूसी शुरू हो गई। लेकिन उन्हें करीब से जानने वाले जानते थे कि ”एमजीआर और जयललिता के बीच अनोखा समन्वय विज्ञान की सीमाओं से परे था।’’ कोई भी चोरी-चुपके कहने के अलावा कुछ सामने कहने की हिमाकत नहीं जुटा पाता था।

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जयललिता अपने इस गुरु के साथ राजनीति में भी उतरीं। 1982 में जब जयललिता एआइएडीएमके पार्टी में शामिल हुईं तो कई भौहें तन गईं। वे राज्यसभा सदस्य और पार्टी की प्रचार सचिव बनाई गईं तो कइयों की ईष्र्या और जलन की शिकार बनीं। लेकिन अपने गुरु के प्रति समर्पित जयललिता ने कभी एमजीआर की छवि धूमिल नहीं होने दिया। अपने शानदार प्रदर्शन और धाराप्रवाह अंग्रेजी तथा तीक्ष्ण बौद्धिक टिप्पणियों से उन्होंने पार्टी के साथ अपनी छवि भी धारदार बनाई। राज्यसभा में शिक्षा और न्यसायपालिका से जुड़े भाषणों को खासकर याद किया जाता है।

Layout 1जयललिता के पक्के इरादों और बौद्धिक तीक्ष्णता का अंदाजा इससे भी लगता है कि ब्राह्मण होने के बावजूद उन्होंने ऐसे राज्य की राजनीति में अपना झंडा गाड़ा, जहां ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन सबसे तीखा था।

उनके दो भाषणों में यह झलक मिल जाती है कि प्रगतिशील समाज निर्माण के लिए प्रतिबद्ध थीं। जयललिता ने 21 मार्च 1985 को अपने भाषण में कहा, ”मायमिक स्तर तक लड़कियों को मुफ्त शिक्षा देने का प्रावधान काफी सराहना योग्य है और मैं इस मामले में मैक्सिम गोर्की का उद्धरण देना चाहूंगी कि ‘महिला के प्रति व्यवहार ही किसी सभ्यता का असली पैमाना है।’’ 7 मई 1984 के एक भाषण में उन्होंने कहा, ”संसार में सिर्फ एक ईश्वर और एक ही जाति है और वह मानव जाति। हम इस सिद्धांत में पूरा यकीन रखते हैं जिसे हमारे गुरु अन्ना ने हमें सिखाया है।’’

शुरु में पांच साल मुख्यमंत्री के दौर में भ्रष्टाचार के आरोप उन्हें झेलने पड़े। 23 दिनों की जेल भी काटनी पड़ी। इस तरह 1991 से शुरू हुआ वह दौर 2016 में आकर खत्म हुआ। ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेराल्ड लिसन ने कहा था कि राजनीति में हफ्ते भर का समय काफी लंबा होता है। लेकिन 1991 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने से लेकर दिसंबर 2016 तक जयललिता का 1300 हफ्तों का सफर बेमिसाल है। राजनीति की उठा-पटक और मुकदमों तथा आरोपों ने जयललिता को कठोर बना दिया था, जिसे उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार भी किया। वे संस्कृत के उस कथन की तरह थीं कि वैरादपि कटोहरानि, मृदुरानि कुसुमादपि (यानी हीरे से भी कड़ा और फूल से भी कोमल)।

वे जनप्रिय नेता थीं और खासकर महिलाओं और निचले पायदान के लोगों के कल्याण के प्रति समर्पित थीं। सस्ती कैंटिन सेवा जैसी उनकी लोकप्रिय योजनाओं के कारण लोग उन्हें प्रेम करते थे और उनकी पार्टी वाले उन्हें पुराचि तलैवी कहते थे।

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जयललिता को कुछ लोग तानाशाही मानसिकता वाली भी कहते थे। वे बतौर महासचिव पार्टी पर पूरा नियंत्रण रखती थीं और कठोर रवैए भी दिखाती थीं। लेकिन पार्टी की एकजुटता कायम रखने के लिए यह जरूरी बन जाता था क्योंकि तमिलनाडु की विभाजित राजनीति में मुलायम बनकर रहने से पार्टी आसैर सरकार बचाना मुश्किल होता।

तमिलनाडु की राजनीति दो द्रविड़ पार्टियों 95 वर्षीय मुतुवेल करुणानिधि की डीएमके और एआइएडीएमके के बीच दो ध्रुवों में बंटी हुई है। राष्ट्रीय दलों को इनकी पीठ पर सवारी करनी पड़ती है। जयललिता के निधन के बाद राज्य की राजनीति और दिल्ली के समीकरण कैसे बदलते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।

तमिलनाडु में पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि अंदरूनी कलह से एआइएडीएमके में टूट न हो। यह एआइएडीएमके से ज्यादा केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए जरूरी है। दरअसल भाजपा को जुलाई 2017 के राष्ट्रपति चुनावों में एआइएडीएमके के विधायकों-सांसदों का समर्थन चाहिए। जयललिता से तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्ते अच्छे थे। लेकिन अब स्थितियां अलग हो सकती हैं।

जाहिर है, केंद्र की भाजपा अगुआई वाली एनडीए सरकार की नजर एआइएडीएमके और राज्य सरकार पर बनी रहेगी। ओ. पनीरसेल्वम की एआइएडीएमके की सरकार का सुचारू रूप से चलना केंद्र की भाजपा सरकार के लिए बेहद जरूरी है। फिलहाल तो पनीरसेल्वम के साथ सब कुछ दुरुस्त लगता है लेकिन समस्या तब पैदा होगी जब पार्टी के ताकतवर महासचिव का प्रादुर्भाव होगा। अब देखना यह है कि शशिकला नटराजन क्या गुल खिलाती हैं?

चेन्नई से एस. ए. हेमंत कुमार

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