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विमुद्रीकरण का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

विमुद्रीकरण का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

कार्ल माक्र्स के अनुसार पूंजी की धुरी पर तन्त्र घूमता है। सयम और शुचिता का विश्व को संदेश देने वाले भारत में यह कथन चरितार्थ हो रहा था। लगता था कि सभी पैसा या मुद्रा के पीछे भाग रहे हैं। धन समाज में एकमात्र सम्मान का द्योतक हो गया था।

इस दुष्चक्र में भारत क्रमश: फंसता गया और देश मे काला धन बनता ही गया। यह कालाधन अधिकांशत: पांच सौ तथा एक हजार के बड़े नोटों के रूप में संचित था। एक अनुमान के अनुसार कुल 15 लाख करोड़ के बड़े नोटो मे 30 प्रतिशत अर्थात् लगभग पांच लाख करोड़ काला धन है। 8 नवम्बर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सरकार की एक घोषणा ने इन बड़े नोटों को अवैध घोषित कर दिया। इससे सम्पूर्ण देशों मे खलबली मच गई। धनी लोगों, राजनीतिज्ञ से लेकर आतकवादियों, नक्सलियों तथा हवाला कारोबारियों मे अफरा-तफरी मच गई। पर ये रसूखदार अन्दर से दुखी रहने के बावजूद चुप रहे। देश मे असतोष जन-सामान्य का असंतोष उमड़ा जो अमेरिकावासी की भांति चाहता तो ईमानदारी तथा शुचिता का देश पर उसके लिए अपना व्यक्तिगत त्याग करने के लिए तैयार नहीं है। वह तो इसी बात से आक्रोश में है कि उसको दैनिक जीवन की गाड़ी में बाधा आ गई है। उसे लम्बी-लम्बी कतारें लगाकर अपने पुराने पांच सौ तथा एक हजार के नोटों को बदलवाना पड़ रहा है। उसके जीवन भर की गाढ़ी कमाई स्वाहा हो गई है। कहीं सरकारी घोषणाओं के भ्रमजाल में उसके जीवन की कमाई न फंस जाये। वस्तुत: यह घटनाचक्र सरकार मे जनता के घटते विश्वास को दर्शाता है।

समाज पर प्रभाव: विमुद्रीकरण से सभी वर्ग खुश है। मजदूर खुश हंै क्योंकि उसका शोषण करने वाले मालिक का काला धन बाहर आ जायेगा। किसान दुखी है क्योंकि वह अपनी फसल के लिए बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक आसानी से नहीं खरीद पा रहा है। उसकी संचित पूंजी को खतरा है क्योंकि वह आसानी से बैंक तक नहीं पहुंच सकता। कइयों का तो बैंक में खाता ही नहीं है।

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ईमानदार सरकारी अधिकारी एव कर्मचारी खुश हैं कि वे कैसे अपने काले धन को निकाले। यही हाल डॉक्टरों, वकीलों तथा अन्य पेशेवर लोगा का है क्योंकि पैसे की जगह सोना बिक्री करने वाले सर्राफे के व्यापारियों पर सरकार की निगाह हैं। बड़े व्यापारी परेशान हैं क्योंकि वे अपनी पूरी आय नहीं दिखाते थे। उन्हें सरकार को कर देना ही पड़ेगा। कारपोरेट तथा औद्योगिक जगत के लोग खुश हैं क्योंकि उनसे अधिक राजनीतिज्ञ परेशान हैं। जिनके पास बिना किसी उद्योग-धंधे के उनसे अधिक सचित धन। प्रदेशों में ऐसे क्षत्रय उदय हो चुके हैं जो कालाधन सचित करके केन्द्रीय सरकार की सत्ता को खुलेआम चुनौती देते हैं। कालाधन संग्रह करने के आधार पर ही उनकी व्यक्तिगत पूजा होती है तथा वे अपने दल का अकेले संचालन करते हैं। अब उन्हें अपनी सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना पड़ेेगा। भारत के अन्दर एक वर्ग की दूसरे वर्ग के प्रति छिपी ईष्र्या है। अत: सामान्य रुप से विमुद्रीकरण का देश में स्वागत हो रहा है। देश में प्रथम बार आर्थिक कदम के द्वारा नैतिकता तथा ईमानदारी का संदेश नीचे तक गया है। यहां तक कि प्रत्येक घर में गृहणियां ने भी स्वीकार किया कि उन्हें अपने पति से धन नहीं छुपाना चाहिए था। सभी को डिजीटल इंडिया अपनाना ही होगा। इंटरनेट द्वारा काम करना ही होगा।

आतंकवाद पर प्रभाव: विमुद्रीकरण से आतंकवाद एक आर्थिक आतंकवाद के साये में आ गया है। उसका पोषण करने वाले हवाला कारोबारियों की कमर टूट गई है। सबसे अधिक नुकसान हवाला कारोबारियों को हुआ है। जिनका कच्चा माल तथा उत्पाद मुद्रा ही प्रश्रय है वे ही आतंकवादियों, शस्त्रों के अवैध व्यापारियों, नशे की दवाओं के तस्करों, सट्टाबाजों, नकली नोटों इत्यादि के बैंक थे। जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल में सिमी आतंकवादियो की टांग टूट गई है। उन्हें अपने को संभालने में कम-से-कम पांच वर्ष का समय लगेगा। कमोबेश यही हाल नक्सलवादियों का हुआ है तथा पूर्वोत्तर भारत मे राष्ट्र विद्रोहियों का भी। वे स्थानीय लोगों से जोर-जबरदस्ती करके अपने बड़े नोट बदलवाने का प्रयास करेंगे पर उन्हें कम-से -कम तीस प्रतिशत धनराशि का बलिदान करना ही पड़ेगा।

भ्रष्टाचार पर लगाम: भ्रष्टाचारियों के पास यह संदेश स्पष्ट रूप से गया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त होकर धन संचित करना व्यर्थ है। उन्होंने भ्रष्टाचार के द्वारा स्वयं एव परिवार को बर्बाद किया। अब वे वह धन भी नहीं रख पा रहे हैं। अत: एक सीमा से परे भविष्य में भ्रष्टाचारी घूस लेने से मना कर देगे। वे कितने लोगों के खाता में अपना काला धन जमा करेंगे? वे लोग ही उनका काला धन वापिस देने से मना कर देंगे। अलग से उन्हें विभागीय तथा आयकर विभाग की कार्यवाहिया का सामना करना पड़ेगा। नोट बदलने की कतारों में देखा गया कि उनमें प्राय: पांच से दस प्रतिशत पुलिस के लोग तथा अन्य सरकारी कर्मचारी थे। भ्रष्टाचार का अन्तिम पड़ाव राजनीतिज्ञों द्वारा भ्रष्टाचार है। वह भी डगमगा गया है। अत: भ्रष्टाचारियों का आत्मविश्वास पूर्णत: हिल गया है तथा वे सकते में आ गये हैं।

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सारांश- विमुद्रीकरण से आशा की जाती है कि कीमतों पर नियन्त्रण होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था में उपस्थित समान्तर अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है जो कि किसी भी सरकारी योजना को विफल करने मे समर्थ है। वह ही रियल इस्टेट या भवन-निर्माण क्षेत्र की प्रगति भी देश में समान रुप से आवश्यक है पर उस क्षेत्र में व्याप्त काला धन ने माफिया तथा गुण्डागर्दी बढ़ा दी थी। वह अब कम होगी तथा भवन-निर्माण क्षेत्र व्यापारिक सिद्धान्तों पर नये रुप से चलेगा। नोटबन्दी से परेशान विद्यार्थी तथा सामान्य जन कुछ दिनों में सामान्य स्थिति में आ जायेगा पर यह भी सिद्ध हो गया है कि बैकिंग क्षेत्र के द्वारा सभी कुछ नहीं किया जा सकता है। यह क्षेत्र इतना सक्षम नहीं है कि केन्द्रीय सरकार की सभी नीतियां का कार्यान्वयन कर सके। नोटबन्दी अपने में कोई उद्देश्य नहीं है।

इसके परिणामों को अन्तिम रुप से उपलब्ध करने के लिए अभी मीलों दूर जाना है। बेनामी सम्पत्ति अधिनियम, 2016 तथा मनी लाउन्डरिंग अधिनियम का ठीक तरह से क्रियान्वयन करना होगा तथा इस कार्यान्वयन की मशीनरी के विरुद्ध भी दृष्टि रखनी होगी। यह न हो कि देश का कालाधन एक स्थान से अन्य स्थान पर पहुंच जाये। मध्यम वर्ग ने इस कदम को आशा से परे स्वागत किया है। इसका अर्थ है कि कुछ कष्ट वहन करके भी लोग देशहित में त्याग करने के लिए तैयार है। पर बहुत कुछ प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त करनी होगी ताकि सामान्य ईमानदार तथा विधि-पालक नागरिक को परेशानी न हो। आशा है कि आने वाले कल में और ऐसी योजनाएं न त्यागकर इस योजना के लाभों का सुदृढ़ीकरण करने पर अधिक ध्यान दिया जायेगा।

डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल

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