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नोटबंदी से होती राजनीतिक लामबंदी

नोटबंदी से होती राजनीतिक लामबंदी

नोटबंदी को एक महीना हो चला है। बैंकों और एटीएम की कतारें यथावत हैं। या कहें कि अब उनकी आदत सी पड़ रही है। नोटबंदी से और कुछ हुआ हो या नहीं लेकिन इसने हर मीडियाकर्मी और राजनेता को अर्थशास्त्री जरूर बना दिया है। जितने मुंह उतने ही आर्थिक फलसफे और विश्लेषण। जिसे देखो वो हजारों और लाखों-करोड़ों की बात करता नजर आता है। मगर सोचने की बात है कि मोदी का नोटबंदी का फैसला क्या सिर्फ आर्थिक है। याद कीजिए, प्रधानमंत्री मोदी का आठ नवम्बर का टीवी पर दिया राष्ट्र के नाम संदेश। उसका अगर ‘वर्ड क्लाउउ’ यानि शब्द पोटली बनाकर उसे खंगाला जाए तो तीन शब्द-प्रयोग आपकी मुट्ठी में आएंगे। पहला कालाधन दूसरा भ्रष्टाचार और तीसरा फर्जी करेंसी। अब तीनों के संदर्भ में विशुद्ध राजनीतिक मायने हैं।

देश की राजनीति पिछले कोई पांच साल से भ्रष्टाचार, कालेधन और जाली नोटों से फैले आतंकवादी तानेबाने के इर्द-गिर्द घूम रही है। याद कीजिए 2014 से पहले का परिदृश्य जिसमें कोयला घोटाला, टूजी घोटाला और राष्ट्रमंडल खेल घोटाला आम शब्द थे। इनकी कोख से जन्मा अन्ना आंदोलन और फिर पैदा हुई आम आदमी पार्टी। अब ये शोध का विषय है कि जिन उसूलों से ‘आप’ बनी उसका उसके लिए कोई मतलब है भी या नहीं? मगर एक बात साफ है कि देश के वोटर के लिए कालाधन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से सुरक्षा देश के लिए बड़े राजनीतिक मुद्दे थे और आगे भी रहेंगे।

मोदी ने नोटबंदी करके इन तीनों बड़े राजनीतिक मुद्दों से सीधे-सीधे सींग गड़ाए हैं। इसलिए अगर आप देखें तो दो नेता नोटबंदी के खिलाफ ज्यादा बोलते नजर आ रहे हैं। वे हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। उसका कारण है ये दोनों ही गैर भाजपा-गैर कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश में लगे हुए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ‘आप’ और टीएमसी का बड़ा मुद्दा था। मोदी ने कालेधन के खिलाफ इतना साहसिक कदम उठाया कि इन दोनों की राजनीतिक जमीन खिसक गई है। अगर आपको यकीन न हो तो दिल्ली और कोलकाता में बैंक और एटीएम की लाइनों में लगे मध्यमवर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों का सर्वे कराकर देख लीजिए।

मेरा अनुमान है कि 90 फीसदी से ज्यादा लोग नोटबंदी की मंशा को सही ठहराएंगे। इसके बावजूद कि उन्हें अपना ही पैसा निकालने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। ये भी सही है कि बाजार में छुट्टे रूपयों की बेहद किल्लत है। साथ ही लोगों के धंधे पर फिलहाल असर पड़ा है। इतनी तकलीफों के साथ ही लोग यही कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार और कालाधन खत्म करने के लिए किसी ने तो हिम्मत दिखाई है। उसी तरह कई लोगों ने ये भी कहा कि कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हो गई है। इसे भी वे जाली नोटों पर रोक लगने से जोड़कर देख रहे हैं और ये बातें कौन कर रहे हैं, समाज के एकदम निचले पायदान पर खड़े लोग। नोटबंदी से होने वाली तकलीफ  के बारे में ज्यादा शिकायत करते हुए आपको नेता, अफसर, धनपति और मीडियाकर्मी ही अधिक मिलेंगे। रिक्शा चलाने वाले, गार्ड, ड्राईवर, सब्जी का ठेला लगाने वाले, छोटे-मोटे दुकानदार या फिर मध्यमवर्ग के लोग आपको प्रधानमंत्री की नियत और हिम्मत की तारीफ करते ही मिलेंगे। यानि मोदी का एक बड़ा मकसद अभी पूरा होता दिखाई दे रहा है जोकि हैभ्रष्टाचार, कालेधन और जाली नोटों के खिलाफ निर्णायक कदम की नियत और ऐसा करने की हिम्मत। इसका आर्थिक विश्लेषण तो अर्थशास्त्री करेंगे परन्तु राजनीतिक तौर पर प्रधानमंत्री ने उन लोगों के दिलों में जगह बना ली है जो हर नेता और पार्टी को भ्रष्ट मानते थे। मोदी ने अपनी अपील का फैलाव भाजपा के पारम्परिक वोट बैंक से आगे कर लिया है। इस मायने में नोटबंदी के आर्थिक परिणामों से जुदा मोदी ने इसका बड़ा राजनीतिक मकसद तो हासिल कर लिया है।

उमेश उपाध्याय

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