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सतचिन्ता में डूब जा रे मनवा

सतचिन्ता में डूब जा रे मनवा

दुनिया में रहने वाले जितने भी व्यक्ति हैं, हर कोई कुछ न कुछ चिंता के घेरे में बंधे रहता है। व्यक्ति कितना भी ज्ञानी क्यों न हो उसके मन में कुछ-न-कुछ अवश्य चिन्ता रहती है।

कितने ही व्यक्ति तो चिंता को सच मान लेते हैं जिससे वो हमेशा दुश्चिन्ता में रहते हैं। जो मनुष्य सतचिन्ता को अपने जीवन का मुख्य अंग बना लेता है, वह मनुष्य अपने जीवन का आनंद लेता है। जो व्यक्ति दुश्चिन्ताको अपने जीवन का एक अंश बना लेता है, वह अपने जीवन के चारो तरफ दु:ख का एक घेरा बना लेता है। जीवन के इस सफर में सवारी भी हम है और चालक भी हम है। सफर उतना ही सुगम होगा जब हमें सही रूप से चलना आएगा। यह सोचने वाली बात है कि जो चिंता हमारे मन को भयभीत करती है, जिससे हमें दु:ख पहुंचता है तो हम उसे अपने मस्तिष्क में जगह ही क्यों देते है? जिस चिंता से हम खुद को घाटे में रखते है उसी चिंता का  उपचार भी हमारे हाथों में नहीं होता। कभी-कभी जिस चिंता के कारण हम अपने जीवन को बर्बाद भी कर लेते है अंतत: वही चिंता मिथ्या साबित होती है। सत्य तो यह है कि हमारा ह्रदय बिलकुल गुब्बारे जैसा बहुत ही हल्का होता है। दुश्चिन्ता पहले-पहले हमारे ह्रदय में एक कंकड़ की तरह बंध जाती है और यह धीरे-धीरे पत्थर जैसा बन कर हमारे ह्रदय को जकड़ लेती है। इसके भारीपन से हमारा ह्रदय आसानी से उड़ नहीं पाता और अंत में टूट जाता है।

इस भारीपन से हमारा जीवन घुटन में बदल जाता है और मृत्यु  के सामान हो जाता है। इसलिए यदि मन में कोई दुश्चिन्ता हो तो उसे अपने मस्तिष्क से अवश्य बाहर निकाल देना चाहिए। कभी-कभी यही दुश्चिन्ता जानलेवा बीमारी में परिवर्तित हो जाती है। निमयित रूप तथा सच्चे मन से विनियोग करने से दुश्चिंता  मन में स्थान नहीं बना पाती। विश्वासी मन वाले व्यक्ति में दुश्चिन्ता कभी जगह नहीं बना पाती। हमेशा दुश्चिन्ता में रहने वाला व्यक्ति किसी को सुख प्रदान करने में सामर्थ्य नहीं होता।

सतचिन्ता करने वाला प्रत्येक व्यक्ति हमेशा संतुष्टि भाव से रहता है। उनकी सतचिंता उनके मन को इतना हल्का बना देती है की वे मुक्त गुब्बारे जैसा अनुभव करते हैं। वह इतना ऊपर रहते है कि उन्हें सबकुछ सही दिखता है। परेशानी के समय भी वे विचलित नहीं होते। सतचिन्ता करना धीरे-धीरे एक अभ्यास बन जाता है। हम सभी को हमेशा कुछ-न-कुछ सतचिन्ता करने का प्रयास करते रहना चाहिये। सतचिन्ता करने वाला हर व्यक्ति किसी भी परिस्थिति का सामना कर लेता है। भगवत-प्रीति और सतकार्य करने से हम आसानी से सतचिन्ता को मन में स्थान दे सकते हैं। सतचिन्ता एक छोटी बात नहीं है। जीवन को आनंदमय करने का यही रहस्य है। अन्य रूप से देखे तो हम जैसा सोचते हैं वैसा ही हमारे जीवन में घट जाता है। इसलिए अपने मन में सतचिंता को जगह देकर अपने जीवन को सुखमय एवं सफल बनाये।

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