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महान योद्धा अम्मा

महान योद्धा अम्मा

अचानक कैमरे पुराने जमाने की रूपसी नायिका, चमत्कारी कामयाब राजनैतिक नेता और गरीब तथा वंचितों की अम्मा पर केंद्रित हो गए। 24 घंटे तक समूचे मीडिया का रुख अम्मा की ओर मुड़ गया, जब उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए देश के संवैधानिक प्रमुख और दिग्गज नेताओं का जमावड़ा चेन्नई के राजाजी हॉल में हो गया। बेशक, जयललिता के अवसान से भारतीय राजनीति में ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसकी भरपाई मुश्किल है। एमजीआर के साए से बाहर निकल कर जयललिता ने अपने लिए एक नई पहचान बनाई थी। एमजीआर के निधन के बाद वे सिर्फ एक साहसी नेता के तौर पर ही नहीं उभरीं, बल्कि बेहद चुनौती भरे दौर में सफलता की अनोखी कहानी भी लिखती रही हैं। उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई, यह उनके अंतिम संस्कार के वक्त उमड़े जन सैलाब से साबित हो जाता है। उन्होंने अपने हर विरोध और चुनौती को अपने लिए अनोखे मौके में बदलने का साहस दिखाया। उन्होंने मौजूदा भारतीय और खासकर तमिल राजनीति के बेहद उलझे और विपरीत दौर में कामयाबी हासिल की।

बिना किसी राजनैतिक विरासत के पारंपरिक ब्राह्मण परिवार की एक महिला के लिए ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति में चतुर और अनुभवी करुणानिधि के मुकाबले एक नहीं, छ: बार मुख्यमंत्री बनाना कोई आसान काम नहीं था। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में भी अनोखा प्रदर्शन दिखाया। अकेले दम पर कुल 39 में से 38 सांसदों को जितवा कर लोकसभा में भेजा। इससे एआइएडीएमके लोकसभा में तीसरा सबसे बड़ा दल बन गया। जयललिता का इससे केंद्र की राजनीति में कद काफी ऊंचा हो गया। अब उनके बाद एआइएडीएमके को आगे चुनौती भरे दौर में अपना वही जज्बा और हैसियत कायम रखनी है।

गौरतलब है कि जयललिता का राजनीति में प्रभावी अवतरण उदारीकरण के दौर के साथ होता है। उनकी पहल और इंफ्रास्ट्रक्चर की बुनियाद रखने की उनकी क्षमता से राज्य में वाहन उद्योग का भारी विस्तार हुआ। 2011 से 2016 के दौर में उन्होंने राज्य में 500 मेगावॉट क्षमता बिजली उत्पादन का विस्तार करके राज्य को बिजली के संकट से उबारा। वे सक्षम प्रशासक थीं। सो, आश्चर्य नहीं कि प्रतिभावान नौकरशाह उनके दौर में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता से काम कर पाते थे। कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुविधाओं, सड़क वगैरह के मामले में तमिलनाडु बाकी राज्यों से हमेशा आगे रहा है। तमिलनाडु आज अगर प्रति व्यक्ति आय के मामले में बाकी राज्यों से आगे है तो उसकी आधारशिला 1991 से 1996 के दौर में उनके राज में रखी गई।

इंदिरा गांधी के बाद जयललिता शायद देश में सबसे ताकतवर और कद्दावर महिला नेता रही हैं। हालांकि इंदिरा गांधी के उलट जयललिता को इस हैसियत में पहुंचने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है। पुरुष प्रधान राजनीति में किसी महिला के लिए संघर्ष करना कभी आसान नहीं रहा है। जयललिता के कई राजनैतिक फैसलों और कदमों की आलोचना तो हो सकती है लेकिन यह तो मानना होगा कि उन्होंने कई बार पस्त हुई पार्टी को नए सिरे से एकजुट किया और बार-बार सत्ता में ले आईं।

राजनीति की उठा-पटक और जोड़तोड़ ने जयललिता को कठोर बनाया। एक अनिच्छुक अभिनेत्री और अनिच्छुक राजनीतिज्ञ से तमिलनाडु की राजनीति की सबसे ऊंची शख्सियत बनाना संघर्ष की एक अनोखी गाथा है। वे हर बाधा को चुनौती मानकर उसका सामना करती थीं और आगे बढ़ती जाती थीं। उनकी विरासत उनकी कल्याण योजनाओं में निहित है जिससे राज्य के कई वर्ग लाभान्वित हुए। वे गरीबों की हमदर्द थीं और महिलाओं तथा कमजोर वर्गों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अकाट्य थी। सस्ते दर की कैंटीन जैसी उनकी कुछ अनोखी योजनाओं ने उन्हें क्रांतिकारी नेता की पदवी दिला दी। जयललिता पर तानाशाह होने का आरोप भी लगते रहे हैं। उन्होंने अपने इन्हीं तरीकों से बतौर महासचिव पार्टी पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। लेकिन इसी से वे पार्टी को एकजुट रख पाईं और सरकार को बचाए रहीं। वरना तमिलनाडु की बेहद जोड़तोड़ वाली राजनीति में यह आसान नहीं था। कहना न होगा कि पार्टीजनों की उनके प्रति ऐसी वफादरी थी कि कोई दूसरी श्रेणी का नेता उभर ही नहीं पाया। हालांकि कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि से राजकाज के मामले में बिल्कुल अलग थीं।

उनकी लोकलुभावन योजनाएं सरकारी खजाने पर भारी दबाव पैदा करती थीं। ऐसी योजनाओं से टिकाऊ विकास संभव नहीं दिखता। लेकिन यह तो कहना ही होगा कि अपनी योजनाओं के कारण भारी लोकप्रिय लौह-महिला अब देवलोक में सिधार चुकी हैं और अब नए नेताओं को देखना है कि पार्टी कैसे एकजुट रहे, अम्मा की चलाई योजनाएं जारी रहें और विकास के मानकों में राज्य सबसे आगे बना रहे। यही अम्मा को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

кистиthomas bek

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