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बाल मन को समझें और विकास सहज बनाएं

बाल मन को समझें और विकास सहज बनाएं

‘क्या आपका बच्चा दुनिया का सामना करने के लिये तैयार है?’ पुस्तक में एक बच्चे के मानसिक विकास तथा इसमें उसके माता-पिता के योगदान की चर्चा की गई है। लेखक ने विभिन्न लेखकों की बचपन के बारे में लिखे विचारों को जुटाया। लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से लिखा है कि अच्छे माता-पिता बनने के लिए यह आवश्यक है कि बच्चों की जरूरतों के लिए माता-पिता अनेक आवश्यकताओं और इच्छाओं का त्याग करें। इस त्याग के फलस्वरूप, माता-पिता के चरित्र में गरिमा का विकास होता है और वे नि:स्वार्थ सत्य को व्यावहारिक रूप में प्रयोग में लाना सीख जाते हैं। लेखक आगे लिखते हैं कि जब बात आती है एक पिता होने की, तो इससे कोई फर्क नही पड़ता कि आप किसी फाच्र्यून 500 कार्पोरेशन के सीईओ हैं, मशहूर खिलाड़ी हैं, फौज में अफसर हैं, इंजीनियर हैं या फिर सूचना प्रौद्योगिकी के प्रोफेशनल हैं। आपके बच्चे के लिए आप सिर्फ एक पिता हैं, न उससे कुछ ज्यादा, न कम। चूंकि लेखक एक शिशु रोग चिकित्सक हैं, अत: उन्होने कई सारे छोटे बच्चों का उदाहरण देते हुए इन बच्चों के बचपन की चर्चा की है। प्रो. अनुपम सिब्बल ने अपनी इस पुस्तक में अत्यन्त समझदारी, संवेदना और अनुभव के साथ एक सुन्दर, विस्तृत और व्यावहारिक मार्गदर्शिका का सृजन किया है जिसे प्रत्येक माता-पिता को व्यवहार में लाना चाहिए। माता-पिता को इसे एक आमंत्रण के रूप में समझना चाहिए। उसके मस्तिष्क और उसके हृदय में छिपे संवेदनशील पे्रम को केन्द्रित करने के लिए और उसे दिशा देने के लिए, ताकि बच्चे प्रसन्नता के साथ पलें-बढ़ें और माता-पिता भी अपनी भूमिका को निभाते हुए प्रसन्नता का अनुभव करें।

क्या आपका बच्चा दुनिया का सामना करने के लिए तैयार है?

लेखक                  : डॉ. अनुपम सिब्बल

प्रकाशक        : मंजुल पब्लिशिंग हाउस

मूल्य                   : 175 रु.

पृष्ठ                    : 165

लेखक अपनी इस पुस्तक में ‘गलतियां करने  और उस गलती को स्वीकार करने’ नामक लेख के हवाले से यह समझने का प्रयास करते हैं कि जब हम अपने बच्चों को साइकिल चलाना सिखाते हैं तो हम जानते हैं कि वे गिरेंगे। गिरेंगे तभी सीखेंगे। जहां हम कुछ मामलों में उदार बन जाते हैं  और उन्हें गलतियां करने की अनुमति दे देते हैं, या फिर उन्हें गलतियां करने के लिए प्रोत्साहित भी करते है, वही अधिकतर मामलों में हम आवश्यकता से अधिक रक्षात्मक या निर्णायात्मक हो जाते हैं। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अपने बच्चों के साथ बहुत छोटी उम्र से ही एक ऐसा रिश्ता कायम करें जो उन्हें न केवल गलतियां करने की स्वतंत्रता दें, बल्कि कब उनसे गलती हुई, इसके बारे में बात करने का भी विश्वास जगाये। इसके माध्यम से लेखक ने बच्चों को छोटी उम्र से मानसिक तनाव से बचाते हुए तथा उन्हें आज के समाज के परिवेश लायक बनाने की तरकीब सुझाया है, जिससे वो अपने आगे आने वाले जीवन को सार्थक और सहज बना सकें। यह पुस्तक पाठकों को अत्यंत प्रभावित करेगी। यह पुस्तक मुख्यत: उन माता-पिता को प्रभावित करेगी, जो अपने बच्चों के अच्छी भविष्य की चिंता करते हैं।

रवि मिश्रा  

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