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नोटबंदी राजनीति, पूर्वाग्रह और पीड़ा

नोटबंदी राजनीति, पूर्वाग्रह और पीड़ा

नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को काले धन और भ्रष्टाचार पर सबसे तगड़े हमले के लिए जैसे ही ऐलान किया कि आज आधी रात से 500 और 1000 रु. के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे, पूरे देश में एक उथल-पुथल-सा माहौल है। लोग काले धन के खिलाफ इस मुहिम के समर्थन में हैं लेकिन अपने दैनिक जीवन में परेशानियों और अर्थव्यवस्था पर इसके कुल असर के मद्देनजर कुछ दहशत में हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री की वह भावुक अपील स्वीकार कर ली कि 50 दिनों में हालात सामान्य हो जाएंगे। वह वक्त भी 31 दिसंबर को पूरा होने को आ रहा है।

इन नोटों का चलन बंद करने का मतलब है कि चलन में से 87 फीसदी मुद्रा (या 500 और 1000 रु. के 2201 करोड़ नोटों) को हटा लिया गया। इसमें से, बकौल रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर एस.एस. मुंधड़ा, 12.44 लाख करोड़ रु. 8 नवंबर से 10 दिसंबर तक बैंकों में जमा करा दिए गए थे। उम्मीद यह भी है कि दिसंबर के अंत तक पुराने नोट को जमा कराने की भारी भीड़ रहेगी। हालांकि उन्हें मार्च के अंत तक जमा कराया जा सकता है।

लेकिन राजमर्रा की जिंदगी में लोगों को हो रही तकलीफों को देखकर कुछ राजनैतिक नेताओं ने सोचा कि इससे मोदी की लोकप्रियता में सेंध लगाया जा सकता है। राष्ट्रीय मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज करने को उतावले ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं और बेशक, राहुल गांधी ने इसे मोदी पर हमले का अनोखा मौका माना। राहुल की तो सुबह-शाम मानो मोदी की नुक्ताचीनी में ही बीतती है। इन सभी ने आम आदमी की आर्थिक दिक्कतों को अपने साझा दुश्मन पर वार करने का बहाना बनाया।

हालांकि नरेंद्र मोदी को शायद वी.पी. सिंह की ही तरह अफसोस हो रहा है कि काले और छुपे धन को निकालने की उनकी योजना का राजनीतिकरण किया जा रहा है। वी.पी. सिंह को लगातार अफसोस रहा कि मंडल आयोग की रपट लागू करने की योजना का राजनीतिकरण किया गया और उससे लालू और मुलायम यादव जैसे जाति आधारित नेताओं का उदय हुआ। मोदी की नोटबंदी से ममता, केजरीवाल और राहुल जैसे राजनैतिक दुश्मनों और मनमोहन सिंह तथा पी. चिदंबरम जैसे तीखे आलोचकों को शह मिल गई।

ममता दीदी तो कौल उठा रही हैं कि चाहे उनकी जान चली जाए मगर वे मोदी को राजनीति से बाहर करके रहेंगी। लेकिन दीदी का नौटंकी करने में कोई जोड़ नहीं है। उन्होंने कुछ दिनों पहले विमान में और जमीन पर अपनी जान पर खतरे की आशंका से दिल्ली से गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी थी। हालांकि दिल्ली से लगातार खंडन किया जाता रहा। उसी तरह नोटबंदी में दीदी को राष्ट्रीय मंच पर चमकने को मौका दिख रहा है, खासकर ऐसे दौर में जब विपक्ष बिखरा हुआ है और राहुल गांधी की साख नहीं बन रही है।

सो, ममता ने फौरन धमकी दे डाली कि नोटबंदी का फैसला वापस लो, वरना.. ..। दीदी ही की तरह नौटंकी में माहिर दूसरे नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ममता के आग उगलू बयान इतने भाए कि वे उनके साथ हो लिए। शायद इस उम्मीद में कि इससे वे रातोरात राष्ट्रीय नेता बन जाएंगे। केजरीवाल का सिद्धांत शायद यह है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। सो, दोनों ने राजधानी में साझा मुहिम की लेकिन वे यह देख हताश हो गए कि लोग नोटबंदी का स्वागत कर रहे हैं। इस तरह दीदी तो अपने सुरक्षित पनाहगाह कोलकाता में लौट गईं। केजरीवाल ने अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों और जांच-पड़ताल से सुरक्षित खेलना ही मुनासिब समझा। उन्होंने कहा कि मोदी काला धन और भ्रष्टाचार मिटाने में सफल हो जाते हैं तो वे जय मोदी कहेंगे। यानी अब वे दो पाए पर खड़े हो गए हैं।

इंडिया टुडे और एक स्वतंत्र एजेंसी के सर्वेक्षण से पता चलता है कि करीब 84 प्रतिशत लोग तकलीफें सहने को तैयार हैं, ताकि जमाखोरों, घूस लेने वालों और काले धन वालों का खुलासा हो। नोटबंदी के खिलाफ विपक्षी एकता नहीं हो पाई क्योंकि ममता, केजरीवाल या राहुल गांधी सभी मोदी के मुकाबले नेता बनने की होड़ में लगे हैं।

संसद के शीतकालीन सत्र के आखिर में राहुल गांधी ने ऐलान किया कि उनके पास मोदी के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत हैं, लेकिन वे इसे सिर्फ संसद में ही पेश करेंगे। वे ऐसा नहीं कर पाए। उनके अपनी पार्टी के नेताओं या विपक्ष के लोगों को ही अंदाजा नहीं था कि मोदी के भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके पास कैसे सबूत हैं। केजरीवाल ने तो उनसे इसका खुलासा करने का भी आग्रह किया। लेकिन वे नोटबंदी से किसानों को होने वाली तकलीफों का ज्ञापन देने के बहाने मोदी से मिलने पहुंच गए। इससे विपक्षी एकजुटता में खलल पडऩे लगी।

दरअसल बैंकों और एटीएम में लंबी कतारों में खड़े होने के बाद खाली हाथ लौटने वालों में विपक्ष के गुस्सा जगा पाने में नाकाम रहने की वजह राजनैतिक से अधिक भावनात्मक है। गरीब और वंचित लोग मोदी का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि वे बेइमानों को परेशान होता देख रहे हैं। दूरदर्शी मोदी ने आकांक्षी भारतीयों और गरीबों का दिल छू लिया है। वे मानते हैं कि जमाखोरों, घूसखोरों और भ्रष्टाचारियों से पैसा निकलेगा तो अच्छे दिन आएंगे।

एक साठेक साल की महिला से तकलीफों के बारे में पूछा गया तो उसने हंसकर कहा, ”हां, तकलीफें तो हैं लेकिन मेरा दुख तो थोड़े दिन में दूर हो जाएगा जबकि मेरे मालिकों का दुख लंबे समय तक रहेगा। उनका पांच करोड़ का नुकसान हो गया। उनके यहां छापा पड़ा।’’ यही असली भावना है। जो लोग माफी योजना के तहत अपनी संपत्ति का खुलासा कर रहे हैं और जिन पर जुर्माना लगा है, उन सभी को आगे टैक्स देना होगा। इससे सरकार के खजाने में पैसा आएगा, जो अभी तक नहीं आ रहा है।

दरअसल मोदी ने अपने कदम से मनमोहन सिंह के भारी भूल और ”महा विपत्ति’’ के आरोपों से एकदम उलट उन भारी गलतियों को दुरुस्त करने का काम किया है जिसके कगार पर अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को ला खड़ा किया था। डॉ. सिंह ने संसद में अपने 10 मिनट के भाषण में कहा कि नोटबंदी के पहले लोगों को 72 घंटे का नोटिस दिया जाना चाहिए था। मोदी ने जवाब में उनका नाम लिए बगैर कहा कि वे अपनी तैयारी के लिए 72 घंटे की नोटिस चाहते थे।


मोदी की राहुल को खुली चुनौती


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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हंगामाखेज शीतकालीन सत्र में नहीं बोल सके। मगर वे अनुभवी रणनीतिकार हैं। सो, उन्होंने विपक्ष और खासकर राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देने का एक तरीका निकाल ही लिया।

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक बुलाई और पार्टी सांसदों के आगे अपने भाषण का प्रसारण दूरदर्शन के लिए रिकॉर्ड करवा दिया।

दूरदर्शन ने संसद के दोनों सत्रों के सत्रावसान के बाद मोदी का पूरा भाषण प्रसारित कर दिया। मोदी का भाषण राहुल गांधी को दो-टूक जवाब की तरह था। जब मोदी का अपने 282 लोकसभा और 55 राज्यसभा सदस्यों के सामने दिए गए भाषण का दोपहर में प्रसारण हो रहा था तो राहुल गांधी को सारा श्रेय लेने देने की कांग्रेस की रणनीति के कारण वे खुद किसानों की व्यथा सुनाने प्रधानमंत्री के पास पहुंचे हुए थे। इस तरह विपक्ष की एकजुटता में खलल पड़ गई।

मोदी ने इस मौके को कांग्रेस पर वार करने में लगाया। उन्होंने दस्तावेजों से यह साबित किया कि कांग्रेस इंदिरा गांधी के दौर से ही राष्ट्रहित के बदले पार्टी के चुनावी हित को अहमियत देती रही है। मोदी ने बताया कि इसके विपरीत भाजपा ”पहले राष्ट्रहित’’ की नीति पर चलती है। पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले की किताब ‘अनफिनिस्ड इनिंग्स: रिकलेक्शन ऐंड रिफलेक्शंस ऑफ ए सिविल सर्वेंट’ के उद्धरणों से प्रधानमंत्री ने बताया कि नोटबंदी 1971 में भी जरूरी थी लेकिन चुनावों के मद्देनजर इंदिरा गांधी ने उसे टाल दिया। ”जब वाई.बी. चव्हाण ने उन्हें नोटबंदी के प्रस्ताव के बारे में बताया और कहा कि उनके विचार में इसे लागू कर देना चाहिए। उन्होंने (इंदिरा गांधी ने) सिर्फ एक ही सवाल पूछा, ”चव्हाण जी, क्या कांग्रेस को अब और चुनाव नहीं लडऩा है।’’’ चव्हाण को संदेश मिल गया और प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

मोदी ने 1971 में नोटबंदी की सिफारिश करने वाली वांचू कमेटी की रिपोर्ट का भी हवाला दिया। इंदिरा गांधी और ऊंचे मूल्य के नोटों को बंद करने से उनके इनकार का संदर्भ दो मकसदों से दिया गया। एक, यह बताना था कि कांग्रेस या खासकर इंदिरा गांधी की बहु और पोता मोदी के खिलाफ मुहिम चलाकर गलती कर रहे हैं। दूसरे, इंदिरा गांधी से तुलना करके यह बताने की कोशिश की गई कि इंदिरा गांधी तो हमेशा चुनावी हितों को ध्यान में रखकर फैसले किया करती थीं लेकिन मोदी में चुनावी हितों की चिंता किए बगैर देशहित में साहसिक फैसले लेने की हिम्मत है।

मोदी ने दूसरे विपक्षी दलों को भी नहीं बख्शा, भले वे कुछ देर से कांग्रेस के विरोध अभियान में शामिल हुए हों। उन्होंने कहा, ”संसदीय प्रक्रिया में गतिरोध तो पहले भी हुए हैं, लेकिन इस बार तो इंतहा हो गई। पहले के मौकों और इस बार शीतकालीन सत्र के हंगामे में एक फर्क है। पहले संसद में हंगामे तब हुए जब कोई भ्रष्टाचार का मामला उजागर हुआ और कोई खुलासा हुआ तो विपक्ष ईमानदारी और निष्ठा की लड़ाई लडऩे के लिए एकजुट हो गया। लेकिन पहली बार सत्ता पक्ष ने भ्रष्टाचार से लडऩे का कदम उठाया तो ज्यादातर विपक्ष भ्रष्टों के पक्ष में एकजुट हो गया।’’

मोदी ने आगे कहा, ”राजनैतिक स्तर इतना नीचे गिर गया है कि कुछ लोग भ्रष्टों के खिलाफ खड़े होने की जुर्रत कर रहे हैं। यह सोचने का विषय है।’’ इसी के साथ मोदी ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ करना भी नहीं भूले, जिन्होंने वैचारिक मतभेदों के बावजूद नोटबंदी का समर्थन किया। माकपा पर कटाक्ष करते हुए मोदी ने कहा, ”ज्योति बसु ने एक बार नोटबंदी का समर्थन किया था। लेकिन, आज देखिए, कम्युनिस्ट क्या कर रहे हैं।’’

मोदी ने कहा कि राजनैतिक स्तर में गिरावट दूसरी बार आई है। उन्होंने कहा कि इसके पहले कांग्रेस, आप और कुछ दूसरी पार्टियों ने पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर पर सर्जिकल हमले का सबूत मांगा था। फिर कहा, ”आज 16 दिसंबर है, आज ही भारत ने पाकिस्तान को समर्पण कराया था और बांग्लादेश आजाद हुआ था। उस समय भी विपक्ष मजबूत था लेकिन किसी ने सबूत नहीं मांगा और आज जब भारतीय सैनिकों ने अपनी बहादुरी दिखाई तो वे सबूत मांग रहे हैं। सार्वजनिक जीवन के स्तर में यह गिरावट काफी चिंता का विषय है।’’

राजनैतिक विरोधियों पर निशाना साधने के अलावा प्रधानमंत्री ने लोगों से शुरू में कही गई 50 दिन की अवधि के बाद भी कुछ कठिनाइयों का मुकाबला करने को तैयार रहने को कहा। उन्होंने कहा कि 500 और 1000 रु. के नोटों का चलन बंद करना एक मील का पत्थर है लेकिन यह आखिरी नहीं है। अगर मध्य वर्ग का शोषण खत्म करना है और गरीबों के अधिकारों की रक्षा करनी है तो भ्रष्टाचार का खात्मा करना ही होगा।

उन्होंने कहा, ”मैंने यह पहले भी कहा है। 50 दिन कठिनाई के होंगे, उसके बाद धीरे-धीरे समस्याएं दूर होंगी। हमने जैसी सफलता हासिल की है और जैसा जन समर्थन हमें मिला है, उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।’’ मोदी ने यह भी इशारा किया कि बेनामी संपत्ति पर भी उनकी स्ट्राइक जल्द ही होगी। उन्होंने कहा, ”आखिर हमने बेनामी संपत्ति कानून क्यों बनाया है। अब वे हल्ला करेंगे कि मोदी ने कानून जल्दबाजी में पास करवा दिया। सवाल यह है कि आपने 1988 से उस पर अमल क्यों नहीं किया। मोदी सरकार ने अब कानून पास किया है और उस पर अमल करेगी।’’

उन्होंने कहा कि शीतकालीन सत्र खत्म हो गया है इसलिए पार्टी के सांसदों को अपने क्षेत्र में जाकर लोगों को नोटबंदी के फायदों के बारे में बताना चाहिए और डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढऩे के लिए माहौल बनाना चाहिए।

असल में शीतकालीन सत्र के बेकार जाने से भाजपा को बढ़त मिल गई है। प्रधानमंत्री को जो कहना था, वह तो उन्होंने कह दिया। भले संसद के सदन में नहीं, संसद भवन परिसर में अपने संसदीय दल की बैठक में ही सही। भाजपा विकलांग अधिकारों का विधेयक भी पास करवा पाई और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को दो वजहों से मुश्किल में डाल दिया।

एक, राहुल गांधी अपने दावे के मुताबिक मोदी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर पाए। उन्होंने कहा था, ”मेरे होंठों को पढि़ए। मेरे पास जो जानकारी है, उससे प्रधानमंत्री व्यक्तिगत तौर पर आतंकित हैं। मेरे पास प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की जानकारी है।’’ दूसरे, राहुल अपनी बढ़त बनाने के लिए किसानों की कर्ज माफी पर प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री से मिल आए। इससे विपक्ष में फूट उभर आई। एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल और माकपा के सीताराम येचुरी ने इस पर अपनी सार्वजनिक नाखुशी जाहिर की और राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की अगुआई में मार्च से अलग हो गए। इस मार्च में सपा, बसपा और डीएमके भी शामिल नहीं हुई। कांग्रेस के साथ सिर्फ तृणमूल और राजद ही रह गए। ममता को तो नोटबंदी पर अपने विरोध में किसी का साथ चाहिए। राजद की नजर में कांग्रेस का साथ अहम है क्योंकि नीतीश कुमार अगर राजद को झटक देते हैं तो कांग्रेस ही लालू का कर्णधार बचेगी।

कांग्रेस की समस्या यह है कि वह मोदी सरकार को दूरदर्शन पर प्रसारण के लिए आड़े हाथों नहीं ले सकती। यह परंपरा उसी ने 2004 में शुरू की थी। उस समय संसद के केंद्रीय कक्ष में कांग्रेस संसदीय दल की बैठक की नाटकीयता का सीधा प्रसारण हुआ था, जिसमें सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह के नाम का प्रस्ताव किया था।


डॉ. सिंह की याददाश्त या तो कमजोर हो गई है या 10, जनपथ के दबाव में वे उसे याद नहीं करना चाहते जो उन्होंने 1991 में प्रधामंत्री पी.वी. नरसिंह राव के वित्त मंत्री के नाते कहा था। उन्होंने 24 जुलाई 1991 को कहा था, ”अब वक्त गंवाने को नहीं बचा है। न ही सरकार और न देश अपने साधनों से आगे साल दर साल चल सकता है। जोड़तोड़ करने या उधार के पैसे पर जिंदगी काटने का समय अब नहीं रहा। बिना तकलीफ के कोई समाधान नहीं होगा। लोगों को अपनी आर्थिक स्वतंत्रता बचाने और अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए बलिदान करने को तैयार रहना होगा।’’

दूसरे कट्टर आलोचक एम. चिदंबरम ने कहा, ”खोदा पहाड़ निकली चुहिया।’’ उन्होंने कहा कि ”नोटबंदी ने लोगों की कमर तोड़ दी है। 45 करोड़ लोग दैनिक मजदूरी पर आश्रित हैं। उनमें 15 करोड़ नौकरी-पेशा वाले हैं जबकि बाकी 30 करोड़ दूधिया, धोबी, किसानी वगैरह का काम करते हैं। नोटबंदी से उन पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है। 18 नवंबर के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने काले धन का 24 बार नाम लिया। 15 दिन बाद उन्होंने नकदी रहित अर्थव्यवस्था की बात लगभग उतनी ही बार की और काले धन की चर्चा नहीं के बराबर की। यानी लक्ष्य तेजी से बदल रहा है, अब काले धन का मामला नहीं रहा। अब उन्हें नकदी रहित अर्थव्यवस्था का नया मंत्र मिल गया है। किस देश में नकदी रहित अर्थव्यवस्था है? क्या अमेरिका में? या सिंगापुर में? इस देश में बिजली की क्या स्थिति है? मशाीनें कहां हैं? नोटबंदी बिना विचारे उठाया गया बेतुका कदम है। कोई दुनिया में इसे अच्छा नहीं बता रहा है। दुनिया में हर बड़ा अर्थशास्त्री या अखबार इसकी निंदा कर रहा है। कल आरएसएस के एक प्रमुख प्रवक्ता ने कहा कि 2,000 रु. के नोट भी बंद होने चाहिए। वे यह भी कर दें तो हैरानी नहीं होगी। आप जैसा चाह रहे हैं, वैसा लेाग विरोध नहीं करते हैं तो यह न समझिए कि वे सरकार के किए का समर्थन कर रहे हैं। ग्रामीण भारत में तकलीफें बेइंतहा हैं। यह किसी प्राकृतिक आपदा से अधिक तकलीफदेह है। यह एक छलाव है कि इससे धनी परेशान होंगे और गरीब फायदे में रहेंगे। मैं किसी दौलतमंद को परेशान होते नहीं देख रहा हूं।’’

यह किसी पूर्व वित्त मंत्री का नहीं, बल्कि किसी हताश-निराश शख्स का बयान लगता है। इससे इनकार नहीं है कि दैनिक जीवन में भारी तकलीफें झेलनी पड़ रही हैं लेकिन दो महीने या कुछ अधिक समय बाद जब पैसे का वितरण अधिक समान हो जाएगा, भ्रष्टाचार दूर होगा, कीमतें घटेंगी और आतंकी गतिविधियों में कमी आएगी तो हमें कोई गुरेज नहीं रह जाएगा।

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कश्मीर में शांति है क्योंकि पत्थरबाजों को 500 रु. और हथियार लूटने वालों तथा हथगोला फेंकने वालों को 1000 रु. मिलते थे। अब वह सब बंद हो गया है। झारखंड, असम, बंगाल और दूसरी जगहों से होने वाली महिला-बच्चों की तस्करी बंद हो गई है क्योंकि सभी लेनदेन नकदी में होता था। जमीन-जायदाद की कीमतें घट गई हैं और तस्करों के धंधे ठप्प हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. राकेश सिन्हा ने सही ही कहा है कि ”नोटबंदी का मकसद नव-उदारवाद की बीमारियों को दूर भगाना है।’’ वे नोटबंदी को पहला आर्थिक सत्याग्रह बताते हैं। वे यह भी कहते हैं कि काला धन 1991 के बाद नव-उदारवाद के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना। 19वीं सदी के उन्मुक्त राजनैतिक-आर्थिक दर्शन का ही एक रूप नव-उदारवाद है और उसका मकसद कुछ लोगों की दौलत बेपनाह बढ़ाना और ज्यादातर लोगों को बाजार का गुलाम बनाना है। इससे राज्य की सत्ता भी बड़ी पूंजी और कारपोरेट घरानों की सेवक बनकर रह जाती है। आम लोग गरीबी में जीते हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की बुनियादी जरूरतों के भी मोहताज रहते हैं।

अच्छा है कि इसे दूर करने के लिए मोदी ने कदम बढ़ाया। इसके सकारात्मक नतीजे दिखने लगे हैं। हिंदी फिल्मी गीत है कि ”कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।’’ इसी तरह सिंह, राहुल, ममता, केजरीवाल तो विरोध करने के लिए ही हैं। उनकी कोई नहीं सुनता।

जब तक लोग नोटबंदी के पक्ष में हैं, नरेंद्र मोदी को घबराने की जरूरत नहीं है। उदय इंडिया को पता चला है कि सामान्य हालात होते ही, सरकार के पास इतना अतिरिक्त धन हो जाएगा कि वह हर बैंक खाते में 10,000 रु. तक जमा करा सकती है। इसका राजनैतिक लाभ 2019 में मिलेगा।

               विजय दत्त

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