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हमारी नीतियों का असर 2017 से दिखने लगेगा: मनोहर पर्रीकर

हमारी नीतियों का असर 2017 से दिखने लगेगा: मनोहर पर्रीकर

‘मेक इन इंडिया’ ही एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर मीडिया कोई विवाद खड़ा नहीं करती है। मैं खुले सोच का व्यक्ति हूं जो अपना विचार लोगों में रखना पसंद करता हूं। हां यह सत्य है कि आज-कल अपना विचार रखना खतरों से खाली नहीं है। लेकिन अच्छी बात यह है कि यह चीज ‘मेक इन इंडिया’ के सम्बन्ध में नहीं है।  जहां तक बात रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश की है तो यह इस क्षेत्र में रातों-रात नहीं आती है। अत: इस क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार ने रक्षा विभाग से कई सारे उड्डयन से सम्बंधित वस्तुओं को निर्यात की सूची से हटाने जैसे कई सारे महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। जहां तक रक्षा क्षेत्र में लाइसेंस  की बात है तो वे सभी वस्तुएं जो इस उड्डयन से सम्बंधित बनायीं जाती है जो पहले रक्षा निर्यात हुआ करती थी, उसे अब निर्यात की श्रेणी से निकाल दिया गया है। रक्षा क्षेत्र में हमने लगभग तीन लाख तिरालिस हजार करोड़ रुपये अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश किये और मैं दावे के साथ यह कह सकता हूं कि जितनी राशि हमने रक्षा क्षेत्र में बढ़ावा के लिए आवंटित किये है वैसा पहले कभी नहीं हुआ है। यदि हम अपने रक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति करना चाहते है तो हम अपनी रक्षा के लिए प्रयोग की जाने वाली गोले, बारूद जैसे महत्वपूर्ण वस्तुओं के लिए किसी तीसरे देश पर निर्भर नहीं रह सकते है। अत: यहां स्वदेश में निर्मित वस्तुओं का महत्व बढ जाता है। हमें 1971 में हुए युद्ध को नहीं भूलाना चाहिए। इस युद्ध के लिए तैयार होने में भारत को लगभग आठ महीनें का समय लगा। यदि हम अपने ऊपर निर्भर होते तो हमे अपने आपको तैयार करने में उतना समय नहीं लगता। यह हाल सभी छोटे देशों का है। यदि हम अपने रक्षा क्षेत्र में आयत के लिए इतना खर्च कर सकते है तो फिर हम अपने ऊपर निर्भर क्यों नहीं रह सकते हैं। यह सत्य हैं कि हम सौ प्रतिशत अपने ऊपर निर्भर नहीं रह सकते है। क्योंकि उदाहरण के तौर पर देखे तो बोईंग जिस प्रकार से हेलीकॉप्टर और जहाजों का निर्माण करती है वह अभूतपूर्व है। कुछ वस्तुएं आपको बाहर से सस्ती दरों में मिल जाती है। भारत को रक्षा के क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत अपने ऊपर निर्भर होना पड़ेगा। जो भारत की विकास, रोजगार और कौशल को सुनिश्चित करेगा। ‘मेक इन इंडिया’ स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण में अधिक मात्रा में रोजगार के अवसर मुहैया कराएगा तथा अनुसंधान, विकास और आत्मनिर्भरता लायेगा। रक्षा क्षेत्र नागरिकों की सुरक्षा की दृष्टि से बनायीं जाने वाली यन्त्र और संकल्पना को विकसित कर सकता है। जिस प्रकार से हमने भारत के ऑटो क्षेत्र में क्रांति लाने का काम किया वो काम हम रक्षा क्षेत्र में क्यो नहीं कर सकते है? मुझे विश्वास हैं कि हम यह काम कर सकते है। निर्यात ही एक ऐसा क्षेत्र है जिस तरफ भारत सरकार अपना अधिक ध्यान आकर्षित कर रही है। रक्षा क्षेत्र के खरीद-परोख में भारत सरकार ने एक धारा के तहत खुली छूट दे रखी है।


विकास और तालमेल सार्वजानिक रक्षा उपक्रमों के लिए जरुरी: आर. के. त्यागी


 

RK Tyagiभारत की आज  की सरकार के नीतियों की वजह से घरेलु उद्योगों का रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बहुत अवसर मिलने लगे है। देश  का रक्षा बजट सकल घरेलु उत्पाद का 6. 5 प्रतिशत है और पिछले साल भर में इसमें 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुयी है। आज भारत में रक्षा उत्पादन  के क्षेत्र में करीब 9 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, 41 आर्डिनेंस फैक्टरी  बोड्र्स, 50 डी आर डी ओ लैब्स कार्यरत हैं और निजी क्षेत्र के करीब 150 खिलाड़ी भी हैं जिस में महिंद्रा, एल एंड टी, रिलायंस और टाटा जैसी कंपनिया प्रमुख हैं। इनमे से करीब 50 ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा हैं। आज ये कंपनियां उभर कर सामने आ रही है क्योंकि यह विश्व स्तरीय मानको पर खड़े उतर रहे हैं। अगर अगले 10 से 15 सालो के अवसरों पर नजर डाली जाए तो यह करीब 450 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर है। अगर हम अपनी सेना- थल, वायु और जल – की जरूरतों पर नजर डाले तो यह करीब 12-13 बिलियन डॉलर के करीब है। इनमे वह प्रोजेक्ट भी शामिल है जो पूरे हो चुके हैं जैसे अपाचे, चीनू और एम् एम् आर सी ए और वैसे भी हैं जो अभी विचाराधीन हैं। इसलिए भारतीय कंपनियों के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है। और इसमें उद्योगों की संस्था जैसे अस्सोचम की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। तालमेल और विकास दो ऐसे शब्द है जो आज सुरक्षा क्षेत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर सार्वजानिक और निजी क्षेत्रों में प्रतियोगिता चलेगी तो दोनों आगे नहीं बढ़ सकते। और अगर संघर्ष की नौबत आई तो भी नुकसान दोनों का ही है। इसलिए समय है तालमेल पर जोर देने का ताकि दोनों क्षेत्र एकसाथ बढ़ सके।


लोग सरकार से हमेशा पूछते है कि सरकार आखिर रक्षा सौदे को तेजी से मंजूरी क्यों नहीं देती? लेकिन प्रश्न यह खड़ा होता है कि यदि आप इन सौदों के बारीकियों को ध्यान से नहीं देखेंगे तो अंतत: हमे 272 लड़ाकू विमानों को बिना ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के ही खरीदना पड़ेगा। आप उसको कैसे वर्णन करेंगे? भारत ने रूस से 272 सुखोई-30 हेलीकाप्टर खरीदा है। यह समझौता दोनों देशो के बीच सन 2000 में हुआ था जिसमे 140 विमानों को हिंदुस्तान एरोनेटिक लिमिटेड में निर्माण करने का लाइसेंस दिया गया। जहां तक सार्वजनिक क्षेत्र से अब्सॉर्ब टेक्नोलॉजी की अस्मर्थता की बात है तो हिंदुस्तान एरोनेटिक लिमिटेड ने कई ऐसे महत्वपूर्ण रक्षा उत्पादों का निर्माण भी किया हैं।

हां यह चिंता का विषय अवश्य है कि आखिर क्यो हिंदुस्तान एरोनेटिक लिमिटेड लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट का निर्माण करने में कठिनाइयों की सामना कर रही है। मुझे हिंदुस्तान एरोनेटिक लिमिटेड में आ रही आंतरीक परेशानियों का हल निकालने के लिए कई सारे वार्तालाप करने पड़े। अभी हमने हथियारों और इलेक्ट्रानिक राडार से सुसज्जित 83 तेजस लड़ाकू विमानों को खरीदने का आर्डर जारी कर दीया है। क्योंकि वे बन्द दरवाजे मे सोच रहे थे। कुछ समय पूर्व ही सरकार ने हिंदुस्तान एरोनेटिक लिमिटेड में निर्मित तेजस लड़ाकू विमान को भारतीय वायुसेना के लिये खरिदने का निर्णय लिया है। रक्षा खरीद के क्षेत्र में कई ऐसे मामले है जिसमें आपके प्रतियोगी आपके द्वारा लगायी गई बोली पर गलत आरोप लगा कर आपके समझौतों को देर करने का प्रयास करते है। भारत सरकार द्वारा रक्षा क्षेत्र में की जा रही खरीदारी का असर वर्ष 2017 तक प्रतित होने लगेगा। रक्षा क्षेत्र में खरीद से जुड़े कई ऐसे नियम है जिसे धीरे-धीरे हल करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं अभी पिछले सरकार के किये गए गलत कार्यों को ही सुधार रहा हूं। मैं किसी के ऊपर उंगली नहीं उठा रहा हूं न ही किसी के ऊपर दोषारोपण कर रहा हूं। अभी तक पिछली सरकारों की कई सारी गलत नीतिया हैं जिसे धीरे-धीरे सुधारने का काम चल रहा हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आने वाले समय में रक्षा क्षेत्र में रास्ते खुले हुए मिलेंगे।


सुरक्षा पर आधारित है अर्थव्यवस्था: मुरलीधर राव


 

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रक्षा निर्माण की बात करते हुए उन्होंने कहा की सरकार और सरकारी संसथान जैसे आर्डिनेंस फैक्ट्रीज व सरकारी उपक्रम निर्माण के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे। आगे उन्होंने कहा की विकास की यात्रा की सफलता में निजी उपक्रमों को भी योगदान देना होगा। देशहित के कार्य में केवल सरकारी उपक्रमो को ही नहीं बल्कि आने वाले कुछ सालो में निजी संस्थानों को भी हाथ मिलकर काम करना होगा। आज हिन्द महासागर क्षेत्र में लगातार नए समीकरण बनते जा रहे है, जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था सुरक्षा आधारित होती जा रही है। देश के अंदर एवं बाहर नए अवसर बढ़ रहे है और भारत का इस वैश्विक विकास का हिस्सा बनना कोई गलत नहीं है और युवाओं को बढ़ चढ़ कर इसका हिस्सा बनना चाहिए।



भारत को विश्व का एक बड़ा मार्केट बनाना चाहते हैं: प्रत्युष कुमार


 

pratyush Kumar

भारतीय रक्षा उद्योग में ऑफसेट का अत्यधिक महत्वपूर्ण योगदान हैं जो इस क्षेत्र को आगे ले जाने में सहायक है। वास्तव में ऑफसेट एक महत्वपूर्ण वर्धक है। यह हमारे छोटे रक्षा उपक्रमों को विश्व स्तरीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। अभी बोईंग के इंडिया में 30 डायरेक्ट और 130 इनडाइरेक्ट सप्लायर है। इसका ताजा उदहारण हैदराबाद में टाटा और बोईंग का एक साथ आकर इस क्षेत्र में गठबंधन करना हैं जो कूछ समय पश्चात अपाचे हेलीकाप्टर के लिए फ्यूसलेजस सप्लाई करना आरम्भ कर देगा। हम न केवल भारत को लड़ाकू विमान बनाकर देने की सोच रहे है बल्कि हम ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत को विश्व का एक बड़ा मार्केट बनाना चाहते है। यह बोईंग की अंतराष्ट्रीय नीति में है। जिसके तहत इंडिया को दो इंजन वाला लड़ाकू विमान मुहैया करवाना है। लेकिन फिर भी अभी भारतीय रक्षा मंत्रालय की खुल कर सामने आने की प्रतीक्षा है। अभी जून में रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत लड़ाकू विमान बनाने के संकेत दे दिए है। हमारा  विस्तृत रूप से नीचे तक पहुचने का लक्ष्य हैं। हम न केवल भारतीय प्रिसिशन इंजीनियरिंग की तलाश करते है बल्कि हम यहां के कौशल से पूर्ण लोगों को रोजगार प्रदान करने में भी विश्वास रखते है।


यदि हम रक्षा बलों के आवश्यकताओं का आंकलन करे तो हम इसमें कई सारे बदलाव कर सकते है। उद्योगों को अपनी राय साफ-साफ रखनी चाहिए। यद्दपि हम डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल्स और आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड को इंडिजेनसली डिजाइन डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चर्ड में बदलने जा रहे है। इसी क्रम में हम बड़े प्राइवेट उद्योगो से यह अपेक्षा रखते है कि वो इसमे छोटे उद्योगो से भी अपनी आपूर्ति को पूरा करेंगे। आज यदि आकड़ों को देखा जाय तो पहले आर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड में छोटे मझोले उद्योगों की हिस्सेदारी 9 प्रतिशत थी जो 20 प्रतिशत होनी चाहिए थी। लेकिन यदि आज की स्थिति को देखा जाये तो यह इस 20 प्रतिशत को पार करते हुए 29 प्रतिशत पर पहुच गयी हैं।


हमें अत्याधुनिक तकनीक का निर्यात करने की आवश्यकता है: जी. सतीश रेड्डी


 

Satheesh

भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिये हमे रक्षा वस्तुओं को स्वदेश में निर्मित करने तथा विदेशी निवेश को लाने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर देने की आवश्यकता है। इसके लिये अच्छे कौशल की भी जरूरत पड़ेगी। बिना इंडस्ट्री के सहयोग के, हम ‘मेक इन इंडिया’ को सफल नहीं बना सकते है। आकाश मिसाइल का प्रोडक्शन सरकार और निजी क्षेत्र के आपसी तालमेल का एक अच्छा उदहारण है। भले आ
काश मिसाइल को भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने बनाया लेकिन इसका 83 प्रतिशत समाग्री निजी क्षेत्र से आती है। सारी डी पी एस यू महंगे सामग्रियों की तरफ अपना ध्यान आकर्षित कर रही है। रक्षा  क्षेत्र में टेस्ट करने की व्यवस्था अब सडकर ने निजी क्षेत्रों के लिए भी खोल दिया है। अब निजी क्षेत्र भी इस सोध से अपनी आकलन कर सकती है। एक टेक्नॉलॉजी डेवलपमेंट फण्ड बनाने की आवश्यकता है जहां अनुभवी लोग जिनके पास प्रोडक्ट बनाने की क्षमता हो तथा इस सम्बन्ध में वे जानकर हों। नयी पद्धति तथा खोज करने के विचार महत्वपूर्ण है। रक्षा मंत्रालय नयी खोज करने के काम का निर्णय लिया है। जहा विभिन्न पद्धत्तियों को नए प्रोडक्ट में बदला जायेगा। हमें विश्व के बाजार से प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता है। डिफेंस प्रोक्योरमेंट पालिसी 2016 इंडियन डिजाईन एंड डेवलप्ड मेनुफेक्चर को अधिक प्राथमिकता देता है। अतत: मेक इन इंडिया का अंतिम लक्ष्य  इंडियन डिजाईन एंड डेवलप्ड मैनुफैक्चरड होना चाहिए। केवल घरेलु बाजार ही भारतीय निजी क्षेत्र के अस्तित्व के लिए उपयुक्त नहीं है। अतत: हमें और ऊपर तक सोचने की आवश्यकता है। हमें स्टेट ऑफ आर्ट टेक्नोलॉजी को निर्यात करने की आवश्यकता है। हमे विकसित देश होने की सोच रखने से पहले अपने टेक्नोलॉजी को बनाने रखने के विषय में सोचना चाहिए। इसलिए बुद्धिजीवी, डी पी एस यू और शोध संस्थाओं को अपने योगदान के विषय में सोचना चाहिए।



रक्षा क्षेत्र किसी भी देश के निर्माण की धुरी होती है: सवितुर प्रसाद


 

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प्रधानमंत्री ने कई सारे नए नए कदम उठाये है। जो प्रतीत भी हो रहा है। 1947 के बाद पहली बार रक्षा क्षेत्र में किसी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा क्षेत्र में कुछ स्वदेश में ही निर्माण करने का निर्णय लिया है। भारत अब पूरे विश्व में एक अलग देश नहीं रह सकता है। यदि भारत की जनसंख्या को देखा जाय तो देश की आयात-निर्यात और जीडीपी को और अत्यधिक बनाने की आवश्यकता हैं। इसमे रक्षा क्षेत्र का अहम् योगदान हो सकता है। भारत आज भी 50 प्रतिशत रक्षा सामग्री आयात करता है। जिसका साफ मतलब है कि हम 50 प्रतिशत नौकरियां विदेशियो को दे रहे है। यह हमारी अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डालता हैं। इतिहास को देखे तो रक्षा क्षेत्र किसी भी देश को बनाने का एक बड़ा कारण होता है। यदि भारत की तुलना चीन से ही करे तो चीन भारत का आधा ही आयात करता है और पूरे विश्व में आयात के क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है।

हमारे पास ऑफसेट पड़े हुए है लेकिन कितनी कंपनियों को वो ऑफसेट मिल पा रहे है? अभी हाल ही में अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है की अमेरिका की कोई भी कंपनी यदि अमेरिका से बाहर जा कर किसी दूसरे देश में कंपनी लगाती है तो उन पर 35 प्रतिशत का कर लगाया जायेगा। क्या ये हम नहीं कह सकते है? किसी और क्षेत्र में नहीं लेकिन कम-से-कम हम ये रक्षा क्षेत्र में तो कह सकते हैं। रक्षा क्षेत्र में हम अपनी सुरक्षा के लिए हम अस्त्र-शस्त्र खरीद सकते है लेकिन कम-से-कम हम अपने जवानों के जूते और सियाचिन में तैनात जवानों के कपड़े तो कम से कम आयात न करें। दु:ख की बात तो यह हैं कि हम ये आयात चीन से करते है, चीन से रक्षा के उपकरण खरीदना खतरों से खाली नहीं है। रक्षा मंत्रालय को रक्षा की खरीद क्षेत्र को लोगों के समक्ष रखना चाहिए न की केवल बाबुओं के बीच ही सीमित होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का इतना बड़ा फैसला लिया है। उन्हें रक्षा निवेशकों को ध्यान में रखते हुए, रक्षा क्षेत्र के टेंडर के लिए केवल एक रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि उन्हें आर्मी, नेवी, और अन्य रक्षा बालों के आफिसों में चक्कर न लगाना पड़ा।


भारत के सभी डीपीएसयूओ में प्रतिस्पर्धा होना समय की मांग हैं, इससे रक्षा वस्तुओं के दाम में भारी गिरावट आयेगी। अत: मेरा मानना है कि हम एडवांस क्यो दे जिसमे छोटी कंपनीया सम्मलित हो? अपने आप को कोई कितना देर तक बांध कर रखेगा। हमे सस्ते दरों पर ही अच्छे प्रकार के वस्तुओं के लिए उद्योगों से पूछना चाहिए। यदि मैं उधार पर ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता हूं तो र्मै दूसरी कंपनी को एडवांस क्यों दूं? हां बड़े कंपनियों के प्रोडक्ट के लिए नियम अलग होने चाहिये तथा छोटे उधोगो के मामले में भी नियम में बदलाव होना चाहिए। इस पर हम काम भी कर रहे है और यही कारण है कि इस पर ज्यादा समय व्यतीत किया जा रहा है। जिस दिन यह मैन्युअल तैयार हो जायेगा, उस दिन यह एक उच्च कोटी और पहले से कही ज्यादा अच्छा मैन्युअल होगा। हाल ही में हमने कुछ नियमों में बदलाव किया है और कुछ बचा है, जिस पर बड़ी गंभीरता से काम चल रहा है।

                उदय इंडिया ब्यूरो

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