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नोटबंदी: आम हिन्दुस्तानी को सलाम!

नोटबंदी: आम हिन्दुस्तानी को सलाम!

संघर्ष की भट्ठी में तपे बिना किसी को स्थायी सफलता नहीं मिलती। सोना हो या लोहा जब तक वह गरम भट्ठी में नहीं पिघलता उसे नया रूप नहीं मिल सकता। उसी तरह प्रगति की चाह रखने वाला समाज और राष्ट्र अगर जरूरी परिश्रम और त्याग के लिए तैयार नहीं है तो फिर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसकी आगे  बढऩे की इच्छा फिर महज एक कपोल कल्पना ही मानी जानी चाहिए।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने इस देश को एक सपना दिया वह था २०२० तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का। उससे पहले हम अपने आपको विकासशील कहलाने में ही बड़े गर्व का अनुभव करते थे। कलाम साहब कहते थे विकासशील यानि गरीब देश होने में कैसा गौरव? कलाम साहब सार्वजनिक जीवन में कर्मठता, शुचिता, सहजता, सरलता और ईमानदारी के प्रतीक थे।

वो समाज और राष्ट्र उन्नत नहीं हो सकता जिसके अर्थतंत्र की बुनियाद बेईमानी, कर चोरी, कालेधन और भ्रष्टाचार पर पड़ी हो। जहां किसी भी तरह के गोरखधंधे से धन कमाने वाले नेताओं, अफसरों, व्यापारियों और दलालों को सम्मान मिलने लगे ऐसे राष्ट्र की नींव में दीमक लग जाती है। ऐसा समाज कैसे उन्नत, संपन्न और विश्व में सम्मानित होने की सोच सकते है? जहां ईमानदार नागरिक मन मसोस कर जिन्दा रहे और बेईमान छाती चौड़ी करके घूमता रहे ऐसी राज्य व्यवस्था देर तक नहीं चलती।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी अभियान के उसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। अगर हम पिछले दस वर्षों पर नजर डालें तो अधिकांश उन लोगों को समृद्धि हासिल हुई हैं जिन्होंने प्रॉपर्टी, शेयर बाजार, रिश्वत, दलाली या हेरा-फेरी से पैसा कमाया है। अगर आप अपने आस-पास नजर डालें तो ऐसे लोग ऊंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिन्होंने अपनी उद्यमिता, मेहनत, शोध अथवा मेधा से समृद्धि हासिल की है। यानि हमारे आसपास दिखने वाली समृद्धि एक बड़ी हद तक उस पैसे से आई जो ‘साफ’ पैसा नहीं है। पिछले दशक में हुई ”जॉबलेस ग्रोथ’’ यानि बिना नए रोजगार होने वाली तरक्की का आधार यही ‘अनधिकृत’ संपन्नता है।

यही कारण है देश में अमीर-गरीब की खाई और गहरी हुई है। न्यूनतम और अधिकतम वेतन की दूरी भी इसी से बढ़ी है। २जी, ३जी, घोटाले, कोयला घोटाला और राष्ट्रमंडल खेलों के खर्चों में हुआ गोलमाल इसी व्यवस्थागत कोढ़ के नमूने हैं। आम नागरिक मेहनत के पैसे पर ये जो लूट हुई उसमें सभी शामिल थे- अफसर, नेता, चुने हुए व्यापारी, भ्रष्ट न्यायाधीश और मीडिया से जुड़े कुछ लोग।

जब रोग असाध्य होता है तो उसका उपचार भी कष्टपूर्ण और जटिल होता है। समाज जीवन में घुन की तरह व्याप्त ‘दो नंबर की कमाई’ को सिस्टम में वापस लाना और ऐसे कदम उठाना जरूरी था जिससे हेरा-फेरी से की गई कमाई बाहर आए। नोटबंदी के बाद यह इसलिए तार्किक ही है कि प्रॉपर्टियों के हिसाब भी पूछे जाने चाहिए जिन्होंने सिर्फ काले को सफेद और सफेद को काले करके अकूत संपत्ति हासिल की है। न सिर्फ उतना बल्कि ऐसे लोगों को सही दंड भी देना चाहिए।

आम हिन्दुस्तानी समाज व्यवस्था में आई इस गंदगी को दूर करना चाहता है। यही कारण हैं कि नोटबंदी के कारण हुई तकलीफों को उसने अच्छे से झेला है। बावजूद इसके कि उसे भड़काने की तमाम कोशिशें कई नेताओं, मीडिया के एक वर्ग ने की। दाद देनी चाहिए भारत के ईमानदार आमजन की जिसने इस गंभीर परेशानी को बखूबी सामना किया।

कुछ सलाह नोटबंदी के विरोधियों के लिए। चलिए तर्क के लिए मान लिया जाए कि नोटबंदी से कालेधन की बीमारी दूर नहीं होगी। तो फिर आपने कोई विकल्प दिया है क्या? इस नाते क्या कालेधन पर यथास्थिति  ही बनी रहने देनी चाहिए? प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तरीके से इस बीमारी का ईलाज करने की कोशिश तो की। विपक्ष के लोग जो बरसों तक सत्ता में रहे है, यह आज भी कई राज्यों में कुर्सी पर बैठै हैं- क्या चाहते है कि बेईमानी और लूट का तंज यूंही चलता रहे। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करके भारत उन्नत राष्ट्र नहीं बन जाएगा। देश को आगे ले जाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक दल या नेता की नहीं हो सकती। एक ही विनती है उन लोगों से वो ये कि अपने अल्पकालीन राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए देश के दीर्घकालीन हितों की अनदेखी न करें।

               

उमेश उपाध्याय

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