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पालिटिक्स में कुछ भी आरोप लगाने की स्वतन्त्रता

पालिटिक्स  में कुछ भी आरोप लगाने की स्वतन्त्रता

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा: यह पालिटिक्स राजनीति भारत में कोई नई चीज है?

पिता: नहीं, बेटा। यह तो भारत में जब से सभ्यता का उदय हुआ है तब से ही है।

बेटा: इसका मतलब क्या है?

पिता: बेटा, साफ है। इसी से तो शासन चलता है। चाहे राजे-महाराजे हों, या विदेशी शासक या आजका जनतन्त्र, सब राजनीति से ही तो चलते हैं।

बेटा: पिताजी, अब मुझे राजनीति बहुत अच्छी लगने लगी है और मैं भी सब कुछ छोड़ राजनीति को ही अपना परम-धर्म बना लूंगा।

पिता: अब राजनीति में नया क्या हो गया जो तू इसका मुरीद बन गया है। पहले तो तू इससे बड़ी नफरत करता था।

बेटा: आपको याद है मैंने अपने पड़ोसी को गाली दे दी थी तो उसने मुझे पीट दिया था। आप बीच में न पड़ते तो पता नहीं वह और क्या करता।

पिता: हां, यह तो मुझे याद है।

बेटा: फिर पिताजी, जब मैंने गुस्से में एक को चोर कह दिया था तो उसने मुझ पर मानहानि का मुकद्दमा कर दिया था। मैं मुआफियां मांग-मांग कर, नाक रगड़-रगड़ बड़ी मुश्किल से बच पाया था।

पिता: यह भी मुझे पता है।

बेटा: पिताजी, मेरे एक दोस्त ने अपने पड़ोस में रहने वाली एक लड़की के चरित्र पर टिप्पणी कर दी थी। फिर क्या? उसका सारा परिवार उस पर टूट पड़ा। सब उससे सबूत मांगने लगे। उस बेचारे ने तो ऐसे ही कह दिया था परिवार के प्रति अपना रोष व्यक्त करने के लिये। उसे क्या पता था कि उल्टे लेने के देने पड़ जायेंगे। मार खाई अलग, अपनी बेइज्जती करवाई अलग।

पिता: बेटा, जब तू या कोई और ऐसा गलत काम करेगा तो उसका खमियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा।

बेटा: इसीलिये तो मैं कह रहा हूं कि मैं अब यह आम जीवन छोड़ राजनीति का जीवन ही अपनाऊंगा।

पिता: तो उससे तुझे क्या मिलेगा?

बेटा: इन सब फिजूल के अमानवीय बंधनों से मुक्ति।

पिता: कैसे?

बेटा: जब मैं किसी छोटी स्थानीय पार्टी का राष्ट्रीय नेता बन बैठूंगा तो मैं किसी भी बड़े से बड़े नेता को कोई भी गाली, उस पर कोई भी आरोप व लांछन लगाने का मुझे अधिकार मिल जायेगा। मैं किसी भी नेता की बीवी, लड़के-लड़की व बहिन के चरित्र पर उंगली उठा सकने की हिम्मत दिखा सकूंगा।

पिता: तो फिर जूते खाने की हिम्मत भी बटोर रखना।

बेटा: पिताजी, आप पता नहीं किस जमाने की बातें करते हैं? पॉलीटीशियन किसी पर भी कोई भी तोहमत लगा सकता है। कोई नहीं पूछता – न पुलिस और न कोर्ट।

पिता: तेरा मतलब कि पॅालिटिक्स में कोई कानून नहीं चलता।

बेटा: कुछ भी समझो पर सच्चाई तो यही है।

पिता: यह कैसे हो सकता है?

बेटा: यह हो रहा है पिताजी। मैं अपको अनेक उदाहरण दे सकता हूं।

पिता: एक-दो तो दे।

बेटा: पिताजी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सीधा आरोप लगाया है कि प्रधानमन्त्री ने विमुद्रीकरण में भ्रष्टाचार किया है।

पिता: तो राहुलजी ने भ्रष्टाचार का कोई ब्यौरा प्रस्तुत किया? कोई प्रमाण या साक्ष्य दिये?

बेटा: उन्होंने तो बस आरोप लगाया है। कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये।

पिता: फिर यह क्या बात हुई?

बेटा: यही तो पॅालिटिक्स है पिताजी।

पिता: यह अच्छी पालिटिक्स है? न ठोस आरोप लगाओ और न कोई सबूत पेश करो और दूसरे को बदनाम कर दो। कोई पूछे भी ना।

बेटा: यही नहीं पिताजी, राहुलजी ने तो यह भी कहा है कि पेटीएम का मतलब पे टू पीएम है।

पिता: तो यह सब उन्होंने बिना साक्ष्य प्रस्तुत किये ही कह डाला?

बेटा: यही तो पॅालिटिक्स की ब्यूटी है। इसीलिये तो मैं कह रहा हूं कि मुझे भी अब इसके रंग में डूब जाना है।

पिता: पर बेटा, मैं तुझे फिर भी नेक सलाह दूंगा कि तू चाहे पॅालिटिक्स में जा या न जा, पर कभी निराधार आरोप मत लगाना वरन् तू मुश्किल में पड़ जायेगा। फिर मुझे मत कहना।

बेटा: पिताजी, यह पुरानी बात हो गई जब मुझे ऊल-जलूल बोल देने पर पीट कर रख दिया जाता था। अब में पॅालिटिक्स में हूं। कोई मुझ पर हाथ भी उठायेगा तो हंगामा खड़ा हो। जन्तर-मन्तर पर हजारों लोग इकट्ठे हो जायेंगे जो मुझे न्याय दिलाने के लिये कुछ भी करेंगे।

पिता: बेटा, राहुलजी ने तो यह भी कहा था कि मैं अगर मूंह खोलूंगा तो भूचाल आ जायेगा। उन्होंने खोला मूंह?

बेटा: नहीं। मैंने तो सुना नहीं, अखबार में पढ़ा नहीं।

पिता: ऐसा क्यों?

बेटा: पिताजी, राहुलजी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते जिससे देश का अहित हो, नुकसान हो। वह क्यों चाहेंगे कि मात्र उनके मूंह खोलने से देश में भूचाल आ जाये और हजारों-लाखों जानें चली जायें और अरबों-खरबों की सम्पत्ति का नुक्सान हो।

पिता: यह तो बेटा राहुलजी ने बड़ी दूर की सोची।

बेटा: वह तो पिताजी सदा ही ऐसा करते हैं। यह तो देश की जनता ही मूर्ख है जो उनकी गुणों की पहचान नहीं कर पाती।

पिता: पर बेटा, राहुलजी यह भी तो आरोप दोहराते रहते थे कि सत्ता पक्ष उन्हें संसद में बोलने नहीं दे रहा।

बेटा: यह तो ठीक है, पिताजी।

पिता: पर बेटा, संसद तो मुख्यत: विपक्ष ने नहीं चलने दी।

बेटा: हां, पिताजी, पहले विपक्ष यह मांग कर रहा था कि चर्चा का उत्तर प्रधानमन्त्री दें क्योंकि वह सदन में उपस्थ्ति नहीं रहते थे।

पिता: पर बेटा, बाद में तो प्रधानमन्त्री काफी दिन उपस्थित रहे। तब उन्होंने चर्चा क्यों नहीं होने दी?

बेटा: यही तो पिताजी पालिटिक्स है।

पिता: तो उधर प्रधानमन्त्री भी तो कह रहे थे कि विपक्ष उन्हें संसद में बोलने नहीं दे रहा और इसीलिये जो बातें उन्हे संसद में बोलनी चाहिये थीं वह उन्हें संसद के बाहर जन सभाओं में बोलनी पड़ रही हैं।

बेटा: हां, ऐसा प्रधानमन्त्री जी ने तो कहा है।

पिता: तो यह अच्छा जनतन्त्र है जिस में प्रधानमन्त्री को ही अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं है।

बेटा: पॅालिटिक्स में सब चलता है, पिताजी।

पिता: पर प्रधानमन्त्रीजी ने तो अपनी बात जनता के सामने रख दी। राहुलजी ने ऐसा क्यों नहीं किया?

बेटा: वह केवल संसद में ही अपनी बात रखना चाहते लगते थे।

पिता: क्यों?

बेटा: इसलिये कि कोई भी सांसद जब संसद में कुछ बोलता हैं तो कोई अदालत इसका संज्ञान नहीं ले सकती है और न उनके द्वारा किसी के बारे कुछ कहे पर कोई मुकद्दमा चल सकता है।

पिता: मतलब वह इसी कारण संसद के बाहर नहीं बोलना चाहते हैं।

बेटा: पिताजी, सांसद तो संसद में ही बोलना चाहेगा।

पिता: पर प्रधानमन्त्रीजी तो संसद के बाहर भी बोल लिये जब उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया गया।

बेटा: प्रधानमन्त्रीजी प्रधानमन्त्री हैं और राहुलजी राहुल।

पिता: बेटा, कहते हैं लंदन में एक हाईड पार्क हैं जहां कोई कुछ भी बोल सकता है। हमारे यहां तो बिना हाईड पार्क के ही सब कुछ होता है। केजरीवालजी तो रोज ही कुछ-न-कुछ बोल देते हैं।

बेटा: पर इसी कारण उन पर सब से अधिक मानहानि आदि के मुकद्दमें भी तो चल रहे हैं।

पिता: तो क्या हो जायेगा? वह कल को बिना शर्त मुआफी मांग लेंगे और सारा मामला समाप्त हो जायेगा। जो उनका राजनीतिक उद्देश्य था वह तो पूरा हो गया ना। आज तक किस नेता को मानहानि पर सजा मिली है?

बेटा: पिताजी, इसी को तो विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कहते हैं।

पिता: तो इसका क्या मतलब कि तू जिसको जो चाहे जो मर्जी चाहे कह दे उसे भले ही वह बात बुरी लगे।

बेटा: स्वतन्त्रता तो स्वतन्त्रता है चाहे किसी को अच्छी लगे या बुरी। हमने भारत की स्वतन्त्रता के लिये जब लड़ाई छेड़ी थी तो अंग्रेजों को अच्छी तो नहीं लगी थी।

पिता: तो तेरा मतलब हैं कि इस स्वतन्त्रता की आड़ में तो कल को तू मुझ में भी बुराइयां देखे और निकालेगा। मुझे भी भला-बुरा कह सकता है।

बेटा: पिताजी, स्वतन्त्रता तो स्वतन्त्रता है। उस पर कोई अंकुश नहीं लगा सकता।

पिता: तू मेरी बुराई कर के देख। मैं भी प्रत्युत्तर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का उपयोग से ही दूंगा।

बेटा: आप क्या करेंगे?

पिता: बेटा, अभिव्यक्ति के माध्यम तीन होते हैं – वाणी, लेखनी और हाथ। मुझे भी तो अपने पक्ष की अभिव्यक्ति का पूरा अधिकार है। और उसके लिये कौन सा माध्यम अपनाऊं, इसे चुनने में भी मैं पूरी तरह स्वतन्त्र हूं।

बेटा: यह तो गलत बात है। आप हाथ उठायेंगे तो यह अहिंसा है, अपराध है। आप कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं।

पिता: बेटा, मैं तुम्हें समझा दूं कि वाणी से भी हिंसा होती है। सच ही कहते हैं कि तलवार का घाव तो भर जाता है पर वाणी का कभी नहीं भरता, वह समय-समय पर पीड़ा देता ही रहता है।

बेटा: पिताजी, बेटे पर हाथ उठाना अपराध है।

पिता: यदि तू मुझे कुछ उलट बोलेगा तो प्रतिकार का मुझे भी अधिकार है। अभिव्यक्ति का कौन-सा साधन उपयोग में लाऊं, यह मेरी स्वतन्त्रता है। मेरे हाथ में तो जूता भी होगा।

बेटा: पिताजी, आप तो यूं ही तैश में आ गये। मैंने तो सिद्धान्त की बात की थी। मैंने कौनसा आपको कुछ कह दिया।

पिता: मैं भी सिद्धान्त और व्यवहारिकता दोनों की बात कर रहा हूं।

बेटा: पिताजी, आपको मुझ पर कोई विश्वास नहीं? क्या में आपके प्रति कभी ऐसा व्यवहार कर सकता हूं?

पिता: यदि तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं कौन सा अपने प्रतिकार के अधिकार का उपयोग करूंगा?

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