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सच की ताकत

सच की ताकत

आधुनिक युग में मनुष्य यंत्रों पर अपने से अधिक विश्वास करने लगा है। हर पल उसे यंत्र की आवश्यकता होती है। आज आदमी अपनी भावना व्यक्त करने से लेकर अपनों को खुशी देने तक, कोई भी काम यंत्रों की सहायता के बगैर नहीं कर पाता है। उसे अपने अंदर रहने वाली असीम शक्ति का आभास भी नहीं होता है। इस युग में रहने वाले हर व्यक्ति के पास नैतिक विचारों का कोई मोल नहीं होता है। वह कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर  पर तो विश्वास कर लेता है लेकिन अपने अंदर सुप्त अवस्था में रहने वाली शक्ति पर भरोसा नहीं कर पाते हैं। हम अपने बाल्य अवस्था में जो नैतिक ज्ञान पाते हैं वह केवल उस समय और विद्यालय में ही सीमित रह जाती है। जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमसे वह समस्त गुण धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। हमारा सबसे बड़ा नैतिक गुण है ‘सच्चाई।’ हम एक छोटे बच्चे को सच बोलने के लिए प्रेरित कर तो लेते हैं लेकिन हममें से कितने व्यक्ति ऐसे हैं, जो जीवन में आने वाले मुश्किल समय में सच्चाई से मुंह चुरा लेते हैं। कोई भी कारण बताकर झूठ बोल देते हैं। जब हम झूठ बोलते हैं, तो सर्वप्रथम यह जानना चाहिए की हम झूठ क्यों बोलते हैं।  देखा जाए तो हम झूठ बोल कर सामने वाले व्यक्ति से अपनी कमी को छुपाते हैं। हम हमेशा दूसरों के सामने खुद को महान दर्शाने का प्रयास करते हैं। हमारा खुद को अच्छा मानना दूसरों के लिए कितना अच्छा साबित होगा, वह भी हमें समझ नहीं आता है। हम अपनी बांतों से दूसरों के सामने अपना मान तो बढ़ा लेते हैं लेकिन यह नहीं समझ पाते की अपनी नजर में उतना ही छोटे हो जाते हैं। एक बार अपने आप को तुच्छ अनुभव करने से हम अपने अंदर रहने वाली शक्ति को नष्ट करते हैं। जब हम झूठ बोलते हैं तो उस समय हम अपने अंदर की कमी से वाकिफ रहते हैं। जब हम अपनी गलती को अन्य किसी के सामने स्वीकार करने से कतराते हैं अथवा स्वीकार ही नहीं कर पाते हैं, तब उस गलती को सुधारने की गुंजाइश ही नहीं बचती है। गलती करना बड़ी बात नहीं है लेकिन उस गलती को न सुधारने से हम एक बेहतरीन जिंदगी जीने का  अवसर खो देते हैं।

झूठ बोलना एक अभ्यास है। जो व्यक्ति एक बार झूठ बोलता है वह मजबूरन अपने आपको सही साबित करने में लगा रहता है। एक झूठ को छुपाने के लिए दूसरे झूठ की सहायता लेता है। वह कभी सच्चाई का सामना नहीं कर पाता है। पूरी दुनिया के सामने वह एक सुस्त जीवन निर्वाह करता है, अंदर ही अंदर खोखला हो जाता है। अंदर से कमजोर व्यक्ति मुश्किल घड़ी में खुद को संभाल नहीं पाता और टूट जाता है। देखा जाए तो झूठ बोलकर हम अपने आप का ही नुकसान कर बैठते हैं।

इंसान अगर एक बार सच बोलने की आदत बना लेता है, तो मुश्किल घडिय़ों में अपने आप को मजबूत पाता है। सच बोलने वाले व्यक्ति को पहले पहले कुछ मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन वही सच्चाई धीरे-धीरे उसकी ऐसी ताकत बन जाता है कि उसे खुद ज्ञात नहीं होता है। सच बोलने वाला व्यक्ति अपने मन के साम्राज्य में सम्राट बन कर रहता है। सदैव एक संतुष्टि का भाव उसके चेहरे से झलकता है। सच बोलने वाले व्यक्ति के चारों तरफ एक अदृश्य शक्ति अपना घेरा बनाये रखती है, जिससे आसानी से कोई दुष्कार्य उसे छू नहीं पाता है। उससे निकलने वाले तेज से अन्य कुकर्मी व्यक्ति भयभीत रहते हैं। सच्चाई उसके लिए इतना बड़ा अस्त्र बन जाता है, जिस कारण वह किसी से भी भयभीत नहीं होता। सच बोलना और झूठ बोलना दृश्यमान होने वाली चीज़ नहीं है लेकिन उसका परिणाम हमारे जीवन में जरूर असर डालता जो अत्यंत सहजरूप में दृश्यमान होता है।

उपाली अपराजिता रथ    

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