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मोदी के कदम ठोस जमीन पर

मोदी के कदम ठोस जमीन पर

जब उत्साह और उत्तेजना पहले भरोसे और फिर आशावाद में बदलने लगे तो सतर्क हो जाने की जरूरत है। वजह यह है कि धीरे-धीरे भरोसा डिगने लगता है और माहौल प्रतिकूल होने की ओर बढ़ चलता है।

देश की आर्थिक हालत की साफ-सफाई के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महा अभियान को 8 नवंबर से 40 दिन बीत चले हैं। इसमें दो राय नहीं कि इस क्रांतिकारी और ऐतिहासिक पहल का जिस उत्साह से लोगों ने स्वागत किया था, वह धीरे-धीरे ठीक होने के भरोसे में बदलने लगा। मोदी के आश्वासन से लोगों में यह भावना कुछ दिन तक कायम रही। उन्होंने कहा कि वे लोगों को निराश नहीं होने देंगे और आर्थिक हालात के सामान्य होने के लिए 50 दिनों तक लोगों से थोड़ी कठिनाई झेलने की अपील की।

लोग इंतजार करते रहे हैं, शायद थोड़ी बेचैनी के साथ। लेकिन पुराने नोटों को जमा करने को लेकर रिजर्व बैंक के लगातार बदलते फैसलों ने इस मौन इंतजार में एक गंभीर बेचैनी का बीज बो दिया है, जिससे भरोसा एक आशावाद में बदलता जा रहा है। यह बेचैनी ही डरावनी है। इससे किसी संकट से जूझने की सामूहिक या सामाजिक ताकत काफी कमजोर हो जाती है। इससे धैर्य चुकने लगता है।

समूचा देश ऐसी बेचैनी की स्थिति में पहुंच गया है, समाज की सामूहिकता पर भारी दबाव पडऩे लगा है और बड़े आर्थिक संकट की आशंकाओं के बादल घिरने लगे हैं। मोदी जब लोगों से यह अपील कर रहे थे कि 50 दिन की मोहलत दीजिए, हालात सामान्य हो जाएंगे, तो उन्हें पूरी तरह तैयार होना चाहिए था। लोगों ने उन्हें वह मोहलत दी। अब, इस सम्पादकीय को लिखते वक्त नौ दिन ही शेष रह गए हैं। 31 दिसंबर को 50 दिन पूरे हो रहे हैं।

बेशक, राजनीति में माहिर किसी चतुर नेता के लिए अपने पत्ते समय से पहले खोलना समझदारी नहीं होगी। आखिर रणनीतियां, नीति-निर्माण और निर्णय राजनीति के चतुर खेल का हिस्सा होते हैं। जाहिर है, राजनीति की इस कला में मोदी से बेहतर शायद ही कोई माहिर हो। वे गुजरात में 12 साल मुख्यमंत्री रहते राजनीति के इस उठा-पटक को बखूबी देख चुके हैं और उसमें सफल होकर भी दिखा चुके हैं।

आखिर देश के सवा सौ करोड़ लोग उनमें अपनी आस्था जाहिर कर चुके हैं। लोगों को यकीन है कि यह मसीहा आर्थिक मोर्चे पर सामान्य हालत बहाल कर लेगा और उनके रोजमर्रा की जिंदगी को कुछ आसान बना देगा। लोगों की यही आस्था मोदी पर जिम्मेदारियों का बोझ कुछ अधिक डाल देती है। जाहिर है, इसका उन्हें बखूबी एहसास भी है। इससे उनकी बतौर नेता साख दांव पर लगी हुई है। यह ऐसे नेता की साख है जो देश को बदहाली से बाहर निकाल लाने में सक्षम है। यह बदहाली पिछले छह दशकों में कई कारणों से पैदा हुई है। इसलिए मोदी के पास किसी तरह की चूक करने की गुंजाइश बेहद कम है। एक भी चूक उनके लिए काफी महंगी साबित होने वाली है।

मोदी के साथ चाहे जो हो पर इससे एक बात तो तय है कि भारत के सवा अरब लोगों और दुनिया भर में करोड़ों लोगों की उम्मीदें और आकांक्षाएं धराशायी हो जाएंगी। ऐसे हालात को देश बमुश्किल ही झेल पाएगा। मोदी की नाकामी का यही भय उनके कट्टर तथा पक्के समर्थकों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या मोदी के लिए बतौर प्रधानमंत्री अपने पहले कार्यकाल में भारी आर्थिक असर वाला ऐसा कदम उठाना उचित और समझदारी भरा है?

दरअसल करोड़ों लोगों की ऐसी चिंता के पीछे यह ईमानदार और गंभीर एहसास है कि इस नोटबंदी से कहीं मोदी देश में कहीं भी और खासकर 2019 में चुनाव न हार जाएं। लोग मोदी की काबिलियत से वाकिफ हैं लेकिन उन्हें विपक्षी पार्टियों की नकारात्मक ताकत का भी एहसास है, जो येन-केन-प्रकारेण खेल बिगाडऩे में लगी हैं। मोदी के कट्टर समर्थकों के जेहन में अब यही सवाल है कि मोदी अगर 2019 के बाद यह फैसला करते तो क्या बेहतर नहीं होता!

कांग्रेस उपाध्यक्ष का भूकंप लाने का बड़बोला दावा तो बेमानी साबित हो गया, उसे गंभीरता से लेने की दरकार नहीं है। बाकी विपक्ष भी अपने को हास्यास्पद ही साबित करता जा रहा है। लेकिन मोदी को लोगों को यह आश्वस्त करना होगा कि वे अपने वादे के मुताबिक 50 दिनों में सामान्य आर्थिक स्थिति बहाल कर लेंगे। जब विपक्ष लगभग हर रोज मोदी और भाजपा सरकार पर तीखे वार कर रहा हो तो लोगों और समाज के धैर्य की परीक्षा लेना खतरनाक साबित हो सकता है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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