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सद्गुरू जग्गी वासुदेव प्राचीन मूल्यों को नए परिधान देने वाले संत

सद्गुरू जग्गी वासुदेव  प्राचीन मूल्यों को नए परिधान देने वाले संत

प्रकाश की यात्रा करने वाला कोई भी मनुष्य अपनी मुट्ठी में सूरज का बिम्ब लेकर जन्म नहीं लेता। अमृत की आकांक्षा रखने वाला कोई भी आदमी अगम्य लोगों में घर बसाकर नहीं रहता। ऊर्जा के अक्षय स्रोतों की खोज करने वाला व्यक्ति विरासत में प्राप्त टेक्नोलॉजी को ही आधार मानकर नहीं चलता। इसी प्रकार सत्य की यात्रा करने वाला साधक पुरानी लकीरों पर चलकर ही आत्मतोष नहीं पाता। बल्कि धर्म के क्षेत्र में भी नये-नये प्रयोग एवं आविष्कार करता है। ऐसे ही एक महान् आध्यात्मिक प्रयोक्ता है सद्गुरू जग्गी वासुदेव। वे पश्चिम में भारतीय ज्ञान एवं अध्यात्म का प्रतिनिधित्व करते हैं। आम आध्यात्मिक गुरुओं से वे न केवल आधुनिक विचार रखते हैं वरन वह उन्हें अपने व्यवहार में भी अपनाते हैं। जहां एक ओर वे योग, अध्यात्म तथा धर्म को आडम्बर से मुक्त करते हैं वही सहज और सरल जीवन जीने की भी शिक्षा देते हैं। उनकी व्यक्तिगत रूचियां भी आम गुरुओं से अलग हटकर है। उनको स्पोर्टस बेहद पसंद है। अक्सर उन्हें कोई आउटडोर गेम खेलते देखा जा सकता है। उन्हें पहाड़ों पर घूमना, फुटबाल खेलना तथा बाइक राइडिंग करना अच्छा लगता है।

जग्गी वासुदेव एक योगी, सद्गुरू, चिन्तक और दिव्यदर्शी हैं। उनको ‘सद्गुरू’ भी कहा जाता है। वे ईशा फाउंडेशन नामक लाभरहित मानव सेवी संस्थान के संस्थापक हैं। ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है साथ ही साथ कई सामाजिक और सामुदायिक विकास योजनाओं पर भी काम करता है। इसे संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है।

सद्गुरू जग्गी वासुदेव का जन्म 3 सितंबर 1957 को कर्नाटक राज्य के मैसूर शहर में हुआ। उनके पिता एक डॉक्टर थे। चार संतानों में वे सबसे छोटे थे। बालक जग्गी को कुदरत से खूब लगाव था। अक्सर ऐसा होता था वे कुछ दिनों के लिये जंगल में गायब हो जाते थे, जहां वे पेड़ की ऊंची डाल पर बैठकर हवाओं का आनंद लेते और अनायास ही गहरे ध्यान में चले जाते थे। जब वे घर लौटते तो उनकी झोली सांपों से भरी होती थी जिनको पकडऩे में उन्हें महारत हासिल है। ग्यारह वर्ष की उम्र में जग्गी वासुदेव ने योग का अभ्यास करना शुरु किया। इनके योग शिक्षक थे श्री राघवेन्द्र राव, जिन्हें मल्लाडिहल्ली स्वामी के नाम से जाना जाता है। मैसूर विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वहीं पर उनके अंदर घूमने और बाइक राइडिंग की रूचियां जन्मीं। उन्होंने पोल्ट्री फार्म तथा कंस्ट्रक्शन जैसे बिजनेस भी शुरू किए।

परन्तु 23 सितम्बर को जग्गी वासुदेव को चामुण्डा हिल पर एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव हुआ जिसने उनकी जीवन की दिशा को ही बदल दिया। उन्होंने अपना बिजनेस छोड़कर अपना जीवन योग की गहन साधना एवं जन-जन को उससे लाभन्वित करने में लगाने का निश्चय किया। जल्दी ही उन्होंने इशा फाउंडेशन की स्थापना की और कर्नाटक तथा आसपास के क्षेत्रों में योग सिखाने लगे। इसके बाद उनका फाउंडेशन विदेशों में भी फैलने लगा। उनके परिवार में उनकी पत्नी तथा एक बेटी थी। उनकी पत्नी का 1996 में निधन हो गया जबकि बेटी राधे जग्गी एक प्रख्यात भरतनाटयम डांसर है। उन्हें जहां आधुनिक कपड़ों से कोई परहेज नहीं है वहीं वे इंटरनेट, लैपटॉप, स्मार्टफोन तथा अन्य आधुनिकतम तकनीकों का इस्तेमाल भी करते हैं।

सद्गुरू द्वारा स्थापित ईशा फाउंडेशन लोगों की शारीरिक, मानसिक और आतंरिक कुशलता के लिए समर्पित है। जिसमें दो लाख पचास हजार से भी अधिक स्वयंसेवियों की सेवाएं प्राप्त हो रही है। इसका मुख्यालय ईशा योग केंद्र कोयंबटूर में है। इसकी एक महत्वपूर्ण योजना ग्रीन हैंड्स के अन्तर्गत पूरे तमिलनाडु में लगभग 16 करोड़ पेड़ रोपित करने  का लक्ष्य है। अब तक इसके अंतर्गत तमिलनाडु और पुदुच्चेरी में 1800 से अधिक समुदायों में, 20 लाख से अधिक लोगों द्वारा 82 लाख पौधों का रोपण किया गया है। जिसने गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया था। पर्यावरण सुरक्षा के लिए किए गए इसके महत्वपूर्ण कार्यों के लिए इसे वर्ष 2008 का इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार दिया गया।

ईशा योग केंद्र वेलिंगिरि पर्वतों की तराई में 150 एकड़ की हरी-भरी भूमि पर स्थित है। घने वनों से घिरा यह केंद्र नीलगिरि जीवमंडल का एक हिस्सा है, जहाँ भरपूर वन्य जीवन मौजूद है। आंतरिक विकास के लिए बनाया गया यह शक्तिशाली स्थान योग के चार मुख्य मार्ग – ज्ञान, कर्म, क्रिया और भक्ति को लोगों तक पहुंचाने के प्रति समर्पित है। इसके परिसर में ध्यानलिंग योग मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की गई है। ध्यानलिंग, ऊर्जा का एक शाश्वत और अनूठा आकार है। 13 फीट 9 इंच की ऊंचाई वाला यह ध्यानलिंग विश्व का सबसे बड़ा पारा-आधारित जीवित लिंग है। यह किसी खास संप्रदाय या मत से संबंध नहीं रखता, ना ही यहां पर किसी विधि-विधान, प्रार्थना या पूजा की जरूरत होती है। जो लोग ध्यान के अनुभव से वंचित रहे हैं, वे भी ध्यानलिंग मंदिर में सिर्फ कुछ मिनट तक मौन बैठकर ध्यान की गहरी अवस्था का अनुभव कर सकते हैं। इसके प्रवेश द्वार पर सर्व-धर्म स्तंभ है, जिसमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, जैन, बौध, सिक्ख, ताओ, पारसी, यहूदी और शिन्तो धर्म के प्रतीक अंकित हैं, यह धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर पूरी मानवता को आमंत्रित करता है।

सद्गुरू के महान एवं ऊर्जस्वल व्यक्तित्व को इन सीमित दायरे में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित करने का प्रयत्न होगा। उन्हें नये समाज का निर्माता कहा जा सकता है। सद्गुरू जैसे व्यक्ति दो चार नहीं, अद्वितीय एवं विलक्षण होते हैं, उनका गहन चिंतन समाज के आधार पर नहीं, वरन उनके चिंतन में समाज अपने को खोजता है। उन्होंने अपने कार्यक्रमों और चिंतन के माध्यम से स्वस्थ मूल्यों को स्थापित करके समाज को जीवंत एवं शक्ति संपन्न बनाने का प्रयत्न किया है। व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र निर्माण की अनेक नई-नई कल्पनाएं उनके मस्तिष्क में तरंगित होती है।

‘उत्तम पुस्तक महान आत्मा की प्राणशक्ति होती है।’ मिल्टन की यह उक्ति सदगुरु की प्रत्येक कृति में चरितार्थ होती हुई देखी जा सकती है। उन्होने 8 भाषाओं में 100 से अधिक पुस्तकों की रचना की है। सद्गुरू के विचारों का सबसे बड़ा वैशिष्टय यह है कि वे विशाल मानव समाज की चेतना को झंकृत करके उनमें आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को सम्प्रेषित करने में सफल हुए हैं।

समग्र मानव समाज के लिए गहन एवं हितावह चिंतन करने वाले युगद्रष्टा सद्गुरू ने अपने आध्यात्मिक आंदोलन एवं विचारों के द्वारा जिस मानव धर्म एवं सुख समृद्धि से परिपूर्ण आदर्श समाज की परिकल्पना की है, उस कल्पना की पूर्ति सभी समस्याओं का समाधान है। कहा जा सकता है कि सद्गुरू के समाज चिंतन में जो क्रांतिकारिता, परिवर्तन एवं नये दिशाबोध हैं, वे समाजशास्त्रियों एवं समाज निर्माताओं को भी चिंतन की नई खुराक देने में समर्थ हैं।

बूंद-बूंद से घट भरता है, वैसे ही व्यष्टि ही समष्टि के रूप में परिणत होती है। सद्गुरू का मंतव्य है- भौतिक विकास के क्षेत्र में अनेक योजनाएं क्रियान्वित होने पर भी जब तक आदमी के निर्माण का कार्य नहीं होगा, सभी योजनाएं अपूर्ण और अधूरी रह जाएंगी।

सद्गुरू ने भौतिक वातावरण में अध्यात्म एवं योग की लौ जलाकर उसे तेजस्वी बनाने का भगीरथ प्रयत्न किया है। उनकी दृष्टि में अपने लिए अपने द्वारा अपना नियंत्रण अध्यात्म है। वे अध्यात्म साधना को परलोक से न जोड़कर वर्तमान जीवन से जोडऩे की बात कहते हैं। अध्यात्म का फलित उनके शब्दों में यों उद्गीर्ण है- अध्यात्म केवल मुक्ति का पथ ही नहीं, वह शांति का मार्ग है, जीवन जीने की कला है, जागरण की दिशा है और रूपान्तरण की सजीव प्रक्रिया है। कहा जा सकता है कि सदगुरु ऐसे सृजनधर्मा अध्यात्म मनीषी हैं जिन्होंने प्राचीन मूल्यों को नए परिधान में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है।

भारतीय संस्कृति की आत्मा धर्म है। यही कारण है कि यहां अनेक धर्म पल्लवित एवं पुष्पित हुए हैं। सबने अपने अपने ढंग से धर्म की व्याख्या की है। सद्गुरू एक ऐसे धर्म के पक्षधर हैं जहां सुख शांति की पावन गंगा-यमुना प्रवाहित होती है। सच्चे धार्मिक की पहचान बताते हुए वे कहते हैं कि धर्म प्रेम और करुणा से भरा होता है। धार्मिक होकर भी व्यक्ति लड़ाई-झगड़े, दंगे-फसाद, तेरा-मेरा करे, यह देखकर आश्चर्य होता है।

ललित गर्ग

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