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समाजिक अवरोधों का सामना करना सीखो

समाजिक अवरोधों का सामना करना सीखो

‘रत्नाभिषेक’ पुस्तक में जीवन को सुखमय तथा सभ्यता से परिपूर्ण बनाने हेतु लेखक ने कु छ महत्वपूर्ण कथनों से लोगों को समझाने का प्रयास किया है। यह पुस्तक राष्ट्र के प्रति प्रेम को जगाने वाली है। इसमें लेखक ने राष्ट्रवादी कथनों के जरिए हमारे अन्दर एक नैतिकता का भाव  जगाने की कोशिश की है। लेखक पुस्तक के आरम्भ में ही लिखते हैं कि यदि प्रतीक बनना चाहते हो तो शौर्य का प्रतीक बनो। इसको लेखक ने विस्तृत रूप से समझाते हुए लिखा है कि वास्तविक सफलता के  रहस्य का नाम शौर्य है। वास्तविक जगत में विचरण करने वाला व्यक्ति ही उन्नति का पथ प्रशस्त कर सकता है, न कि कल्पनाओं के संसार में विचरण करने वाला। जो व्यक्ति कल्पनाओं के संसार में विचरण करते रहते हैं, वे वास्तविकता से इतनी दूर चले जाते हैं कि वास्तविकता उन्हें तुच्छ लगने लगती है। कल्पनाओं के संसार में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति अपनी वास्तविक कल्पना शक्ति को भ्रमित कर लेते हैं। यह कल्पना शक्ति वास्तविक जगत से इतनी दूर कर देती है कि वे दीर्घसूत्री हो जाते हैं।

Layout 1लेखक, सत्यता को लोगों में बनाये रखने के लिये अपनी बात रखते हुए लिखते है कि यदि आश्रय लेना चाहते हो तो सत्य का आश्रय लो। सत्य रहस्य है। सत्य वास्तविक रहस्य है और अवास्तविक रहस्य जो सत्य प्रिय, मन को आनन्दित करने वाला, हितकारी, स्पष्ट, अन्तरात्मा में छिपे अंधकार को नष्ट करने वाला है, उसे वास्तविक सत्य कह सकते हैं। जो सत्य अप्रिय, संवेगपूर्वक प्रेरित करने वाला पूर्ण स्पष्ट है उसे अवास्तविक सत्य कहा जा सकता है परन्तु इसमें जो ‘अप्रिय’ सत्य का अंश है इसका प्रयोग विशेष स्थिति में किया जा सकता है क्योंकि यह सत्य होते हुए भी अपने रहस्य से घृणा करने वाला है इसलिये सत्य का आश्रय लेकर व्यक्ति समस्या निवारक तथा सफलता एवं विजय प्राप्ति के योग्य हो जाता है।

रत्नाभिषेक

लेखक: बलराम रस्तोगी (सखा)

प्रकाशक : अनुराधा प्रकाशन

मूल्य                   : 200 रु.

पृष्ठ                    : 144

आज समाज में अधिकतर लोग आर्थिक तंगी से विचलित होकर अपने कार्य को मध्य में ही रोक देते है लेकिन सामना नहीं कर पाते इस पर लेखक ने लिखा है कि यदि सामना करना चाहते हो तो आर्थिक स्थिति का सामना करो। इस क्रम में लेखक ने लिखा है कि जब व्यक्ति में आर्थिक परिवर्तन होता है तब उसमें अत्यधिक परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखाई देने लगता है जो उसे असन्तुलित करके, मानवीय गुणों से पृृथक करने का प्रयास करता है। यहीं से उसमें  ‘हम’ श्ब्द की उत्पत्ति हो जाती है। जब आर्थिक स्थिति उच्चता को प्राप्त हो जाती है तब वह व्यक्ति में एक प्रकार का परिवर्तन उत्पन्न कर देती है जिसके फलस्वरूप यह परिवर्तन उसे अनियंत्रित करने का प्रयास करता है। यहीं से वह ‘सत्’ या’ मैं’ को प्राप्त करता है।

यह पुस्तक पाठकों पर प्रभाव डालने में सफल रहेगी। इसका कारण इस पुस्तक का वास्तविक जीवन से संबंधित होना है। जो आम लोगों के सामने रोज घटने वाली घटनाओं के ऊपर निर्भर है।

 रवि मिश्रा

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