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एक स्वस्थ जीवन-शैली ही यूरोलॉजी की समस्याओं से बचन का समाधान

एक स्वस्थ जीवन-शैली ही यूरोलॉजी की समस्याओं से बचन का समाधान

स्वस्थ जीवन-शैली बहुत ही महत्वपूर्ण है और ऐसी जीवन शैली के लिए नियमित व्यायाम और सुरक्षित खान-पान बेहद जरूरी है। अगर सिर्फ इन्हीं दो बातों का ध्यान रखा जाए और जागरूकता फैलाई जाए तो बहुत हद तक यूरोलॉजी संबंधित समस्याओं से निजात पाई जा सकती है।’’ यह कहना है दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में यूरोलॉजी और रेनल ट्रांसप्लांट के प्रमुख डॉ. अनूप कुमार का। एम्स के गोल्ड मेडालिस्ट और अमेरिका में रोबोटिक्स में डिग्री पाए डॉ. अनूप झेंपते हुए ही स्वीकार करते हैं कि वे गरीबों को मदद करने का खास ख्याल रखते हैं। उन्होंने उदय इंडिया के संपादक दीपक कुमार रथ के साथ विस्तृत बातचीत की। प्रमुख अंश:-

भारत में यूरोलॅाजी संबंधी समस्या की स्थिति क्या है?

भारत में यूरोलॅाजी की समस्याएं पूरी जनसंख्या के विभिन्न आयु वर्ग पर निर्भर करती है। यहां मैं 50 वर्ष के ऊपर के आयु वाले वर्ग में होने वाली समस्याओं पर पहले बात करना चाहूंगा। इस वर्ग में चार प्रकार की समस्याएं होती हैं। एक, पथरी की समस्या, दूसरे कैंसर, तीसरे प्रोस्टेट (पौरुष-ग्रंथि) में सूजन और चौथे, इनफेक्शन की समस्या है। सबसे बदतर स्थिति किडनी का खराब हो जाना होत है। इनमें प्रोस्टेट में सूजन की समस्या लोगों में सबसे अधिक पाई जाती है। उसके बाद पथरी और इनफेक्शन की समस्या तथा कैंसर की समस्या होती है। किडनी फेल होने पर ट्रांसप्लांट की दरकार होती है। भारत की 80 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या इन रोगों से सबसे मुश्किल स्थिति में होती है क्योंकि वे अपने इलाके में किसी यूरोलॅाजिस्ट की सलाह नहीं ले पाते हैं। ऐसे लोगों की या तो किडनी खराब होने के कगार पर होती है या खराब हो चुकी होती है जिसे ट्रान्सप्लान्ट करना पड़ता है। यदि इन लोगों को इन बीमारियों का समय पर डॉक्टर के पास जाकर इलाज कराने के लिये शिक्षित किया जाये तो इससे किडनी में होने वाली समस्याओं को रोका जा सकता है। इसके अलावा इन सारी सुविधाओं को यदि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराया जाये तो इससे भी इन समस्याओं को कम किया जा सकता है।

आपके अस्पताल में आने वाले मरीजों में ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का क्या प्रतिशत होता है?

हमारे यहां ग्रामीण और शहरी दोनों तरह के लोग आते हैं। यदि मरीजों की संख्या के अनुसार बांट कर देखें तो लगभग 70 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाके से और 30 प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्र से होंगे। इन मरीजों की संख्या को पूरे देश के संदर्भ में देखें तो यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, कोलकाता, पूर्वोत्तर राज्य तथा जम्मू-कश्मीर के लगभग ग्रामीण क्षेत्रों से काफी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

ये मरीज ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं जहां प्रारंभिक जांच की भी सुविधा नहीं होती है। इस स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि कोई भी एक प्रशिक्षित यूरोलोजिस्ट सेंटर खोलने के लिए, हमें पहले एक प्रशिक्षित यूरोलोजिस्ट की जरूरत पड़ती है। दूसरी समस्या ग्रामीण क्षेत्रों और कस्बों में यूरोलॉजिस्ट की कमी है। ज्यादातर प्रशिक्षित यूरोलॉजिस्ट नगरों में या फिर मेट्रो शहरों में काम करना पसंद करते हैं। इसलिए जरूरी है कि नोडल केंद्र बनाए जाएं, जो ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं का निराकरण करे क्योंकि हर ग्रामीण इलाके में ऐसे केंद्र बनाना संभव नहीं है।

यूरोलॉजी संबंधी समस्या से जूझ रहे लोगों को भोजन तथा अन्य कार्यों सहित किन-किन सावधानियों का ध्यानपूर्वक अनुसरण करना चाहिए?

स्वस्थ जीवन-शैली का होना बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसके लिए नियमित व्यायाम और सुरक्षित खान-पान बेहद जरूरी होता है। अगर सिर्फ इन्हीं दो बातों का ध्यान रखा जाए और जागरूकता फैलाई जाए तो बहुत हद तक यूरोलॉजी संबंधित समस्यायों से निजात पायी जा सकती है। जागरूकता से मेरा मतलब है की अगर किसी व्यक्तिको, जो 50 वर्ष या उससे अधिक का हो, मूत्र संबंधित तकलीफें होती हैं तो उसे फौरन डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। मसलन बीच रात में पेशाब का आना, जो प्रोस्टेट वृद्धि का प्रारंभिक लक्षण है और कैंसर भी ऐसे हो सकता है, तो उसे तुरंत  यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। इसलिए मैं इस उम्र वर्ग के सभी लोगों को सलाह देना चाहूंगा कि अपने मूत्र प्रणाली की वार्षिक जांच जरूर करवाएं। यह जांच सभी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त उपलब्ध है और इस जांच से किसी भी बीमारी को उसकी प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ा जा सकता है। प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़े जाने से न सिर्फ उस बीमारी का इलाज आसान हो जाता है बल्कि उस पर लागत भी कम आती है। मसलन अगर कोई प्रोस्टेट का रोगी मुझे प्रारंभिक अवस्था में ही संपर्क करता है तो उसका इलाज मैं  बहुत आसानी से कर सकता हूं। जबकि अंतिम अवस्था में आने पर न सिर्फ बीमारी का इलाज करना मुश्किल हो जाता है, उस पर लागत भी बढ़ जाती है क्योंकि दवाइयां महंगी हो जाती है फिर। अब सरकार इन महंगी दवाइयों को मुफ्त उपलब्ध तो करवाती है लेकिन उससे सरकार पर बोझ बढ़ जाता है। तो ऐसे में अगर लोगों को जागरूक किया जाए तो सरकार पर बोझ कम  हो जायेगा और इसीलिए मैं कहता हूं की जानकारी ही बचाव है।

आज के जमाने में लोग कम सोने, देर रात सोने, शराब पीने के आदि होते जा रहे हैं, तो क्या यह सब भी यूरोलोजिकल समस्यायों को बढ़ाने में कारक होते हैं?

शराब और तम्बाकू का सेवन निश्चित तौर पर कई तरह के कैंसरों को बढ़ावा देता है जैसे किडनी और ब्लाडर कैंसर। इसके अलावा कई तरह की शारीरिक समस्यायों को भी जन्म देता है जैसे कि लिवर और पैंक्रियाज की समस्याएं। इसलिए स्वस्थ जीवन-शैली बहुत जरूरी है जिसमें आठ घंटे की नींद अनिवार्य है। अच्छी नींद और शांति तमाम तरह के तनाव को कम कर देती है। यहां यह बताना जरूरी है कि आज के दौर में 35 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं, जो घर और बाहर के कामों के बोझ से दबी होती हैं, उनमें यूरोलॉजी संबंधित बीमारियों की बाढ़-सी आ गई है। इसलिए यह जरूरी है स्वस्थ जीवन-शैली अपनाई जाए और शराब और तम्बाकू के सेवन से बचा जाए।

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क्या आपको लगता है कि मांसाहार यूरोलॉजी संबंधी बीमारियों को बढ़ावा देता है?

बहुत सारे शोध हुए हैं जिनका मानना है की शाकाहार मांसाहार के मुकाबले ज्यादा बेहतर होता है। मैं यह नहीं कहता की मांसाहार हानिकारक होता है लेकिन बहुत सारे लोग डिब्बा बंद मांस खाते है जिससे कैंसर, मोटापा और दिल की बीमारियां हो सकती हैं। यह भी कहा जाता है की पत्तीदार सब्जियों का सेवन मांसाहार से कहीं बेहतर होता है। यहां मैं यह कहना चाहूंगा की लोग शाकाहारी हों या मांसाहारी, उन्हें अपने भोजन में वसा और कार्बोहाइड्रेट से बचना चाहिए।

भारत में यूरोलॉजी के  क्षेत्र में शोध का स्तर कैसा  है?

भारतीय समुदाय इस क्षेत्र में बहुत काम कर रहा है जिसका लोहा पूरी दुनिया मान रही है। उदाहरण के तौर पर हमारा संस्थान कैंसर की रोकथाम के लिए इलाज ढूंढने में लगा है। हम ऐसे जीन की खोज में लगे हैं जिससे कैंसर होता है। एकबार यह पता लग जाये तो हम कैंसर की रोकथाम करने में भी सफल हो जायेंगे। लेकिन यह भी मानना होगा की इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, कमी है तो संरचनाओं की।

आईसीएमआर का क्या योगदान है?

आईसीएमआर एक अच्छी संस्था है जो बेसिक रिसर्च पर काम करते हुए यूरोलॅाजी से संबंधित मेडिकल रिसर्च को बढ़ावा देती है। भारत सरकार भी इस प्रकार की संस्थाओं के माध्यम से इस क्षेत्र को बढ़ाने में सहायता कर रही है। अब हम इस क्षेत्र में रोबोटिक्स लेजर का भी उपयोग कर रहे हैं।

यूरोलॅाजी में रोबोटिक्स लेजर का क्या उपयोग है?

पहली बार 2000 में अमेरिका में रोबोटिक्स लेजर का उपयोग प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए किया गया था, तब से लेकर आज तक रोबोटिक्स लेजर का उपयोग प्रोस्टेट और ब्लैडर कैंसर तथा सर्जरी में अहम योगदान हो चुका है। इसके उपयोग से न केवल समय की बचत होती है बल्कि इससे मरीज को ज्यादा दर्द भी नहीं होता है।

भारत में कितने मरीजों ने इस सुविधा का लाभ लिया है?

रोबोटिक्स सर्जरी की सुविधा सर्वप्रथम एम्स में शुरू की गई थी। फिर पीजीआईएमआर में। अब तो कई निजी अस्पतालों में यह सुविधा उपलब्ध है लेकिन अभी सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा आनी बाकी है। हमने चार साल पहले इस सुविधा को प्राप्त करने का प्रयास शुरू किया था और अगले 2 महीने में यह हमारे पास होगा। साथ ही यह प्रयास भी करने होंगे कि सभी सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा हो ताकि गरीबों को यह सुविधा मुफ्त मिल सके।

देश में प्रोस्टेट कैंसर और किडनी कैंसर मरीजों की कितनी संख्या है?

प्रोस्टेट कैंसर के मामले में हमने आईसीएमआर के साथ मिलकर एक अध्ययन कराया था जिसमें सभी कैंसर संस्थानों से आंकड़े जुटाए गए थे। इन आंकड़ों के अनुसार प्रोस्टेट कैंसर दूसरी सबसे बड़ी समस्या बन कर उभरी है भारतीय पुरुषों के लिए, और अगले 20 साल में इसके दोगुना  हो जाने की उम्मीद है। जहां तक किडनी कैंसर की बात है, पिछले 10 वर्षों की तुलना में यह कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है क्योंकि हम शहरी क्षेत्रों में इसे जल्द पकड़ ले रहे हैं।

सरकार द्वारा इतनी सुविधाएं देने के बाद भी लोग सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों की तरफ क्यों जा रहे हैं?

सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर हमेशा निजी अस्पतालों के डॉक्टरों से ज्यादा मरीजों को देखते हैं। इसलिए अनुभव के मामले में सरकारी अस्पताल के डॉक्टर हमेशा निजी अस्पतालों के डॉक्टरों से आगे होते हंै। समस्या केवल सुविधाओं को प्रदान करने की है जो निजी अस्पतालों में अधिक होती है। जैसे यदि मरीजों के लिये बेड की बात हो तो यह हमेशा निजी अस्पतालों में अधिक होती है, निजी अस्पतालों में सरकारी अस्पतालों के मुकाबले सफाई भी अधिक होती है। सरकारी अस्पताल सफाईकर्मियों की कमी से भी जूझ रहे हैं। हमारे पास ही लगभग पूरी आवश्यकता के आधे ही कर्मचारी हैं। इसलिये सरकार को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। मोदी जी पर पूरा भरोसा है कि वो इस बात को अवश्य अपने संज्ञान में लेंगे इसलिये  सरकार को अपने सफाई अभियान की शुरुआत अस्पताल से करनी चाहिये। आज एम्स देश का सर्वोत्तम संस्थान है क्योंकि वहां पर ये सारी सुविधायें उपलब्ध हैं।

कोई भी बड़ा डॅाक्टर सरकारी अस्पताल में नहीं रहना चाहता है, जिसका कारण ब्रेन-ड्रेन है। क्या ये आपके भी डिपार्टमेंट में हैं?       

कोई भी डाक्टर अच्छा वातावरण चाहता है और वातावरण सरकारी अस्पताल में नही मिल पाता है। सरकारी डाक्टरों को अपनी सुरक्षा की भी चिन्ता होती है। इसका कारण लोगों को उचित सुविधाएं न दे पाना है। सरकारी अस्पतालों में एक ही बेड तीन लोगों को दी जाती है। जो अमानवीय है। अभी तो कई सारे मरीज सर्जरी के लिये दो वर्ष से प्रतिक्षा कर रहे हैं। सरकार ये सारी सुविधायें संसद में चार वर्ष पहले ही पास कर चुकी है लेकिन यह अब तक उचित समय पर पूरी नहीं हुई। अत: नये-नये अस्पताल बनाने कीजगह सरकार को इन पुराने अस्पतालों में सुविधा प्रदान करनी चाहिये तथा समय-समय पर कामों को पूरा करने की आवश्यकता है और यदि ऐसा ही रहा तो जो छह एम्स बनाने वाले हैं उनमें भी कठिनाइयां आयेंगी।

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