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यूपी में नोटबंदी या वोटबंदी

यूपी में नोटबंदी या वोटबंदी

चुनाव का ऐलान होते ही यूपी की सुर्खियां बदलने लगी हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश ने अपने पारिवारिक दंगल में पिता मुलायम को पीछे छोड़कर नए ब्रांड के रूप में उभरे हैं तो भाजपा और बसपा के दांव भी ऊंचे हैं।

चुनाव आयोग के उत्तर प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम की घोषणा करते ही मानों फिजा बदल गई। सुर्खियां नोटबंदी और समाजवादी पार्टी में उत्तराधिकार की लड़ाई से खिसक कर इस पर जा टिकीं कि चुनाव के मैदान में किसका दम दिखेगा और किसका प्रदर्शन किस पर भारी पड़ेगा। तभी तो दनादन टीवी चैनलों के जनमत सर्वेक्षण भी आने लगे। जहां तक सपा के पारिवारिक कलह का मामला है, उसमें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने को निर्विवाद नेता घोषित करने में लगभग कामयाब हो गए हैं। भाजपा और बसपा को अब उन्हीं से टकराना पड़ेगा। योजनाओं के मुताबिक कांग्रेस और रालोद से गठजोड़ के बाद तो अखिलेश सत्ता विरोधी लहर से उबर कर मजबूत चुनौती देने की स्थिति में हो सकते हैं।

फिर भी चुनाव की घोषणा ने अखिलेश के सामने घरेलू मोर्चे को जल्दी से जल्दी सुलझाने की चुनौती पेश कर दी है, ताकि वे समय रहते चुनाव की असली लड़ाई के लिए खुद को तैयार कर सकें। उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च तक 7 चरण में वोटिंग होगी और उसके बाद 11 मार्च को सभी पांच राज्यों के चुनाव परिणाम घोषित किए जाएंगे।

दरअसल अपने कार्यकाल के पहले दो साल तक परिवार के बड़े बुजुर्गों के आज्ञाकारी बालक बने रहे, अखिलेश को मई 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी हार ने काफी हद तक बदल दिया। उन्होंने तभी से पार्टी की खासियत और खामियों के लिए जिम्मेदार कारकों को पहचानने की प्रक्रिया शुरू कर दी। एक तरफ उन्होंने विकास योजनाओं की झड़ी लगाई और जबरदस्त प्रचार तंत्र के बल पर खुद के लिए विकास पुरुष की छवि गढ़ी, तो दूसरी तरफ चाचा शिवपाल यादव और ‘अवांछित’ अमर सिंह को पार्टी की सारी बुराइयों का प्रतीक बनने दिया। सितंबर 2016 में जब उन्होंने पहली बार शिवपाल यादव के विभाग छीने तो साफ हो गया कि अखिलेश अब पार्टी के भीतर सख्त स्वच्छता अभियान चलाने वाले हैं। इसी दौरान उन्होंने खनन के विवादित मंत्री गायत्री प्रजापति की भी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी थी। प्रजापति को मुलायम परिवार का करीबी और राजदार माना जाता है। हालांकि उस समय अखिलेश को अपने फैसले बदलने पड़े, लेकिन उन्होंने अपने इरादे तो जाहिर कर ही दिए थे।

ठीक इसी दौरान उन्होंने पार्टी और परिवार के संकट का बखूबी इस्तेमाल एक अवसर के रूप में अपने हक में किया। सितंबर में ही उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के राजनीतिक विशेषज्ञ स्टीव जार्डन को 2017 के चुनाव प्रचार के रणनीतिकार के रूप में तैनात किया था। अखिलेश सरकार के कल्याणकारी कामों और योजनाओं समेत क्षेत्रवार विवरणों की जानकारी सपा के विधायकों से जुटाते हुए जार्डन अपने काम को धीरे-धीरे समझ गए। कहा जा रहा है कि जार्डन अखिलेश के लिए सीट केंद्रित घोषणापत्र तैयार कर रहे हैं।

सितंबर में ही अखिलेश ने एक और जबरदस्त पहल की। अखिलेश ने अपने 10 विश्वस्त युवा लड़के-लड़कियों का दल अमेरिकी राष्टरपति चुनाव का अध्ययन करने के लिए भेजा। इस दल में सपा से जुड़े मैनेजमेंट एक्सपर्ट, बैंकर, सुप्रीम कोर्ट के वकील जैसे हाई प्रोफाइल के लोग थे। यह दल यूनिवर्सिटी ऑफ एक्रॉन में ढाई महीने की फैलोशिप पर अमेरिका गया। इस दल ने अपनी रिपोर्ट सीधे अखिलेश यादव को सौंपी। आगामी विधानसभा चुनाव में अखिलेश इस दल को शहरी क्षेत्र में सपा की कमजोर सीटों का चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपेंगे। यह दल अमेरिकी चुनाव प्रचार की आधुनिक तरकीबों का इस्तेमाल शहरी मतदाताओं को सपा की ओर मोडऩे में करेगा। ये लोग सोशल मीडिया कैंपेन, विज्ञापन कैंपेन और टेलीफोन संदेशों को संभालने का काम करेंगे।

इस सब तैयारियों के बल पर अखिलेश परिवार से मोर्चा लेने को लेकर किस कदर तैयार थे, इसकी बानगी पिछले कुछ महीनों में आए उनके सार्वजनिक बयानों से मिलती है। पिछले साल नवंबर में जब पार्टी में उठापटक हुई थी और अखिलेश ने शिवपाल को मंत्रिमंडल से चलता कर दिया था, तब मुलायम ने शिवपाल को अखिलेश की जगह पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। लेकिन सुलह समझौते के बीच अखिलेश ने मंच से ही कह दिया था कि अध्यक्ष कोई हो टिकट वही बांटेंगे। बाद में उन्होंने टिकट के अधिकार को लेकर ही पार्टी में बगावत की। एक टीवी कार्यक्रम में उनसे पूछा गया कि आपके पास तो अधिकार ही नहीं हैं, तो उन्होंने कहा कि समय आने पर बैट-बॉल छीन लेंगे। दिसंबर के अंत में एक पत्रकार वार्ता में कांग्रेस से गठबंधन के सवाल पर उन्होंने कहा कि अभी इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा। अभी से बोल दिया तो बीजेपी गठबंधन होने से पहले ही उसे तुड़वा देगी। हल्के-फुल्के तरीके से दिए गए अखिलेश के बयान वक्त के साथ उनके रणनीतिक बयान साबित हुए।

कई लोगों का मानना है कि अखिलेश सरकार के अंतर्गत सपा अपनी पुरानी विरासत से मुक्त होने लगी है जो उसने यूपी की अपराधमय राजनीति के दौर में अर्जित की थी। इस स्थिति को पाने के लिए अखिलेश ने एक ऐसे नेता की भूमिका अदा की है जो राज्य में विकास लाने को प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 दिसंबर को जब बनारस में थे, ठीक उसी दिन अखिलेश ने शहर में वरुणा रिवर कोरीडोर का लोकार्पण किया जिसमें शुरुआती 50 मीटर में विकसित रिवरफ्रंट क्षेत्र का प्रदर्शन किया गया। उनकी सरकार की योजना है कि अगला 10 किमी क्षेत्र 2017 के दिसंबर तक तैयार कर लिया जाए।

पिछले महीने अखिलेश ने लखनऊ में 5,000 करोड़ रु. से ज्यादा की लागत वाली दर्जन भर से ज्यादा परियोजनाओं का अनावरण किया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में, जहां सपा का मजबूत गढ़ है, उनकी सरकार 354 किमी लंबे समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का विकास कर रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले उनके सभी 25 मंत्रियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सरकार की पेंशन और किसान बीमा योजनाओं का प्रचार करें।

अखिलेश यह भी तय कर रहे हैं कि जाति की गणित को वे सही से हल कर लें। उनकी कैबिनेट ने 22 दिसंबर को एक संकल्प पारित किया, जिसके मुताबिक 17 पिछड़ी उपजातियों को अनुसूचित जातियों में बदलने पर विचार किया जाएगा। आबादी में करीब 14 फीसदी हिस्सा रखने वाली इन उपजातियों के सहारे कुछ चुनिंदा सीटों पर चुनावी खेल पलट सकता है। कैबिनेट ने यह कदम शायद इस वजह से उठाया है क्योंकि 2014 के संसदीय चुनाव में गैर-यादव ओबीसी वोट बीजेपी की झोली में चला गया था। पार्टी पर पकड़ मजबूत करने के बाद अखिलेश ने अग्रणी कुर्मी नेता नरेश उत्तम को राज्य में पार्टी का अध्यक्ष बना दिया, जो मुलायम के करीबी माने जाते हैं। अखिलेश के एजेंडे में कांग्रेस के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन करना भी शामिल है। सूत्रों की मानें तो अखिलेश बीते दिसंबर में प्रियंका गांधी के साथ मुलाकात कर चुके हैं।

अखिलेश भले ही बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रहे हों लेकिन सामने आने वाले खतरों के प्रति वे बेपरवाह नहीं हैं। उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने 2 जनवरी को निर्वाचन आयोग के अधिकारियों से मुलाकात कर सपा के चुनाव चिन्ह साइकिल पर अपना दावा ठोक दिया है। वैसे रामगोपाल यादव नवंबर में निर्वाचन आयोग के अधिकारियों से मिले थे और उन्होंने पार्टी टूटने की स्थिति में चुनाव चिन्ह के रूप में मोटरसाइकिल के विकल्प पर बात की थी। पारिवारिक कलह की दिशा चाहे जो भी रहे और चुनाव में सपा का प्रदर्शन चाहे जैसा भी हो, लेकिन अखिलेश ने तय कर लिया है कि उन्हें मुलायम की छाया से बाहर निकलना है। सपा अब यादव-मुस्लिम की जगह सबकी पार्टी बनेगी। उनके लिए अब केवल इतनी चुनौती है कि अगर पार्टी चुनाव हार भी गई, तो वे भविष्य में समाजवादी पार्टी के लिए जन समर्थन बचाए रख सकें।

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चुनाव की बेला जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, उत्तर प्रदेश का सियासी मोर्चा उतना ही उलझता जा रहा है। नोटबंदी के असर से उत्तेजना-उत्साह और बेचैनी दोनों ही एक साथ पैदा हो रही है। काले धन वालों के खिलाफ मुहिम को शुरू में जन समर्थन भी मिलता दिख रहा था लेकिन हालात सामान्य करने में सरकारी अक्षमता से तकलीफें जब बढऩे लगीं तो इसके खिलाफ गुस्सा भी बढऩे लगा। इसी वजह से भाजपा कुछ हड़बड़ी में लग रही थी। उसकी राज्य इकाई के नेताओं में मौके से आ रहीं जमीनी रिपोर्टों से बेचैनी बढ़ रही थी। इन नेताओं ने पार्टी आलाकमान को लिखा भी कि जल्दी से जल्दी यानी जनवरी-फरवरी में ही विधानसभा चुनाव करा लेना चाहिए।

नोटबंदी और भाजपा   

दरअसल नोटबंदी के असर को लेकर दुविधा और अनिश्चय केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के लगातार बदलते निर्देशों से भी पता चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी छवि रॉबिनहुड जैसी पेश करने पर मजबूर हो रहे हैं। हाल में मुंबई के समुद्र में शिवाजी महाराज की स्मारक की जल-पूजा के दौरान उन्होंने कहा कि बेईमान बच नहीं पाएंगे। इसके पहले मुरादाबाद की रैली में मोदी लोगों से कह चुके हैं कि जन धन खातों में भ्रष्ट कमाई वालों के जमा किए रुपयों को खाते वाले न लौटाएं और कोई धमकी दे तो कहें कि रुको, मोदी को लिखता हूं। लेकिन भाजपा के प्रदेश नेताओं की यह आशंका भी बेवजह नहीं है कि मोदी की भ्रष्ट और अमीरों का मान-मर्दन करने वाली छवि की हवा भी नोटबंदी से होने वाली जमीनी परेशानियों से जल्दी बैठ सकती है।

नकदी का संकट शहरों को भी पस्त कर रहा है, मगर सबसे बुरा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। कई इलाकों में अभी खरीफ की फसलों की भी खरीद नहीं हो पाई है। किसान धान औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है। इससे भी बुरा हाल आलू और फल-सब्जियों के किसानों का है। शहरों में खासकर निर्माण गतिविधियों के ठप्प पडऩे से प्रवासी मजदूर गांव में लौटने को मजबूर है। जनवरी के अंत तक तो इसका दंश बड़े पैमाने पर दिखने लग सकता है, बशर्ते सरकार हालात पर कुछ काबू पा ले, जिसकी गुंजाइश बेहद कम दिखती है।

और उत्तर प्रदेश गांवों का ही प्रदेश है। यहां कुल 403 विधानसभा सीटों में से शहरी और अद्र्ध शहरी सीटें 150 से भी कम हैं। फिर, यहां के शहरी लोगों का रुझान भी बड़े पैमाने पर ग्रामीण समीकरणों से ही तय होता है। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परेशानी बढऩे पर जो वर्गभेद अभी नोटबंदी के मामले में अमीर-गरीब के बीच दिख रहा है, वह जाति और समुदाय के पुराने खांचों की ओर बढ़ सकता है। यही भाजपा के नेताओं की पेशानी पर बल डाल रहा है।

दरअसल गरीबों खासकर गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलितों को लुभाने की भाजपा और मोदी की कोशिशों की वजहें भी वाजिब हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में इन्हीं के वोटों ने मोदी लहर को सूनामी जैसा बना दिया था। सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार पिछड़ी जातियों में 27 फीसदी यादवों, 53 फीसदी कुर्मी-कोयरी और 60 फीसदी अन्य जातियों ने कमल पर मुहर लगाया था। दलितों में 18 फीसदी जाटवों और 45 फीसदी अन्य दलित जातियों के वोट भाजपा को मिले थे।

मगर 2014 के बाद से गंगा में काफी पानी बह चुका है। दलितों के भाजपा से खफा होने की वजहें कई हैं। बहुजन समाज पार्टी के पाले से पिछड़ी जातियों और दलित नेताओं को तोडऩे के बावजूद भाजपा की पतंग कोई बहुत ऊपर जाती नहीं दिखी है। सो, नोटबंदी से भाजपा को आखिरी उम्मीद है। लेकिन इसका असर जितनी तेजी से फीका पड़ता जाएगा, भाजपा को उतनी ही दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। गौर करने की बात यह भी है कि नोटबंदी से खासकर भाजपा का बनियों और शहरी मध्यवर्ग का पारंपरिक समर्थन गड़बड़ा सकता है।

माया की सियासी जमीन

अब नोटबंदी का चाहे जो असर हो मगर उसके पहले तक संभावित दलित-मुस्लिम गठजोड़ की वजह से मायावती ही समाजवादी पार्टी की मजबूत दावेदार मानी जाती रही हैं। उत्तर प्रदेश में करीब 22 प्रतिशत दलित और करीब 19 फीसदी मुसलमानों का समीकरण अगर तैयार होता है तो यह अजेय कहा जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि ये वोट बिना बंटे एकमुश्त पड़ें। यह तभी संभव है जब मुसलमानों को पूरा यकीन हो और वे कुछ और जातियों के वोट बसपा की ओर जाते देखें। मायावती इसके लिए 100 से अधिक मुसलमानों को टिकट ही नहीं दे रही हैं, भाजपा का हर मोर्चे पर खुलकर विरोध कर रही हैं। वे मोदी की हर रैली के बाद उनकी एक-एक बात का प्रतिवाद करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाना नहीं भूलतीं।

माया अपने पुराने नारे सर्वजन हिताय के जरिए ब्राह्मणों को भी लुभाने की कोशिश कर रही हैं लेकिन वह अभी होता नहीं दिख रहा है। वैसे, रणनीति बदलने में माहिर मायावती ब्राह्मणों को अधिक से अधिक सीट देकर उन पर डोरे डाल सकती हैं। 2007 के चुनावों में उन्होंने ब्राह्मणों को 88 टिकट दिए थे जिनमें 70 के आसपास जीत गए थे। इससे बसपा बहुमत में आ गई थी। ब्राह्मण और मुसलमानों के वोट को ध्यान में रखकर ही मायावती शुरू में कांग्रेस से भी तालमेल की कुछ बातचीत चला रही थीं पर सीटों की संख्या पर मामला बन नहीं पाया। कांग्रेस की मांग 100 सीटों की थी मगर बसपा 70 ही देने को तैयार बताई जाती थी। अभी भी यह मामला खुला हुआ है।

कांग्रेस का दांव

यही वजह है कि सत्तारूढ़ सपा के मुख्यमंत्री अखिलेश भी कांग्रेस से तालमेल की इच्छा लगभग सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। दरअसल कांग्रेस को चाहे जितना कमजोर माना जाए पर उसका जुडऩा कई वोटबैंकों में एक आश्वस्ति पैदा करता है। इससे मुसलमानों की दुविधा खत्म हो सकती है। ब्राह्मणों में भी कुछ दिलचस्पी पैदा हो सकती है और गठबंधन की अपनी ताकत तो होती है। अपनी इसी ताकत के एहसास से कांग्रेस ज्यादा तगड़ा मोलभाव कर रही है। वह शायद उप-मुख्यमंत्री के पद पर भी दावा कर रही है। लेकिन फिलहाल मामला सीटों के तालमेल पर अटका है। कहते हैं सपा कांग्रेस, रालोद और बाकी छोटे दलों को मिलाकर 100 सीटें देने को तैयार है जबकि कांग्रेस अकेले 100 सीटें चाह रही है। हाल में सपा के राज्य अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि कांग्रेस से किसी तरह के तालमेल की संभावना नहीं है। कांग्रेस के यूपी प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने भी कहा कि चुनाव अकेले लड़ेंगे।

इसलिए उत्तर प्रदेश का मैदान अभी खुला हुआ है। हालांकि सबके दांव ऊंचे हैं इसलिए कोई कोर कसर छोडऩे की हालत में नहीं है। लेकिन हालात शायद ही किसी के वश में होते हैं। अगले एक-दो महीने दिलचस्प जंग के आसार हैं। भाजपा मैदान में बदस्तूर डटी है तो मायावती या मुलायम की पार्टी के दावों में भी काफी दम है। बेदम तो कांग्रेस या रालोद जैसे छोटे दावेदारों को भी नहीं कहा जा सकता, मगर उनकी भूमिका मुख्य दावेदारों की ताकत बढ़ाने या घटाने में ही ज्यादा दिखती है। उम्मीद है कि चुनाव आयोग जल्दी ही घोषणाएं भी कर दे तब लड़ाई और खुलकर सामने आएगी।

हरिमोहन मिश्र

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