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प्रेम कहानी जो टकराव की दास्तां बन गई

प्रेम कहानी जो टकराव की दास्तां बन गई

इन दिनों आपको टीवी सीरियल देखने की जरूरत नहीं। देश की राजनीति में जो सीरियल चल रहा है उसकी कहानी देश के सारे सीरियलों को मात देनेवाली है। उसमें महाभारत की कहानी है रामायण की भी तथा औरंगजेब और शाहजहां  की कहानी है और सास बहू वाले सीरियलों की कथा भी। कुल मिलाकर यह सीरियल  राजनीति में परिवारवाद कायम करने वाले नेता की प्रेम कहानी से उपजी शोकांतिका है। ऐसी कहानी का सुपर हिट होना लाजिमी है। राजनीति के जानकार लोगों का कहना है यह कहानी एक दो साल की नहीं तीन दशक  की कहानी है। इतना ही नहीं, जो लोग समाजवादी पार्टी में मौजूदा कलह को चाचा-भतीजे यानि अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच की वर्चस्व की लड़ाई मानकर चल रहे हैं, वे हकीकत नहीं जानते। दरअसल, शतरंज के इस खेल में शिवपाल तो महज एक मोहरा भर हैं, जिन्हें अपने बड़े बेटे पर अंकुश रखने के लिए मुलायम सिंह यादव इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मुलायम अपनी इच्छा से यह सब नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनसे यह सब करवाया जा रहा है। मुलायम जैसी हस्ती से यह सब कराने की क्षमता किसके पास है। वह है उनकी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के पास।

कुछ अर्से पहले सपा के ही एक विधायक  ने पत्र लिखकर यह आरोप लगाया था कि साधना गुप्ता सत्ता हथियाने के लिए मुलायम सिंह यादव से अखिलेश के खिलाफ साजिश करा रही हैं ताकि सत्ता उनके विश्वस्त शिवपाल यादव के हाथों में आ सके। दरअसल इस विधायक ने वह बात कह दी थी जिसे उप्र राजनीति के गलियारे में कहा सुना जा रहा है। अब तो लोग साधना गुप्ता की तुलना कैकई से करने लगे हैं। साधना गुप्ता और मुलायम सिंह के बेटे प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव भी राजनीति में उतर गई हैं और पार्टी ने उन्हें लखनऊ कैंट सीट से उम्मीदवार भी घोषित किया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि साधना गुप्ता और उनकी बहू की बढ़ती राजनीतिक दिलचस्पी की वजह से मुलायम परिवार दो खेमे में बंट गया है। अखिलेश यादव के अलावा मुलायम के दूसरे भाई रामगोपाल यादव और परिवार के अधिकांश सदस्य साधना गुप्ता के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ थे।

परिवार में जो लोग साधना गुप्ता का विरोध कर रहे हैं, वही लोग अमर सिंह का भी विरोध कर रहे हैं। क्योंकि एक राय यह भी है कि मुलायम सिंह यादव और साधना गुप्ता की मुलाकात अमर सिंह ने ही कराई थी। उत्तर प्रदेश में कहा तो यह भी जा रहा है कि मुलायम की पहली पत्नी और अखिलेश की मां के निधन के बाद साधना गुप्ता को मुलायम परिवार में शामिल कराने में अमर सिंह की अहम भूमिका थी। अखिलेश जिन वजहों से अमर सिंह से नाराज रहते हैं, उनमें सबसे बड़ी वजह यह भी बताई जाती है।

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समाजवादी पार्टी में बाप और बेटे के बीच जो जंग चल रही है  उसकी जड़ मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता को ही माना जा रहा है। जिन अमर सिंह से अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इतने खफा हैं, खबर है कि साधना के कहने पर ही मुलायम ने उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल किया था। तो इस झगड़े की जड़ मुलायम सिंह और साधना गुप्ता की प्रेम कहानी है। मुलायम सिंह 80 के दशक तक उत्तर प्रदेश के एक प्रभावशाली और ताकतवर नेता के रूप में उभर चुके थे। वे जब राजनीति के शिखर पर थे उस वक्त उनकी जिंदगी में साधना गुप्ता का आगमन हुआ। 1982 में जब मुलायम लोकदल के अध्यक्ष बने, उस वक्त साधना पार्टी में एक कार्यकर्ता की हैसियत से काम कर रही थीं। बेहद खूबसूरत और तीखे नैन-नक्श वाली साधना पर जब मुलायम की नजर पड़ी तो वे पहली ही मुलाकात में नेताजी अपने से 20 साल छोटी साधना को अपना दिल दे बैठे। मुलायम पहले से ही शादीशुदा थे और साधना भी। साधना की शादी फर्रुखाबाद जिले के छोटे से व्यापपारी चुंद्रप्रकाश गुप्ता  से हुई थी। लेकिन बाद में वह उनसे अलग हो गईं। इसके बाद शुरू हुई मुलायम-साधना की अनोखी प्रेम कहानी।

दिसंबर 1989 में जब मुलायम मुख्यमंत्री बने तो धीरे-धीरे बात फैलने लगी कि उनकी दो पत्नियां हैं। इसके बाद 90 के दशक के अंतिम दौर में अखिलेश को साधना गुप्ता और प्रतीक गुप्ता के बारे में पता चला। कहते हैं कि उस समय मुलायम साधना गुप्ता की हर बात मानते थे, इसीलिए मुलायम के शासन (1993-2007) में साधना गुप्ता ने अकूत संपत्ति बनाई। बता दें कि आय से अधिक संपत्ति का उनका केस आयकर विभाग के पास लंबित है।

मुलायम सिंह की पहली शादी 18 वर्ष की उम्र में मालती देवी से हुई थी। शादी के पांच साल बाद गौना हुआ। मालती देवी बहुत ही साधारण महिला थीं। वह अधिकतर समय घर के काम में ही लगी रहती थीं। वह अस्थमा से पीडि़त थीं और 2003 में उनकी मृत्यु हो गई। फिर मुलायम का सारा ध्यान साधना गुप्ता पर आ गया। हालांकि, मुलायम अब भी इस रिश्ते को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे। दूसरी तरफ साधना चाहने लगी कि मुलायम उन्हें अपनी आधिकारिक पत्नी मान लें, लेकिन पारिवारिक दबाव, खासकर अखिलेश यादव के चलते मुलायम इस रिश्ते को कोई नाम नहीं देना चहते थे।

इस बीच साधना अमर सिंह से आग्रह करने लगीं कि वह नेताजी को मनाए, अमर सिंह नेताजी को साधना गुप्ता और प्रतीक गुप्ता को अपनाने के लिए मनाने लगे। 2007 में अमर सिंह ने सार्वजनिक मंच से मुलायम से साधना को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया और इस बार मुलायम उनकी बात मानने के लिए तैयार हो गए। लेकिन अखिलेश इसके लिए कतई तैयार नहीं थे। अखिलेश के विरोध को नजरअंदाज करते हुए मुलायम ने अपने खिलाफ चल रहे आय से अधिक संपत्ति से संबंधित मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र दिया, जिसमें उन्होंने साधना गुप्ता को पत्नी और प्रतीक को पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया। उसके बाद साधना गुप्ता, साधना यादव और प्रतीक गुप्ता, प्रतीक यादव हो गए। अखिलेश ने साधना गुप्ता की अपने परिवार में एंट्री के लिए अमर सिंह को जिम्मेदार माना। तभी से अखिलेश अमर सिंह से चिढऩे लगे थे। वह मानते हैं कि साधना गुप्ता और अमर सिंह के चलते उनके पिताजी ने  उनकी मां के साथ न्याय नहीं किया। वो अपनी मां के काफी करीबी कहे जाते थे तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उनका हक छीनने वाली के प्रति उन्हें लगाव तो होगा नहीं।

समाजवादी पार्टी की कहानी में फिल्मी मसाला भी है। कुछ समय पहले एक चौंकाने वाली खबर सामने आई जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे। इस खबर में यह दावा किया जा रहा है कि प्रतीक यादव मुलायम सिंह यादव के असली बेटे नहीं हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, सपा सुप्रीमो मुलायम का सिर्फ एक असल वारिस है, वह है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। साधना गुप्ता से अपने रिश्तों के चलते उन्होंने प्रतीक को बेटे के तौर पर अपना लिया।

सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट Pe-2ca/2007/Acu-iv/cbi/New Delhi के मुताबिक, प्रतीक के जैविक पिता का नाम चंद्रप्रकाश गुप्ता है, जो यूपी के फर्रुखाबाद के रहने वाले हैं। वो मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के पहले पति हैं। साधना औरैया जिले के बिधूना के रहने वाले कमलापति की बेटी हैं। 1962 में जन्मीं साधना सिंह की 4 जुलाई 1986 में चंद्रप्रकाश गुप्ता से शादी हुई थी। शादी के बाद 1988 में प्रतीक का जन्म हुआ। इसके दो साल बाद साधना और चंद्रप्रकाश अलग हो गए। इसके बाद साधना मुलायम के संपर्क में आईं।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी नाम के एक शख्स ने मुलायम के खिलाफ आमदनी से ज्यादा संपत्ति रखने का आरोप लगाते हुए अर्जी लगाई। उन्होंने कहा कि 1979 में 79 हजार रुपए की संपत्ति वाला समाजवादी करोड़ों का मालिक कैसे बन गया? इसी केस में कोर्ट में दिए हलफनामे ने मुलायम का एक और राज खोला, जिस पर दशकों से पर्दा पड़ा था कि मुलायम की दूसरी बीवी भी है और एक बेटा भी है। साधना गुप्ता और प्रतीक यादव।

सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी। इसी पड़ताल के दौरान सीबीआई ने प्रतीक के स्कूल रिकॉर्ड खंगाले और पाया कि उनके 1994 में स्कूली दस्तावेजों में मुलायम के सरकारी आवास का पता है। मां के नाम के कॉलम में साधना का नाम था। यहां से पता लगता है कि 1994 में औपचारिक तौर पर साधना और मुलायम रिश्ते में आ चुके थे। जीवन में साधना के प्रवेश के बाद ही मुलायम मुख्यमंत्री बने। इसलिए वो उन्हें लकी मानते थे। साधना और उनके बेटे के लिए नेताजी का प्यार अखिलेश और डिंपल को कभी पसंद नहीं आया। 1988 में पहली बार अखिलेश साधना गुप्ता से मिले थे। तब वो 15 साल के थे। अखिलेश को साधना बिल्कुल पसंद नहीं आईं। इसके बाद नेताजी की जिंदगी में अखिलेश को एक ‘डिस्टर्बेंस’ माना गया और उन्हें पढ़ाई के लिए दूर भेज दिया गया।

राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक साधना गुप्ता अपने बेटे प्रतीक को लोकसभा का टिकट दिलवाना चाहती थीं। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। कहा ये भी जाता है कि प्रतीक की खास राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। वो बॉडी बिल्डिंग, कारों और रियल एस्टेट के बिजनेस में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं बल्कि उनकी पत्नी अपर्णा यादव राजनीतिक तौर पर ज्यादा मुखर हैं। वह लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रहे अरविंद सिंह बिष्ट की बेटी हैं और इसीलिए राजनीतिक समझ और महत्वाकांक्षा संभवत: उन्हें  विरासत में मिली है। इस बार सपा ने प्रतीक की पत्नी अपर्णा को लखनऊ कैंट से कैंडिडेट बनाया है। उनके पिता अरविंद बिष्ट को भी सूचना आयुक्त बनाया गया था, लेकिन हालिया बवाल के बाद उन्हें भी पद से हटा दिया गया। बताते हैं कि मार्च 2012 में मुख्यमंत्री बनने तक अखिलेश ने साधना को कोई तरजीह नहीं दी।

अखिलेश का ये रवैया मुलायम को पसंद नहीं आया। मुलायम के दखल पर अखिलेश को बैकफुट पर जाना पड़ा। साधना अपने चहेते अफसरों को मनपसंद पोस्टिंग दिलाने लगीं। बताया गया कि ये सारी पोस्टिंग साधना की सिफारिश पर ही हुईं। वहीं, साधना ने अपने बेटे प्रतीक के भी रियल इस्टेट कारोबार में जड़े जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बताया जाता है कि साधना लीड्स यूनिवर्सिटी से पढ़े प्रतीक को राजनीति में भी लाना चाहती हैं। लेकिन प्रतीक अभी इसके लिए इच्छा नहीं दिखा रहे। हालांकि प्रतीक की पत्नी अपर्णा को जरूर समाजवादी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव के लिए लखनऊ कैंट से अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी हैं।

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मुलायम बेशक कह रहे हैं कि उनका परिवार एक है। लेकिन रिश्तों में जो दरार आ गई है, वो शायद ही कभी भर सके। मुलायम जहां छोटे भाई शिवपाल यादव और अमर सिंह की खुली तरफदारी कर रहे हैं। वहीं मुलायम के चचेरे भाई राम गोपाल यादव को राजनीतिक गलियारों में अखिलेश का चाणक्य माना जा रहा है।

सपा के घरेलू मोर्चे पर हुई खटपट आखिर में घमासान तक पहुंच गई। वैसे तो यह खटास अपनी सौतेली मां से होकर कैकेयी बनी साधना गुप्ता की ख्वाहिशों के चलते है। जहां चर्चाओं के अनुसार साधना गुप्ता अपने बेटे प्रतीक को बेहद असरदार ओहदा थमाने के लिए पासे चला रही हैं। एक चर्चा यह भी है कि 2012 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के समय साधना ने पति मुलायम सिंह से एक वचन लिया था। साधना ने अपने बेटे प्रतीक को भी दो साल के भीतर अखिलेश के समान दर्जा दिए जाने का वादा लिया था। 2014 में दो साल बीत गए और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मुखर स्वभाव की साधना गुप्ता ने दो और साल इंतजार किया। कई लोगों का मानना है कि साधना को डर था कि समय के साथ मुलायम सिंह का पार्टी में कद घटता जा रहा है। उन्हें अपने 28 साल के बेटे प्रतीक के भविष्य को लेकर भी डर था। यही डर उनके सब्र का बांध टूटने का कारण बना।

लखनऊ की राजनीति को करीब से देखने वाले सूत्र बताते हैं कि पिछले साल अक्टूबर से परिवार में पिता मुलायम और बेटे अखिलेश के बीच दूरियां आनी शुरू हो गई थी। सार्वजनिक मंच से अखिलेश यादव भी पिता से दूरियों की बात स्वीकार चुके हैं और इसके लिए अमर सिंह को जिम्मेदार ठहराया है। आपको जानकर हैरत होगी कि परिवार में न केवल पिता-पुत्र में झगड़ा है बल्कि अक्टूबर में ही सास साधना गुप्ता और बहू डिंपल यादव के बीच खटपट शुरू हो गई थी। अखिलेश यादव ने जब मंत्री गायत्री प्रजापति और मुख्य सचिव दीपक सिंघल पर कार्रवाई की तो साधना गुप्ता ने डिंपल यादव के सामने नाराजगी जाहिर की।

बहू डिंपल ने सौतेली सास साधना से कहा कि वे सरकार की बातें परिवार के बीच में न लाएं। इस पर साधना नाराज हो गईं। कहा जाता है कि साधना ने डिंपल को कुछ ऐसे शब्द कहे जो उन्हें काफी बुरी लगी। डिंपल ने उसी वक्त पति अखिलेश यादव को फोन कर सारी बातें बता दी। ये बातें अखिलेश यादव को भी काफी बुरे लगे और वे बैठक के तुरंत बाद घर लौट आए। बात बढऩे पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, डिंपल और अपने बच्चों को मुलायम के घर से लेकर अपने सरकारी आवास पर आ गए। यहां 2 दिनों तक मुख्यमंत्री परिवार रहा। इसके बाद 8 अक्टूबर को सीएम ने अपने 4 विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास पर गृह प्रवेश किया। इस पूजा में साधना गुप्ता शामिल नहीं हुईं। इसके बाद से ही अखिलेश अपने पिता मुलायम सिंह यादव से अलग रहने लगे।

मुलायम सिंह के दोनों ही बेटों ने पहाड़ की ठाकुर लड़कियों को अपनी पत्नी बनाना पसंद किया। अखिलेश की पत्नी डिंपल उनके साथ सैनिक सकूल में पढ़ती थी और वे कर्नल रावत की बेटी है। जबकि अपर्णा के पिता अरविंदर सिंह बिष्ट पत्रकार हैं। अपर्णा भी प्रतीक के बचपन की दोस्त है। मैनचेस्टर यूनीवर्सटी से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में डिग्री हासिल करने वाली राजनीतिक परिवार की बहू भला राजनीति से दूर कैसे रह सकती थी? बताते हैं कि पहले उसने जिम का शौक रखने वाले अपने पति प्रतीक यादव को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। उनके समर्थकों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें आजमगढ़ से टिकट दिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। हालांकि इस सीट से मुलायम सिंह यादव खुद चुनाव लड़े और जीते।

बहू काफी तेज है। उसकी समझ में आया है कि दबाव की राजनीति किए बिना काम नहीं बनेगा। भातखंडे संगीत महाविद्यालय में शास्त्रीय संगीत सीख चुकी यह बहू हर्ष फाउंडेशन नाम के एनजीओ से जुड़ी हुई है। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान की तारीफ की। जब प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए तो उनके साथ अपनी सेल्फी खिंचवायी। नरेंद्र मोदी ने भी उनके विचारों को अपनी साइट पर डाला। उसने मुलायम सिंह के करीबी आमिर खान को हाल के विवादास्पद बयान की जमकर आलोचना की। गोहत्या पर कड़ी पाबंदी लगाए जाने की मांग की। जब किसी ने मोदी की तारीफ करने के बारे में पूछा तो छूटते ही कह दिया कि यह तो मेरे दिल से निकले उदगार है। मैंने यह कहते समय अपने दिमाग का नहीं बल्कि दिल का इस्तेमाल किया है। शायद यह सब बातें ससुरजी को यह संकेत देने के लिए काफी थी इसलिए उन्होंने उसे उत्तर प्रदेश से विधानसभा का चुनाव लड़वाने का फैसला कर लिया। वैसे भी दूसरी पत्नी का दबाव था। जब बड़ी बहू सांसद हो तो छोटी विधायक भी न बने यह कैसे हो सकता है। बताते हैं कि अमर सिंह ने भी साधना गुप्ता से मुलायम सिंह यादव की शादी करवाने में अहम भूमिका अदा की थी और दोनों ठाकुर बहुओं को घर में लाने के लिए उन्होंने ही तमाम बाधाएं दूर करने में अहम भूमिका अदा की थी।

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का अपने मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव से मोहभंग हो गया है। कुछ समय पहले राजनीतिक हल्कों में चर्चा थी मुलायम ने फैसला किया था कि 2017 विधानसभा चुनाव में अगर समाजवादी पार्टी की दोबारा सरकार बनी तो अखिलेश की जगह अपर्णा यादव बन सकती हैं यूपी की मुख्यमंत्री। मुलायम सिंह यादव के करीबी का दावा है कि नेताजी ने इसके लिए अपने भाई शिवपाल यादव को भी तैयार कर लिया था। बताया जा रहा था कि मुलायम सिंह यादव ने अपनी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के दबाव में यह फैसला लिया। दरअसल मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता नेताजी से बार-बार यह कहती थीं कि आपने अपने जीवन भर के संघर्ष की कमाई सिर्फ अखिलेश को दी है। अपने दूसरे बेटे प्रतीक के साथ सौतेला व्यवहार किया है। चूंकि प्रतीक यादव राजनीति में ज्यादा एक्टिव नहीं हैं इसलिए अपर्णा के नाम पर सहमति बन गई है। इस समय छोटी बहू, प्रतीक व शिवपाल यादव एक खेमे में हैं तो रामगोपाल-अखिलेश यादव दूसरे खेमे में हैं।

मुलायम सिंह की टे्रजेड़ी यह है कि वे अपने को समाजवादी कहते रहे मगर उन्होंने अपने परिवार को ही सारा समाज समझ लिया और बेचारी एक साइकल पर यादव परिवार के पंद्दह लोग बिठा दिए। साईकल उनका बोझ नहीं सह पाई और आखिर में पंक्चर हो गई। अब इस पंक्चर साईकिल के लिए मारमारी चल रही है। अब मामला चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है। जानकार लोग बताते है कि अब उत्तर प्रदेश चुनाव में तो साइकल किसी को नहीं मिलने वाली। चुनाव आयोग उसे फ्रीज कर देगा।

जिस तरह से मुलायम सिंह यादव के परिवार में उठा-पटक चल रही है, उसने दो दशक पहले एनटी रामाराव परिवार में हुए झगड़े की यादें ताजा कर दी हैं। दोनों परिवारों के अंदरूनी झगड़ों में कई समानताएं हैं।

सपा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता और पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के खिलाफ झंडा उठा लिया है। वहीं रामाराव परिवार में यह काम उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने किया था। संयोग देखिए कि एनटी रामाराव जिस तेलुगू देशम पार्टी के मुखिया थे, उसका चुनाव चिन्ह भी साईकिल ही था और समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी साईकल ही है।

Layout 1एनटी रामाराव परिवार के झगड़े और समाजवादी पार्टी के झगड़े में कई समानताएं हैं। एनटी रामाराव का फिल्मी  करियर समाप्त हो गया था और राजनीति में आने के बाद 1983 में पहली बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। वे तीन बार मुख्यमंत्री रहे। 1985 में उनकी पहली पत्नी का कैंसर से देहावसान हो गया। उनका एक बेटा और दो दामाद तेलुगू देशम पार्टी की राजनीति में सक्रिय थे। रामाराव परिवार में झगड़े की शुरुआत लक्ष्मी पार्वती के आने से हुई। रामाराव की जीवनी लिखने के सिलसिले में लक्ष्मी पार्वती उनसे मिलीं और फिर दोनों में प्रेम हुआ। 1993 में दोनों ने शादी कर ली। जब 38 वर्षीय लक्ष्मी पार्वती से एनटी रामाराव ने शादी की थी तो उनकी उम्र 70 साल से अधिक हो गई थी। इस वजह से यह शादी उनके बेटों और दामादों को पंसद नहीं थी।

जब लगा कि रामाराव पूरी तरह से लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़े हैं तो उनके बेटों और दामादों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी। इस बगावत की अगुवाई चंद्रबाबू नायडू कर रहे थे जो उस वक्त रामाराव सरकार में मंत्री थे 1994 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 214 सीटें तेलुगू देशम पार्टी को मिलीं तो इस जीत का श्रेय लक्ष्मी पार्वती को भी मिला। इसके बाद वे पार्टी की राजनीति और सरकार के कामकाज में दखल देने लगीं तो विधायक और सांसद उनके खिलाफ खड़े हो गए। जब लगा कि रामाराव पूरी तरह से लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़े हैं तो उनके बेटों और दामादों ने उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का नेतृत्व उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में अखिलेश आज चंद्रबाबू नायडू की भूमिका अदा कर रहे हैं तो लोग उन्हें औरंगजेब कह रहे हैं।

सतीश पेडणेकर

german englishцентр духовный

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