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बज गया बिगुल

बज गया बिगुल

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ सभी राजनैतिक पंडितों की निगाहें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश पर टिक गई हैं। बिहार विधानसभा चुनावों के बाद अब सबसे अहम उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव परिवार में मचे घमासान के बीच सियासी अग्निपरीक्षा होने जा रही है। मुलायम परिवार की कलह ऐसे निम्न स्तर पर पहुंच चुकी है, जिसकी मिसाल शायद ही ढूंढ़े मिले। इससे एक परिवार पर आधारित राजनीति का काला पक्ष भी उजागर हो गया है। आजादी के बाद देश में राजनीति और राजनैतिक विचार को एक परिवार तक सीमित रखने की शुरुआत सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने की। उसी के नक्शेकदम पर क्षेत्रीय दलों और जयललिता, करुणानिधि, लालू प्रसाद यादव, देवेगौड़ा जैसे नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में राज किया। कभी वह दौर भी था जब क्षेत्रीय दल नहीं हुआ करते थे और इंदिरा गांधी की लोकप्रियता पर सवार होकर कांग्रेस राज्यों में भी मामूली विरोधों के साथ राज किया करती थी। उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती जाति आधारित समीकरणों के आधार पर सत्ता में पहुंचे। बिहार में भी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद जाति की राजनीति ही करने लगे।

नरेंद्र मोदी की अगुआई में 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने भारी जीत दर्ज की थी। वह जीत मोदी की विराट शख्सियत, राजनेता जैसी सकारात्मक छवि के साथ जमीनी स्तर पर संघ के सुव्यवस्थित सांगठनिक ढांचे का कमाल थी। अब भाजपा की प्रचार रणनीति पूरी तरह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर आश्रित है। उसने उत्तर प्रदेश में किसी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम आगे बढ़ाने का फैसला नहीं किया है। सो, उत्तर प्रदेश में चुनाव जाति आधारित राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दिग्गजों और नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे के बीच लड़ा जाएगा। लेकिन भारत में कई बार विकास का एजेंडा कारगर नहीं होता। अखिलेश यादव ने भी राज्य में कई इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं का सूत्रपात किया है मगर वे कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। गौरतलब है कि अखिलेश सरकार ने गरीबों और वंचित वर्गों की खातिर अपने कल्याणकारी कामों को प्रचारित करने के लिए सरकारी मशीनरी का खूब दोहन किया है। हालांकि उनके लिए सबसे नकारात्मक समाजवादी पार्टी में पारिवारिक कलह का खुलेआम प्रहसन है, जो लोगों को नहीं भाएगा क्योंकि यह खत्म होता भी नहीं दिखता।

उधर, मायावती नोटबंदी से अपनी पार्टी की कलई खुलने से मोदी के खिलाफ बढ़-चढ़कर बोल रही हैं। ऐसा लगता है कि इस बार उनके प्रतिबद्ध वोटबैंक का उन्हें उस कदर समर्थन हासिल नहीं होने जा रहा है क्योंकि उनका करिश्मा अब उतार पर है। कई मौकों पर उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने से भी उनकी हालत कमजोर हुई है। कांग्रेस के राहुल गांधी तो वोटरों को आकर्षित करने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं। वे अपनी पार्टी के लिए दलित एजेंडा तैयार करने में नाकाम तो रहे ही हैं, दलित और पिछड़े वर्गों के नौजवानों की भी उनमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। अब कांग्रेस इस दुविधा में है कि सपा से गठजोड़ करे या नहीं? कहने की दरकार नहीं कि 2014 के आम चुनावों के साथ हाल के चुनावों में भी मुसलमान नौजवानों ने मोदी के नेतृत्व के पक्ष में वोट डाला।

इन तमाम वजहों के मद्देनजर, जाहिर है कि उत्तर प्रदेश चुनावों में भले जाति बड़ा मुद्दा हो, इस बार यादव, मुसलमान, ब्राह्मण, राजपूत, लोध और दूसरी अहम जातियों के वोट क्षेत्रीय नेताओं के बदले मोदी के पक्ष में जा सकते हैं। हम जानते हैं कि मोदी को सुनने के लिए भारी भीड़ जुटती है और लखनऊ की परिवर्तन रैली में जुटी विशाल भीड़ को देखते हुए इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि मोदी मंत्र फिर अपना जादू दिखाएगा। इससे बढ़कर बात यह है कि मोदी अब उत्तर प्रदेश के ही सांसद हैं और उनकी सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले राजनाथ सिंह भी इसी प्रदेश से सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री हैं। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भाजपा राज्य की सपा सरकार के कुशासन की पोल खोलने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रही है। इसके अलावा आम जनता में मोदी का जादू खासकर नोटबंदी जैसे बड़ कदम के बाद काफी बढ़ गया है। लेकिन यह भी सही है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव उनकी भविष्य की छवि के लिए अहम होंगे क्योंकि मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले की कई वरिष्ठ अर्थशास्त्री तीखी आलोचना कर चुके हैं।

पंजाब में भाजपा-अकाली दल गठजोड़ को लगातार दो बार सत्ता के बाद कठिन राजनैतिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वहां आम आदमी पार्टी के मैदान में उतरने से भी माहौल पेचीदा हो गया है। कांग्रेस भी तगड़ी चुनौती दे रही है और लगातार सरकार की खामियों को उजागर कर रही है। अमृतसर से लोकसभा चुनाव हार चुके वित्त मंत्री अरुण जेटली को एक बार फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह परोक्ष रूप से चुनौती दे रहे हैं। उत्तराखंड में हालात भाजपा के पक्ष में लगते हैं। यहां भी प्रधानमंत्री की अच्छी छवि का लाभ मिलेगा। गोवा में राज्य से मनोहर पर्रीकर के केंद्र में आ जाने से भाजपा को बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। राज्य में भाजपा के नए नेतृत्व का मुकाबला विपक्ष से होगा।

इस चुनावी मौसम में सबसे परेशान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं। वे चिट फंड घोटालों में अपने दो सांसदों की गिरफ्तारी से बुरी तरह झुंझलाई हुई हैं। वे राज्य में भाजपा नेताओं से वैसे ही पेश आ रही हैं जैसे उन्हें वाममोर्चा सरकार के दौर में झेलना पड़ा था। इस बार तो तृणमूल कांग्रेस कानून-व्यवस्था के सभी कायदों को खुलेआम तोड़ रही है। इसलिए अब वक्त आ गया है कि राज्यपाल पश्चिम बंगाल के हालात के बारे में केंद्र को रिपोर्ट सौंपें। राज्य भाजपा के नेता उन्हें पहले ही ज्ञापन दे चुके हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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