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विश्वासघात एक अपराध

विश्वासघात एक अपराध

मनुष्य हमेशा परमात्मा अथवा परमानन्द के खोज में रहता है। इस खोज के रास्ते में रुकावट लाती है तो केवल उसके अन्दर रहने वाली उसकी कुप्रवृति। यही कुप्रवृति इस तरह उसके अन्दर जम जाती है कि वह आसानी से उससे छुटकारा नहीं पाता है। अनेक प्रकार की कुप्रवृतियों में से आज हम विश्वासघात के बारे में आलोचना करेंगे। विश्वासघात का अभ्यास बचपन से ही मनुष्यों में धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। पहले-पहले वह कोई छोटी बात पर किसी के विश्वास को चोट पहुंचाता है, फिर बड़ी-बड़ी बात पर। किसी को धोखा देना अथवा विश्वासघात करने वाले व्यक्ति अपने दोष को जघन्य नहीं मानते हैं, उनके लिए किसी के भी विश्वास को चोट पहुंचाना साधारण-सी बात होती है। देखा जाए तो विश्वासघात करना इंसान का वध करने जैसी बात है। क्योंकि मनुष्य स्थूल रूप से तो सबके लिए जीता है। वह सूक्ष्म रूप से अपने अन्दर रहने वाली भावना और विश्वास के माध्यम से जीता है, जब उसी भावना और विश्वास को चोट पहुंचती है तो वह संपूर्ण रूप से टूट जाता है। जब हम किसी का भरोसा करते हैं तो वह कोई छोटी बात नहीं है। बच्चों को अपने माता-पिता के ऊपर, माता-पिता को अपने बच्चों के ऊपर, पति-पत्नी एक दूसरे के ऊपर। देखा जाए तो हर रिश्ते केवल विश्वास के अदृश्य धागे के ऊपर टिका होता है। जब इनमें किसी को भी उसके सामने वाले का भरोसा तोडऩे का आभास मिलता है तो उसे ऐसा महसूस होता है कि जैसे उसकी सांस रुक-सी गयी हो। कुछ समय तक उसे संपूर्ण बेबसी महसूस होती है।

विश्वास पर ही पूरी दुनिया टिकी है, हम परमात्मा के ऊपर विश्वास रखकर एक नया जीवन पाते हैं। जटिल से जटिल परिस्थतियों में रहकर केवल सब कुछ सही होने के विश्वास से ही इंसान जी लेता है। विश्वास एक प्रकार जीने का माध्यम होता है। जो व्यक्ति विश्वास का मूल्य समझ नहीं सकता उसे परमात्मा के दरबार में दंडित होना पड़ता है। विश्वासघात को हम एक अधर्मी मान लें तो गलत नहीं होगा। असलियत में वह ईश्वर के ऊपर विश्वास नहीं करते हैं क्योंकि जो ईश्वर को अच्छी तरह से समझ लेते हैं तो वह उनको हर स्थिति, हर क्षण, हर जगह अनुभव करते हैं, यहां तक ईश्वर को अपने अंदर ही पाते हैं। जब ईश्वर के स्थिति में गलत कार्य करने से पीछे नहीं हटते हैं तो हम उन्हें कैसे मानते हैं। कुछ लोग तो केवल पूजा करने का एक दिखावा करते हैं, उनके लिए ईश्वर केवल उनके मन में खुशी देने की मशीन होता है। जब जरूरत है तब ईश्वर की पूजा कर लो, उनके जरूरत के अनुसार ईश्वर की पूजा  की स्थिति भी बना लेते हंै। इस समय पूजा करनी चाहिए, इस समय नहीं करनी चाहिए।

यहां पूजा करनी चाहिए और यहां नहीं, मनुष्य अपने आप तय कर लेता है। देखा जाए तो खुद को भगवान से भी अधिक शक्तिशाली मानता है।

अच्छा कार्य सबसे नहीं हो सकता है। लेकिन अच्छा कार्य करने का दिखावा करके किसी के विश्वास को चोट पहुंचाना वास्तव में बड़ा अपराध है। अगर परमात्मा है तो अच्छे कार्य के लिए अच्छे और मन्द कार्य के लिए मन्द होता हो तो एक विश्वासघाती को, एक घातक के लिए जो दण्ड है वहीं मिलता होगा। विश्वासघाती एक घातक ही तो है।

उपाली अपराजिता रथ

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