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आचार्य सुधांशुजी महाराज परमात्मा का रास्ता बताने वाले संत

आचार्य सुधांशुजी महाराज  परमात्मा का रास्ता बताने वाले संत

विकास ऊध्र्वारोहण की प्रक्रिया है। बीज उगता है तब बरगद बन विश्राम लेता है। दीए की बाती जलती है तब सबको उजाले बांटती है। समन्दर का पानी भाप बन ऊंचा उठता है तब बादल बन जमीं को तृप्त करने बरसता है। जीवन का ऊध्र्वारोहण भी विकास की ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरता है। कौन नहीं जानता कि आज तक किसी शहर, गांव या घर में बड़ा आदमी नहीं जनमा। जन्म हमेशा शिशु का होता है। हजारों-लाखों शिशुओं की भीड़ में कोई-कोई शिशु जीवन-विकास की प्रयोगशाला में विभिन्न प्रशिक्षणों से गुजरकर महापुरुष बनता है। भारतभूमि अनादिकाल से ऐसे ही महापुरुष ऋषियों-महर्षियों की साक्षी बनी है। इसी भूमि पर कभी वैदिक ऋषियों एवं महर्षियों की तपस्या-साधना साकार हुई भी तो कभी महावीर, बुद्ध एवं आद्य शंकराचार्य के तप ने इस माटी को कृत्कृत्य किया था। साधना की इस पवित्र भूमि को कभी रामकृष्ण परमहंस ने तो भी विवेकानन्द ने, कभी श्री अरविन्द ने तो महात्मा गांधी ने उज्ज्वल एवं तेजस्वी बनाया। साधना, कर्मयोग, सेवा, परोपकार की यह गंगा बीसवीं सदी क उत्तराद्र्ध में जिस शलाकापुरुष में आत्मसात हुई, वे हैं श्री सुधांशुजी महाराज। आध्यात्मिक प्रवक्ता, प्रखर लेखक, जीवन निर्माता, प्रवचनकार, चिन्तक, विचारक व मनीषी राष्ट्र-सन्त और इनसे ऊपर एक महान् सद्गुरु हैं। वे गहन अंधकार में टॉर्च का काम करते हैं, शिष्यों की अंतश्चेतना को जगाते हैं एवं युग की समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करते हैं। आत्मबोध और कर्तव्य बोध के वे एक समन्वित युगपुरुष, युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा संतपुरुष हैं।

विश्व जागृति मिशन के संस्थापक-अध्यक्ष आचार्य सुधांशुजी महाराज भारतीय संस्कृति एवं ऋषि-मनीषा के शलाकापुरुष हैं। देश एवं विश्व के विभिन्न अंचलों में सेवारत लगभग 50 लाख शिष्यों के ‘परम पूज्य गुरुदेवÓ आचार्यश्री सुधांशुजी भारत के उन चुनिन्दा अध्यात्मवेत्ताओं में से एक हैं, जिनके विचारों को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के पश्चिमी दिल्ली जिले के नांगलोई अंचल में बक्करवाला मार्ग पर 24 एकड़ भूभाग में फैला आध्यात्मिक आश्रम ‘आनन्दधामÓ उनके विश्व जागृति मिशन का अन्तरराष्ट्रीय मुख्यालय है।

उत्तर भारत में गंगा-यमुना के पवित्र आंचल में शिवालिक की तलहटी में बसे उत्तर प्रदेश राज्य के सहारनपुर जनपद के हरिपुर गांव में स्मृतिशेष श्री हरीशचन्द्रजी एवं श्रीमती कर्पूरीदेवीजी के घर जन्मे श्री सुधांशु जी महाराज का जन्म 2 मई, 1955 को हुआ। बचपन से ही विलक्षण एवं तीक्ष्ण प्रतिभा से सम्पन्न थे और उस छोटी-सी अवस्था में इन्होंने मंत्र और श्लोकों का अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया था। हठयोगी विजेन्द्रमुनि, वनखण्डी साधु प्रकाशानन्द, योगी सदानन्द, वीतराग स्वामी मुक्तानन्द जैसे तपोनिष्ठ सन्तों के सान्निध्य व मार्गदर्शन में आगे बढ़े तपस्वी महापुरुष श्री सुधांशुजी महाराज संस्कृतिपुरुष चिरयुवा स्वामी विवेकानन्द और वीतराग इतिहासपुरुष चैतन्य महाप्रभु के सद्गुणों के पुंजीभूत एक प्रखर व्यक्तित्व हैं।

सुधांशुजी महाराज ने 24 मार्च 1991 को रामनवमी के दिन दिल्ली में विश्व जागृति मिशन की स्थापना की और इसके माध्यम से भारत ही नहीं विदेशों में भी अध्यात्म-साधना, सेवा और जनकल्याण का संदेश प्रचारित कर रहे हैं। इनका मिशन निर्धनों, अभावग्रस्त, बेसहारा और कमजोर व्यक्तियों की सहायता करता है। दिल्ली स्थित इनके आनन्दधाम आश्रम में सेवा, जनकल्याण, चिकित्सा, शिक्षा, संस्कार-निर्माण एवं परोपकार की अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही है। देश में लगभग 6 करोड़ अनाथ, निर्बल, निर्धन बच्चे हैं। इनकी दुर्दशा ने आचार्यश्री को विचलित कर दिया। इसी कारण चार स्थानों पर इन बेसहारा बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार प्रदान करने की बड़ी सुन्दर व्यवस्था की गयी है। आचार्य सुधांशुजी महाराज का सपना है कि इन वंचित वर्गों के कम-से-कम एक करोड़ बच्चों को शिक्षित, अल्पशिक्षित एवं सुसंस्कारी बनाकर उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ेंगे। आनन्दधाम स्थित महर्षि वेद व्यास गुरुकुल विद्यापीठ तो ऐसे ही बच्चों को सुयोग्य विद्वान नागरिक बनाने की एक सुन्दर प्रयोगशाला है। आनन्दधाम के अस्पतालों करुणा सिन्धु अस्पताल एवं युगऋषि आरोग्यधाम ने 14 लाख से ज्यादा वंचित वर्ग के लोगों की पीड़ा को हरने का काम किया है और उनका नि:शुल्क इलाज किया है। ह्वाईट लोटस अस्पताल के रूप में तो दिल्ली को एक अनुपम चिकित्सा केन्द्र मिला है, जहां आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, पंचकर्म आदि से इलाज की बड़ी उच्चस्तरीय व्यवस्था है। इन बृहद् सेवा योजनाओं के अलावा राष्ट्र के आध्यात्मिक नवोन्मेष एवं सांस्कृतिक जागरण हेतु विराट् भक्ति सत्संग महोत्सवों के आयोजन किये जाते हैं। मानसिक, शारीरिक व आध्यात्मिक विकास के लिए ध्यान साधना शिविरों का आयोजन किये जाते हैं। ‘उपेक्षित बचपन’ को वात्सल्य, संरक्षण, शिक्षण-प्रशिक्षण देते हुए एवं उन्हें सुयोग्य बनाकर राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने के विशिष्ट उपक्रम भी संचालित किये जा रहे हैं। युवाओं को मेधा-सम्पन्न व श्री-सम्पन्न बनाने के विविध कार्यक्रमों के साथ नारी की अस्मिता एवं अस्तित्व को गरिमा प्रदान करने हेतुु ‘श्री शक्ति मंच’ के माध्यम से बहुआयामी कार्यक्रमों का आयोजन हो रहे है। सचमुच सुधांशुजी महाराज व्यक्ति नहीं, वे धर्म, दर्शन, कला, साहित्य, सेवा और संस्कृति के प्रतिनिधि ऋषिपुरुष हैं। उनका संवाद, शैली, साहित्य, साधना, सोच, सपने और संकल्प सभी कुछ मानवीय-मूल्यों से जुड़े हैं।

रमणीक व हरीतिमा से युक्त आनन्दधाम आश्रम का कोना-कोना दैवीय शक्तियों एवं स्वत:स्फूर्त आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत है। काठमाण्डू के पशुपतिनाथ मन्दिर की प्रतिकृति दिखने वाला दिव्य पशुपतिनाथ मन्दिर हो या नवग्रहों की शान्ति के पर्यावरणीय उपाय सुझाता नवग्रह मण्डल मन्दिर अथवा परम दिव्यता से युक्त आनन्दधाम मन्दिर, सभी मन्दिर आगन्तुक को भीतर की यात्रा करा देते हैं। ओंकार कुटिया में ‘ऊंÓ का नाद तो आगन्तुक को अन्दर तक छूता ही है, सिद्ध शिखर मन्दिर पर हिमालय से नीचे उतरतीं भागीरथी मां गंगा को अपनी जटाओं में लेने के लिए दोनों हाथ उठाये सदाशिव का दृश्य उस ओर टकटकी लगाये देखने को विवश कर देता है। कल्पवृक्ष वाटिका में बैठकर साधना करने का अनुभव तो अनूठा, अलौकिक एवं विलक्षण होता ही है।

सुधांशुजी महाराज के पुरुषार्थी जीवन की एक पहचान है गत्यात्मकता। वे अपने जीवन में कभी कहीं रुके नहीं, झुके नहीं। प्रतिकूलताओं के बीच भी अपने लक्ष्य का चिराग सुरक्षित रखा। इसलिए उनकी हर सांस अपने दायित्वों और कर्तव्यों पर चौकसी रखती है। पसीना बनकर बहता है। रातें जागती हैं। दिन संवरते हैं। प्रयत्न पुरुषार्थ बनते हैं और संकल्प साधना में ढलते हैं। सचमुच! वे कर्मवीर है और अपने जीवन को कृतकाम कर रहे हैं। उनकी रचनात्मक उपलब्धियां उम्र के पैमानों से इतनी ज्यादा हैं कि उनके आकलन में गणित का हर फार्मूला छोटा पड़ जाता है।

आपका अतीत सृजनशील सफर का साक्षी है। इसके हर पड़ाव पर शिशु-सी सहजता, युवा-सी तेजस्विता, प्रौढ़-सी विवेकशीलता और वृद्ध-सी अनुभवप्रवणता के पदचिन्ह हैं जो हमारे लिए सही दिशा में मील के पत्थर बनते हैं। आपका वर्तमान तेजस्विता और तपस्विता की ऊंची मीनार है जिसकी बुनियाद में जीए गए अनुभूत सत्यों का इतिहास संकलित है। जो साक्षी है सतत अध्यवसाय और पुरुषार्थ की कर्मचेतना का, परिणाम है तर्क और बुद्धि की समन्वयात्मक ज्ञान चेतना का और उदाहरण है निष्ठा तथा निष्काम भाव चेतना का।

सुधांशुजी महाराज की अविभक्त संत-चेतना ने अपना परिचय स्वयं दिया कि ‘मैं सबसे पहले मानव हूंÓ, और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा ही मेरा मिशन है। इसीलिए वे सूरज की धूप, वर्षा के पानी और वृक्ष की छांव ज्यों कभी बंटे नहीं। हवा बन सब तक पहुंचे, प्रकाश बन अंधेरों को थामा और विश्वास बन सबके आश्वास बन गए। कहते हैं सिद्ध पुरुष अनेक हो सकते हैं, उनकी प्राप्ति अपेक्षाकृत सरल है। सद्गुरु विरल होते हैं। सिद्ध वह है, जो सत्य को उपलब्ध हो गया। सद््गुरु वह है जो ज्ञान को बांटता है, औरों को भी सत्य का बोध कराता है। सिद्ध एक सीट वाली नाव है। उस पर दूसरा नहीं बैठ सकता। सुधांशुजी महाराज अनेक सीटों वाली नाव हैं, महायान हैं। उसमें करोड़ों यात्री बैठ सकते हैं और संसार-सागर के उस पार पहुंच सकते हैं। वे अनेकों के लिए द्वार बने हैं।

समर्पण पूर्णिमा है, अहंकार अमावस। परमात्मा को खोजने के लिए कैलाश, काशी काबा, गया या पावा जाने की अपेक्षा नहीं है। परमात्मा वहां है, जहां कोई सुधांशुजी महाराज जैसा दिव्य संतपुरुष एवं पवित्र संतात्मा हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारा है, पर परमात्मा का निवास कहां है? पता नहीं। वह सर्वथा अज्ञात है। जिस क्षण हमारे कदम उस परमात्म-तत्व की खोज में आगे बढ़ते हैं, वही क्षण जीवन की सुबह है। रुका हुआ कदम अमावस है, उठा हुआ कदम पूनम है। परमात्मा का रास्ता सुधांशुजी महाराज जैसे गुरु ही बता सकते हैं। उनके साथ एक कदम भी उठा लें, उनके सहयात्री बन जाएं तो पूर्णिमा घटित हो सकती है।

ललित गर्ग

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