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नई पार्टियों के कारण दिलचस्प होगा मुकाबला

नई पार्टियों के कारण दिलचस्प होगा मुकाबला

क्या रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर फिर गोवा के मुख्यमंत्री बनेंगे? गोवा के चुनाव में यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। इस बार गोवा विधानसभा चुनाव में मुकाबला दिलचस्प होने के आसार हैं क्योंकि मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं चार पार्टियों के बीच हो गया है। एक तरफ सत्ताधारी भाजपा पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी निशाना साध रहे हैं, वहीं अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बागियों की पार्टी गोवा सुरक्षा मंच, भाजपा की पूर्व सहयोगी महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी और शिवसेना के साथ मिलकर भाजपा को घेरने के लिए तैयार हैं। गोवा में 4 फरवरी को एक ही चरण में मतदान होगा। बीजेपी ने गोवा के विधानसभा चुनाव में बिना किसी सीएम उम्मीदवार के चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया हो, मगर राज्य के चुनाव प्रभारी और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यह कहकर सस्पेंस बना दिया है कि केंद्र से भी कोई नेता मुख्यमंत्री बनने के लिए भेजा जा सकता है। इससे लोगों को लग रहा है कि पर्रीकर फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं।

अभी विधानसभा की 40 में से 21 सीट भाजपा के पास हैं। जबकि कांग्रेस के पास मात्र 9 सीटें हैं। इसके अलावा पांच निर्दलिय विधायक है। महाराष्ट्रवादी गोमांटक पार्टी के पास तीन  और गोवा विकास पार्टी के विधानसभा में दो विधायक हैं। 2012 के विधानसभा में भाजपा को 34.68 फीसदी जबकि कांग्रेस को 30.78 फीसदी वोट मिले थे।

पिछले चुनाव में भाजपा की जीत के बाद मनोहर पर्रीकर दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे लेकिन उन्हे  बाद में केंद्र की सरकार में रक्षामंत्री बना दिया गया और लक्ष्मीकांत पार्सेकर को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद पार्टी में गुटबाजी हावी हो गई है। ऐसे में इस बार जहां कांग्रेस एक बार फिर जोरदार वापसी की कोशिश कर रही है  तो आम आदमी पार्टी पूरी ताकत से गोवा के चुनाव में कूद गई है। ‘आपÓ ने एलविस गोम्स को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया है।

गोवा के विधानसभा चुनावों को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि कम सीट होने के कारण वोट प्रतिशत में बहुत ज्यादा फर्क न होते हुए भी सीटों में अच्छा-खासा फर्क आ जाता है। एक तरफ भाजपा अपनी सरकार किसी भी कीमत पर गोवा में खोना नहीं चााहती लेकिन मनोहर पर्रीकर के बाद आरएसएस और भाजपा में गुटबाजी उसके लिए खतरा है। कांग्रेस अभी भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। तो आम आदमी पार्टी तमाम दावों के बावजूद टिकट बटवारें को लेकर अपने ही नेताओं का विरोध झेल रही है। गोवा विकास पार्टी और महाराष्ट्रवादी गोमांटक पार्टी भी चाहेंगी कि उनकी स्थिति आने वाले विधानसभा चुनाव में ऐसी बने कि वो नई सरकार में अहम सहयोगी बन सकें।

गोवा में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तीन पार्टियों ने महागठबंधन की घोषणा की है. महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी), शिवसेना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बागी नेता सुभाष वेलिंगकर की पार्टी जीएसएम मिलकर चुनाव लड़ेंगे। यह समान विचारधारा वाली ताकतों के बीच गठबंधन होगा.यह गठबंधन गोवा की कुल 40 सीटों में से 35 पर अपने प्रत्याशी उतारेगा. इसमें शिवसेना चार, जीएसएम छह और बाकी बची सीटों पर एमजीपी अपने उम्मीदवार उतारेगी. गठबंधन की सभी पार्टियों के उम्मीदवार अपने-अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे। गोवा सुरक्षा मंच को अगले हफ्ते चुनाव चिन्ह मिल जाने की उम्मीद है। गठबंधन घोषणापत्र भी जारी करेंगा जिसमें गोवा की अस्मिता का मसला प्रमुख होगा।

पिछले चुनावों में महाराष्ट्र गोमांतकवादी पार्टी ने गोवा में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन मनोहर पर्रीकर के रक्षा मंत्री बनने के बाद से ही भाजपा और एमजीपी में टकराव बढऩे लगा था। पिछले महीने यह टकराव उस समय सार्वजनिक हो गया था जब एमजीपी नेता और गोवा सरकार में तत्कालीन परिवहन मंत्री सुदिन धवलीकर ने मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पर्सेकर को नाकाबिल बताते हुए पद से हटाने की मांग कर दी। इससे नाराज लक्ष्मीकांत पर्सेकर ने एमजीपी के दोनों मंत्री सुदिन धवलीकर और दीपक धवलीकर को कैबिनेट से हटा दिया था।

 गोवा में भाजपा के खिलाफ आप पार्टी एक नए दावेदार के तौर पर उभरी है, पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव के नतीजों से यह स्पष्ट होगा कि आप पार्टी का दिल्ली  के बाहर कोई भविष्य है या नहीं? आप पार्टी ने पहले हरियाणा में चुनाव लड़ा था, जहां उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। आम आदमी पार्टी दिल्ली स्टाइल में गोवा में चुनावी जंग लड़ रही है। पार्टी की रणनीति उसी तर्ज पर दिख रही है, जो दिल्ली में पार्टी को जीत का स्वाद चखा चुकी है। आप के मुख्यमंत्री के नाम के इर्द-गिर्द अपनी कैंपेनिंग के साथ ही पार्टी ठीक दिल्ली की तरह गोवा में भी विरोधी पार्टी को उनके मुख्यमंत्री के नाम के सवाल पर घेर रही है। आप ने गोवा के लिए अपने सीएम कैंडिडेट के तौर पर एल्विस गोम्स के नाम का ऐलान किया। जिसके बाद पार्टी गोम्स को मुख्यमंत्री बनाने के लिए गोवा की जनता से वोट मांग रही है। साथ ही पार्टी चुनावी जंग को हस्तियों की लड़ाई में तब्दील करने के लिए वही तरीका अपना रही है जो दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनाया था। गोम्स को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवीर बनाने के दूसरे दिन ही गोवा में कई जगह होर्डिंग लगा दिए गए जिनमें गोम्स और मौजूदा मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर की तुलना करने की कोशिश की गई है।

आप ने गोवा में जब गोम्स बनाम पारसेकर के होर्डिंग लगाए तो उस पर बीजेपी ने आपत्ति जताई। बीजेपी ने कहा कि ये पोस्टर अपमानजनक हैं। आप नेताओं ने आरोप लगाया कि बीजेपी समर्थक उनके होर्डिंग फाड़ रहे हैं। जिसके बाद आप ने पोल्स में बैनर्स लगाने शुरू किए। कुछ इसी तरह दिल्ली चुनाव के दौरान भी हुआ था जब आप नेताओं ने विरोधी पार्टियों पर उनके होर्डिंग-पोस्टर फाडऩे का आरोप लगाया था। आप के नेता अनौपचारिक बातचीत में मानते हैं कि आप के पोस्टरों को टारगेट कर बीजेपी उन्हें ही पब्लिसिटी देने का काम कर रही है। गोम्स से एक केस के मामले में एसीबी की पूछताछ पर भी आप बीजेपी पर उन्हें  टारगेट करने का आरोप लगा रही है। आप नेता आशीष तलवार ने कहा कि जिस तरह बीजेपी बौखला रही है उससे अब हमें यकीन हो गया है कि गोवा में इस बार बीजेपी हाफ और कांग्रेस साफ हो जाएगी।

आप बड़ी चतुराई से भाजपा के सामने मुख्यमंत्री के नाम का जाल बुन रही है। जहां पार्टी पंजाब में मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान नहीं कर रही है, वहीं गोवा में एल्विस गोम्स को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर आप बीजेपी को अपने गेम में फंसाना चाहती है। आप लगातार बीजेपी को इस सवाल पर घेर रही है कि बीजेपी अपने सिटिंग सीएम का नाम लेने से क्यों डर रही है।

बीजेपी ने गोवा में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए आज अपने 29 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है। 40 सीटों वाली इस विधानसभा में 4 फरवरी को मतदान होना है. हालांकि गोवा में सीएम कैंडिडेट कौन होगा, इसे लेकर बीजेपी अपने पत्ते नहीं खोल रही. बताया जा रहा है कि बीजेपी इस दुविधा में है कि वो मनोहर पर्रिकर के चेहरे पर चुनाव लड़े या सीएम लक्ष्मीकांत पारसेकर के चेहरे पर. अगर पारसेकर का नाम चुनाव से पहले घोषित किया जाता है तो राज्य में उनके नाम पर वोट पड़ेंगे और ऐसे में बीजेपी को पर्रिकर की लोकप्रियता का फायदा नहीं मिल सकेगा।

बीजेपी नेता जे पी नड्डा उम्मीदवारों की सूची के साथ मीडिया के सामने आए तो उन्होंने इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं दिया कि गोवा में पार्टी का मुख्यमंत्री का नाम कौन होगा। गोवा में बीजेपी सीएम लक्ष्मीकांत पारसेकर को सीएम कैंडिडेट के रूप में पेश करने को तैयार नहीं है। उसका सोचना है कि रक्षामंत्री और गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर पारसेकर से बड़ा चेहरा हैं और विधानसभा चुनाव में उन्हीं का चेहरा सामने रख उतरा जाना चाहिए। भावी सीएम का फैसला चुनाव जीतने के बाद किया जाए। नड्डा ने इस बारे में सवाल पूछे जाने पर कहा कि पार्टी का संसदीय बोर्ड इस मामले पर फैसला करेगा.

तमाम ओपीनियन पोल गोवा में बीजेपी के पक्ष में हैं लेकिन इसके बावजूद सत्तारूढ़ भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। राज्य में आम आदमी पार्टी के उभार से वो सतर्क है तो दूसरी ओर उसके अपने इस समय चुनाव मैदान में उसके आमने-सामने आ गए हैं। 40 सीटों वाली विधानसभा में 2-3 सीटों का अंतर भी सरकार बनाने और बिगाडऩे के लिए काफी अहम हो जाता है। यही वजह है कि बीजेपी पर्रिकर के लोकप्रिय चेहरे को चुनाव में अधिक से अधिक भुनाना चाहती है।


बहुत कठिन डगर लखनऊ की


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भाजपा को लखनऊ की गद्दी पर बैठना कुछ समय पहले आसान दिखाई दे रहा था, अब बदलते राजनीतिक समीकरण में उसकी राह में तरह-तरह के रोड़े आ पड़े हैं। सपा और कांग्रेस का गठजोड़ बिना फेरे लिये विवाह जैसा है यानी कसम और बंधन कोई नही, लेकिन बरातियों को एकत्र कर गठजोड़ का खेल है। सपा और कांग्रेस दोनों को ही उत्तर प्रदेश की जनता नकारने का मन बना चुकी हैं। ऐसे में दोनों ने गठबंधन कर चुनाव लडऩे में ही अपना हित समझा । कांग्रेस नेतृत्व जानता है कि न उसकी सरकार बनी है और न वो 30 से अधिक सीटें जीत सकती है। पर वह अकेले ही चुनाव लडऩे में सक्षम है। नेताओं की भरमार है पार्टी में, और छुटपुट कार्यकर्ता भी प्रत्येक गांव में मिल जाएंगे।

कांग्रेस एक बार बीएसपी से गठबंधन कर लगभग सवा सौ सीटों पर चुनाव लड़ी थी पर तीस सीटों के आसपास ही जीत सकी थी जबकि उसे बीएसपी का वोट भी ट्रांसफर हुआ था। उसके बाद कभी कांग्रेस जमींन से उठ नहीं पायी। गठबंधन में कांग्रेस को सपा का वोटबैंक, यादव ट्रांसफर होने में सशंय हैं। सीटें भी 103 उसके हिस्से में आ रही हैं।  300 से अधिक सीटों पर पार्टी का चुनाव चिन्ह और नाम लेने वाला कोई नहीं होगा यानी पार्टी ने अपनी बर्बादी की राह चुनी है तो इसके पीछे कोई तो कारण है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को रायबरेली और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी लोकसभा सीट से हारने का खतरा मंडरा रहा है जो दो वर्ष बाद होनें वाले है। इसलिये इन क्षेत्रो में सभी विधान सभा सीटों पर लडऩे शर्त कांग्रेस ने रखी है और उसके बदले में 110 सीटों पर समझौता करने वाली कांग्रेस 85 सीटों पर तैयार हो गयी है। अखिलेश ने इसी मजबूरी का फायदा उठाया और राहुल गांधी को सपा द्वारा अमेठी लोकसभा में दो जीती हुई विधानसभा उपहार स्वरूप दे दी है। बस यही एक राहुल गांधी के चेहरे पर चमक  आने का कारण है।

दोनों वी आई पी लोकसभा जीतने का फार्मुला निकालने के लिये गुलाम नबी आजाद की पीठ थपथपायी जा रही है। उधर प्रमोद तिवारी की बंाछें भी खिल उठी है। वैसे वो विरोधी पार्टी से हाथ मिलाकर अपनी सीट जीतने में सदा कामयाब रहे हैं।

सपा द्वारा अमेठी और रायबरेली की सारी सीटें कांग्रेस को देने से भले ही राहुल गांधी ने आगामी लोकसभा में अपनी जित पक्की कर ली हो पर 85 सीटों पर समझौता कर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने विस्तर गोल होने  की तैयारी कर ली है।

सपा और कांग्रेस की लखनऊ डगर आसान नहीं होगी। सपा का पांच वर्ष का शासनकाल गुंडागर्दी और माफिया राज के नाम से कुख्यात हो चुका है।   पार्टी के गुरगे जिले-जिले, गांव-गांव में जमीनों पर कब्जा करने के लिए जाने जाते रहे हैं, ऊपर से हर महत्वपूर्ण पदों पर अखिलेश राज अपने कुनबे या जाति के लोगों को बिठाने के लिए बदनाम भी हुआ है। यहां तक कि हाईकोर्ट ने उन्हें पद से हटाया है। उधर भाजपा की राह भी कठिन होती जा रही है। प्रियंका गांधी का बाहर निकलना कांग्रेस को संजीवनी तो नहीं दे सकता वरना पार्टी समझौता ही क्यों करती पर माहौल में गर्माहट आयेगी, क्योंकि वे भीड़ जुटाने का काम कर सकती हैं। आम वोटर सपा के शासन से पीडि़त रहा है। इसीलिए सपा गठनबंधन का लखनऊ पहुंचना कठिन है। भाजपा ने केशव मौर्य को अध्यक्ष बना कर कुशवाहा वोट अपनी झोली में डाल लिया हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी में रहे या जाएं कुशवाहा  वोट भाजपा को ही मिलने वाला है। उमा भारती और कल्याण सिंह जैसे दिगज्जों के कारण लोध वोट भी भाजपा को अच्छी संख्या में मिल जाएगा। पार्टी ने दारा सिंह चौहान को पिछड़ा प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर प्रदेश के अति पिछड़ों का भी मन जीतने का अच्छा प्रयास किया है।

यदि व्यापारी वर्ग और वैश्य भाजपा से बंधा रहा तो भाजपा की डगर आसान होगी। नोटबंदी तो भाजपा के हक में है, भले बाजार का थोड़ा बहुत दुकानदार नाराज हो। अल्पसंख्यक यदि धुव्रीकरण में एकदम गठबंधन की ओर चले जाते हैं तो बहुसंख्यक का भी धुव्रीकरण हो सकता है। ओवैसी की पार्टी भी अल्पसंख्यकों के वोट काटेगी। भाजपा यदि टिकट बांटने में सतर्कता नहीं बरतती है तो उसकी आसान डगर में भी लखनऊ की गद्दी पर पहुंचने में रोड़े अटक सकते हैं। भाजपा नरेन्द्र मोदी के सशक्त नेतृत्व में और उनकी लोकप्रियता से वैतरणी पार करती आज तो दिखाई दे रही है।

डॉ. विजय खैरा


हालांकि गोवा में मुख्यमंत्री कौन होगा, इसे लेकर बीजेपी अपने पत्ते नहीं खोल रही. बताया जा रहा है कि बीजेपी इस दुविधा में है कि वो मनोहर पर्रीकर के चेहरे पर चुनाव लड़े या सीएम लक्ष्मीकांत पारसेकर के चेहरे पर। अगर पारसेकर का नाम चुनाव से पहले घोषित किया जाता है तो राज्य में उनके नाम पर वोट पड़ेंगे और ऐसे में बीजेपी को पर्रिकर की लोकप्रियता का फायदा नहीं मिल सकेगा।

जहां तक मुद्दों का सवाल है खनन और केसिनों मुख्य विवादास्पद मुद्दे हैं। भाजपा और आप ने कैसिनों बंद करने का वायदा किया है। मगर  गोवा के उप मुख्यमंत्री फ्रैंसिस डिसूजा ने कहा कि इस तटीय राज्य में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अन्य चीजों के साथ शराब और कैसिनो के लिए भी जगह है। साथ ही कैसिनो उद्योग सरकार के लिए राजस्व अर्जित कर रहा है। डिसूजा ने कहा कि गोवा शराब, सूरज, रेत, नाचने-गाने का एक स्थल है। इसे कैसिनो, तीर्थाटन पर्यटन, हनीमून स्थल, आंचलिक पर्यटन और इलेक्ट्रानिक डांस म्यूजिक स्थल के तौर भी जाना जाता है।

उन्होंने कहा कि गोवा को केवल एक चीज के लिए नहीं जाना जाता। कैसिनो अकेला ऐसा कारण नहीं है जिसको लेकर पर्यटक इस राज्य में आते हैं।

 गोवा में जुआघरों को बढ़ावा देने के लिए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) दोनों ही जिम्मेदार है, जबकि विपक्ष में रहते हुए दोनों ने इसका विरोध किया है। गोवा सरकार उन भारतीय जुआरियों को वापस आकर्षित करना चाहती थी जो अब नेपाल जाकर जूआ खेलते थे, जहां इसे वैधानिक करार दिया गया है। सबसे पहले कांग्रेस पार्टी ने गोवा में जुआ को अनुमति दी, जब उसने 1992 में गोवा पब्लिक गैंबलिंग एक्ट में संशोधन किया और पांच सितारा होटलों में स्लॉट मशीनों को अनुमति दे दी। बाद में कांग्रेसी मुख्यमंत्री प्रतापसिंह राणे के कार्यकाल में समुद्र या नदियों में (ऑफ शोर) टेबल गेम को अनुमति दे दी गई। उस समय बीजेपी ने इसका विरोध किया था। इसके बावजूद गोवा में सत्ता में आने के बाद बीजेपी के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर (2000 से 2004 तक पिछले

कार्यकाल में) कैसीनो गोवा के संचालन के लिए लाइसेंस दे दिया। इस चुनाव में यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है।

सतीश पेडणेकर

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