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चुनावी युद्ध के हथियार हैं नारे

चुनावी युद्ध के हथियार हैं नारे

साल २०१७ के आने वाले चुनावों में सभी राजनीतिक दल जीतने के लिए तमाम कोशिशों में लगे हैं। राजनीतिक पार्टियों के चुनावी नारे सोशल मीडिया पर खूब धमाल मचा रहे हैं। यूपी में सत्ता हासिल करने की ताक में बीजेपी ने अपना नारा रखा है ‘उत्तर देगा उत्तर प्रदेश’ वहीं यूपी में सत्तासीन पार्टी सपा का नारा है ‘काम बोलता है’ जो कि सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। चुनावी प्रचार की होड़ में दोनों पार्टियों के बीच एक दूसरे को मात देने की होड़ लगी हुई है। सपा ने नारों की झड़ी लगा रखी है। ज्यादातर नारे अखिलेश के बारे में हैं। जैसे   ”नो कंफ्यूजन नो मिस्टेक, अखिलेश फिर अखिलेश”, ”लोहा तप कुंदन भया”, ”रोम रोम उत्तर प्रदेश, मैं आपका अखिलेश”। तो कांग्रेस का नारा है -‘२७ साल यूपी बेहाल’ पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह ने अपनी पार्टी का चुनावी नारा दिया है,  ‘हर घर तों इक कप्तान।’ इस तरह नारों की बहार आई हुई है मगर इनमें से कोई नारा है ऐसा नहीं है जो झकझोर सके और लोगों की जुबान पर चढ़ जाए।

हमारा देश नारों का देश है। यहां  हर अवसर के लिए नारे  हैं। किसी के स्वागत के लिए नारे, विरोध के लिए नारे, संघर्ष के लिए नारे, मांगे  मनवाने के लिए नारे यहां तक कि अंतिम यात्रा के लिए भी एक नारा है। ऐसे  में चुनाव और नारों का  चोली दामन का साथ हो तो अचरज कैसा? चुनाव आते ही पार्टियां  नारों की तलाश में जुट जाती हैं। लोकसभा चुनाव में  भाजपा को अपने चुनाव अभियान के लिए एक नारा मिल ही गया ‘अबकी बार मोदी सरकारÓ। यह नया नारा नहीं था वरन नई बोतल में पुरानी शराब थी। भाजपा के ही १९९६ के नारे ‘राजतिलक की  करो तैयारी अबकी बारी अटल बिहारी’ का संशोधित परिवर्धित रूप  था। हर बार जब आम चुनाव होते हैं तो राजनीतिक दल नारों की फसल तो उगाते ही हैं। नरेंद्र मोदी ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत और वोट फार इंडिया’ नारे दिए। दोनों नारे ठीक थे लेकिन गरीबी हटाओ वाली बात नहीं थी। मोदी को लेकर भी नारे लिखे  गए, ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ या  ‘नरेंद्र मोदी कमल निशान मांग रहा है हिन्दुस्तान।’ दूसरी तरफ कांग्रेस चुनाव अभियान की तरह नारे बनाने में भी पिछड़ गई। पहले उसके पास ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’ जैसा जबरदस्त नारा था। लेकिन कुछ  समय से आम आदमी श4द आम आदमी पार्टी की जागीर बन गया है सो कांग्रेस ने यह नारा छोड़ दिया। इसके बाद उसने जो नारे गढ़े, उनमें से कोई दमदार

नहीं था। उसके नए  नारे थे ‘राजनीति नहीं काजनीति, या तोड़ें नहीं जोड़ें।’ ऐसे बुझे-बुझे से नारों से भला कोई चुनाव जीतता है। अन्य किसी पार्टी ने नया नारा चुनाव के लिए गढ़ा हो, ऐसा सुनाई नहीं दिया। सड़क की राजनीति करने वाली आप ने भी नहीं।

भारत में तो नारे चुनावों की जान रहे हैं। सभी पार्टियां अपने लिए नारे ढूंढती हंै, गढ़ती हैं। आजकल राजनीतिक पार्टियां आलसी हो गई हैं, यह काम विज्ञापन एजंसियों पर छोड़ देती हैं इसलिए पार्टियों के पास पहले जैसे जोशीले और  झकझोरने वाले नारे नहीं रहे। पर बिना नारे के चुनाव बेमजा लगता है जैसे बिना नमक की तरकारी। नारे ही माहौल बनाते हैं। नारे ही चुनाव अभियान में दम और कार्यकर्ताओं में जोश भरते  हैं। इसलिए  हर पार्टी एक ऐसा नारा चाहती है जिससे वोटरों को लुभा सके। एक समय ऐसा था कि चुनाव आते ही गांव-शहर नारों से गूंज उठते थे। पार्टी की रीति, नीति और लक्ष्य और मुद्दों को समेटे ये नारे इतने प्रभावी होते थे कि पूरा का पूरा चुनाव पलटने की क्षमता रखते थे।

भारत की चुनावी राजनीति में नारों ने हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। गागर में सागर होते थे नारे। जिसमें दो लाइनों में पार्टियों का गूढ दर्शन, लक्ष्य  सरल भाषा में भरा होता था। आजादी के बाद क6युनिस्टों ने एक नारा दिया था ‘देश की जनता भूखी है यह आजादी झूठी है’। उनका एक और नारा लोकप्रिय था ‘लाल किले पर लाल निशान मांग रहा है हिन्दुस्तान’। समाजवादियों और साम्यवादियों ने साठ के दशक में नीतियों को स्पष्ट करने वाले ‘जब तक भूखा इंसान रहेगा धरती पर तूफान रहेगा’, ‘धन और धरती बंट के रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी’ और ‘खुला दाखिला सस्ती शिक्षा लोकतंत्र की यही परीक्षा’ जैसे नारे उछाले थे। उनके कुछ नारों को तो बाद में  सभी पार्टियों ने अपना लिया है। वो हैं ‘रोजी रोटी दे न सकी वो सरकार निक1मी है, जो सरकार निक1मी है वो सरकार बदलनी है’ या  ‘हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।’

 कुछ नारे ऐसे होते थे जिसमें दूसरी पार्टी पर हमला किया जाता था। साठ के दशक में जनसंघ और कांग्रेस में नारों के जरिये  नोंक9झोंक होती थी। जनसंघ अपने चुनाव चिह्न दीपक और कांग्रेस ने अपने दो बैलों की जोड़ी के ज़रिए एक दूसरे पर निशाना साधते थे। जनसंघ का नारा था-जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल। इसके मुकाबले कांग्रेस नारा लगाती थी-इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं।

डॉ. लोहिया ने कई नारे दिए हैं। पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी देने का वह नारा आज भी याद किया जाता है-‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ या उनका यह नारा जो जेपी आंदोलन में बहुत गूंजा-‘जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं।’

 इंदिरा गांधी ने १९७१ का चुनाव ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर लड़ा और सफलता

पाई। इंदिरा गांधी के आते-आते नारे बहुत व्यक्ति केंद्रित हो गए थे तब विपक्ष ने नारा दिया, ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ तो  इंदिरा ने नारा दिया-

”वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ।”

१९७४ के जेपी आंदोलन में कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की ये पंक्तियां नारा बनीं – ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’.  इमरजेंसी  में इंदिरा गांधी के खिलाफ यह नारा लगता था -‘आकाश से कहें नेहरू पुकार, मत कर बेटी अत्याचार।’

जनता पार्टी के ढाई साल के कुशासन से त्रस्त जनता की भावनाओं को भुनाकर कांग्रेस ने अपने पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए नारा दिया-‘आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे।’ इसी के साथ ‘इंदिरा लाओ, देश बचाओ’ नारा भी खूब चला।  कांग्रेस यह नारा  तो बहुत चर्चित रहा-‘जात पर न पात पर इंदिराजी की बात पर मुहर लगाना हाथ पर।’ १९८४ में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा’, जैसे नारे ने पूरे देश में सहानुभूति लहर पैदा की, और कांग्रेस को बड़ी भारी जीत मिली। १९८४-८५ में राजीव गांधी पहला चुनाव लड़े तो सभाओं में जुटी भीड़ नारा लगाती थी -‘उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं।’ राजीव गांधी की हत्या के बाद राजीव तेरा, ये बलिदान याद करेगा हिंदुस्तान- नारा  सामने आया। और इसका असर भी वोटिंग पर देखा गया।

बोफोर्स कांड में घिरे राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह समर्थकों ने  भड़काऊ नारे उछाले थे – ”गली-गली में शोर है – राजीव गांधी चोर है।” वे वीपी सिंह का महिमा गान करते हुए कहते थे-‘राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है’ तब कांग्रेसियों का जवाबी नारा होता था-‘फकीर नहीं राजा है सीआईए का बाजा है।’ वहीं चंद्रशेखर की पार्टी ने अपने चार महीने के कार्यकाल के आधार पर – ”चालीस साल बनाम चार महीने” के नारे के साथ चुनावी महासमर में छलांग लगाया था।

भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ ने भी राजनीति में कुछ अच्छे नारों का योगदान दिया है। इनमें से एक नारा था -‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर घर में दीपक, जनसंघ की यही निशानी।’ लेकिन भाजपा का सबसे 3लाप नारा रहा-‘इंडिया शाइंनिंग।’ इस नारे ने एनडीए की चमक उतार दी थी। १९९६ में भाजपा ने  सत्ता में आने के लिए नारे के जरिये दलील दी ‘सबको परखा बार-बार हमको परखो एक बार’ जैसे नारे शामिल हैं। इससे पहले, जनसंघ की ओर से आपातकाल के बाद ‘अटल बोला इंदिरा का शासन डोला’ जैसे नारे लगाए गए।

जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद १९७० के दशक में हुए मध्यावधि चुनाव में इंदिरा ने सरकार की स्थिरता को मुद्दा बनाते हुए एक और नारा दिया जो लोगों को भाया और वह सत्ता में लौटीं। यह नारा था, ‘चुनिए उन्हें जो सरकार चला सके’।

बसपा राजनीति में जातिवादी और  भड़काऊ नारे लेकर आई। ‘तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’, जातीय वैमनस्य फैलाने वाला नारा था तो जिसकी जितनी सं2या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी पार्टी के कार्यक्रम को लोगों तक पहुंचाने का। १९९२ में जब सपा और बसपा का गठबंधन हुआ तो यही नारा हवा में गूंजता था ‘मिले मुलायम कांशीराम हवा हो गया श्रीराम।’ ब्राह्मणों के वोट पाने के लिए बसपा ने अपने चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ की ऐसी व्या2या की थी – ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश हैÓ। बसपा के  सवर्ण प्रत्याशियों ने  अपनी बिरादरी के  लोगों को वोट देने की अपील करते हुए इस नारे का सहारा लिया ‘पत्थर रख लो छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर’ जो काफी चर्चित रहा। एक और जातिवादी नारा था-भूरा बाल साफ करो।

पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा  चुनावों में ममता बनर्जी ने ‘प्रतिशोध नहीं परिवर्तन’ और ‘मां माटी मानुस’ नारे के साथ तीन दशक पुरानी वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका। कुछ क्षेत्रीय नेताओं को लेकर भी लोकप्रिय नारे लिखे गए है जैसे ‘जबतक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा बिहार में लालू’,या ‘जिसने कभी न झुकना सीखा उसका नाम मुलायम है।’

इस तरह नारे चुनावी युद्ध के कारगर हथियार है जिन्हें विचारधारा और नीतियों की सान पर तेज किया जाता है। शेषन के समय से चुनावों में  पहले जैसी उन्मुक्तता नहीं रही इसलिए नारों का महत्व थोड़ा कम हुआ है। फिर आजकल तो आधा चुनाव  प्रचार तो टीवी पर हो जाता है। इसके बावजूद विज्ञापनों के लिए तो नारे चाहिए ही तभी तो वे असरदार होते हैं। आप यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते -नारे हैं नारों का 1या? नारों का चुनाव आयोग पर भी असर पड़ा और वह भी नारे देने लगा -‘पहले अपना वोट डलेगा, चूल्हा उसके बाद जलेगाÓ और ‘सारे काम छोड़ दो सबसे पहले वोट दो!’

 सतीश पेडणेकर

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