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अलिखेश के नेतृत्व की गठबंधन बनने से क्षतिपूर्ति की उक्वमीद 

अलिखेश के नेतृत्व की गठबंधन बनने से क्षतिपूर्ति की उक्वमीद 

यूपी में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का विवाद फिलहाल खत्म हो गया है। इसके साथ ही सूबे में विधानसभा के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी। प्रथम चक्र के लिए नामांकन हो गये। विभिन्न दलों के गठबंधन भी हो गये हैं। सपा के सहयोगियों मेें प्रमुखत: कांग्रेस और लोकदल में बात बन चुकी है। हालांकि कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल के अलावा जदयू और कुछ स्थानीय दलों के साथ भी सपा बातचीत हो रही है लेकिन ये सिर्फ कुछ सीटों पर तालमेल की बात है। कुल मिलाकर लड़ाई का स्वरूप स्पष्ट हो गया है। सत्तारूढ़ पार्टी सपा-कांग्रेस गठबंधन, भाजपा और बसपा में त्रिकोणात्मक संघर्ष के आसार हैं। 

सप्ताह भर पहले तक सपा के दिग्गजों से लेकर विधायकों और कार्यकर्ताओं तक में मायूसी थी। लेकिन पिता-पुत्र में समझौते के बाद जहाँ सपाजनों की मायूसी खत्म हुई पार्टी फिर पुराने तेवर की वापसी में जुट गयी है। यद्यपि अखिलेश द्वारा मंत्रिमंडल से बर्खास्त मंत्रियों और कुछ विधायकों (शिवपाल यादव के नजदीकी) पर अनिश्चितता अभी कायम है। लेकिन फि लहाल इससे कुछ खास फर्क नहीं पडऩा है। असल बात, और चुनावी जंग अखिलेश यादव को केन्द्र में रखकर ही हो रही है। गठबंधन वाले दल भी अब मुलायम सिंह की बजाय मुख्यमंत्री के निणर्य के प्रति शत-प्रतिशत आशान्वित या निराश होने के लिए बाध्य हैं। इस वजह से भाजपा और बसपा का आक्रमण और कांग्रेस तथा गठबंधन के साथियों का रवैया भी मौजूदा मुख्यमन्त्री के प्रति दुश्मनी और दोस्ती से भरा होना स्वभाविक है।


 गठबंधन आज की हकीकत


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सपा-कांग्रेेस गठबंधन को लेकर उत्तर प्रदेश के नेताओं को हालांकि विश्वास में नहीं लिया गया लेकिन

फिर भी कांग्रेसियों का बहुमत सत्ता में भागीदारी और 2019 के संसदीय चुनाव में भी गठबंधन जारी रखेजाने की उम्मीद के भरोसे गठबंधन से काफी खुश है। कांग्रेस के प्रदेश सचिव सतीश चौबे का तो मानना है कि सपा के साथ मिलकर व्यापक मोर्चा बनाना आज का ‘युग धर्म’ है। पेश है हमारे ‘प्रमुख संवादाता’ सियाराम यादव से सतीश चौबे की बातचीत।

कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया और वह भी उसकी शर्तों पर आप लोगों को भनक तक नहीं लगी ?

व्यापक मोर्चा का गठन आज का ‘युगधर्म’ है।भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को हराने के लिए यह बेहद जरूरी था। भाजपा जैसे देश का इतिहास, संस्कृति, साहित्य, विकृत करने में जुटी है, सभी प्रगतिशील दलों और लोगों के लिए उसे हराने के बारे मेें, सोचने का समय है यह।

इसमें कितना हित सपा का है और कितना कांग्रेस का ?

सबका हित है। सपा का भी, कांग्रेस का भी, प्रदेश का और देश का भी।मैंने कहा न कि आज सा6प्रदायिक ताकतों के हौंसले तोडऩे की जरूरत ज्यादा अहम् है।निजी हितों से ऊपर उठकर।

गठबंधन की पहल काफी देर से हुई। स्थानीय नेताओं की राय नहीं ली गयी। आपको नहीं लगता की प्रदेश के

कार्यकर्ताओं में नाराजगी हैइसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है?

आपकी आशंका निर्मूल नहीं है। प्रदेश के नेताओं से सलाह लेनी भी चाहिए थी। हमारे यहां न तो राजेश पति त्रिपाठी और न ही राजेश मिश्रा से पूछा गया। मुझे भी नहीं मालूम था कि ऐसा निर्णय लिया जा रहा है। फिर भी निर्णय अच्छा हुआ।

असर ‘नेगेटिव‘ भी तो हो सकता हैबागी उम्मीदवार  सकते हैंउनसे कैसे निबटेंगे?

बड़े हित के लिए कुछ ‘निजी हितों की तिलांजलि देेनी पड़ती है। जनता ऐसा चाहती है। पार्टी के नेताओं की जिनकी लडऩे की तैयारी थी, उन्हें जरूर झटका लगा है।

बनारस या पूर्वांचल में लाभ कितना मिलेगा?

बनारस में हमारी सीट एक थी- पिंडरा। वह तो जीतेंगे ही। बाकी दो कैंट और दक्षिणी में हम नंबर दो थे, गठबंधन में हम इसे भी जीतेंगे।

गठबंधन का भविष्य क्या बिहार जैसा लम्बा होने की उम्मीद है?

होना चाहिए। तभी बात बनेगी। कम से कम २०१९ का संसद का चुुनाव तो गठबंधन में होना ही

चाहिए।



 मुख्यमंत्री नई राजनीति के प्रतीक बन गये हैं


 Layout 1उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की छवि एक युवा, परंपरागत  राजनीतिक से अलग हट कर सोचने और काम पर ध्यान देने वाले मुख्यमंत्री की बन गयी। इसीलिए विरासत की पारिवारिक जंग में भी वह पिता मुलायम सिंह यादव पर भारी पड़े। सपा के 90 प्रतिशत विधायक सांसद, एम.एल.सी. और कार्यकर्ता तो उनके साथ रहे ही, आम लोग, यहां तक कि दूसरे दलों के सिम्पेथेइजर (सहानुभूति रखने वाले) और बुद्धिजीवी भी चाह रहे कि अलिखेश को मुख्यमंत्री के रूप में एक और मौका मिलना चाहिए। लखनऊ में शकुन्तला विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवेन्द्र यद्यपि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता नहीं, जाने-माने विचारक हैं, फिर भी दो-टूक राय रखते हैं। कहते हैं- एक नये ढर्रे की और विकास कार्यक्रमों की बात करने वाले मुख्यमंत्री की छवि के कारण आम लोग उन्हें एक और मौका देने की बात करते हैं।

देवेन्द्र जी, यूपी विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। केन्द्र में भाजपा सत्तारूढ़ है। प्रधानमंत्री की छवि और विकास कार्यक्रमों के भरासे वह लखनऊ में भी सत्ता का सपना संजोये है। दूसरी और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती एक बार और सत्ता में वापसी को बेकरार दिख रही हैं। इधर सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नये मुखिया मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ऐन चुनाव के वक्त विरासत की जंग जैसेतैसे फतह कर चुनाव मैदान में हैं। एक सामाजिकराजनीतिक विचारक होने के नाते आप क्या सोच रहे हैं, कैसा लग रहा है आपको

अन्य चुनावों से इतर इस चुनाव में मुखिया की छवि और मुद्दे काफी स्पष्ट हैं। मुख्ययमंत्री अखिलेश यादव की छवि पिता मुलायम सिंह की छवि से अलग जातीय राजनीति के पैटर्न से अलग विकास की राजनीति करने वाले शख्स  की बन चुकी है। यह जनता पसंद कर रही है। इसलिए वह अन्य नेताओं की परंपरागत राजनीतिक-जाति, स6प्रदाय और आरोप- प्रत्यारोप से ऊपर या अलग सोचने वाले को पसन्द कर रही है। संयोग से युवा अखिलेश में उसे यह सब नजर आ रहा है।

पिछले चार वर्षो तक उन्हेंलल्लू मुख्यंमत्रीकहा जाता रहा है। कुछ लोग तो यू.पी. को चार मुख्यमंत्रियों का प्रदेश कहते रहे हैं ?

हां, लेकिन उन्होंने इस छवि को तोड़ा और विकास की राजनीति करने वाले सीएम बन गये। आज लोग उन्हें एकदम अलग, यहां तक कि पिता मुलायम सिंह के हस्तक्षेप को भी नकार देने वाले मुख्यमंत्री के रूप में देखने लगे हैं।

यह सोच तो पार्टी के भीतर बनी है। इससे आम वोटर पर क्या फर्क पड़ेगा ?

पड़ सकता है। आम लोग भी पर6परागत राजनीति से ऊबे हैं। वही सम्परदाय  की राजनीति, मन्दिर-मास्जिद की राजनीति, अगड़े-पिछड़े की बातें। इससे हटकर कोई नौजवान कुछ और सोच तो रहा है। विकास की बात तो कर रहा है।

तो आपको क्या लग रहा है? मोदी का या भाजपा का विकास का नारा हल्का पड़ेगा ?

क्या भारी पड़ेगा और 1या हल्का कहना मुश्किल है। हां प्रधानमंत्री की छवि केन्द्र में काम करेगी, सूबे में तो आपको नयी (स्थानीय) छवि वाला चेहरा चाहिए।

तो आपके मुताबिक यूपी में भाजपा को मुख्यमंत्री के रूप में किसी को पेश करना नकारात्मक हो सकता है?

बिल्कुल। देखिये न, उनके पास लोग हैं ही नहीं। अन्य दलों के ‘डस्टबीन’ से उन्हें प्रत्याशी खोजने पड़ रहे हैं। यही अर्थ लोग लगा रहे हैं।

ऐसे में कांग्रेस से सपा का गठबंनध कंाग्रेस के लिए फायदेमंद होगा?

कांग्रेस का भी फिलहाल उद्धार हो जायेगा बिहार की तरह। अब मुस्लिम मतदाता गठबंधन के पक्ष में आ जायेंगे तो सपा के साथ कांग्रेस की भी इज्जत बच जायेगी।


Layout 1यहां यह भी स्पष्ट रूप से देखने, महससू करने और अन्दाजा लगाने की यह है कि लड़ाई (चुनावी समर) के  मुख्य  कोण सपा में आपसी जंग के बावजूद अन्य दो कोणों में कुछ खास बढ़त बना लेने की बेताबी रही, हो या उस मौके का लाभ भाजपा या बसपा ने उठा लिया हो, ऐसा लगा नहीं। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि सत्तारूढ़ पार्टी ने कुछ खास, गंवा दिया। कह सकते हैं कि जैसे आम लोगों के साथ विरोधियों को भी सपा के अंतर्कलह के खात्मे का इन्तजार था। इसलिए बसपा के अलावा किसी भी दल ने अपने उ6मीदावारों की पूरी तो क्या  आधी सूची भी घोषित नहीं की। दूसरी ओर सपा के सभी गुट (मुलायम सिंह-शिवपाल सिंह के करीबी भी) पूरी तरह अखिलेश के नेतृत्व में एक साथ हो गये हैं। वाराणसी की महिला सपा की अध्यक्ष श्रीमती गायत्री यादव कहती भी हैं- ‘समाजवादी पार्टी एक है। हमारे सेनापाति   अखिलेश यादव हैं। उनके नेतृत्व में हम विधान सभा के चुनाव की जंग लड़ रहे हैं। यह जंग हम जीत कर फिर सरकार बनायेंगें। इसमें कोई ‘इफ-बट’ नहीं है। मतलब कि अगर पहले आपसी अन्तर-कलह थी भी तो उसका कोई असर दिख नहीं रहा है। अब भितरघात का कोई अन्देशा हो, ऐसा नहीं है। गायत्री जी कहती भी हैं- ‘समाजवादियों में’ विचारभिन्नता होती है। क्योंकि कि यहां आप पर कोई विचार थोपे नहीं जाते। आप स्वयं से, सहमत होकर कोई बात स्वीकार या इनकार करें। हां, थोपे विचार यहां नहीं चलते। स्वीकार तो स्वीकार।’ यह बात सपा के सामान्य कार्यकर्ता में भी देखने को मिल रही है। काशी विद्यापीठ वाराणसी के प्रोफेसर सुरेन्द्र प्रताप कहते हैं- ‘इतनी घमासान के बाद समाजवादियों में इतना सामंजस्य दिलचस्पी पैदा करता है और इसकी तारीफ करनी होगी।’

हालांकि भाजपा और बसपा के लोग इस तथ्य को नकारते हैं और उनके मुताबिक यह सिर्फ खयाली पुलाव है। सपा में इतना अन्तर्कलह हो चुका है कि अब दिलों में जुड़ाव की बात करना सच्चाई को नकारना है। भाजपा नेता और वाराणसी के मेयर रामगोपाल मोहले कहते हैं- कांच (दर्पण) में किरिज पड़ जाने पर चेहरा नहीं दिखता।’ इसी तरह बसपा के बृजेश कुमार कहते हैं- मुलायम सिंह यादव मजबूरी में अलिखेश यादव को स्वीकार कर ले रहे हैं लेकिन शिवपाल सिंह उनकी अधीनता कैसे स्वीकार करेंगे? यह सहज स्वीकारा नहीं जा सकता। मनुष्य का मनोविज्ञान भी होता है कि नहीं?

खैर, जो भी हो अब तो चुनावी जंग सामने है। सपा के नेतृत्व में गठबन्धन और भाजपा, बसपा का त्रिकोण जंग-मैदान में है। लड़ाई का अंजाम कई सवालों का जवाब दे देगा।

लखनऊ से सियाराम यादव

DS Dentaltopodin.com

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