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यूपी में जाति या वर्ग की जय!

यूपी में जाति या वर्ग की जय!

भाजपा और प्रधानमंत्री की योजनाओं के मुताबिक नोटबंदी ने असर दिखाया तो यूपी में जाति और मजहब की कडिय़ा ढ़ीली पड़ सकती हैं। लेकिन माकूल असर पैदा नहीं हुआ तो कांग्रेस के गठजोड़ के सहारे अखिलेश या मायावती अपने मुस्लिम तथा जाति समीकरण के सहारे कोई गुल खिला सकती हैं।

ऐसा लगा, मानो समाजवादी पार्टी की कलह की पटकथा का अंत चुनाव आयोग के फैसले से हो गया। मुलायम सिंह यादव खेमे के शरणागत हो जाने से लगा कि चुनाव की बाजी पूरी तरह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ आ गई है। लेकिन ठहरिए अभी चौंकाने वाली खबरें और भी हैं। अब मामला कांग्रेस-रालोद से सपा के गठजोड़ पर तीखे मोलभाव पर अटका है। सीटों के बंटवारे का वारा-न्यारा इतना आसान भी नहीं है। कठिन मांग अजित सिंह के रालोद की ओर से पेश हो रही है। अगर यह कड़ी सुलझ भी जाती है तो अपना दल में अनुप्रिया पटेल की मां के खेमे जैसे कुछ छोटे दलों की आकांक्षाओं को पूरा करने में भी पसीने छूट सकते हैं।

अखिलेश के साथ ही कांग्रेस की भी दि1कत यह है कि अगर महागठबंधन नहीं बनता है तो उत्तर प्रदेश में वह फिजा नहीं बनेगी, जो उन्हें बसपा और भाजपा से बढ़त दिला जाएगी। इसलिए उन्हें हर हाल में यह करना ही होगा। लेकिन जैसे-जैसे देर होती जाएगी, वैसे-वैसे उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

असल में भाजपा और बसपा की चुनौती कम नहीं है। बसपा ने महीनों पहले से बड़े पैमाने पर पहल करके अपने लिए एक जमीन तैयार की है। भाजपा ने भी नोटबंदी के जरिए एक नए तरह की फिजा तैयार की है। और इसे किसी भी तरह से कमजोर नहीं माना जा सकता।

दरअसल लखनऊ में २ जनवरी को भाजपा की परिवर्तन रैली में उमड़ा जन सैलाब अगर कोई संकेत देता है तो भाजपा नोटबंदी के सहारे राज्य में अपना १४ साल का वनवास तोड़ सकती है। लेकिन नोटबंदी का माकूल असर नहीं हुआ तो ब्रांड अखिलेश खिल सकता है, बशर्तें वे गठजोड़ को परवान चढ़ा सकें और समय उनके हाथ से न छूट जाए। हालांकि मायावती के दलित-मुस्लिम और सर्वजन टिकट बंटवारे की फिजा भी कम जोरदार नहीं है। दिक्कत सिर्फ यह है कि व्यापक जन धारणाओं को आकार देकर चुनावी फिजा तैयार करने में महज टिकटों का संतुलित बंटवारा शायद नाकाफी है। उसके लिए कुछ करने की जरूरत हो सकती है, जो बसपा अभी करती नहीं दिख रही है।

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दरअसल जैसे-जैसे चुनाव की वेला नजदीक आ रही है, उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य पेचीदा होता जा रहा है। हालांकि अब तो यह स्पष्ट होने लगा है कि नोटबंदी के फैसले की एक अहम वजह भाजपा के जनाधार को व्यापक बनाने की योजना भी रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शायद इसका एहसास पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान ही गहराई से हुआ हो सकता। उस चुनाव प्रचार के दौरान ही विपक्ष की टिप्पणियों के बर1स अपनी सामान्य पृष्ठभूमि पर जोर देने की रणनीति अपनाकर मोदी ने देश के चुनावी इतिहास में भाजपा को ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच दिया था। इसी एहसास से उन्होंने १६ मई २०१४ को नतीजे आने के बाद संसद के केंद्रीय कक्ष में भाजपा संसदीय दल की बैठक में कहा था कि उनकी सरकार गरीबों के हित में होगी।

मोदी का गरीब कार्ड

मगर बाद में ‘सूट-बूट की सरकार’ के आरोपों से घिरे मोदी को दिल्ली और बिहार में हार झेलना पड़ा। वे विदेश से काला धन लाने और हर किसी के खाते में ‘१५ लाख रु. जमा करने’ के वादे को पमरा करने में नाकाम रहने के लिए विपक्ष के हमले की जद में भी रहे। अब उत्तर प्रदेश के सबसे अहम विधानसभा चुनावों के पहले उन्होंने काला धन और भ्रष्टाचार पर सबसे तगड़ा वार करके इन आलोचनाओं से उबरने और विपक्ष को घेरने की रणनीति बनाई। हाल में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने साफ कहा भी कि पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी उनके इन चुनावों में अमोघ अस्त्र होंगे।

मोदी भी लगातार गरीबों के हित की बातें कर रहे हैं और काला धन वालों को न बख्शने का हवाला दे रहे हैं। एक रैली में उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें चुनाव में जीत-हार से ज्यादा गरीबों के हित की चिंता है। कई बार गरीबों के हितैषी होने के बयान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ नारे की याद दिला देते हैं। एक रैली में तो उन्होंने कहा, ”मैं कहता हूं भ्रष्टाचार मिटाओ, वे कहते हैं मोदी हटाओ।” इसे सुनकर बरबस इंदिरा गांधी के उस नारे की याद आ जाती है कि ”मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ।” जाहिर है, मोदी को एहसास है कि सिर्फ संघ परिवार के हिंदू ध्रुवीकरण की कोशिशों और भाजपा के परंपरागत वोट बैंक के सहारे आगे नहीं जाया जा सकता।

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उत्तर प्रदेश के संदर्भ में कहें तो लोकसभा चुनावों ने बता दिया था कि सिर्फ ब्राह्मण-बनिया या ऊंची जातियों के सहारे भाजपा की नैया वैतरणी पार नहीं कर सकती। दरअसल सीएसडीस के आंकड़ों के अनुसार २०१४ के लोकसभा चुनाव में पिछड़ी जातियों में २७ फीसदी यदवों, ५३ फीसदी कुर्मी-कोयरी और ६० फीसदी अन्य जातियों ने कमल पर मुहर लगाया था और इन्हीं के वोटों ने मोदी लहर को सूनामी जैसा बना दिया था। ढाई साल तक केंद्र में मोदी सरकार के कामकाज और संघ परिवार से जुड़े संगठनों खासकर गौरक्षकों के दलित को निशाना बनाने से इस पूरे वर्ग में एक तरह की निराशा का भाव था। उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के केशव प्रसाद मौर्य को अध्यक्ष बनाने और बसपा से टूटे  नेताओं को अपने पाले में लाने के बावजूद चुनावी फिजा बहुत बनती नहीं दिख रही थी।  अब भाजपा के लिए सबको संतुष्ट रख पाना भी आसान नहीं रह गया है।

ऐसे में नोटबंदी से अगर गरीब-अमीर की फिजा तैयार होती है तो भाजपा को गरीबों का हमदर्द मान लिया जाता है तो ये अति पिछड़ों (करीब ६ फीसदी) और गैर-जाटव दलितों (करीब ५ प्रतिशत) के वोट उसकी ओर लौट सकते हैं। इसमें अगर ऊंची जातियों के करीब १२ प्रतिशत वोट जुड़ जाते हैं तो खासकर उत्तर प्रदेश में पूरब और मध्य में करीश्मा कर सकते हैं। पूरब और मध्य में ही सबसे ज्यादा सीटें हैं और वहां गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों की आबादी इतनी अधिक है कि वे किसी के पक्ष में पलड़ा झुका सकते हैं।

असल में इस बार भाजपा को पश्चिम उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड तथा रूहेलखंड इलाकों से उतनी उ6मीद नहीं दिख रही है। पश्चिम में मोटे तौर पर गूजर तो भाजपा के साथ हैं मगर यही बात जाटों के बारे में नहीं कही जा सकती। इसलिए अजित सिंह के रालोद की भी कुछ संभावनाएं बढ़ती दिख रही हैं। लेकिन कुल मिलाकर यही लगता है कि अगर मोदी गरीबों के मसीहा के रूप में स्थापित हो सके तो देश के चुनावी इतिहास में फिर एक बड़ा फेरबदल हो सकता है और इस बार उत्तर प्रदेश में परिवर्तन की लहर पैदा हो सकती है, सपा और बसपा को बारी-बारी राज सौंपने  से ऊबे लोगों को एक नया राजनैतिक आधार दे सकती है।

लेकिन नोटबंदी का अगर प्रतिकूल असर हुआ तो सपा में अखिलेश गुट और बसपा की संभावनाएं एक-दूसरे से होड़ ले सकती हैं। असल में नोटबंदी की सबसे बुरी मार ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पडऩे की आशंका है। कई इलाकों में अभी खरीफ की फसलों की भी खरीद नहीं हो पाई है। किसान धान औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है। इससे भी बुरा हाल आलू और फल-स4िजयों के किसानों का है। शहरों में खासकर निर्माण गतिविधियों के ठप्प पडऩे से प्रवासी मजदूर गांव में लौटने को मजबूर हुए हंै। इससे गांवों में तकलीफें बढऩे की आशंका है। भाजपा के नेताओं को यही डर सता रहा है।

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बसपा का गणित 

भाजपा अगर परिवर्तन की लहर अपने पक्ष में पैदा नहीं कर सकी तो मोदी से मोहभंग और अखिलेश सरकार की एंटी-इंकंबेंसी तथा सपा में कलह का लाभ मायावती को मिल सकता है। मायावती लंबे समय से इसी रणनीति पर चलकर भाजपा और सपा विरोधी वोटों को एकजुट करने में जुटी हैं। हाल में उन्होंने कुल ४०३ विधानसभा सीटों में से ४०१ टिकटों का ऐलान कर दिया। इसमें ९७ टिकट मुसलमानों को, ८२ दलितों को, १०६ पिछड़ी जातियों (आधे से ज्यादा अति पिछड़ी जातियों को) और १०३ सवर्णों (६६ ब्राह्मण) को टिकट देकर मायावती अपने दलित-मुस्लिम और सर्वजन समीकरण को साधने की उम्मीद कर रही हैं। लेकिन चुनावी राजनीति अब टिकट देने भर से आगे जा चुकी है। अब जनमत तैयार करके फिजा बनाने का दौर है।

इसके पहले २००७ में मायावती को जब बहुमत मिला था तो उसके लिए मायावती ने महौल पैदा करने के लिए काफी मेहनत की थी। अभी दलित नायक की उनकी छवि बरकरार थी। फिर राज्य भर में उन्होंने और उनके सिपहसालार सतीशचंद्र मिश्रा ने ब्राह्मणों को एकजुट करने के लिए स6मेलन करवाए थे। नारा दिया था, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।’ इस बार उनके नारे बस बहनजी पर केंद्रित हैं। उनका लोकप्रिय वीडियो ‘बहनजी को आने दो’ है। सतीश मिश्रा वगैरह उतने सक्रिय नहीं लगते, न उस पैमाने पर सर्वजन सम्मेलनों का ही जोर है।

मुसलमानों में जरूर उनके दूसरे सिपहसालार नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफजाल सिद्दीकी सक्रिया हैं। वे जगह-जगह भाईचारा सम्मलेन कर रहे हैं। इससे उन्हें अच्छा रिस्पांस भी मिला है। लेकिन अगर अखिलेश कांग्रेस और रालोद से गठजोड़ कर लेते हैं तो मुसलमानों के वोट शायद उतने बड़े पैमाने पर बसपा की ओर न जाएं। हालांकि बसपा ने यह 2याल रखा है कि पिछड़े या पासमंादा मुसलमानों पर डोरे डाले जाएं, जिनकी आबादी मुस्लिम समाज में करीब ८० फीसदी है। अधिकांश टिकट भी इसी पसमांदा बिरादरी को दिए गए हैं। मुसलमानों में ऊंचे शेख, पठान, बड़े अंसार वगैरह का अमूमन रुझान सपा की ओर माना जाता है मगर पासमांदा मुसलमानों का वोट कांग्रेस या बसपा की ओर जाता रहा है। हालांकि भाजपा विरोध के नाम पर ये वोट कई बार एकमुश्त भी पड़ते रहे हैं। बसपा यही उम्मीद कर रही है कि उसे भाजपा विरोध के पाए पर खड़े होने का लाभ मिल जाएगा।

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अखिलेश की योजनाएं

अखिलेश ने लगातार यही कोशिश की है कि भाजपा समर्थक होने का मुल1मा चाचा शिवपाल और अमर सिंह के मत्थे चला जाए। इसमें वे लगभग कामयाब भी हो गए हैं। अब देखना है कि वे पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को किस कदर साथ लेकर चल पाते हैं। हालांकि अखिलेश ने अपने विकास एजेंडे से बेशक अपनी छवि सर्वजातीय बनाने की कोशिश की है। उनका आकर्षण यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़ा है। खासकर युवाओं में वे एक नए नायक बनकर उभरने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कोशिश के तहत वे गठबंधन भी तैयार कर रहे हैं।

अगर अखिलेश की कोशिशें परवान चढ़ जाती हैं तो उत्तर प्रदेश में कांटेदार तितरफा लड़ाई दिखेगी। बेशक पूरे देश की नजर अगले कुछ समय तक उत्तर प्रदेश पर गड़ी होगी क्योंकि  इसी से कई बड़े नेताओं के भाग्य का फैसला होना है और २०१९ के लोकसभा चुनावों की जमीन भी तैयार होनी है।

हरिमोहन मिश्र 

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