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राहुल की मोदी को चुनौती

राहुल की मोदी को चुनौती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी पड़ोस में सूरजकुंड या मनाली की सुहानी वादियों में छुट्टी बिताने की भी नहीं सोचते। लेकिन प्रधानमंत्री पद के आकांक्षी राहुल गांधी समय-समय पर खासकर पुराने साल को विदा करने और नववर्ष के स्वागत में अनोखी, अजनबी जगहों की सैर करने के लिए उड़ जाना पसंद करते हैं। जब भी वे कुछ लंबे सैर-सपाटे से लौटते हैं, एक नए अवतार में पेश होते हैं।

इस बार जब वे क्रिसमस और नववर्ष के जश्न के लिए लंदन गए तो लौटकर भारत में राज करने के अपने परिवार के दैवीय अधिकार पर दावा करने की तैयारी से पूरी तरह लैश होकर आने वाले थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सबसे तीखे आरोप लगाने वाले राहुल मानो २०१४ में हार का बदला लेने की तैयारी करके आए थे।

लेकिन लौटने के बाद शायद ऊर्जा से लबालब भरे राहुल का यह कैसा अवतार है? उन्होंने मोदी पर कोई वार नहीं किया, न ही उन्हें ‘बेदर्द’ मोदी की नोटबंदी से गुस्साए किसानों की याद आई, न ही वे मोदी के कथित निजी भ्रष्टाचार की सुध ले पाए और न वे पांच राज्यों के चुनावों को लेकर खास चिंतित नजर आए।

शायद वे लंदन में बिताए खुशनुमा दिनों की याद में खोए थे और चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के हफ्ते भर के दौरे के न्यौते को लेकर उत्साहित थे। विपक्ष के किसी और नेता के बदले सिर्फ उन्हीं को न्यौते का संकेत है कि चीन के शासकों को लग रहा है कि राहुल ही मोदी को सबसे तगड़ी चुनौती देने वाले हैं। कम से कम उनके चमचे तो अपने बॉस के दिमाग में यही बात बैठा रहे होंगे। हालांकि बार-बार खासकर अहम चुनाव के मौकों पर विदेश उड़ जाने को लेकर शायद प्रतिकूल जन धारणाओं के कारण राहुल को चीन का दौरा रद्द करने पर मजबूर होना पड़ा है।

बेशक, उनके जोश और अपनी अहमियत के जज्बे ने लंदन की छुट्टियों से लौटने के बाद उन्हें नए अवतार में पेश किया। इसके पहले वे बेहद जल्दबाजी वाला ४६ साल के युवा कहे जाते रहे हैं। वे सहारा की डायरियां हिलाकर मोदी पर आरोप लगा चुके हैं और अब वे उन पर अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने और लोगों को भारी मुसीबत में डालने का आरोप लगा रहे हैं।

लंदन से लौटकर उन्होंने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता की, जिसका मकसद मोदी को नीचा दिखाने और नोटबंदी की गलतियों को मंजूर करने पर मजबूर करने की नीति तय करना था।

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मोदी पर राहुल के हमलों की दिशा एक ही है। पहले उन्होंने सहारा डायरी को लेकर हमला बोला। राहुल की हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि वे नेशनल हेराल्ड एसोसिएटेड प्रेस की संपत्ति के गबन, जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप में जमानत पाए हुए हैं और फिर भी देश के प्रधानमंत्री मोदी पर सहारा से ४० करोड़ रु. और आदित्य बिड़ला समूह से १२ करोड़ रु. लेने का आरोप लगा रहे हैं।

वे अभी तक उस कहावत की जद में नहीं आए हैं कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते। अगर यूपीए-२ सरकार के दौरान घोटालों पर गौर करें तो राहुल के शीशे के घर में पहले दरार आ चुकी है। लेकिन कहावत यह भी है कि बच्चे और कम बुद्धि लोग अपनी करतूतों के नतीजों से अनजान रहते हैं।

सो, आश्चर्य नहीं कि राहुल पूरे दमखम से मोदी पर आरोप लगा रहे हैं, उन्हें लुटेरा, धोखेबाज बता रहे हैं जो नोटबंदी के जरिए किसानों और गरीबों की कीमत पर करीब ५० धनी घरानों को लाभ पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा, ”मोदी जी ने देश के ५० घरानों और १ प्रतिशत सबसे अमीरों के लिए नोटबंदी यज्ञ किया है।” उन्होंने श्वेत पत्र निकालने की मांग की है कि नोटबंदी कितना काला धन इकठ्ठा हुआ है।

अपने नए अवतार में कांग्रेस के वस्तुत: मुखिया राहुल तीखा हमला कर रहे हैं और नोटबंदी के जरिए करोड़ों लोगों का जीवन तबाह करने के लिए मोदी को दंडित करने के खतिर विपक्ष को एकजुट करने में जोरशोर से सक्रिय हैं। लोग बंद नोटों को बदलने या एटीएम से खर्च के लिए पैसे निकालने के लिए लंबी कतारों में घंटों खड़े होते और ज्यादातर को खली हाथ लौटना पड़ता। इससे लगा कि विपक्ष को आखिरकार लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काने को मौका मिल गया। राष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए केंद्रीय भूमिका की तलाश में राहुल को यह मौका हाथ लगा। लेकिन उन्होंने बिना किसी योजना के मोदी पर हमले शुरू कर दिए। वे इस उ6मीद में थे कि उन्हें मोदी विरोधी अभियान का नेता मान लिया जाएगा। वे इसमें कामयाब होते भी लगे।

लोकसभा में नोटबंदी पर बहस का मौका आया तो सभी विपक्षी नेताओं ने कहा कि राहुल उनकी ओर से बोलेंगे। इसी मौके पर राहुल भैया ने अपनी कम बुद्धि का इजहार कर दिया।

उन्हें लगा कि विपक्ष की ओर से बोलने के लिए चुने जाने का मतलब यह है कि उन्हें ही मोदी से लोहा लेने को चुना गया है। आखिर इसी मोदी ने २०१४ में उनकी उम्मीदें धराशायी कर दी थीं। इस तरह उन्हें लगा कि वे पहले मोदी को २०१७ के उत्तर प्रदेश चुनावों में धूल चटाएंगे और फिर २०१९ में उन्हें गद्दी से बाहर करके सिंहासन पर विराजमान हो जाएंगे।

उन्होंने खुद पर संयुक्त विपक्ष की ओर से मोदी से टक्कर  लेने की जि6मेदारी ओढ़ ली। प्रधानमंत्री से लोहा लेने के लिए खुद को उपयु1त साबित करने के लिए वे उनसे यह शिकायत लेकर मिलने पहुंचे कि किसान तकलीफ में हैं और सरकार उनका दुख दूर करने के लिए कुछ नहीं कर रही है।

उनकी इस कोशिश से विपक्षी नेता भड़क उठे और देश को बर्बाद कर रहे एक ‘फासीवादी’ से मोर्चा लेने का उनके सपनों का महल भरभरा कर ढह गया। राहुल गांधी का मोदी के खिलाफ आक्रामक रवैया और सहारा तथा आदित्य बिड़ला से पैसा लेने का उनका आरोप यह सोच कर लगाया गया था कि पूरा विपक्ष उनके साथ है। उन्होंने पार्टी नेताओं के साथ कई दौर की बात भी की थी। इससे वे यह सोच बैठे कि विपक्ष ने अपनी ओर से नोटबंदी पर उन्हें बोलने की जिम्मेदारी दे दी है।

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यह सोच ही बताता है कि उनका नजरिया कितना बचकाना है। उन्होंने भला यह कैसे सोच लिया कि शरद पवार, नीतीश कुमार या ममता बनर्जी जैसे नेता उनका नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे? आखिर राहुल की मोदी से भेंट पर नाराज होकर राकांपा, जदयू, सपा, अन्नाद्रमुक और कई दलों के विपक्षी नेता नोटबंदी की तकलीफों की शिकायत के लिए राष्ट्रपति के पास मार्च में शामिल नहीं हुए।

विपक्षी दलों का साझा मोर्चा बनाने की कोशिश बुरी तरह नाकाम हो गई। यह इससे भी जाहिर था कि विपक्ष की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिर्फ राहुल और ममता दीदी ही पहुंचीं। उसमें छह दूसरी कतार के नेताओं के अलावा कोई बड़ा नेता नहीं पहुंचा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दीदी ने साफ कर दिया कि कौन बॉस है।

वामपंथी पार्टियां तो नदारद ही थीं। माकपा की शिकायत थी कि न उसे खबर की गई, न उससे साझा अभियान की सलाह ली गई। जदयू वैसे भी नोटबंदी पर विपक्ष के साथ नहीं है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जब दूसरे चरण में पहुंच गई और देश नए साल में पहुंच गया है तब विपक्ष के साझा न्यूनतम कार्यक्रम की बात वैसे भी बेमानी हो गई है।

एक मायने में यही होना भी चाहिए। आखिर ऐसे विविधता भरे लोकतंत्र में विपक्ष से हमेशा एक आवाज में बोलने की उम्मीद भी क्यों होनी चाहिए?

मसलन, नीतीश कुमार और नवीन पठनायक ने सरकार की नोटबंदी का समर्थन किया है। दूसरे प्रमुख नेताओं की आलोचना में भी अलग-अलग विचारों और हितों तथा मजबूरियों की बात सामने आई है।

हालांकि यह भी सही है कि पिछले ह3तों और महीनों में बार-बार एक विरोधाभास उभर कर आया है। सरकार एक से दूसरे बड़े फैसले पर चलती रही है, मसलन सर्जिकल स्ट्राइक से नोटबंदी जैसा अहम कदम उठा रही थी तो विपक्ष सिर्फ उस पर प्रतिक्रया ही दे रहा था।

दूसरा संकेत यह भी है कि कांग्रेस में वह माद्दा भी नहीं बचा है कि वह साझा रणनीति तैयार कर सके। लोकसभा में अपनी घटती संख्या के अलावा मुख्य विपक्षी पार्टी में अपनी अनिश्चतताएं और विरोधाभास इतने हैं कि वह केंद्रीय भूमिका के लिए तैयार भी नहीं है। फिलहाल कोई भी और विपक्षी पार्टी पूरी तरह उसके साथ नहीं आई है। पहले जदयू थी और अब ममता बनर्जी हैं पर वे भी पूरी तरह से नहीं हैं।

इसका मतलब है कि जब सरकार ऐसे फैसले ले रही है जिन पर पूरी तरह बहस होनी चाहिए थी, विपक्ष का फोकस ही साफ नहीं है। नए साल में यह देखना है कि वह अपना फोकस वापस पाता है या नहीं। यह भी दोहराया जा सकता है कि शरद पवार या नीतीश कुमार जैसे वरिष्ठ नेता राहुल का नेतृत्व शायद ही स्वीकार करें। दरअसल राहुल भले सुर्खियां हासिल कर लें पर उनकी पार्टी की दशा खराब है। उनका मोदी के खिलाफ आक्रामक रवैया बेमानी है 1योंकि उनकी अपनी कोई साख नहीं बची है और उनकी पार्टी के लोग उनको बोझ समझते हैं।


प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री!


 राहुल की यादगार टिप्पणियों को जरा याद कीजिए। ”गरीबी एक मानसिकता है।” ”भारत मानव संसाधन के मामले में २१वीं सदी का सऊदी अरब बनने जा रहा है।” और ”राजनीति तो सब जगह है.. .. यह आपकी कमीज में.. .. आपकी पैंट में .. हर जगह है।” वे २०१५ में भाजपा को कह गए कि ”विपक्ष कहता है कि ६० साल में कोई काम नहीं हुआ।”

सोशल मीडिया पर एक और मजाक चल रहा है कि राहुल अपनी मां से कह रहे हैं कि उनके पास सबूत है कि मोदी ने इंडियन प्रीमियर लीग के जरिए काफी अवैध रकम कमाई है। सोनिया ने फौरन कहा कि ये आरोप ललित मोदी पर हैं, नरेंद्र मोदी पर नहीं।

उन्होंने नोटबंदी पर ऐसा हल्ला मचाया कि कांग्रेस के एजेंडे ही खत्म हो गए। उसके प्रवक्ताओं के पास मोदी के भाषणों पर टिप्पणी देने के अलावा कुछ बचा ही नहीं। मगर राहुल को अपने सैर-सपाटे से वाकई प्यार है। वे इसके पहले २०१५ में शायद दक्षिण पूर्व एशिया में छुट्टियां बिताने लापाता हो गए थे। तब बजट सत्र से वे अनुपस्थित रहे थे। उसी साल बिहार चुनावों के वक्त वे कुछ समय अमेरिका के एस्पेन में एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने चले गए।

उनके जब-तब विदा हो जाने से कड़ी मेहनत करने वाले नेताओं को चिढ़ होती है। इसमें उनकी पार्टी नेताओं के प्रति ही एक अवमानना दिखती है। इससे उनके विपक्षी सहयोगी भी नाराज हो जाते हैं।

कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियों के नेताओं को यह एहसास है कि राहुल भाजपा विरोधी जंग लडऩे के काबिल नहीं हैं। इसमें अगर किसी को संदेह था तो उन्होंने २०१४ में टाइम्स नाऊ के लिए अर्नब गोस्वामी को दिए इंटरव्यू से दूर कर दिया था। उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया।

उस इंटरव्यू में अपनी चुनावी सभाओं में उन्होंने सभी दोषों के लिए भ्रष्ट सरकारी तंत्र को कोषा। यह सब इसलिए सही

नहीं माना गया क्योंकि उनकी पार्टी ही ६० साल से सत्ता में थी और उसी ने यह तंत्र बनाया था। ४६ साल की उम्र में जब ज्यादातर भारतीय प्रौढ़ माने जाते हैं, वे युवा नेता ही कहलाते हैं। इसका सिर्फ एक ही तर्क है कि वे आज भी अविवाहित हैं। लेकिन यह देश की समस्या तो नहीं है। राजनीति में १५ साल के बाद भी शायद राहुल को नहीं मालूम कि लोग क्या चाहते हैं और उनसे कैसे जुडऩा चाहिए। फिलहाल उनका हल्ला-गुल्ला लोगों में चिढ़ ही पैदा करती है। इससे वे अपने लक्ष्य के करीब नहीं पहुंच पाएंगे।

वे अपने दम पर एक भी चुनाव नहीं जीत पाए हैं। उनके काल में कांग्रेस बिहार में राष्ट्रीय से क्षेत्रीय पार्टी बन गई। फिर भी उनके चमचा कहीते हैं कि वे राष्ट्रीय नेता हैं। हर मायने में राहुल न सिर्फ कांग्रेस के लिए बोझ हैं, बल्कि विपक्ष के लिए भी कलंक की तरह हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दो अंकों में ही पहुंचने की उम्मीद कर रही है।

उनके अलावा कोई और विपक्षी नेता, केजरीवाल भी नहीं चाहेंगे कि मोदी पर वज्रपात हो जाए। वे दीदी के साथ तो नहीं ही जाएंगे। लेकिन राहुल तो मोदी को मात देने के लिए शैतान से भी हाथ मिलाने से परहेज नहीं करेंगे। ऐसी नफरत और नाराजगी राहुल को कहां ले जाएगी? २०१७ में शायद इसका कोई संकेत मिले।


मोदी के खिलाफ जिन दस्तावेजों को प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया, उसे न्यायाधीशों ने पर्याप्त नहीं माना है। वे उसे कोई सबत मानने को तैयार नहीं हैं। फिर भी राहुल उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर मोदी पर हमले कर रहे हैं। अगर वे सोचते हैं कि महज आरोप लगाकर वे मोदी को घेर लेंगे तो मूर्खों के स्वर्ग में जी रहे हैं। मोदी की साख बहुत ऊंची है। राहुल पर तो अपनी पार्टी के लोगों का ही भरोसा नहीं है। वे जानते हैं कि जब सत्ता उनके और उनकी मां के हाथ में थी तो तमाम घोटाले हुए।

हाल में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की फाइलों से भी पता चलता है कि असली सत्ता तो १०, जनपथ के पास थी।

नरेंद्र मोदी राहुल के आरोपों पर सिर्फ इतना कहा कि उन्हें खुशी है कि राहुल बोलना सीख गए। वे आरोपों पर कुछ नहीं बोले। अगर मोदी ने राहुल के आरोपों का खंडन किया होता तो दलील-दर-दलील शुरू हो जाती। सुप्रीम कोर्ट ने ही फैसला सुना दिया कि दस्तावेज फर्जी हैं तो मोदी क्यों चिंता करें।

जब मुलायम सिंह ने बेटे अखिलेश को पार्टी से निकाला तो ट्विटर पर चलने लगा कि अब सोनिया गांधी को भी राहुल को निकाल देना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो ज्यादातर कांग्रेसी ही इसका स्वागत करेंगे। भाजपा ऐसा कतई नहीं चाहेगी क्योंकि राहुल जब  भी बोलते हैं तो उसका उलटा ही असर होता है और विपक्ष के हमले भोथरे हो जाते हैं। भाजपा के एक नेता ने मजाक किया, ”राहुल देश को कांग्रेस मुक्त कराने के बेहतरीन उपाय हैं।’

जरा गौर कीजिए कि कांग्रेस ने संसद के शीतकालीन सत्र को बर्बाद कर दिया। इससे सरकारी खजाने को करोड़ों रु. की चपत लगी। एक दिन के सत्र बेकार जाने का खर्च २ करोड़ रु. पड़ता है। इससे यह धारणा बनी कि कांग्रेस के पास कुछ ठोस कहने को नहीं है। मगर इससे मोदी को यह कहने का मौका मिल गया कि ”मैं भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिश कर रहा हूं। कांग्रेस संसद को काम करने से रोक रही है।” राहुल जब २०००0 रु. निकालने के लिए एटीएम की कतार में घंटा भर खड़े हुए तब भी उन्होंने भारतीय राजनीति का मजाक ही बनाया। लेागों की हंसी उड़ायी कि राहुल ५० लाख की कार में २००० रु. निकालने पहुंचे।

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अब वे नोटबंदी के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए राष्ट्रीय स6मेलन बुलाना चाहते हैं। लेकिन आलोचना पर अब कौन ध्यान देगा जब हालात सामान्य होने लगे हैं। बैंकों का कहना है कि ९० फीसदी एटीएम काम करने लगे हैं। अब १०,००० रु. तक निकाले जा सकते हैं और ८० फीसदी बंद नोट बैंकों में आ चुके हैं। बैंकों से कहा गया है कि किसानों के कर्ज की उगाही में देरी करें और बीज तथा खाद के लिए कर्ज देना आसान बनाएं।

हालात का सकारात्मक पक्ष यह है कि फल, सब्जियों और अनाज की कीमतें घट रही हैं। जमीन-जायदाद की कीमतें अपनी वास्तविक स्थिति में आ रही हैं। भ्रष्टाचार, कालाबजारी, मानव तस्करी वगैरह पर अंकुश लगा है। मोदी ने सही ही कहा है कि नोटबंदी का विरोध करने वाले कालाबाजारियों का बचाव कर रहे हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि फरवरी के अंत तक चीजें सामानय हो जाएंगी और अर्थव्यवस्था चढऩे लगेगी।

ऐसे में राहुल सियासी रूप से अहम उत्तर प्रदेश के चुनावों को भी भूलकर नोटबंदी पर हमले जारी रखे हुए हैं। सो, आश्चर्य नहीं कि सोशल मीडिया पर कई तरह के मजाक चल पड़े हैं। वे नववर्ष मनाने लंदन उड़ गए तो लोगों को लगा कि उनके मुंह से किसानों के दर्द की बात शोभा नहीं देती। इसलिए राहुल ने मोदी के लिए जो चुनौती खड़ी की है, वह खुद-ब-खुद हवा हो जाएगी और कोई आंसू बहाने वाला भी नहीं मिलेगा।

 विजय दत्त

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