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व्यक्तित्व का विकास

व्यक्तित्व का विकास

व्यक्ति का परिचय होता है उसके व्यक्तित्व से।  समाज में हम कैसे रहते हैं , कैसे लोग हमारे साथ व्यवहार करते हैं, यहाँ तक की हमारी उन्नति भी निर्भर करती है हमारे व्यक्तित्व के ऊपर। हमारा व्यक्तित्व जितना अधिक उच्च होता है, उतना अधिक हम लोगों के प्रिय होते हैं और उतनी ही आसानी से हमारा हर कार्य सफल होता है।  अगर व्यक्तित्व की अवधारणा के बारे में विचार किया जाए तो हम केवल अपने बाहरी आचरण को ही व्यक्तित्व का  विकास समझ लेते हैं।  अगर कोई व्यक्ति सबके सामने अपने आपको बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश करता है तो हम उसके व्यक्तित्व की वाह  – वाही करने लगते है।  जबकि व्यक्तित्व की परिभाषा ही भिन्न है।

आधुनिक युग में लोगों का दृष्टिकोण भी बड़ा भिन्न है।  जो लोग महंगी चीजों का इस्तेमाल करते हैं या फिर अपने नीचे लोगों को दबा कर रखने की क्षमता रखते हैं , हम उनके व्यक्तित्व को ही उन्नत व्यक्तित्व का दर्जा दे देते हैं।  जबकि हमें ज्ञात होना चाहिए की ऐसे व्यक्तित्व कुछ समय के लिए हमें प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन जिनका सच में व्यक्तित्व अच्छा होता है, वो हमारे ह्रदय पर अमिट  छाप छोड़ जाते हैं। हम हमेशा व्यक्तित्व को सही मायने में समझने की जगह उसके विकास के लिए चिंतित रहते हैं।  यहाँ तक की खुद के व्यक्तित्व के विकास के लिए नाना प्रकार के अनुष्ठान तथा क्लास भी लेते है। इन सब चीज़ों से केवल हमारा आचरण ही परिवर्तित हो सकता है। जब तक हम अंदर से खुद को नहीं पहचानेंगे तब तक हमारा विकास अधूरा रहता है।  देखा जाए तो व्यक्तित्व की उन्नति का रास्ता जितना बाहरी  दुनिया में नहीं होता उससे ज्यादा अपने अंदर होता है। अगर हम अपने मन के अंदर एकाग्रचित हो कर झांके तो एक परम शक्ति को वहां पाएंगे। इसी परम शक्ति की उपस्थिति का आभास मिलते ही हमारे व्यक्तित्व का स्वत: विकास होने लगता है। इसके आभास से ही हम किसी भी कार्य को किसी भी हालात में करने को सक्षम हो जाते हैं। व्यक्ति हर क्षेत्र में विजय की ओर अग्रसर हो जाता है और उसका मनोबल दृढ़ हो जाता है।

एक शिशु के दुनिया में आते ही हम उसके ऊपर अपनी इच्छानुसार आचरण थोपने लगते हैं।  उसे कैसे बैठना चाहिए , कैसे बोलना चाहिए , क्या खाना चाहिए, यह हम तय करने लगते हैं। उसके वस्त्र और आचरण को ही उसके व्यक्तित्व के विकास का पैमाना  बना बैठते है। जबकि इस दुनिया में आया हर शिशु अलग होता है, अलग  गुण लेकर आता है।  हमें उसकी सोच को पहचान कर उसके विकास में सहाय होना चाहिए।  एक छोटे शिशु का विकास ही एक समाज का विकास करता है। व्यक्तित्व विकास को अपनी जिम्मेदारी न समझ कर परमात्मा की एक महान जिम्मेदारी समझे तो अधिक अच्छा होगा।  केवल ह्रदय को निर्मल रखना और अपने आप को पहचानना ही व्यक्तित्व का विकास कर सकता है।

उपालि अपराजिता रथ 

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