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मेक इन इंडिया विकास का रोडमैप

मेक इन इंडिया विकास का रोडमैप

By नरेन्द्र दामोदरदास मोदी

सामान्य रूप से सरकार का एक स्वभाव रहता है, सेक्रेसी का। आज के इस अवसर पर आप अनुभव करते होंगे ओपनेस का, एक खुलेपन का। सरकार क्या सोचती है, अब यह चीजें जितनी आज आपके सामने आई हैं, यही चीजें पाने के लिए पता नहीं कितनी आरटीआई करनी पड़ती है आपको। तो व्यवस्था ऐसी विकसित की जा सकती है कि उसी प्रकार से हमने देखा है कि बजट जब आता है तो ढेर सारे डेलिगेटशन्स मेमोरेंडम लेकर के आते हैं। वो भी एक ऐसी फॉर्मालिटी हो जाती है कि सरकार कागज ले लेती है। कितना ही बड़ा हायर पोजिशन पर क्यों न हों, ‘अच्छी-अच्छा देख लेंगे।’ फिर वो कागज प्रोसेस में चला जाता है।

आज आपने देखा होगा कि आपकी जो कन्सन्र्स हैं, उसकी आज चर्चा हुई है। सिर्फ सुना गया ऐसा नहीं है। चर्चा हुई, इतना ही नहीं उसमें से रास्ते भी खोजे गए। रास्ते खोजकर हम मिलकर के अचीव कैसे करें? हमारी कलेक्टिव रिस्पॉन्सिबिलिटी का एक फीलिंग  आज आया। ‘फीलिंग ऑफ वननेस’, उस दिशा में एक प्रयास है।

जब मैं प्रारंभ से कहता हूं कि मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस तो इस विषय को बहुत कम लोग समझ पाते हैं। कुछ लोग तो यह मानते हैं कि मंत्रियों की संख्या के आधार पर तय होता है कि मिनिमम गवर्नमेंट है या नहीं है।

यह उनकी समझदारी का प्रोबलम है, लेकिन मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस क्या होता है वो आज एक दिन में आपने देख लिया। शायद जितने निर्णय आज आप कर रहे हैं, मिलकर के कर रहे हैं, शायद सरकारी फाइल और प्रोसेस में हुआ होता तो सालों निकल जाते। यह है मिनिमम गवर्नेंस। मिनिमम गवर्नेंस से मैक्सिमम गवर्नेंस की दिशा में कैसे जा सकते हैं, इसका यह एक स्वभाविक आपके सामने प्रस्तुत है।

मैं जब नया-नया आया, मैंने 15 अगस्त को भी इस बात का उल्लेख किया था लाल किले पर से। मैं अनुभव कर रहा था कि यहां सरकार स्लो चलती है। हरेक का अपना-अपना एक रजवाड़ा बना हुआ है। पिछले छह-सात महीनों में सबसे पहला हमने काम किया उन सारे बैरियर्स को खत्म करने का। मिल-बैठकर के निर्णय करें, कागजी कार्रवाई आखिर में होती है।

आज हम उसमें से एक स्टेप आगे गए हैं और वो स्टेप है, पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप का मॉडल सिर्फ पूंजी और प्रोजेक्ट नहीं होता है। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप का मॉडल डिसीजनमेकिंग में भी हो सकता है। एक नया एप्रोच है और उस नये एप्रोच को आज आपने अनुभव किया है।

इट इज ए बिगनिंग, लेकिन इससे आपको संकेत मिलता होगा कि किस दिशा में जाया जा सकता है। तो इन ट्रू सेंस, पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप का मॉडल ‘मिटिंग ऑफ माइंड’  से शुरू होता है, तो फिर ‘अचीवमेंट इन मैन्यूफैक्चरिंग’ तक पहुंचता है और मैं मानता हूं कि आज पूरे दिनभर में आपने इस बात को अनुभव किया होगा।

मुझे याद है जिस दिन 25 सितंबर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म जयंती पर मैंने मेक इन इंडिया कार्यक्रम की यहां शुरूआत की थी, आप में से कई मित्र यहां थे। उसके बाद मैं काफी कुछ उसकी आलोचनाएं सुन रहा था। लेकिन आपने देखा होगा कि पिछले तीन महीने में एक विचार को सिद्ध करने के लिए गवर्नमेंट मशीनरी ने किस प्रकार से अपने आपको तैयार किया है। आपको अनुभव हुआ होगा चर्चा में। कानून बदलने पड़े -तैयार है, नियम बदलने पड़े – तैयार हंै, व्यावस्था को स्पीडी करना है – तैयार है। यह जो एक बदलाव है उस बदलाव को हमें रियल धरती पर आगे उतारना है और इसलिए आपको इसके साथ जोड़कर इसके लिए हमने प्रयास किया है।

हम जानते है सरकार ज्यादातर ‘एबीसीडी’ में फंसी रहती है। सरकार का कल्चर, एबीसीडी कल्चर होता है और यह ऊपर से नीचे तक होता है। मैं कहता हूं…

A -avoid, B–Bypass,
C–Confuse, D – Delay.

हमारी कोशिश है एबीसीडी कल्चर से एक ऐसे रोडमैप पर जाएं, जिसमें सक्सेस ही सक्सेस हो और जब मैं सक्सेस ही सक्सेस रोड की बात करता हूं, तो मैं उस रोड की चर्चा करता हूं जिसमें रोड का मतलब है:

R – Responsibility,
O – Ownership,
A – Accountability,
D – Discipline.

यह रोडमैप पर हम आगे बढऩा चाहते हैं। पूरी सरकारी व्यवस्था को उस दिशा में तैयार करने की हम कोशिश कर रहे हैं। इसके कारण शासन में काम करने वाले व्यक्तियों को भी ‘सामान्य जन की क्या अपेक्षाएं हैं’, उसके अनुरूप अपनी चीजों को prioritise करने की आदत बन जाती है।

मैं समझता हूं इससे एक बहुत बड़ा लाभ होगा। एक उससे आगे का कदम जो मेरे मन में है, जिस पर हमें सोचना चाहिए। जिस प्रकार से आज हम इस रिफॉर्म में इस प्रकार के लोग मिले हैं, मैं मानता हूं कि मैं विकास के लिए जिन बातों को बल देना है, उसमें मैन, मेटेरियल, मनी, मशीन, मिनरल – इसका मैक्सिमम मूवमेंट कैसे हो। कोई स्टेगनेंसी न हो, इन पांचों क्षेत्रों में। इन फाईव एम की मूवमेंट कैसे बढ़े, उसको लेकर हम आगे बढऩा चाहते हैं।

हम जनवरी के फस्र्ट वीक में फायनांशियल सेक्टर को अटेंड कर रहे हैं, विशेषकर के बैंकिंग सेक्टर के लोगों को बुला रहे हैं। इस गोल को पाने के लिए उनका रोल क्या होगा उसकी वहां चर्चा करेंगे, रास्ते तय करेंगे।

एक महत्व, जैसा मैंने कहा मैन। हमारा काम है ह्यूमैन रिसोर्स डेवलपमेंट का, हमारा काम है इनोवेशन का, हमारा काम है  रिसर्च का। इन सारे क्षेत्रों को भी अगर हमें नेक्स्ट जेनरेशन की ओर ले जाना है, तो इन तीन बातों को हमारे डीएनए के रूप में लाना पड़ेगा। आज दुर्भाग्य से हमारी व्यवस्था में वो डीएनए नहीं है। इनोवेशन, रिसर्च ऐंड ह्यूमैन रिसोर्स डेवलपमेंट ये पूरे पार्ट ऑफ प्रोसेस होना चाहिए। आइसोलेटेड नहीं होना चाहिए और इसलिए मेरा सेकेंड फेज का काम ऐसा है कि क्या हम देश में पांच या छह या आठ रीजन्स में यूनीवर्सिटीज को, इंस्टीट्यूशन्स को, मैन्यूफैक्चरिंग वल्र्ड को और गवर्नमेंट पॉलिसी मेकर्स को साथ मिलकर ह्यूमैन रिसोर्स डेवलपमेंट की हमारी नेट 20-30 इयर्स के लिए किस प्रकार के लोगों की जरूरत है। उन लोगों को तैयार करने के लिए हमारे आज जो सिलेबस हैं, हमारे इंस्टीट्यूशन्स हैं वो बहुत कैपेबल हैं क्या? उसको हम बदलाव ला सकते हैं क्या? उसमें कोई नया मॉडल ला सकते हैं क्या? हम कल्पना कर सकते हैं, आज अगर मान लीजिए हम सोच रहे हैं हम बुलेट ट्रेन। बुलेट ट्रेन के लिए इंजीनियरिंग स्कील के लोग हमारे पास हैं क्या? नहीं हैं तो वी विल हैव टू क्रिएट। ….

हमारे आईटी सेक्टर में हम लोगों ने बहुत बड़ा अपना तजुर्बा बताया 25 साल पहले, लेकिन हम गूगल नहीं बना पाए। हमारा जो टैलेंटेड मैनपावर था बाहर चला गया। क्या हम उस दिशा में सोच सकते हैं कि जगत में जो श्रेष्ठ है वो हमारे यहां भी पैदा हो सकता है और दुनिया इस बात को मानेगी। हमारे स्पेस का जब प्रेजेंटेशन हो रहा था तो मैं देख रहा था कि सब लोग तालियां बजा रहे थे। यह भारत के नौजवान साईंटिस्ट कर रहे हैं।  दुनिया में अपना रूतबा दिखा रहे हैं तो और क्षेत्र तो इससे सरल है। हम इसको कर सकते हैं।

एक दूसरा जो विषय जैसे मैंने कहा हम जनवरी के पहले सप्ताह में बैंकिंग या फाइनांशियल सेक्टर के इसी विषय को लेकर  मिल रहे हैं। मैं चाहता हूं कि संबंधित लोग मिलकर रीजनल दिशा में कैसे काम करें इस पर काम करें।’ और एक विषय है जिस पर हमें बल देने की आवश्यकता है, भारत का विकास संतुलित होना चाहिए। अगर भारत के पश्चिम का हिस्सा समृद्धि की ओर बढ़े और पूरब का हिस्सा वैसे का वैसा ही रह जाएं तो देश के लिए उचित नहीं है।

अब इंडस्ट्रीयल हाउसेस को भी सोचना होगा। कोयला ईस्ट में है और बिजली वेस्ट  में पैदा करते हैं। ऐसी कौन सी स्ट्रेटीजी है हमारी। हमारे पास प्राकृतिक सम्पदा सारी की सारी भारत के पूर्वी भाग में है। हमारी योजनाओं में, और मैं चाहूंगा इसके लिए हमारे नीति निर्धारक भी अटेंशन दें और आप जो विकास करना चाहते हैं उसके लिए अपना विकास, अपनी कंपनी का विकास, देश का विकास भी सोचिए। इस्टर्न पार्ट ऑफ इंडिया के पास जो पोटेंशियल है, उसके पास जो सामथ्र्य है, वो सामथ्र्य हमारे देश के विकास में किस प्रकार से उपयोग हो, हमारी मैन्यूफैक्चरिंग सेंटर कैसे बढ़े उस पर विचार करना होगा। वहां पर भी टैलेंटेड यूथ हैं, वहां मिनरल्स हैं, वहां संभावनाएं पड़ी हैं। उन संभावनाओं पर हम एक दशक में अगर ध्यान दें तो भारत का पश्चिमी छोर जिस प्रकार से आगे बढ़ा है उसी प्रकार पूर्वी छोर भी आगे आ जाएगा। अगर पूरब का छोर इक्वल आ जाएगा तो आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस ग्रोथ टारगेट की चर्चा पूरी दुनिया हिंदुस्तान से अपेक्षा करती है, उसको पाने का वो उत्तम से उत्तम रास्ता बन सकता है।

इसलिए हम उस दिशा में भी अगर आगे बढ़ें तो मैं समझता हूं कि हम काफी कुछ दे सकते हैं। आज पूरे दिनभर यह जो प्रयास हुआ है, हर एक की जिम्मेदारी तय हो चुकी है, रोडमैप तैयार हो चुका है, क्या अचीव  करना है वो निर्धारित हो चुका है, नीतियों में क्या, परिवर्तन लाना है वो तय हो चुका है। अब मैं नहीं मानता हूं कि कोई कागजी कार्रवाई की जरूरत पड़ेगी, अपने आप चीजें इंप्लीमेंट होंगी और हम जो मेक इन इंडिया  का कॉन्सेप्ट लेकर के चल रहे हैं, उस पर आगे बढ़ेंगे।

लेकिन बात मेक इन इंडिया से अटक नहीं सकती। हमारी कोशिश उससे आगे हो। हम दुनिया में इंडिया ब्रांड कैसे डेवलप कर सकते हैं? अगर दुनिया में इंडिया ब्रांड डेवलप  करना है, तो मेक इन इंडिया उसके साथ एक कैचलाईन लगेगी।

‘जीरो डिफेक्ट’। अगर जीरो डिफेक्ट नहीं है, तो हम ग्लोबल मार्केट में अचीव नहीं कर सकते। उसी प्रकार से दुनिया एनवार्नमेंट कॉन्सियस है। बहुत बड़ी हमारी जिम्मेदारी है तो ‘जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट’। हम वो मैन्यूफैक्चरिंग करेंगे एनवार्नमेंट पर इफेक्ट न करे। हम वो मैन्यूफैक्चरिंग करेंगे जो जीरो डिफेक्ट हो और दुनिया भर के अंदर जिसकी मांग हो – उस काम के लिए हम आगे बढ़ें।

इसको हम और आगे बढ़ाने वाले हैं। सेक्टेर स्पेसिफिक तक जाने वाले हैं। मैं चाहता हूं कि आपके सुझाव हम सब मिलकर के देश को आगे बढ़ाने में काम आएंगे।

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