ब्रेकिंग न्यूज़ 

भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाएंगे: राजनाथ सिंह

भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाएंगे: राजनाथ सिंह

उदय इंडिया पहली ऐसी मैगजीन है, जिसने मेक इन इंडिया पर इतना भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया है। यह मैगजीन जब से प्रकाशित हो रही है, तब से मैं इसे पढ़ता हूं। इस मैगजीन के बारे में मैं कह सकता हूं कि यह नेशनलिस्ट मैगजीन है। देश की जो ज्वलंत समस्याएं होती हैं, उन समस्याओं पर इस मैगजीन में तरह-तरह के आर्टिकल्स हमें पढऩे को मिलते हैं। इसलिए इस कार्यक्रम को उदय इंडिया द्वारा मेक इन इंडिया को केन्द्रबिंदू में रखकर आयोजित किया गया है।

आप सभी जानते हैं कि मेक इन इंडिया का उद्देश्य क्या है। हम मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देना चाहते हैं, यह हमारा उद्देश्य है। हम तो मेक इन इंडिया को उस मुकाम तक पहुंचाना चाहते हैं, जहां मेक इन इंडिया उत्तम क्वालिटी और बेहतर दाम की कसौटी पर खरा उतर सके। दुनिया में पहले एक धारणा यह थी कि भारत में जो भी आईटम्स बनते हैं, उनकी क्वालिटी बहुत पूअर होती है, इनफीरियर होती है। लेकिन, आप सभी जानते हैं कि सॉफ्टवेयर के मामले में हमने सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी साख बनाई है। भारत में बने सॉफ्टवेयर की मांग सारी दुनिया में है। इस क्षेत्र में काम करने वाले भारत के जितने भी युवा हैं उन्होंने सारी दुनिया में सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत का मस्तक ऊंचा किया है। मैं तो यह भी मानता हूं कि यदि हार्डवेयर हम बनाएं, तो मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में भारत की साख सारी दुनिया में बढ़ सकती है।

1947 में हमें आजादी मिलने के बाद, यदि मैं पूरे आजाद भारत के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखता हूं तो मैं इस नतीजे पर पहुंचता हूं कि भारत में कोई इंडस्ट्रीयल रिवोल्यूशन नहीं हुआ। हम सीधे एग्रीकल्चर इकोनॉमी से सर्विस इकोनॉमी में परिवर्तित हो गए। यहां पर जो इंडस्ट्रीयल रिवोल्यूशन होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि एग्रीकल्चर सेक्टर से बड़ी संख्या में युवा भाग रहे हैं, बेरोजगारी की संकट से जूझ रहे हैं। उन्हें रोजगार का जो अवसर हासिल होना चाहिए, वह अवसर उन्हें नहीं मिल रहा है। मैं यह मानता हूं कि रोजगार के अधिक से अधिक  अवसर अगर सृजित हो सकते हैं तो मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में सृजित हो सकते हैं या कंस्ट्रक्शन के सेक्टर में सृजित हो सकते हैं। हमारे देश में भले ही इंडस्ट्रीयल रिवोल्यूशन नहीं हुआ हो, हमारी अर्थव्यवस्था के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती हो, लेकिन भारत के इतिहास को देखने के बाद मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि चाहे जितनी भी विपरीत परिस्थितियां, बड़ी से बड़ी चुनौतियां हमारे सामने आईं हों, हमने उसका मुकाबला किया है, उस पर विजय प्राप्त की है और, और अधिक ताकतवर बनकर हम आगे निकले हैं। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी भारत और अधिक ताकतवर बनकर निकलेगा, यह मुझे पूरा विश्वास है।

आप जानते हैं कि आजादी के बाद मिक्स्ड इकोनॉमी और प्लान्ड इकोनॉमी का रास्ता हमलोगों ने चुना था। बड़े पैमाने पर उस समय उद्योग भी यहां लगे थे, उसके बावजूद प्रारंभिक दशक में ग्रोथ रेट जीडीपी के लगभग 3-3.5 प्रतिशत था। उस समय के कुछ आर्टिक्ल्स मैं देखता हूं….. एक स्थान पर यह भी मुझे पढऩे को मिला कि कुछ लोगों का कहना था कि भारत में जितना पोटेंशियल होना चाहिए, वह पोटेंशियल नहीं है। इसी लिए लोगों ने इस ग्रोथ रेट को ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहा। लेकिन, मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं 1998 से 2004 के श्री अटल बिहारी वाजपेयी का काल। परिस्थितियां बहुत प्रतिकूल थीं, कारगिल का युद्ध हुआ था पाकिस्तान के साथ। उस युद्ध में भारत ने विजय हासिल की थी, लेकिन युद्ध युद्ध होता है। जब भी दुनिया के किसी देश का किसी देश के साथ युद्ध होता है तो स्वभाविक रूप से आर्थिक संकट किसी न किसी सीमा तक पैदा होता है। जब कारगिल हुआ था, उस समय सारा विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा था। इससे भारत भी अछूता नहीं रह सकता था। लेकिन, श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और उनकी सरकार के सूझ-बुझ का ही करिश्मा था कि भारत में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर में इतना हेवी इन्वेस्टमेंट किया गया कि ग्लोबल इकोनॉमिक रिसेशन से भारत की इकोनॉमी को जिस हद तक प्रभावित होना चाहिए, उस हद तक भारत की इकोनॉमी प्रभावित नहीं हो पाई और हमने जीडीपी के ग्रोथ रेट को ले जाकर 2003 और 2004 में लगभग 8-8.4 परसेंट तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल की। जो यह धारणा बनी हुई थी कि भारत की इकोनॉमी में ग्रोथ का पोटेंशियल नहीं है, उन्हें हमने यह संदेश दे दिया कि भारत की इकोनॉमी में जीडीपी के ग्रोथ रेट को किस सीमा तक पहुंचाने का पोटेंशियल है। हमने संदेश दे दिया कि अगर हम अपनी जीडीपी की ग्रोथ रेट बढ़ाना चाहें तो बहुत सारे रिफॉम्र्स के माध्यम से हम अपनी जीडीपी की ग्रोथ रेट को बढ़ा सकते हैं।

अमीर बनने के चार रास्ते

17-01-2015

अमीर बनने के चार मार्ग हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों ने इसके प्रयोग किए हैं। पहला प्रयोग यूरोप ने किया। उसने देशों पर कब्जा कर उन्हें अपना उपनिवेश बनाया। ब्रिटेन लगभग 70 देशों पर राज कर रहा था। स्पेन, डच, पुर्तगाली, फ्रेंच आदि देशों ने लैटिन अमेरिकी आदि कई देशों पर कब्जा किया और उन्हें सदियों तक लूटा। लूट कर उन्होंने अपने भंडार भरे और अमीर बने।

सऊदी अरब और बाकी के मध्य-पूर्वी देशों के पास अपार प्राकृतिक संपदा है। दीवार फिल्म का एक संवाद है कि आपके पास क्या है, तो दूसरा भाई कहता है कि मेरे पास मां है। उसी तरह अरब देश कहते हैं कि हमारे पास तेल है। तो वे तेल से अमीर बने। तीसरा रास्ता भारत और चीन का है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में जो वस्तुएं महंगी बनती हैं, उन्हें इन्होंने सस्ते में बनाकर दिखाया। ऐसे प्रोडक्ट जिनके पेटेंट नहीं हैं, उन्हें सस्ते में बनाने में महारत हासिल की और पिछले तीस सालों में वे अमीर बनने के रास्ते पर चल पड़े।

हालांकि ये तीनों रास्ते बहुत अच्छे नहीं हैं। लंबे समय तक चलने वाले नहीं हैं। क्रूड ऑयल के दाम 120 डॉलर से 60 डॉलर हो गया तो रूस की व्यवस्था आज दिक्कत में आ गई है। इसलिए, सही रास्ता है – इनोवेशन का, शोध का। जो देश शोध करते हैं, वे सही में अमीर बनते हैं। अमेरिका की यही खासियत है कि वह दुनिया के मेधावी छात्रों को अपने यहां बुलाता है और उन पर खर्च करता है। वही छात्र अमेरिका के लिए नए-नए शोध करते हैं। उसी शोध से देश समृद्ध बनता है।

(प्रकाश जावेड़कर, केन्द्रीय मंत्री,जंगल एवं पर्यावरण विभाग)

विडंबना यह रही कि 2004 से लेकर 2014 तक उस मूमेंटम को जिसे हमारी इकोनॉमी ने 1998 से 2004 तक हासिल किया था, उसे बनाए रखने में हम कामयाब नहीं हो पाए थे। अब एक बार फिर हमारी सरकार आई है श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में। आप सभी जानते हैं कि डेवलपमेंट और गुड गवर्नेंस हमारे नेशनल एजेंडा की प्राथमिकता में शामिल है। सरकार बनने के साथ सबसे बड़ी चुनौती जो हमारे सामने थी, वह चुनौती थी महंगाई की। आज मैं कह सकता हूं कि महंगाई पर काफी हद तक काबू पाने में हमने सफलता हासिल कर ली है। उसमें कोई यह कह सकता है कि केवल आपकी पॉलिसिज का यह करिश्मा नहीं है, बल्कि पेट्रोल और डीजल, जो हमारे देश में आता है और जिस मार्केट से यह आता है उस इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल और पेट्रोल की कीमतें कम हुईं हैं, उसके परिणामस्वरूप यह महंगाई कम हुई है। काफी हद तक यह एक फैक्टर हो सकता है, लेकिन सब कुछ यही है ऐसा मैं नहीं मानता हूं।

महंगाई का जहां तक सवाल है, कंज्यूमर प्राईस इंडेक्स नवंबर 2013 में जहां पर 11.2 परसेंट था, वहीं कंज्यूमर प्राईस इंडेक्स आज लगभग 4 परसेंट रह गया है। होलसेल प्राईस इंडेक्स का जहां तक सवाल है, वह नवंबर 2013 में लगभग 7.5 प्रतिशत था, आज वह जीरो परसेंट हो गया है। ओवरऑल अगर मैं फूड इंफ्लेशन की बात करूं तो नवंबर 2013 में यह लगभग 19 परसेंट था। आज वह 0.6 परसेंट रह गया है, जो नगण्य है। अब महंगाई पर हमने काबू पाया है और इसमें स्थायित्व बनी रहे, इसके लिए भी हमें प्रयत्न करने की जरूरत है। हमारे इकोनॉमिक इंजन को आज स्पीडअप करने की जरूरत है। आज हमारी ग्रोथ रेट लगभग 5-5.5 परसेंट के बीच की है। अब इस ग्रोथ रेट को हमें बढ़ाना है। ग्रोथ रेट को बढ़ाने के लिए सबसे पहले मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर, इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर, कन्स्ट्रक्शन सेक्टर में हेवी इन्वेस्टमेंट होना चाहिए। अब ये इन्वेस्टमेंट होगा कैसे? जब तक हम अपने डोमेस्टीक इन्वेस्टर्स और फॉरेन इन्वेस्टर्स के अंदर कॉन्फिडेंस जेनरेट नहीं करेंगे तब तक हम यह कामयाबी हासिल नहीं कर सकते। श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं यह बात कह सकता हूं कि सारी दुनिया को हमने यह संदेश देने में कामयाबी हासिल की है कि ‘दिस गवर्नमेंट मिन्स बिजनेस’।

देशहित में सेल्समैन बन गए हैं प्रधानमंत्री

17-01-2015

आप सभी इंडस्ट्रीयलिस्ट्स एक तरह से इकोनॉमी की जननी हैं। क्रिएशन की जो पावर होती है, उससे जो सुकून मिलता है, मुझे यकीन है कि आप सब उस सुकून में जीते हैं। आपने न सिर्फ खुद की तरक्की की है, बल्कि अपने परिवार की, अपने समाज की और देश की भी तरक्की में भी योगदान दिया है। इसके लिए हम सभी आपके दिल से आभारी हैं।

प्रधानमंत्री जी द्वारा मेक इन इंडिया का किया गया आह्वान एक बड़ा कदम था। विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री जी भारत के लिए जिस तरह से एक सेल्समैन की तरह काम कर रहे हैं, ऐसा मैंने किसी प्रधानमंत्री को करते हुए नहीं देखा। यह भावना एक प्रधानमंत्री में तभी आ सकती है, जब उसका देश के साथ जबरदस्त लगाव हो, वो चाहता हो कि देश का हर युवा, हर इंडस्ट्री आगे बढ़े। माना जाता है कि भारत लालफीताशाही से घिरा हुआ है। इस बात को आपसे बेहतर और कौन समझ सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री जी के मस्तिष्क में हमेशा यही बात रहती होगी कि अगर जो भारत के हित में है तो उसे स्वीकार किया जाए। आप सभी एचिवर्स हैं। मेरा मानना है कि ये जरूरी नहीं है कि जीवन में आप कहां पहुंचे, ये महत्वपूर्ण है कि आप कहां से कहां तक पहुंचे।

(कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर केन्द्रीय मंत्री, सूचना एवं प्रसारण विभाग)

विडंबना यह रही कि 2004 से लेकर 2014 तक उस मूमेंटम को जिसे हमारी इकोनॉमी ने 1998 से 2004 तक हासिल किया था, उसे बनाए रखने में हम कामयाब नहीं हो पाए थे। अब एक बार फिर हमारी सरकार आई है श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में। आप सभी जानते हैं कि डेवलपमेंट और गुड गवर्नेंस हमारे नेशनल एजेंडा की प्राथमिकता में शामिल है। सरकार बनने के साथ सबसे बड़ी चुनौती जो हमारे सामने थी, वह चुनौती थी महंगाई की। आज मैं कह सकता हूं कि महंगाई पर काफी हद तक काबू पाने में हमने सफलता हासिल कर ली है। उसमें कोई यह कह सकता है कि केवल आपकी पॉलिसिज का यह करिश्मा नहीं है, बल्कि पेट्रोल और डीजल, जो हमारे देश में आता है और जिस मार्केट से यह आता है उस इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल और पेट्रोल की कीमतें कम हुईं हैं, उसके परिणामस्वरूप यह महंगाई कम हुई है। काफी हद तक यह एक फैक्टर हो सकता है, लेकिन सब कुछ यही है ऐसा मैं नहीं मानता हूं।

महंगाई का जहां तक सवाल है, कंज्यूमर प्राईस इंडेक्स नवंबर 2013 में जहां पर 11.2 परसेंट था, वहीं कंज्यूमर प्राईस इंडेक्स आज लगभग 4 परसेंट रह गया है। होलसेल प्राईस इंडेक्स का जहां तक सवाल है, वह नवंबर 2013 में लगभग 7.5 प्रतिशत था, आज वह जीरो परसेंट हो गया है। ओवरऑल अगर मैं फूड इंफ्लेशन की बात करूं तो नवंबर 2013 में यह लगभग 19 परसेंट था। आज वह 0.6 परसेंट रह गया है, जो नगण्य है। अब महंगाई पर हमने काबू पाया है और इसमें स्थायित्व बनी रहे, इसके लिए भी हमें प्रयत्न करने की जरूरत है। हमारे इकोनॉमिक इंजन को आज स्पीडअप करने की जरूरत है। आज हमारी ग्रोथ रेट लगभग 5-5.5 परसेंट के बीच की है। अब इस ग्रोथ रेट को हमें बढ़ाना है। ग्रोथ रेट को बढ़ाने के लिए सबसे पहले मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर, इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर, कन्स्ट्रक्शन सेक्टर में हेवी इन्वेस्टमेंट होना चाहिए। अब ये इन्वेस्टमेंट होगा कैसे? जब तक हम अपने डोमेस्टीक इन्वेस्टर्स और फॉरेन इन्वेस्टर्स के अंदर कॉन्फिडेंस जेनरेट नहीं करेंगे तब तक हम यह कामयाबी हासिल नहीं कर सकते। श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं यह बात कह सकता हूं कि सारी दुनिया को हमने यह संदेश देने में कामयाबी हासिल की है कि ‘दिस गवर्नमेंट मिन्स बिजनेस’।

हम पूरे माहौल को इंडस्ट्री-फ्रेंडली बनाना चाहते हैं, इन्वेस्टर्स फ्रेंडली बनाना चाहते हैं, बिजनेस फ्रेंडली बनाना चाहते हैं। इसके लिए इंस्ट्रक्शनल रिफॉर्म जो करने चाहिए, प्रोसिजरल रिफॉर्म जो हमें करने चाहिए, उस दिशा में भी हम अपने कदम तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं। जहां तक फॉरेन डाईरेक्ट इंवेस्टमेंट का प्रश्र है, सबको जानकारी है कि उसेे बढ़ाकर डिफेंस और इंश्योरेंस जैसे क्षेत्र में 49 परसेंट तक कर दिया गया है। जीएसटी को लेकर एक लंबी मांग चली आ रही थी कि जल्दी से जल्दी यह लागू होना चाहिए। हमारी कैबिनेट ने उसे मंजूरी दे दी है, लेकिन अभी उसे संसद में पास कराना है। संसद में यह पास क्यों नहीं हो पाया, क्योंकि आपने देखा कि राज्यसभा में कितने दिनों तक हंगामा चलता रहा। हमारी कोशिश थी कि संसद के इसी सत्र में हम जीएसटी बिल को पास करा दें, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। मैं राजनीतिक पार्टियों से विनम्रतापूर्वक अपील करना चाहता हूं कि हेल्दी डेमोक्रेसी में डेमोक्रेसी का सर्वाइवल जिद्द से नहीं होता है, जज्बे से होता है। यदि हमारी संसद का सत्र ठीक तरीके से चला होता, कोई व्यवधान पैदा नहीं हुआ होता तो मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जीएसटी बिल को भी संसद के दोनों सदनों में पास कराने में हम कामयाब हुए होते।

हमारी सरकार ने एक कदम और उठाया है, वह है प्रधानमंत्री जन धन योजना। हमारा प्रयत्न है कि फाइनांशियल एक्सपैंशन के साथ-साथ फाइनांशियल इन्क्लूजन को भी बढ़ावा मिले। हमारी इसी सोच का परिणाम है प्रधानमंत्री जन धन योजना। पिछले महिने तक देश के 89 परसेंट परिवारों के बैंकों में अकाउंट खोल दिए गए हैं, चाहे उनके पास पैसा हो या नहीं हो। हरियाणा ऐसा राज्य है, जहां 100 परसेंट परिवारों ने अपना अकाउंट बैंकों में खुलवा लिया है। फाइनांशियल इन्क्लूजन में यह हमारा मेजर अचीवमेंट है। मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि मेक इन इंडिया की सफलता देश को नई ऊंचाईयों तक ले जा सकती है, ऐसी क्षमता भारत के पास है। जिस भारत के पास ह्यूमैन रिसोर्सेज की कमी न हो, जिस भारत के पास नेचुरल रिसोर्सेज की कमी नहीं हो, उस भारत में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी ग्रोथ रेट में कॉन्ट्रीब्यूशन सिर्फ 14-15 परसेंट ही है। हमारे पड़ोसी देश चीन के जीडीपी ग्रोथ रेट में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का कॉन्ट्रीब्यूशन लगभग 30 परसेंट है। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में और इन्वेस्टमेंट बढ़ाकर हम अपने ग्रोथ रेट को बढ़ा सकते हैं या नहीं बढ़ा सकते हैं, इस पर हमने विचार किया है। समय लगेगा लेकिन इस इन्वेस्टमेंट को हम बढ़ाएंगे। अगले 10 वर्षों में जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के कॉन्ट्रीब्यूशन को 15 परसेंट से बढ़ाकर 25 परसेंट तक ले जाने का हमारा लक्ष्य है, ताकि जहां हमारा पड़ोसी देश खड़ा है वहां हम भी खड़े हो सकें। भारत की विशाल आबादी को हमें रोजगार भी देना है और सर्विस सेक्टर के साथ-साथ मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को भी हमें बढ़ाना है।

मैं अभी हाल ही में इजरायल गया था। वहां के प्रधानमंत्री के साथ-साथ कई मंत्रियों, व्यवसाय जगत से जुड़े लोगों और इन्वेस्टर्स के साथ हमारी बातचीत हुई। वहां की टेक्रोलॉजी की एडवांसमेंट को देखने के बाद मैं बहुत प्रभावित हुआ। प्रधानमंत्री जी से जब हमारी बात हुई तो मैंने उनसे रिक्वेस्ट किया कि इजरायल के पास जो आज टेक्नोलॉजी है उसका ट्रांसफर भारत को भी हो। वहां के बिजनेसमैन और इन्वेस्टर्स को भी भारत में आने की अपनी इच्छा को जाहिर किया। इसराजय के प्रधानमंत्री ने तुरंत अपनी सहमति देते हुए कहा कि एक इनविटेशन सिर्फ भारत से आना चाहिए, हमारे यहां से बिजनेसमैन और इन्वेस्टर्स का बड़ा ग्रुप भारत जाएगा और हम भी चाहते हैं कि भारत में इजरायल के इन्वेस्टर्स मैक्सिमम इन्वेस्टमेंट करें।

नौजवानों को बनाना होगा दक्ष

17-01-2015

मैं धन्यवाद दूंगा दीपक रथ जी को। लम्बे समय से इनसे सम्बन्ध है हमारा और इनकी रूचि से भी हम काफी हद तक परिचित हैं। ये उस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, जिसे वास्तव में देश के जिस हिस्से में तरक्की की बहुत आवश्कयता है। ओडिशा प्रदेश के अंदर संभावना बहुत है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने हम सबको निर्देश दिया है, देश को निर्देश दिया है कि मेक इन इंडिया का सही स्वरुप अगर हमें देखना है तो ओडिशा जैसे प्रदेशों में देखकर हम चला सकते हैं और मैंने इसे समझने की कोशिश भी की है। अभी जैसा कि जावड़ेकरजी कह रहे थे कि दुनिया में लोगों के पास क्या-क्या है। हमारे पास देश की आबादी और देश में काम करने वाले हाथों की कमी नहीं है। हमारा देश ही ऐसा है जो एक और एक को ग्यारह करना जानता है और सही ढंग से आगे बढ़ सकता है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने बहुत सही ढंग से समझाने का काम किया है। मैं इतना ही कह सकता हूं कि जो मंत्रालय मुझे माननीय प्रधानमंत्रीजी ने सौंपा है, उसमें सबसे अधिक संभावना है। ऐसा मेरा मानना है। पिछले कई वर्षों में टेक्सटाइल उद्योग को हम सही ढंग से आंक नहीं पाये हैं। हमारे देश में ऐसे बहुत से स्थान हैं जो मैनचेस्टर का मुकाबला करते हैं, पर उनको हम भूलते आए हैं।

इस वर्ष कॉटन के उत्पादन में हिंदुस्तान दुनिया में नंबर एक है। इस समय हम चीन से भी आगे हैं, लेकिन कपड़े के उत्पादन में हम उस हिसाब से नहीं हैं। इसलिए आज आवश्यकता हमें इस बात की है कि कैसे हम इस स्वरुप को आगे बढ़ाएं, उसे प्रधानमंत्री ने सही ढंग से आंकने का काम किया। अगर खादी का सबसे अधिक प्रयोग कहीं होता है तो गुजरात में होता है। हम इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं और आगे बढ़कर चल सकते है। मैं उदय इंडिया को बधाई देता हूं कि उसने एक अच्छी पहल प्रारम्भ की है। यहां मौजूद साथी प्रयास करें तो और आगे बढ़कर काम करें तो मुझे नहीं लगता कि कोई समस्या आएगी। हमें जरुरत इस बात की है कि हम ऐसे नौजवानों को प्रशिक्षित करें जो सही अर्थों में स्किल को जानतें हों। देश के अंदर लगभग 6 लाख से अधिक गांव हैं तो कैसे हम इसको सही ढंग से आगे बढ़ाने का काम कर सकते हैं, ये हम सब की चिंता और रूचि का विषय होना चाहिये।

(संतोष गंगवार केन्द्रीय कपड़ा मंत्री)

मैन्यूफैक्चरिंग में बढ़ावा देकर हम अपने एक्सपोर्ट को बढ़ा सकते हैं और यूएस तथा यूएई पर से अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकते हैं। भारत में मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलने से भारत लो-एंड एक्सपोर्ट्स मार्केट के कम से कम 20 परसेंट हिस्से को कैप्चर कर सकता है। मेक इन इंडिया की जो नई पॉलिसी सामने आई है, उसके तहत हमारा संकल्प है कि जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का जितना कॉन्ट्रीब्यूशन है, उतना तक पहुंचे। इसके लिए चाहे दस साल लगे, बारह साल लगे या चौदह साल लगे। जहां तक मैन्यूफैक्चरिंग इम्पोर्ट का प्रश्र है, वर्तमान में इसकी लागत 127 बिलियन डॉलर है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने से पांच वर्षों के अंदर 40 से 50 बिलियन डॉलर तक हम इसे सीमित कर सकते हैं।

भारत को हम डिजिटल इंडिया बनाना चाहते हैं। इससे हमारे गुड गवर्रनेंस का स्वप्र भी साकार होगा। मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में कम से कम 12 ऐसे सेक्टर्स हैं, जिनमें एडवांस टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देकर अगले 10 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था का टोटल आउटपुट 1 ट्रिलियन डॉलर बढ़ाया जा सकता है। आज हमारी अर्थव्यवस्था की साईज 2 ट्रिलियन डॉलर है। यह हमारे लिए एक मेजर एचीवमेंट होगा। बारह जो नए क्षेत्र हैं उनमें मोबाईल इंटरनेट भी है, क्लाउड कंप्यूटिंग भी है, बायो टेक्नोलॉजी भी है और, और भी बहुत कुछ है।

भारत केवल शहरों का देश नहीं है, भारत गांवों का देश है। टेक्नोलॉजी की अगर हम बात करते हैं तो उन गांवों में रहने वाले 65 प्रतिशत लोगों की भी चिंता करनी होगी। गांव कैसे रहने योग्य बन सके, गांवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन को कैसे रोकें, वहां रोजगार के अवसर कैसे सुनिश्चित किए जाएं, इस पर गहन विचार करने की आवश्यकता है। जिस दिशा में हमारी गवर्नमेंट प्रभावी तरीके से विचार कर रही है और जहां पर हम स्मार्ट सिटीज बनाना चाहते हैं, बुलेट ट्रेन चलाना चाहते हैं, अन्य बहुत सारी चीजें करना चाहते हैं, वहीं पर हम गांव के हालात को भी सुधारना चाहते हैं, ताकि गांवों से पलायन रूके और गांवों में ही नए रोजगार के अवसर पैदा हों।

उदय इंडिया के इस नेशनल कन्क्लेव में दिन भर की चर्चा से निकलने वाले परिणाम भी मेक इन इंडिया कार्यक्रम के लिए लाभदायक सिद्ध होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

михаил безлепкин сотрудникцерковь возрождение

Leave a Reply

Your email address will not be published.