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दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा सिंहनी होकर भी ममता और करुणा का महासागर

दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा  सिंहनी होकर भी ममता और करुणा का महासागर

जीवन जीना सामान्य बात है। अध्यात्मपूर्ण जीवन जीना महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट बात है। भारत की संस्कृति आध्यात्मिक महापुरुषों की समृद्ध धरोहर है, इनमे अध्यात्म गुरु माताओं का योगदान भी कमतर नहीं है। परम श्रद्धेया साध्वी ऋतम्भरा दीदी मां एक बहुआयामी व्यक्तित्व से सम्पन्न महासाधिका, महान् उपदेष्टा, प्रखर प्रयोक्ता हैं। उनके जीवन का केन्द्रीय आयाम है, अध्यात्म। वे वात्सल्य, प्रेम और करुणा की महानदी है। आप धार्मिक यात्राओं, प्रवचन तथा कथावचन द्वारा जन-जागरण में जुटी धर्मक्रांति के साथ-साथ समाजक्रांति की प्रेरक है। देश और दुनिया को उनकी एक अनुपम देन है वात्सल्यग्राम, जिसके जरिए वे नन्हें अनाथ बच्चों, निराश्रित बहनों एवं अपेक्षित वृद्धों को नव परिवार बसाने में संलग्न हैं। आप आत्म-कल्याण के साथ-साथ जन-कल्याण की दिशा में सक्रिय है। इक्कीसवीं सदी के भाल पर अपने कर्तृत्व की जो अमिट रेखाएं आपने खींची हैं, वे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। वे सृजन की देवी हैं, उन्होंने असंख्य लोगों के जीवन-पथ पर प्रेरणा के दीप जलाए हैं, उनकी सकारात्मक ऊर्जा की स्रोत बनी है।

लुधियाना जिले के दोराहा नगर में 2 जनवरी 1964 को पिता श्री प्यारेलालजी एवं माता श्रीमती कलावती देवी के घर में जन्मी निशा ने कभी नहीं सोचा था कि आगे चलकर कभी छोटे से गांव की सीमा को लांघकर विश्व भर में साध्वी ऋतम्भरा ‘दीदी मां’ के नाम से प्रसिद्ध होगी। हां, बचपन से कुछ कर गुजरने की चाह जरूर थी। अध्यात्म की ओर रूझान एवं घर का भक्तिपूर्ण वातावरण अज्ञात की ओर उकसाता जरूर था। अबाध गति से चलती वह धार आज एक महासागर बनकर करोड़ो लोगों की प्रेरक शक्ति बन गयी है।

दीदी मां का बचपन आम बालिकाओं की तरह था। आप भी और बालिकाओं की तरह चुलबुली और नटखट थी। लेकिन दया करुणा का भाव, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, पूजा-सत्संग में रूझान बचपन से ही था। मां से कृष्ण भक्ति का संस्कार मिला तो पिताजी से वैरागी भक्ति का संस्कार मिला और आपका स्वयं का रूझान शुरू-शुरू में मां दुर्गा की आराधना में रहा। इस तरह आप शक्ति, भक्ति एवं गति का समन्वित स्वरूप है।

व्यावहारिक शिक्षा आपकी बी.ए. द्वितीय वर्ष तक रही। भगवद्गीता के प्रति रूझान आपका बचपन में ही निर्मित हो गया था। धर्म एवं अध्यात्म से जुड़ी जानकारियां एवं स्वयं की जिज्ञासाओं को सुलझाने व जानने के लिए आप प्रयासरत रहती। इसी जिज्ञासावृत्ति ने आपको बिन्दु से सिन्धु बना दिया, ससीम से असीम बन गयी।

गहन लगन एवं एकाग्रता का ही परिणाम रहा कि आप साधना में गहन से गहनतर गहराई में उतरती गयी। साधना के दौरान आप भिन्न-भिन्न अनुभूतियों से गुजरी। कभी स्वयं पानी की तरह तरल हो जाती और स्वयं को धार की प्रवाह में पाती तो कभी देह से परे हो जाती। कभी जन्मों-जन्मों का रुदन फूट पड़ता तो कभी मंद-मंद मुस्कराती। कभी झूमते-गाते, भजन इत्यादि करती तो कभी इतने मौन में, ध्यान में चली जाती कि मूर्तिवत हो जाती।  जब आपकी कुंडली जागृत हुई तब आपने अपने भीतर ऊर्जा का सैलाब देखा तो शरीर को कभी हवा की तरह हल्का पाया। आपका कहना है साधना पथ में आपने स्वयं की वास्तविकता को जाना।

आपके समय-समय पर कई आदर्श रहे जो आपको बचपन से लेकर आज तक जीवन के विभिन्न मोड़ पर किसी-न-किसी रूप में प्रभावित करते रहे हैं, उनमें से हैं- वीर सावरकरजी, भगतसिंहजी, गुरु गोविंदसिंहजी और स्वयं आपके गुरु योगपुरुष स्वामी परमानन्दजी महाराज। इन सबके अलावा आप भगवान श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व से भी बहुत प्रभावित रही। एक और उनकी मधुर बांसुरी की तान तथा दूसरी ओर सुदर्शन चक्र उठाने की क्षमता आपको सदा प्रेरणा देती रही है। परन्तु इन सबसे भी ऊपर यदि आपका कोई आदर्श रहा जिसने आपको सदा कुछ सीखने, समझने की प्रेरणा दी, हर स्थिति और परिस्थिति में आपको बचपन से लेकर आज तक न केवल प्रभावित किया बल्कि प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से साथ भी दिया, वह रही आपकी स्वयं की मां, कलावती जी।

आपने जीवन का उद्देश्य अध्यात्म के साथ परिवार, समाज और राष्ट्र को सक्रिय करना रहा है। जगत को सही दिशा देना, हिन्दु समाज व हिन्दुस्तान की सेवा करना है। आपने सेवा एवं समाज उत्थान के अनेक रचनात्मक एवं सृजनात्मक उपक्रम शुरु किये, जिनमे सर्वाधिक महत्वपूर्ण है-नवजात शिशु जिन्हें अच्छी कोख नहीं मिलीं उन्हें अच्छी गोद देना है। निराश्रित और निरूद्देश्य युवतियों के हृदय में ‘यशोदाभाव’ जागृत करके निराश्रित शिशुओं को मां की वात्सल्यमयी गोद उपलब्ध कराना व उन्हें स्वावलंबी, देशभक्त, संस्कारित और समाजसेवा में समर्पित नागरिक बनाना। तिरस्कृत वृद्धाओं को ममत्व व स्नेहपूर्ण और वात्सल्य परिवार का संरक्षण प्रदान करना है। वनवासी बालिकाओं/महिलाओं को विभिन्न गृह उद्योगों में व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर उन्हें, उन्हीं के क्षेत्र में प्रस्थापित करके वहां की महिलाओं का विकास करने का दायित्व सौंपना है। इस तरह इन्होंने ऐसे वात्सल्य परिवारों की स्थापना की, जिसमें एक समर्पित मां, एक मौसी, एक नानी और छह सात बच्चे, जो भाव-संबंधों से गुम्फित होते हैं। निराश्रित शिशुओं को अनाथालाय, निराश्रित युवतियों को नारी निकेतन और तिरस्कृत वृद्धाओं को वृद्धाश्रम न देकर उन्हें वात्सल्य परिवार के सदस्य के रूप में स्थापित करना तथा दो वंचितों को एक दूसरे का पूरक बनाने का महान् उपक्रम करके आपने समाज और राष्ट्र को एक नयी दिशा दी है। ‘दीदी मां’ वात्सल्यग्राम रूपी माला का वह धागा है जिस से गुजर कर हर मनका माला बनती है।

अभी कुछ दिनों पूर्व श्रीकृष्ण की लीला स्थली वृन्दावन नगरी में इसी वात्सल्यग्राम रूपी नये तीर्थ को देखने का मौका मिला। इस अनूठे प्रकल्प के पीछे की सोच अनाथालय की व्यवसायिकता और भावहीनता के स्थान पर समाज के समक्ष एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करने की अभिलाषा रही है जो भारत की परिवार की परम्परा को सहेज कर संस्कारित बालक-बालिकाओं का निर्माण करे न कि उनमें हीन भावना का भाव व्याप्त कर उन्हें अपनी परम्परा और संस्कृति छोडऩे पर विवश करे।

दीदी मां यह प्रकल्प देखकर जो पहला विचार मेरे मन में आया वह हिन्दुत्व की व्यापकता और उसके बहुआयामी स्वरूप को लेकर आया। ये वही साध्वी ऋतम्भरा हैं जिनकी सिंह गर्जना ने श्रीराम मन्दिर आन्दोलन को ऊर्जा प्रदान की थी, परन्तु उसी आक्रामक सिंहनी के भीतर वात्सल्य से परिपूर्ण स्त्री का हृदय भी है जो सामाजिक संवेदना के लिये द्रवित होता है। यही हृदय की विशालता हिन्दुत्व का आधार है कि अन्याय का डटकर विरोध करना और संवेदनाओं को सहेज कर रखना। सम्भवत: हिन्दुत्व को रात दिन कोसने वाले या हिन्दुत्व की विशालता के नाम पर हिन्दुओं को नपुंसक बना देने की आकांक्षा रखने वाले हिन्दुत्व की इस गहराई को न समझ सकें।

साध्वी ऋतम्भराजी सुप्त हिन्दू के हिन्दुत्व को जगाने और श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन को जन आंदोलन बना देने वाली महानायिका हैं। जिनके राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत प्रवचन सुनने को आपके धोर विरोधी भी सदैव आतुर रहते हैं। आप बच्चों के बीच स्नेहमयी दीदी मां हैं, अन्य सभी लोगों की प्रिय दीदी हैं। श्रीमद्भागवत कथा की विदुषी प्रवक्ता हैं। इन सबसे अधिक पूज्य गुरुदेव स्वामी परमानन्दजी महाराज की कर्मठ, निष्ठावान शिष्या हैं, जिन्होंने शिष्यत्व को गरिमा प्रदान की। आप पवित्र हवा के झोंके की तरह हैं जो गुरुदेव की अलौकिक वाणी की सुगंध को पूरे राष्ट्र में फैलाने में सहयोग दे रही हैं। हिन्दु संस्कृति की रक्षा के लिए बालिकाओं की, जो कल की माताएं होंगी, सेना का निर्माण कर रही हैं। लाला लाजपत राय की तरह आप जेल यात्राओं के साथ-साथ, शत्रुओं की धमकियों के बीच प्राण हथेली पर लेकर देश भर में घूमती हैं।

समग्र मानव समाज के कल्याण का चिंतन करने वाली क्रांतिकारी युगद्रष्टा सद्गुरु दीदी मां ने अपने आध्यात्मिक आंदोलन एवं विचारों के द्वारा जिस मानव धर्म एवं सुख, संस्कार एवं समृद्धि से परिपूर्ण आदर्श परिवार की परिकल्पना की है, उस कल्पना की पूर्ति सभी समस्याओं का समाधान है। कहा जा सकता है कि दीदी मां के समाज चिंतन में जो क्रांतिकारिता, परिवर्तन के स्फुलिंग एवं नये दिशाबोध हैं, वे समाजशास्त्रियों एवं समाज निर्माताओं को भी चिंतन की नई खुराक देने में समर्थ हैं।

 ललित गर्ग

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