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एकदिवसीय को टी२० न बनाएं

एकदिवसीय को टी२० न बनाएं

कहते हैं क्रिकेट के खेल के तीन मुख्य पहलु होते हैं- बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण। इन तीनों पहलुओं से खेल में रोमांच बना रहता है। लेकिन इनमें से एक भी पहलु अगर बाकि पहलुओं पर हावी हो जाए तो खेल से न केवल प्रतिस्पर्धा कम हो जाएगी बल्कि रोमांच भी खत्म हो जाएगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एकदिवसीय क्रिकेट में बल्लेबाजों का दबदबा काफी बढ़ गया है। यही वजह है कि आज 350 के स्कोर का भी आसानी से पीछा कर लिया जाता है। इसके कई मुख्य कारण हैं- सपाट पिच, छोटी बाउंड्री, पॉवरप्ले, फ्री हिट सभी प्रकार की नो बॉल पर, बेहतर व मजबूत बल्ले आदि। इन्ही कारणों से आज एकदिवसीय क्रिकेट में आए दिन 350 से 400 रन बन रहे हैं।

पहली बार 350 रनों का आंकड़ा वेस्टइंडीज ने 1987 विश्व कप के दौरान श्रीलंका के विरूद्ध छुआ था। दूसरी बार यह करिश्मा इंग्लैंड ने पांच साल बाद 1992 में पाकिस्तान के खिलाफ किया। 350 रनों की चुनौती पर विजय मिल चुकी थी लेकिन अभी भी यह किसी करिश्मे से कम नहीं था। वर्ष 2000 तक खेले गए 1662 एकदिवसीय मैचों में कुल 6 बार ही 350 का आंकड़ा पार हुआ। 2001 से 2004 के बीच कुल 12 बार 350 का आंकड़ा पार हुआ। वर्ष 2004 के अंत तक कुल एकदिवसीय मैचों का . 27 प्रतिशत मैचों में 350 या ज्यादा स्कोर बना। अगले दस सालों में यानि 2005 से 2014 तक यह आंकड़ा 2 प्रतिशत पर पहुंच गया, यानि प्रतिवर्ष 6 बार 350 का आंकड़ा पार हुआ। 1987 से अबतक कुल 69 बार 350 का आंकड़ा पार हुआ।

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वर्ष 2015 से अबतक और 31 बार 350 या उससे अधिक रन बन चुके हैं। 2015 विश्व कप में ही 7 बार टीमों ने 350 का आंकड़ा पार किया। हाल में भारत-इंग्लैंड श्रंखला में 6 में से 4 पारियों में 350 का आंकड़ा पार हुआ। 2005 से 2014 के 2 प्रतिशत के मुकाबले 2015 से अब तक 6 प्रतिशत से अधिक बार 350 का आंकड़ा पार हो चुका है। खेल के विशेषज्ञ भी एकदिवसीय में बल्ले के बढ़ते दबदबे को लेकर चिंतित तो हैं। भारतीय पूर्व टेस्ट क्रिकेटर सुधीर नायक (जो आजकल वानखेड़े के पिच क्यूरेटर हैं) के अनुसार आई सी सी द्वारा नियमों में फेरबदल व सपाट पिचों को एकदिवसीय में 350 रनों के बढ़ते चलन का जिम्मेदार बताया।

rohitभारत ने सर्वाधिक 23 बार एकदिवसीय में 350 का आंकड़ा पार किया है। दूसरे नंबर पर दक्षिण अफ्रीका है जिसने 22 व ऑस्ट्रेलिया ने 16 बार एकदिवसीय में 350 का आंकड़ा पार किया है। भारत व दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर कुल 100 में से 45 बार 350 का आंकड़ा पार किया है। अकेले भारत में ही 26 बार एकदिवसीय में 350 या इससे अधिक का स्कोर बना है, जबकि दक्षिण अफ्रीका में 20 बार 350 या इससे अधिक का स्कोर बना है। इन दोनों देशों को छोड़ किसी और देश में 10 बार भी 350 या इससे अधिक का स्कोर नहीं बना। अगर बात टारगेट का पीछा करने की हो तो कुल 10 बार 350 या इससे अधिक का स्कोर बना है, जिसमें भारत व इंग्लैंड ने तीन, दक्षिण अफ्रीका ने दो व न्यूजीलैंड और श्रीलंका ने एक-एक बार टारगेट का पीछा करते हुए 350 या इससे अधिक का स्कोर बनाया है। इसमें 7 बार टीमों ने जीत भी हासिल की है। भारत ने तीन, दक्षिण अफ्रीका ने दो जबकि इंग्लैंड व न्यूजीलैंड ने एक-एक बार टारगेट का सफलतापूर्वक पीछा किया है।

भारत-इंग्लैंड सीरीज में दो लगातार मैचों में 350 या इससे अधिक का स्कोर चेस हुआ जो क्रिकेट इतिहास में पहली बार हुआ है। इससे पहले किसी सीरीज में 350 या इससे अधिक का स्कोर दो बार चेस भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच 2013 में खेली गई सीरीज में हुआ था। वर्ष 2002 में एकदिवसीय क्रिकेट में औसत रन रेट 4.94 प्रति ओवर था। तब टी20 क्रिकेट का आगाज भी नहीं हुआ था। दस वर्ष बाद औसत रन रेट केवल 5.05 प्रति ओवर ही हुई। 2012 में बल्लेबाजों के मददगार नियमों का अनुसरण किया गया और एक साल बाद औसत रन रेट 5.50 प्रति ओवर हो गई। 2013 में फिर नियमों में बदलाव हुए और गेंदबाजों के प्रतिकूल नियमों के बावजूद बल्लेबाज टारगेट को सरलता से चेस कर पाए। 2013 के शुरूआत से कुल 27 बार 300 से 324 का टारगेट सफलतापूर्वक चेस हुआ है, जबकि 2001 से 2013 के बीच कुल 17 बार ही 300 से 324 का टारगेट सफलतापूर्वक चेस हुआ।

आज गेंदबाजों के लिए खेल में ज्यादा ऑपशन नहीं हैं। हमें खेल में संतुलन रखना होगा। अगर गेंदबाज को उसके मददगार वातावरण मिल जाए तो बल्लेबाज 150 रन भी नहीं बना पाते। हवा या पिच से मूवमेंट या स्पिन की मददगार पिच या उछाल से आज बल्लेबाज कांपते नजर आते हैं। समय आ गया है कि आई सी सी खेल में संतुलन बरकरार रखने के लिए जल्द नियमों में बदलाव करे वरना वो दिन दूर नहीं जब एकदिवसीय क्रिकेट में एक बल्लेबाज ही अके ले 300 और टीम का स्कोर 500 होगा। उम्मीद है हमें गेंद व बल्ले के बीच बराबरी की टक्कर देखने को मिलेगी।

सौरभ अग्रवाल

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