ब्रेकिंग न्यूज़ 

विचार मंथन

विचार मंथन

हम हमेशा अपने मन में सुविचार और कुविचार दोनों के बीच में दबे रहते हैं। कितना भी अधिक सुविचारों को मन में लाते हैं, कितना भी अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन अपने मन को दुख और दुश्चिन्ता से मुक्त नहीं कर पाते हैं । जब हम सतचिन्ता प्राप्त करते है अथवा जब हम सुविचारों के साथ होते हैं उसी क्षण हम खुश रहते हैं, लेकिन जैसे ही उससे दूर होते है लगातार दुख हमें सताने लगता हैं। हमें यह समझ में नहीं आता है कि वास्तव में ऐसा क्यों होता है। हम सब कुछ जान कर भी अपनी चिन्तन प्रक्रिया को संतुलित नहीं कर पाते हैं। जिस तरह एक कोठरी जब कुछ पुरानी एवं गंदी चीजों से भरी हो, और ऊपर से जितनी भी सुन्दर और मूल्यवान चीजों से सजाने का प्रयास करे, हमारा वह गृह व्यवस्थित नहीं हो सकता। उसी तरह जब तक हमारे मन के अन्दर रहने वाले गन्दे विचारों को हम बाहर निकाल कर फेंक न दें तब तक हम अच्छे विचारों को काम में नहीं लगा सकते हैं।

खुद को दुश्चिन्ता से दूर करना इतना सहज कार्य नहीं है। कितने ही बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इसी कार्य में सक्षम नहीं हो सकते हैं। केवल अभ्यास के द्वारा हम कुछ हद तक यह करने में सक्षम हो सकते हैं। हमारा कुछ प्रयास भी हमें अनेक सुख दे सकता है। दुश्चिन्ता को मन से दूर रखने का सर्वप्रथम प्रयास है अपने आपको ज्यादा से ज्यादा समय तक सतकार्य में विनियोग करके रखना। जितना अधिक समय हम अच्छा कार्य करने में लगाते हैं उतना अधिक मन प्रसन्न होता है, हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है। इसलिये खुद को आध्यात्मिक विचारों में डुबाकर रखें। आध्यात्मिक भाव से रहने वाला व्यक्ति परमात्मा के ऊपर इतना अधिक विश्वास करता है कि जटिल परिस्थितियों में भी केवल सब कुछ ठीक जाएगा इसी विचार से खुश रहता है। अगर कोई व्यक्ति आध्यात्मिक अथवा धार्मिक विचारों का ना भी हो मगर अपने कर्म को ईश्वर मानकर चलता हो तो वह भी सदैव संतुष्टि भाव से रहता है।

अनेक समय हमें यह ज्ञान नहीं होता है कि कौन सा कार्य सतकार्य है और कौन सा कार्य कुकार्य है। जब हमें कुछ पाने की चाहत होती है अथवा हमें कुछ भोग करने की लालच होती है उसे पाने के लिए किये गये कार्य को हम अपने ध्यान में नहीं ला पाते हैं। धीरे-धीरे वह हमारा कुभ्यास बन जाता है जो हमें सतचिन्ता से दूर करता है। फिर वही हमारे दुख का कारण बन जाता है। देखा जाए तो मन इन सुविचार और कुविचार के बीच में दब जाता है। जरूरत है तो कुछ समय शांत बैठकर अपने अन्दर ही अपने मन में मंथन करें। हम में से ऐसे बहुत लोग हैं, जिनकी सोच बहुत ऊंची है। हमारे मानस मंथन के माध्यम से हमें जीवन की नैया का दृष्टिकोण मिल जाता है। हम आसानी से सभी चीजों का सामना कर सकते हैं। शांत बैठना अथवा कुछ समय योग करना हमारे दिल और दिमाग दोनों को पोषण प्रदान करता है। समय-समय पर विचार-मंथन के माध्यम से विश्वरूपी दुश्चिन्ता शांत होती है। उसके विसर्जन से प्राप्त होने वाली सतचिन्ता के अमृतपान से हमारा जीवन जरूर आनंदमय हो जायेगा।

उपाली अपराजिता रथ

wobs.uaоптом косметика украина

Leave a Reply

Your email address will not be published.