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लाजवाब बजट

लाजवाब बजट

आजादी के बाद पहली दफा बजट पारंपरिक समय से पहले लाया गया, जो वाकई अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल खाता है। अब भारत प्रशासनिक व्यवस्था के हर पहलू में अनोखा बदलाव ला रहा है। मगर इकलौता विपक्ष नरेंद्र मोदी सरकार के लोकप्रिय बजट पर हताशा में अनाप-शनाप प्रतिक्रया दे रहा है। इस साल का बजट किसानों, गरीबों की हर समस्या का समाधान पेश करता है और इन्फ्रास्ट्रक्चर, ग्रामीण विकास और वंचितों के उत्थान पर फोकस करता है। प्रगति के इस एजेंडे में स्वास्थ्य और शिक्षा भी प्राथमिकता की सूची में है। बजट गरीबों के कल्याण पर केंद्रित है इसलिए कांग्रेस के लिए इसकी आलोचना करना भी भारी पड़ रहा है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने कांग्रेस से उसका मुद्दा ही छीन लिया और अब वह सिर्फ घडिय़ाली आंसू बहाने पर मजबूर है।

तीन महीने पहले सरकार के नोटबंदी के ऐतिहासिक फैसले के मद्देनजर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वाकई बजट के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। इस पृष्ठभूमि में वित्त मंत्री के लिए यह जरूरी था कि आम आदमी की आशंकाओं को दूर किया जाए। उन्होंने अपने बजट में यह काम बखूबी किया। निजी आयकर में रियायतों के प्रस्ताव लोगों के लिए प्रेरणादायक हो सकते हैं। मसलन, 2.5 लाख रु. से 5 लाख रु. तक की आमदनी वालों के लिए आयकर की दर 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दी गई है। हालांकि 50 लाख रु. से 1 करोड़ रु. आमदनी वालों पर 10 प्रतिशत अधिभार लगाकर राजस्व घाटे की भरपाई की कोशिश की गई है। पहली बार रिटर्न दाखिल करने वालों को समीक्षा से बरी कर दिया गया है और 5 लाख रु. तक सालाना आमदनी वालों को सिर्फ एक पन्ने का रिटर्न दाखिल करने की सहुलियत दी गई है। ये सभी प्रस्ताव प्रेरणादायक हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर के मद में भारी आवंटन खुशहाली ला सकता है मगर देखना होगा कि इसका असर लक्षित वर्ग तक किस पैमाने पर पहुंचता है।

लघु और मझोले उद्योगों को राहत के प्रस्ताव प्रगति और रोजगार को बढ़ावा दे सकते हैं। फिर, आवास को आम लोगों की पहुंच में लाने का प्रस्ताव भी स्वागतयोग्य है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य की जानकारी से लैस स्मार्ट आधार कार्ड भी सुखद एहसास दिलाएगा। सबसे राहत की खबर तो यह है कि संदिग्ध राजनैतिक चंदों पर अंकुश लगाने के लिए अहम प्रस्ताव किए गए हैं। मेरी राय में राजनैतिक दलों के लिए नकद चंदे की सीमा 2,000 रु. तक करने से सबसे भ्रष्ट नेताओं पर चोट पड़ेगी, जो समाज के हर वर्ग से रकम लेने के लिए शर्म-हया की सीमा भी लांघ चुके हैं। इसलिए यह कहने की दरकार नहीं कि यह एक जिम्मेदार सरकार का जिम्मेदार बजट है, जिसके लिए देशहित सर्वोपरि है। इसके विपरीत कांग्रेस सरकारें सिर्फ बांटो और राज करो की नीति पर चलती रही हैं और सिर्फ अल्पसंख्यक वोटों के लिए खजाने को खाली करती रही हैं। अरुण जेटली ने वाकई खूब सोच-समझकर मौजूद संसाधनों में संतुलन साधने की कोशिश की है। इसमें दो राय नहीं कि हर बजट प्रस्ताव को मौसम के मिजाज, दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन वगैरह पर निर्भर होना पड़ता है। लेकिन उन्होंने तात्कालिक लाभ के लिए वित्तीय अनुशासन को ढीला नहीं किया है। इसलिए यह कहना लाजिमी है कि बजट में गरीब और जरूरतमंदों की मदद करने की सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर होती है। रेलवे बजट भी वाकई अच्छा है क्योंकि यह साफ-सुथरे स्टेशनों और सुखद यात्रा को आश्वस्त करता है।

पांच राज्यों के चुनाव के मद्देनजर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखकर अरुण जेटली ने काफी उम्मीदों से भरा बजट पेश किया। इससे विपक्ष की बोलती बंद हो गई है। उन्होंने जनता को खुश कर दिया मगर वित्तीय अनुशासन जरा भी नहीं तोड़ा। अब यह देखना है कि यह बजट खासकर उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को कितना आश्वस्त कर पाता है, जहां चुनाव जाति गणित पर होते हैं।

बजट का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास की राह को जारी रखा गया है जबकि कर आधार को चौड़ा करके राजस्व में इजाफे का प्रावधान किया गया है। यह बेहद सुविचारित बजट है, जिसमें निचले आय वर्ग की तकलीफ दूर करने पर जोर दिया गया है और साथ ही दीर्घावधिक इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास पर भी ध्यान दिया गया है। घरेलू अर्थव्यवस्था में उत्पादकता लाने और उसे सक्षम बनाने के लिए बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक संरचना में भारी निवेश की दरकार है। यह हमारी अर्थव्यवस्था को दूसरे देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए भी जरूरी है। यह देश को आर्थिक और सामरिक मजबूती देने और लोगों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए भी जरूरी है। प्रशासन की गुणवत्ता, विभिन्न सामाजिक तबकों के जीवन में उत्साह पैदा करने और देश को भ्रष्टाचार, कालेधन और अपारदर्शिता जैसी बुराइयों से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार का एजेंडा देश में बेहतर माहौल पैदा करेगा। यहां यह बताना भी जरूरी है कि सरकार की बैंकों के डूबत कर्ज (एनपीए) के लिए विशेष वैधानिक नियम लाने की कोशिश भी स्वागतयोग्य है। इसी तरह देश में डिजिटल भुगतान का ढांचा तैयार करने के लिए भी सरकार सराहना की पात्र है। अरुण जेटली की तारीफ करनी होगी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता के दौर में वे किसी तात्कालिक लाभ की लालच में नहीं फंसे। यह भी हकीकत है कि कोई बजट हर किसी को खुश नहीं कर सकता। हमेशा कुछ लोग आलोचना करेंगे ही। चुनावी राज्यों के लिए कोई लोकलुभावन योजना न ला पाने के लिए भी कुछ वास्तविक अड़चनें होंगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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