ब्रेकिंग न्यूज़ 

कण-कण में हैं राम

कण-कण में हैं राम

By दीपक कुमार रथ

अब यह साफ हो चुका है कि बहुचर्चित फिल्म ‘पीके’ हॉलीवुड की चर्चित हास्य-व्यंग्य फिल्म ईटी (जिसमें दूसरे ग्रह से आए प्राणी धार्मिक आस्थाओं का माखौल उड़ाते हैं) की तर्ज पर बनाई है। ‘पीके’ में ऐसे कई दृश्य हैं जो हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करते हैं। कोई भी स्वाभिमानी हिंदू विचारों और कला की आजादी के नाम पर हिंदू धर्म, संतों और रीति-रिवाजों की अवमानना पर फिल्म पर पूरी बंदिश लगाने की मांग करेगा।

यह वाजिब है कि आखिरकार हमेशा उदासीन रहने वाले हिंदू, हिंदू धर्म पर इस बेहद पूर्वाग्रहग्रस्त तथा एकतरफा हमले के खिलाफ उठ खड़े हो रहे हैं। फिल्म के एक दृश्य में नायक पीके एक पेड़ के नीचे एक पत्थर रखता है और अपने पान के पत्ते से चूना लेकर उस पर तिलक लगाता है, फिर उसके सामने कुछ पैसे डाल देता है, ताकि नायिका के पिता को यह दिखा सके कि ईश्वर के बारे में उसकी मान्यता गलत है। कुछ देर बाद ही उस पत्थर को ‘शिव लिंग’ समझकर लोग दंडवत करने लगते हैं और चढ़ावा चढ़ाने लगते हैं। एक दूसरे दृश्य में पीके (अभिनेता आमिर खां) हाथ में शराब की बोतल लिये मंदिर में चला जाता है।

क्या आमिर ऐसे ही मक्का के काबा या ‘सलीब पर ईसा मसीह’ की सुंदर मढ़ी तस्वीर किसी पेड़ के नीचे रखकर मुसलमानों या ईसाइयों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की जुर्रत कर सकते हैं? अगर ऐसा करते तो भारी शोर-गुल मच गया होता और यकीनन आमिर के खिलाफ कोई फतवा जारी हो गया होता।

यह विषय बहुत गंभीर है। भला कोई अपने पुरखों की धार्मिक मान्यताओं की हंसी उड़ाते कैसे बर्दाश्त कर सकता है। यह फिल्म सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी है कि वह देखे कि कहीं धार्मिक भावनाएं तो आहत नहीं हो रहे हैं। फिर सेंसर बोर्ड ने उन दृश्यों को हटाने के लिए क्यों नहीं कहा जिनमें ‘ईश्वर’ का माखैल उड़ाया गया है? क्या बोर्ड आमिर खान के जलवे से अभिभूत था या फिर अपने पिछले चेयरमैन की तरह उसे ऐसे दृश्य आपत्तिजनक नहीं लगे। अब पता चल रहा है कि बोर्ड के चार सदस्यों में दो ने ऐसे दृश्यों पर अपनी लिखित आपत्तियां जाहिर की थीं। लेकिन सेंसर बोर्ड की चेयरमैन लीला सैमसन ने कहा, ”हर फिल्म किसी न किसी की धार्मिक भावनाओं पर चोट करती है। हम ऐसी बेमतलब की दलीलों से दृश्यों को नहीं हटा सकते क्योंकि रचनात्मक स्वतंत्रता भी कोई चीज होती है जिससे लोग किसी विषय पर अपने विचार प्रकट करते हैं। हमने पीके को सर्टिफिकेट दिया है और फिल्म सार्वजनिक हो चुकी है इसलिए हम अब दृश्यों को नहीं हटा सकते।’’

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही फिल्म की मदद को आगे आ चुका है और साफ-साफ कह चुका है कि फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की कोई जरूरत नहीं है। सर्वोच्च अदालत फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की अपील खारिज कर चुका है, बल्कि उसकी यह भी सलाह है कि जो उसकी भावनाओं और प्रस्तुति से सहमत नहीं हैं, वे ”फिल्म न देखें।’’ तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश लोढ़ा ने कहा था, ”आप नहीं पसंद करते तो फिल्म न देखें। इसमें धर्म का पचड़ा न डालिए।’’ लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब किसी की भावनाओं से खेलना तो नहीं होता।

‘पीके’ को लेकर हिंदुओं के विरोध जारी हैं। इस बीच वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की फिल्म की सराहना कुछ प्रदर्शनकारियों को घाव पर नमक छिड़कने जैसा लगा।

यहां तक कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महल ने भी कहा है कि सांप्रदायिक सद्भाव को कायम रखने के लिए सेंसर बोर्ड को दृश्यों को हटा देना चाहिए। मौलाना ने कहा, ”अगर किसी फिल्म में धार्मिक भावनाएं आहत करने जैसे मामले हों, खासकर जब एक मुसलमान आमिर खान ने हिंदू पात्र का अभिनय किया हो तो उस पर कुछ को गुरेज हो सकता है।’’ सिखों को भी आपत्ति है कि उसमें एक सिख भिखारी को दिखाया गया है जबकि कोई सिख भीख नहीं मांगता।

यही नहीं, साजिश की अटकलें भी शुरू हो गई हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने यह कहकर नए विवाद को हवा दे दी है कि राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी इस फिल्म को वित्तीय मदद आइएसआइ ने दी है। भाजपा नेता ने राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआइ) से मांग की है कि फिल्म की फंडिंग के स्रोत की जांच करे।

अब आइए जरा कुछ पीछे चलें। इस साल 16 मई 2014 की सुबह (लोकसभा के नतीजों के दिन) एनडीटीवी समाचार चैनल पर जेएनयू की प्रोफसर जोया हसन ने कहा, ”भारतीयों के मताधिकार (हिंदुओं को) पर पुनर्विचार होना चाहिए।’’ संसद के दोनों सदनों में कुछ छोटे-मोटे बेमानी हिंदू संगठनों के ‘पुनर्धर्मांतरण’ या शासक दल के किसी एक मामूली सांसद के कुछ बेमानी धार्मिक मुद्दों पर टिप्पणियों को लेकर हो-हल्ला मचता रहा है। पिछले महीने केंद्र सरकार की एक कनिष्ठ मंत्री की ‘भदेस’ किस्म की टिप्पणी ही टीवी समाचार चैनलों पर छाई रही। यह तिल का ताड़ बनाने का अनोखा मामला है।

पिछले कुछ बरसों से मीडिया में खासकर हिंदू धार्मिक नेताओं, मठों और जिन्हें व्यंग्य से ‘धर्मगुरु’ कहा जाता है उनका माखौल उड़ाने, उनकी निंदा करने का अभियान लगातार जारी है। ऐसी फिल्मों पर रोक लगनी चाहिए और फिल्मों को दिखाने की मंजूरी देने वाली सेंसर बोर्ड जैसी संस्थाओं में सुधार किया जाना चाहिए। हिंदू निंदा हाल के दौर में बॉलीवुड में तथाकथित सेकूलर अभिजनों का नया शगल बन गया है।

kiddsy отзывыВиды и назначение аудитов сайта: SEO

Leave a Reply

Your email address will not be published.