ब्रेकिंग न्यूज़ 

योग पुनर्जागरण के अग्रदूत

योग पुनर्जागरण के अग्रदूत

पिछली सदी का पूर्वार्ध भारत में  सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण का युग था जब तमाम मनीषियों ने भारत के प्राचीन ज्ञान और विद्याओं  के संजीवनी प्रदान की। जनजीवन से लगभग लुप्त हो चुके योग के पुनर्जागरण का श्रेय जाता है – कृष्णमाचार्य को। उनके समय में  योग जो केवल जंगलों और गुफाओं  में रहनेवाले साधु संन्यासियों की बपौती रह गया था कृष्णमाचार्य ने उसे शहरों में लाकर उसकी शिक्षा दीक्षा और प्रचार प्रसार कर उसे एक बार फिर लोकप्रिय बनाया। उसके बाद तो फिर योग की आंधी ऐसी चली कि वह सारी दुनिया में फैल गया। कृष्णमाचार्य खुद तो कभी भारत के बाहर गए नहीं लेकिन उनके शिष्यो पट्टभि ज्वाइस, देशिकाचार, इंद्रादेवी और बी. के. एस. अयंगार ने योग को दुनियाभर में  पहुंचाया। तभी तो कृष्णमाचार्य को आधुनिक योग का जनक कहा जाता है।

उनके यौगिक परंपरा को बहुत से योगदान हैं जिन्हें आज की योग परंपरा ने आत्मसात कर लिया है। कहा जाता है कि आधुनिक काल में शीर्षासन और सर्वांगासन को जो महत्व दिया जा रहा है उसका श्रेय उन्हीं को है। इसके अलावा वे योग आसनों में परिष्करण, उनकी सिक्वेसिंग, आसन विशेष की उपचारात्मक उपयोगिता, के प्रवर्तक थे। आसनों से साथ प्राणायाम को जोड़कर उन्होंने उस आसन को ध्यान की सीढी बनाने के बजाय उसका अपरिहार्य हिस्सा बना दिया।

वास्तव में आज के योग में आसनों के अभ्यास को जितना महत्व दिया जा रहा है वह कृष्णाचार्य की देन है। उनसे पहले किसी योगी ने शारीरिक अभ्यास इतने सायास तरीके से विकसित नहीं किया था। इस प्रक्रिया में उन्होंने हठयोग को रूपांतरित कर दिया। इस के साश वह भारत में योग के पुनर्जागरण के केंद्र में आ गया। इसमें उन्नीस सौ तीस के दशक में उनके द्वारा दिए अनेकानेक भाषणों और योग प्रदर्शनों का महत्वपूर्ण योगदान है। कृष्णमाचार्य ने हठयोग में पारंगत होने के बाद अध्यापन के कैरियर की शुरूआत की।

वर्ष 1888 में जन्में कृष्णमाचार्य के समय योग बहुत उपेक्षित स्थिति में था। उसकी साधना करने वाले केवल कुछ ही लोग रह गए थे। उन्नीसवी सदी के हिन्दू पुनर्जारण ने अन्य क्षेत्रों की तरह योग को भी प्रभावित किया और उसमें भारतीय परंपरा की नई जान फूंकी। युवा कृष्णामार्य ने इस कार्य के लिए अपने को समर्पित कर दिया। संस्कृत, तर्कशास्त्र, कर्मकांड, और आयुर्वेद का उन्होंने गहन अद्ययन किया। उनके बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके पिता ने उन्हे पांच साल की उम्र में पतंजलि योगसूत्र की शिक्षा देना शुरू किया। स्वयं कृष्णमाचार्य के मुताबिक उन्होंने अपने गुरू राममोहन ब्रह्मचारी से सात साल तक पतंजलि के योगसूत्र, आसन और प्राणायाम और योग के उपचारात्मक पहलुओं के बारे में शिक्षा ली। उनका दावा है कि इस दौरान 3000 आसनों में दक्षता हासिल की। उसके कुछ चमत्कृत करनेवाले कौशलों पल्स रोकना में पारंगत हो गए। उसके बाद उनके गुरू ने उनसे कहा कि वे अपने गृह प्रदेश जाएं और घर बसाने के अलावा योग शिक्षा दें।

कृष्णमाचार्य की शैक्षणिक योग्यता के कारण उन्हें किसी भी बड़े संस्थानों  में अच्छा पद मिल सकता था लेकिन गुरू की बात को मानते हुए उन्होंने इन अवसर को छोड़ दिया। एक तरह से उन्हें फिर गरीबी का वरण करना पड़ा। तब 1920 के दशक में योग सीखाना कोई फायदेमंद पेशा नहीं था। लोग योग के बारे में ज्यादा जानते नहीं थे इसलिए छात्र कम ही होते इसलिए उन्हें काफी प्लांटेशन में फोरमैन की नौकरी करनी पड़ी। लेकिन छुट्टी के दिनों में वे सारे राज्य में घूमकर योग पर भाषण देते थे और योग प्रदर्शन करते थे। कृष्णमाचार्य योग को लोकप्रिय बनाने के लिए सिद्धियों का प्रदर्शन करते थे। ये योग प्रदर्शन इस तरह तैयार के गए थे कि लोगों की योग में दिलचस्पी जागे। इनमें प्रमुख थी अपनी नब्ज को रोक देना। हाथ से कार रोकना, किसी वजनदार चीज को दांत से उठाना आदि। उन्हें लगता था कि लोगों को योग सीखाने के लिए जरूरी है कि पहले योग की तरफ उनका ध्यान आकर्षित हो।

आधुनिक योग के पितामह माने जाने वाले टी कृष्णमाचार्य का जन्म मैसूर में हुआ था। वे योग शिक्षक के साथ साथ उपचारक भी थे। उन्होंने लॉर्ड इर्विन, मैसूर के महाराजा के मधुमेह उपचार किया था। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उनसे प्रेरणा लेकर दुनिया भर में कई योग संस्थान खुले। अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने मैसूर के शाही दरबार में बिताया जहां वे दर्शनशास्त्र व योग सिखाते थे। सन् 1933 में उन्होंने भारत के पहले योग स्कूल की नींव रखी। 1989 में सौ साल की उम्र में निधन होने से पहले उन्होंने ऐसे कई योग्य शिष्य तैयार कर दिए जिन्होंने देश विदेश में योग की महत्ता को बढ़ाया। उन्होंने अपने आखिरी दिनों तक हठ योग की विनियोग प्रणाली का अभ्यास किया और उसकी शिक्षा दी। उनके पुत्र टी.के.वी. देसीकाचर अपने संत पिता की शिक्षाओं को जारी रखे हुए हैं। उन्होंने बाकी लोगों के साथ प्रसिद्ध जिद्दू कृष्णमूर्ति को भी योग सिखाया है। श्री कृष्णामाचार्य के एक और मशहूर विद्यार्थी हुए बी. के. एस. अयंगर जो खुद भी एक विश्व प्रसिद्ध गुरु थे।

कृष्णमाचार्य का भाग्य गुला 1931 में जब उन्हें मैसूर के संस्कृत कालेज में पढ़ाने का न्यौता मिला। जहां वेतन अच्छा था इसलिए योगा सीखाने के लिए काफी समय होता था। फिर मैसूर के महाराजा योग को काफी प्रोत्साहित करते थे। अगले दो दशक तक मैसूर के महाराजा ने सारे भारत में योग को प्रोत्साहित करने में कृष्णमाचार्य की मदद की। उनके प्रकाशनों और योग प्रदर्शनों को आर्थिक सहायता की। महाराजा स्वयं मधुमेह के मरीज होने के कारण योगा और उसके उपचारात्मक पहलू की तरफ आकर्षित हे थे। कृष्णमाचार्य ने इस क्षेत्र में काफी काम करते भी रहे। इसके बाद का कुछ काल कृणष्णामाचार्य के लिए बहुत सृजनात्मक था। इस दौरान ही उन्होंने अपना अष्टांग विन्यास योग विकसित किया। उस दौरान उनके सिष्य ज्यादातर युवा ही थे तो उन्होंने कई क्षेत्रों में जैसे योग, जिमनेशियम और भारतीय पहलवानी में काम शुरू किया। उन्होंने शारीरिक फिटनेस के लिए गतिशील तौर पर किए जानेवाले आसन सीक्वेंंस विकसित किया।

हालांकि कृष्णमाचार्य ने योग प्रदर्शन के तरीके उन्नीसवी सदी के तीसरे दशक में में खोजे थे मगर वे 40 वर्ष तक पश्चिम के लिए अक्षात रहे। हाल ही में उनके सबसे मशहूर और सबसे समर्पित छात्र के पट्टभि ज्वाइस के कारण वे योग की सबसे लोकप्रिय शैली बन गए।

जब उनके शिष्य योग का प्रसार प्रचार करके समृद्ध हो रहे थे तब कृष्णमाचार्य अपने सबसे कठोर समय से गुजर रहे थे। 1947 में मैसूर की उनकी योगशाला में लोगों की भर्ती कम हो गई थी। केवल तीन छात्र रह गए थे। सरकार का संरक्षण खत्म हो गया था। मैसूर के राज घराने के स्थान पर जो नए नेता आए थे उनकी योग में दिलचस्पी नहीं थी। कृष्णमाचार्य किसी तरह योगशाला को चलाने की कोशिश की लेकिन 1050 में उसे बंद करना पड़ा। 60 वर्षीय कृष्णमाचार्य बड़ी मुश्किल में थे कि इस उम्र में कैसे नए सिरे से शुरूआत की जाए।

उन्हे अपने शिष्यों की तरह योग की बढती लोकप्रियता का लाभ नहीं मिला। वे उपेक्षित रहकर भी योग के अध्ययन, अध्यापन और उसके विकास में लगे रहे।

वर्ष 1920 में जब कृष्णमाचार्य काम पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे और आखिर में मैसूर छोड़कर चेन्नई के विवेकानंद कॉलेज में अध्यापन का काम स्वीकार करना पड़ा। वहा नए छात्र आने लगे जिनमें जीवन के हर क्षेत्र के लोग थे और ऐसे लोग थे जिनकी स्वास्थ्य की स्थितियां अलग अलग थी। तब कृष्णमाचार्य ने उन्हें पढाने के लिए नए तरीके खोजे। उनमें से कुछ कम शारीरिक क्षमता वाले, कुछ विकलांग थे कृष्णमाचार्य ने हर छात्र की क्षमता के मुताबिक आसन और पोस्चर  अपनाने पर ध्यान दिया।

कृष्णमाचार्य स्वास्थ्य संबंधी हर समस्या के लिए इस तरह की तकनीक अपनाने को तैयार रहते थे। एक बार एक डाक्टर  ने स्ट्रोक के शिकार मरीज की मदद करने को कहा। कृष्णमाचार्य मरीज के निष्प्राण हो चुके अंगों को विभिन्न आसनो के पोस्चरो में डालते रहे यानी एक तरह से यह योगा थेरपी का प्रयोग था। इसमें उन्होंने अपने छात्रों की मदद ली और उस व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार हुआ। इसके बाद तो वैद्य के रुप में उनकी प्रतिष्टा बढ़ गई।

उनके पुत्र देसिकाचार के अनुसार कृष्णमाचार ने सांसो के चक्र को समर्पण का कृत्य बताया था। सांस अंदर लो ईश्वर आपके करीब आएगा। सांस को अंदर रोक कर रखो ईश्वर आपके साथ रहेगा। सांस बाहर छोड़ों और ईश्वर को समर्पित करो।

आज भी भारत में उन्हें योगी के बजाय वैद्य के रूप में जाना जाता है। हालांकि उनके मन अतीत के प्रति गहरा सम्मान का भाव था लेकिन वे प्रयोग करने और नई जमीन तोडऩे से नहीं हिचके। उन्होंने करोड़ों लोगो तक योग को पहुंचाया यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

उनकी शिक्षाओं का निहित संदेश यही है कि योग कोई जड़ परंपरा नहीं है।यह जीवंत और श्वास लेती कला है। जो हर अभ्यासु के प्रयोगों और उससे गहराते अनुभव से सतत पुष्पित पल्लवित होती है।

कृष्णमाचार्य का योग सिद्धांत अष्टांग विन्यास योग के ईर्द-गिर्द निर्मित है। जिसका खास जोर शक्ति और जस्विता प्राप्त करने की प्रभावशाली शैली पर आधारित हैं। इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने आसन और प्राणायाम के मेल के महत्व पर विशेष बल दिया। वे पहले योग शिक्षक थे जिन्होंने धार्मिक पहलू पर कभी भी जोर नहीं दिया। सारे समुदायों के लोग उनसे योग सीखने आते थे। उन्होंने अपने द्वारा शिक्षित के जानेवाले शिष्यों के धर्म संस्कृति को सीखने का पूरा प्रयत्न किया। जब हैदराबाद के निजाम ने उन्हें योग शिक्षा के ले बुलाया तो कृष्णमाचार्य में उनसे उर्दू में बात की। निजाम उनसे तना प्रबावित हुआ कि उसका पूरा परिवार योग का अभायास करने लगा।

लगभग 96 वर्ष की उम्र में उनके नितंब की हड्डी टूट गई। उन्होंने शल्य चिकित्सा कराने से इंकार कर दिया। और स्वयं बिस्तर पर के जा सकनेवाले योग अभ्यासों की श्खला तैयार करके अपना उपचार किया। उनकी मृत्यु पर फर्नांडो पेजेज रूइज ने लिखा था चाहे आप पट्टभि ज्वाइस की गतिमान श्रंखलाओं, बीकेएस आयंगार के परिष्कृत आसनों, इंदिरा जेवी की शास्त्रीय या भंगिमाओं का अबायास करते हो इन समस्त अभ्यासों का एक ही स्रोत है -दक्षिम भारत के छोटे से गांव में सौ साल पहले जन्मा 5 फीट 2 इंच का ब्राह्मण।

सतीश पेडणेकर

оао альфа страхованиемихаил безлепкин компромат

Leave a Reply

Your email address will not be published.