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प्राकृतिक आपदाओं में शोध की आवश्यकता

प्राकृतिक आपदाओं में शोध की आवश्यकता

मौसम में आकस्मिक परिवर्तनों से लेकर भारी वर्षा, बाढ़, भूकम्प और सुनामी जैसी भयंकर प्राकृतिक आपदाएं हमेशा बहुत बड़ी संख्या में जान और माल की क्षति कर देती हैं। विज्ञान की बड़ी से बड़ी प्रगति भी ऐसे दैविक प्रकोप के सामने नगण्य सी दिखाई देने लाती है। जिस क्षेत्र में ऐसी किसी भी आपदा का प्रकोप पडऩे लगता है उस समय गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित और प्रत्येक जाति, मत-पंथ और सम्प्रदाय के लोग अपने आपको एकदम हैरान और असहाय परिस्थिति का शिकार समझने लगते हैं। आज के आधुनिक युग में जबकि सारे विश्व की सरकारें नित नई वैज्ञानिक प्रगति का दम भरते नजर आती हैं, ऐसे में प्राकृतिक आपदा का पूर्व एहसास न कर पाना और परिणामत: नागरिकों को आपदा प्रबन्धन के लिए समय का न मिल पाना अपने आप में सभी वैज्ञानिक प्रगतियों को झुठलाता हुआ नजर आता है, जबकि अनेकों पशु-पक्षी सामान्य मौसमी बदलावों जैसे  सर्दी-गर्मी, तेज हवा, वर्षा से लेकर भूकम्प तक का पूर्वाभास कर लेते हैं। इसी प्रकार प्रकृति से पूरी तरह जुड़कर जीवन बिताने वाले अनेकों आदिवासी भी ऐसे ही कुछ पूर्वाभास करने में सक्षम होते हैं। आध्यात्मिक उच्च साधना के माध्यम से अनेकों ऋषियों, मुनियों और ज्योतिषाचार्यों ने भी कई बार ऐसी आपदाओं का पूर्वाभास व्यक्त किया है।

इस सम्बन्ध में मैंने अपने राज्यसभा सदस्य काल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय से प्राकृतिक आपदाओं की सही भविष्यवाणियों के लिए एक उचित चेतावनी तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता के सम्बन्ध में प्रश्न उठाया था। हाल ही में मुझे सम्बन्धित मंत्रालय के राज्यमंत्री श्री वाई.एस. चौधरी ने विस्तारपूर्वक कुछ तथ्यों से अवगत कराने की कृपा की है।

12 सितम्बर, 2007 को 8.5 की तीव्रता वाले समुद्री तूफान, 30 मार्च, 2010 को 6.9 की तीव्रता वाले समुद्री तूफान, 12 जून, 2010 को 7.5 की तीव्रता वाले समुद्री तूफान, 10 जनवरी, 2012 को 7.1 की तीव्रता वाले समुद्री तूफान, 11 अप्रैल, 2012 को 8.5 की तीव्रता वाले समुद्री तूफान की पूर्व सूचना जारी की गई थी। ऐसी चेतावनियों के बल पर जान और माल की क्षति को बचाने का सफल प्रयास किया गया।

इस मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाले कई विभाग अलग-अलग प्राकृतिक आपदाओं के आगमन से पूर्व अपनी विशेषज्ञता के आधार पर विपत्ति के समय और उसकी गंभीरता का आंकलन करने का प्रयास करते हैं, जैसे सुनामी की सम्भावना का अध्ययन करने के लिए हैदराबाद स्थित समुद्र सूचना सेवा नामक विभाग कार्य करता है। मौसम विभाग समुद्री तूफानों, आंधी, भारी वर्षा, बर्फबारी तथा ठंडी और गर्म हवाओं की संभावना का अध्ययन करता है। इसी प्रकार भूकम्प की सम्भावनाओं का आंकलन करने के लिए सारे देश में 84 केन्द्रों का एक संगठन भारत के साथ-साथ भारत के चारों तरफ भूमि के गर्भ में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है। इतनी विशाल व्यवस्था के बावजूद यह निश्चित है कि आज तक सारे संसार में कोई ऐसी तकनीक विकसित नहीं हो पाई जो इन प्राकृतिक आपदाओं के केन्द्र, समय और इनकी तीव्रता का निश्चित अनुमान लगा सके।

वर्ष 2005 में तमिलनाडू के तटीय क्षेत्रों में सुनामी का प्रकोप आज तक भारतवासियों के दिमाग पर एक भयंकर सदमे की तरह छाया हुआ है। अचानक एक दिन प्रात:काल समुद्र तट के लाखों लोगों ने अपने दैनिक नितकर्म करते हुए समुद्र से लगभग 100 फुट ऊंचाई के परदे की तरह भयंकर लहरों को अपनी तरफ आते हुए देखा। किसी व्यक्ति को इससे पूर्व ऐसी आपदा का कोई अनुभव या ज्ञान नहीं था। किसी को क्या पता था कि इतनी बड़ी ऊंचाई तक की उठती हुई लहरें समुद्र देवता का भारी प्रकोप बन जायेंगी। इस प्राकृतिक आपदा ने सारे भारत को ही नहीं अपितु सारे संसार को हिलाकर रख दिया था। वर्ष 2005 के इस सुनामी के बाद केन्द्र सरकार ने सुनामी चेतावनी नामक विभाग की स्थापना की थी। भारत के समुद्री तटों से जुड़े अन्य देशों को भी इस विभाग का भरपूर लाभ प्राप्त हुआ है जिसने अपने 9 वर्ष के इस छोटे से काल में अब तक 82 समुद्री भूकम्पों की चेतावनियां देकर लाखों की संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाते हुए बहुत बड़ा उपकार किया है। इस विभाग द्वारा जारी चेतावनियों के द्वारा विगत 9 वर्षों में हमने भारतवासियों के साथ-साथ अन्य समुद्री पड़ोसी देशों के नागरिकों की भी जानें बचाने का दैविक कार्य सम्पन्न किया है। ऐसे कार्यों के लिए हमारे वैज्ञानिक साधुवाद के पात्र हैं।

भारत सरकार के यह विभाग प्राकृतिक आपदाओं के पूर्व आंकलन की चेतावनियों को बिना विलम्ब के सम्बन्धित राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार को पहुंचाने के साथ-साथ लाखों की संख्या में टेलीफोन द्वारा एवं एस.एम.एस. भेजते हैं तथा अपनी अधिकृत वैबसाईट पर ऐसी सूचनाएं समय-समय पर डालते रहते हैं।

इसी प्रकार मौसम विभाग के अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में चलने वाले 180 केन्द्र मौसम के दैनिक परिवर्तनों के अतिरिक्त समुद्री तूफानों का आंकलन भी सफलतापूर्वक करते आ रहे हैं। इस विभाग द्वारा 24 से 48 घण्टे पूर्व मौसम के परिवर्तनों का आंकलन सम्भव हो गया है। इस विभाग का प्रत्येक केन्द्र लगभग 100 से 500 किलोमीटर के दायरे में मौसम का अध्ययन करता रहता है। अब इस मौसम विभाग के अध्ययन में त्रुटियों की मात्रा भी बहुत कम हो चुकी है। वैज्ञानिक विशेषज्ञता के इन बढ़ते कदमों के कारण ही अब लोगों की जानें सुरक्षित करने का कार्य सफलता प्राप्त करने लगा है।

इन विभागों की सफलता के पीछे जहां एक तरफ अति-आधुनिक तकनीकी मशीनों आदि की भूमिका है वहीं वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं की लगन भी अपने आपमें प्रशंसा की पात्र हैं।

मौसम विभाग के इन प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत के अन्दर आने वाले विदेशी पर्यटक और भारतीय नागरिक भी इंटरनेट के द्वारा उस स्थान के वर्तमान मौसम और सम्भावित परिवर्तनों की जानकारी अपनी यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व ही प्राप्त कर पाते हैं। उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा हो या जम्मू-कश्मीर की अमरनाथ यात्रा, अब भारत के तीर्थ यात्रियों को भी यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व मौसम के पूर्वानुमानों से भली-भांति अवगत करवा दिया जाता है। इस प्रकार एक तरफ जहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत के  नागरिकों को प्राकृतिक आपदाओं से जानें बचाने के मार्ग पर पूरी सक्षमता प्राप्त कर चुका है, वहीं अब यह विभाग पर्यटन मंत्रालय का भी सहयोगी विभाग बनता जा रहा है।

कुछ पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों ने भूकम्प से कुछ क्षण मात्र पूर्वाभास की तकनीकें विकसित तो कर ली हैं, परन्तु उन जानकारियों का अधिक लाभ इसीलिए नहीं हो पाता क्योंकि पूर्वाभास का समय बहुत कम होता है। दूसरी तरफ भूकम्प की तरंगों की गति लगभग दो मील प्रतिक्षण से भी अधिक होती हंै। आज तक विश्व के वैज्ञानिक भूकम्प से पहले लम्बे समय के पूर्वाभास का कोई यन्त्र विकसित नहीं कर पाय हैें। भारत सरकार को इस विषय पर प्राथमिकता से कार्य करना चाहिए। यदि भारत के वैज्ञानिक इस मार्ग पर कुछ सफलता अर्जित कर पाये तो सारे मानवता का उपकार हो सकेगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना

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