ब्रेकिंग न्यूज़ 

शाहरुख की मियांगीरी

शाहरुख की मियांगीरी

कभी कभी लगता है कि भारत पहले से ज्यादा सहिष्णु हो गया है। विभाजन के बाद देश में मुस्लिमों को लेकर इतना आक्रोश था कि मुस्लिम कलाकारों को यह गलतफहमी थी कि मुस्लिम नाम के साथ वे कभी हिन्दी सिनेमा में सफल नहीं हो सकते। इसलिए वे हिन्दू नाम रखकर फिल्मों में काम करते थे इनमें दिलीप कुमार, मीना कुमारी, मधुबाला को तो सभी जानते हैं। लेकिन यह उनकी गलतफहमी ही थी क्योंकि  तब भी भारत में ऐसे कलाकार थे जो अपने मुस्लिम नामों के साथ ही काम करते रहे और सफल भी रहे। बाद में तो फिल्मों के हर क्षेत्र में मुस्लिमों की तादाद इतनी बढ़ी कि लगने लगा कि मुस्लिम बाकी क्षेत्रों में पिछड़े हों मगर सिनेमा में तो वे अव्वल बन गए। यह बात अलग है कि इस्लाम और सिनेमा का कोई मेल नहीं है। वह मुसलमानों के लिए हराम है। देश के जिस हिस्से में सबसे ज्यादा मुसलमान हैं, मेरा मतलब है कश्मीर घाटी से है, वहां सारे सिनेमाघर बंद पड़े हैं, उन्हें चलने ही नहीं दिया जाता। खैर, अब तो यह हालत है कि खान अभिनेताओं की लाइन लगी हुई है। पहले तीन अभिनेता शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान -खान ही हैं। इनके पीछे भी बहुत से खान सैफ अली खान, इमरान हाशमी आदि हैं। इसके बावजूद इन खान अभिनेताओं को असहिष्णुता की शिकायत है।

ऐसी ही शिकायत करनेवालों में एक हैं किंग खान या शाहरुख खान। हमेशा की तरह वे इन दिनों भी चर्चा में हैं। शाहरुख खान ने पिछले चार महीनों में लगातार तीन फिल्मों में काम किया है, और उन्होंने हर बार एक मुस्लिम किरदार निभाया। ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में अहम कैमियो करते हुए वह ताहिर खान के रूप में दिखे, जो ऐश्वर्या राय बच्चन के सबा के साथ जुड़ता है। ‘डियर जिन्दगी’ में वह जहांगीर खान बने हैं, और अब वह फिल्म ‘रईस’ में  रईस के किरदार में नजर आये जो किरदार गुजरात के अवैध शराब निर्माता और दाऊद के करीबी अब्दुल लतीफ की कहानी पर आधारित है। मुंबई बम कांड में इस्तेमाल हुआ आरडीएक्स लतीफ ने गुजरात में उतरवाया था। कुछ मुंबई भेजा कुछ अपने पास रखा। अहमदाबाद के दरियापुर से वह पांच बार चुनाव भी जीता। रईस फिल्म के बाद दर्शक शाहरुख के नए परिवर्तन से हतप्रभ हैं। उन पर बहस छिड़ गई है।

इस बहस की वजह पत्रकार राणा अयूब का वह लेख भी है जिसमें उन्होंने शाहरुख की इस कोशिश की पुरजोर वकालत करते हुए कहा है -‘बॉलीवुड में लगभग हमेशा ही रोमांटिक हीरो की भूमिका के लिए जाने-पहचाने जाते रहे शाहरुख खान ने पिछले कुछ महीनों में यह साबित करने की कोशिश की है कि ताहिर होना भी राहुल या राज होने जितना ही सहज है, और जरूरी नहीं है कि फिल्मों में मुस्लिम किरदार होने पर तभी पहचाने जाएंगे, जब वे खास टोपी पहने दिखेंगे। सो, यह बेहद अहम है कि हम इस नए ढर्रे को सामान्य समझने लगें, क्योंकि अब तक हर दूसरी बड़ी फिल्म में हर आतंकवादी गतिविधि से जुड़ा शख्स मुसलमान ही दिखाया जाता रहा है, भले ही वे ’90 के दशक की नव-देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्में रही हों, या हालिया वक्त में बनी राष्ट्रवादी फिल्में।

ऐसे वक्त में, जब ताकतवर जगहों पर बैठे लोग विचारों को वही पुराने स्थापित ढर्रों की ओर ले जाना चाह रहे हों, इस तरह जोर देकर कुछ भी कहना वक्त पर दी गई चेतावनी जैसा है।—बेहद बहादुरी के साथ इस नए ‘सामान्य’ को पेश करने के लिए शाहरुख खान और उनके इस प्रयास को शुक्रिया कहा ही जाना चाहिए…’

लेकिन इसे लेकर देश में बहस में शुरू हो गई है। बहस का मुद्दा यह है कि शाहरुख अपनी मुस्लिम पहचान को बहुत मुखर रूप से पेश कर रहे हैं। यह बात कुछ हद तक सही भी है। वैसे तो शाहरुख खान ने असल जिन्दगी में भी अपनी धार्मिक पहचान को कभी छिपने नहीं दिया। 9/11 के बाद लिखे एक कॉलम में इस्लाम को लेकर गलतफहमियां दूर करने की कोशिश करने से लेकर अलग-अलग अवसरों पर अपनी आस्था के बारे में खुलकर बात करने तक कई बार ऐसे मौके आए, जब उन्हें अपने विचारों को लेकर राजनैतिक गुस्से का सामना करना पड़ा। धर्म के आधार पर की जाने वाली नाइंसाफी के खिलाफ शाहरुख खान की मजबूत सोच ही वह वजह थी, जिसके चलते करण जौहर ने उन्हें ‘माई नेम इज खान’ में रिजवान खान बना डाला, जो अपने मजहब के माथे पर लगा दिए गए ‘आतंकवादी’ के ठप्पे को मिटा देना चाहता है।

Layout 1

लगातार तीन फिल्मों में शाहरुख का मुस्लिम किरदार निभाना केवल संयोगमात्र था या शाहरुख का सोचा-समझा फैसला। इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में शाहरुख खान ने कहा कि कैसे पत्रकारिता अब सूचना देने के बजाए सनसनीखेज हो गई है। इसी ब्लॉग में उन्होंने कहा कि आप एक एक्टर के तौर पर मेरे प्रोफेशन को सम्मान देते हुए इस नजरिए से एक खबर लिख सकते हैं कि एक के बाद एक मुस्लिम किरदार कर रहा हूं। मुझे तो याद भी नहीं है कि करण जौहर की फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में मेरा नाम क्या था। मैं वहां केवल दो घंटे के लिए गया और कुछ सीन शूट किए और दोस्तों रणबीर कपूर, ऐश्वर्या राय और करण जौहर के साथ मस्ती की। मैंने सुबह के दो बजे शूटिंग पूरी कर ली थी और 6 बजे तक पार्टी की। इसके बाद मैं लिस्बन वापस चला गया।

शाहरुख के तीन किरदारों पर  देश में तीखी बहस भी चल रही है और सारा मुस्लिम समाज उसके लपेटे में आ गया है। जानेमाने पत्रकार हसन सरूर ने टाइम्स ऑफ इंडिया में  टिप्पणी की है कि दक्षिणपंथी तो इस पर गदगद हैं कि देखो हम सही साबित हुए। हम नहीं कहते कि मुस्लिम अपने को चाहे जितना उदारवादी और सेकुलर क्यों न दिखाए उसका असली चेहरा मुस्लिम का ही होता है। भले ही ये नजरिया चाहे जितना पूर्वाग्रहग्रस्त हो, वह केवल हिन्दू दक्षिणपंथियों तक सीमित नहीं है। मगर मुस्लिम केवल अपनी धार्मिक पहचान को ही सबसे ज्यादा महत्व देते हैं, यह बात उदारवादी अभिजात वर्ग भी जानता है। मैं टीवी के उन एंकरों को जानता हूं जिनके उदारवादी होने में किसी को शक नहीं हो सकता। वह भी अपने कार्यक्रम को विचारोत्तेजक बनाने के लिए मुस्लिम मेहमानों पर यह बताने का दबाव डालते है कि बताएं कि वह पहले मुसलमान हैं या पहले भारतीय। दरअसल शाहरुख और रईस पर हो रही सारी बहस को इस रूप में ही देखा जा रहा है कि भारतीय मुस्लिम अपने मुस्लिम और भारतीय पहचान के बीच में दो फाड़ है।

यह केवल संयोग या जानबूझकर की गई कोशिश है, यह कह पाना मुश्किल है। लेकिन इस सबसे जो बहस शुरू हुई है, वहबहुत बुनियादी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे हसन सुरूर के मुताबिक यह बहस एक व्यापक समस्या को सामने लाती है भारतीय मुस्लिम की दुविधा मुस्लिम पहचान बनाम राष्ट्रीय पहचान को रेखांकित करती है। शाहरुख के आलोचक कहते हैं कि हाल ही में लगातार निभाए तीन किरदार शाहरुख की जानबूझकर मुस्लिम किरदार निभाने की कोशिश है। पहले दो फिल्मों ‘ऐ दिल है मुश्किल’ और ‘डियर जिंदगी’ में शाहरुख जिन मुस्लिम किरदारों को निभाते हैं, वे नाममात्र के मुस्लिम हैं। मगर रईस में वे सारी सावधानियां ताक पर रखकर एक कट्टर  या असली मुसलमान की तरह सामने आ जाते हैं। पहले शाहरुख एक प्रेमी की रूमानी भूमिकाएं ही निभाते रहे हैं लेकिन अब उससे बाहर निकल कर अपने मुसलमान होने का विज्ञापन कर रहे हैं। रईस के संवाद में मिंयाभाई की डेयरिंग और बनिया का दिमाग भी उनकी नई सोच के अनुकूल है।

Layout 1

रईस की कहानी शराबंदीवाले राज्य में अवैध शराब बनाकर मालामाल हो गए अपराधी अब्दुल लतीफ की है। गुजरात के जन्म के साथ ही राज्य में शराब की खरीद-फरोख्त पर रोक लग गई। शराब बंद होने के बावजूद गुजरात में शराब की मांग खत्म नहीं हुई। इसी मांग को पूरा करके एक मामूली जुआड़ी राज्य का सबसे बड़ा शराब माफिया और फिर गैंगस्टर बन गया। वैसे शाहरुख इस बात से इनकार करते हैं कि उनके फिल्म की कहानी अब्दुल लतीफ की जिंदगी पर आधारित है। अहमदाबाद के दरियापुर के पोपटियावाड़ के तंग इलाके में स्थित एक दो मंजिला इमारत में रहने वाले अब्दुल लतीफ ने अपनी जिंदगी की शुरुआत दूसरों के लिए तस्करी की शराब बेचने से की थी। बहुत जल्द वह समझ गया कि शराब के धंधे में काफी पैसा है और दूसरों के लिए शराब बेचकर वह कभी ‘रईस’ नहीं बन सकता। लतीफ के पुराने साथी बताते हैं कि 1977-78 में लतीफ कालुपुर में जुआ और शराब घर चलाने वाले मंजूर अली के ठेके पर 30 रुपये महीने पर नौकरी करता था। नौकरी के साथ-साथ देसी शराब की थैलियां बेचने से शुरू करके वह अंग्रेजी शराब की बोतलें बेचने लगा। राज्य में शराब की तस्करी का धंधा दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से फैल रहा था। धंधे के साथ ही अवैध शराब के कारोबार  में लतीफ का कद बढ़ रहा था।

लतीफ के एक पड़ोसी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘लतीफ का छोकरा लोग किसी भी बाहरी आदमी को पहचान लेता था। हमें पता ही नहीं था कि वह किस तरह के लोग हैं या कौन लोग उससे शराब लेने आते हैं। उसका इतना खौफ था कि कोई भी यह जानने की कोशिश भी नहीं करता था।’ पड़ोसी के अनुसार जब ट्रक के ट्रक शराब उतारी जाती थी तो लतीफ के लोग हर गली के मोड़ पर पुलिस की आमद की निगरानी करते थे। लतीफ के पुराने साथी बताते हैं कि उस समय उसे राजस्थान से तस्करी करके लाए गए हर ट्रक शराब पर करीब डेढ़ लाख रुपये का फायदा होता था।

शराब के धंधे में जड़ें जमाने के बाद लतीफ का अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से संबंध बन गया। एक समय उसे गुजरात में दाऊद का एकमात्र आदमी माना जाने लगा। 1992 में गुजरात के पोरबंदर पर दाऊद का हथियारों और विस्फोटकों का बड़ा जखीरा उतरा। पुलिस के अनुसार इस काम को दाऊद के लिए लतीफ ने ही अंजाम दिया और कुछ हथियार और विस्फोटक उसने मुंबई भिजवाए और बाकी अपने गोदाम में रखवा लिया। पुलिस के अनुसार इसी गोला-बारूद और हथियारों का इस्तेमाल 1993 के मुंबई बम धमाकों में किया गया था। 1992 में लतीफ दुबई भाग गया। 1995 में भारत वापस आया। उसी साल गुजरात पुलिस ने उसे दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया। 1997 में एक मामले की जांच के बाद जेल वापस लाए जा रहे लतीफ ने भागने की कोशिश की और मुठभेड़ में मारा गया। एक तरह से मुंबई बमकांड के लिए दाऊद के साथ लतीफ भी जिम्मेदार था। ऐसे आदमी पर फिल्म बनाकर शाहरुख ने उसे महिमामंडित करने की ही कोशिश की है।

Layout 1

शाहरुख की एक और खासियत है कि वे अपनी धार्मिक पहचान को लेकर शर्मसार नहीं है। मगर इस्लाम के साथ दुनियाभर में कई सवाल जुड़ गए हैं। उनसे वे या तो बचते हैं या इन पर लीपापोती कर देते हैं या इस्लाम के बारे में झूठ बोलकर गौरवान्वित करने की कोशिश करते हैं।

इन दिनों दुनियाभर में इस्लाम को लेकर सबसे बड़ा सवाल है आतंकवाद का। मगर शाहरुख में वह हिम्मत भी नहीं है कि वे इस्लाम के उन सिद्धातों का विरोध कर सकें जिनसे आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है। इसलिए वे लीपापोती करते हैं। मगर इस्लाम को लेकर शाहरुख कहते हैं कि इस्लाम में आतंक की कोई जगह नहीं है। इसलिए हमें अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जिससे वो अपने धर्म के साथ ही दूसरोंके धर्म की भी इज्जत करें। शाहरुख ने कहा कि आतंक से हमें डटकर मुकाबला करना चाहिए। शाहरुख ने खुलकर कहा कि मैं भी एक पढ़ा-लिखा मुसलमान हूं। मैंने भी कुरान पढ़ा है। कुरान का हवाला देते हुए शाहरुख ने कहा कि आतंक फैलाने वाले को पैंगबर कभी माफ नहीं करते हैं। आतंक का कोई मजहब नहीं होता है। उन्होंने कहा कि इस्लाम दहशतगर्दी का सख्त विरोध करता है। शाहरुख कुरान पढऩे की बात करते हैं मगर इस बात को छुपा जाते हैं कि उसमें दसियों जगह काफिरों के खिलाफ लडऩे की, उनके खिलाफ जिहाद करने की, उनमें आतंक फैलाने की बात कही गई है। ये बातें ही  आतंकवाद का कारण हैं। इस्लाम की नजर में सभी मनुष्य बराबर नहीं हैं, वह  मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों के बीच फर्क करता है। गैर मुस्लिम काफिर होते हैं, इन काफिरों को इस दुनिया में कोई मानव अधिकार हासिल नहीं है। उन्हें  स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलेगा। इस्लाम में मुस्लिमों के लिए अलग और गैर मुस्लिमों के लिए अलग नैतिकता और न्याय के सिद्धांत हैं। वह इस्लाम की रक्षा और गैर इस्लामियों के विनाश के लिए मुस्लिमों को गैर मुस्लिमों के खिलाफ खड़ा करता है। इस्लाम की कुछ धाराएं मुस्लिमों को काफिर यानी गैर मुस्लिम व्यक्तियों और समूहों के संहार को प्रोत्साहित करती हैं। ये धाराएं मुसलमानों से कहती हैं -अपने आसपास के काफिरों के खिलाफ युद्ध करो। उन्हें तुम्हारे अंदर की कठोरता को महसूस करने दो। रसूल, काफिरों और पाखंडियों के खिलाफ युद्ध करो, उनके प्रति कठोर बनो। नर्क ही उनका घर होगा। काफिरों के दिल में आतंक भर दो। उनका सिर कलम कर दो, हर अंग काट डालो।

Layout 1

यह तो बस एक बानगी है। इस्लाम की कुछ धाराएं अन्य धर्मों के अनुयायियों यानी काफिरों के खिलाफ निरंतर युद्ध यानी जिहाद का निर्देश देती हैं। इसके बावजूद शाहरुख कहते हैं कि आंतक का कोई मजहब नहीं होता और इस्लाम दहशतगर्दी का विरोध करता है। ये बातें तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।

शाहरुख यह भी कहते हैं कि हमें अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जिससे वे अपने धर्म के साथ ही दूसरों के धर्म की भी इज्जत करें। यह अच्छी बात है। मगर कुरान तो कहता है कि इस्लाम एकमात्र सच्चा व सर्वश्रेष्ठ धर्म है। वह ईश्वरीय धर्म है। बाकी धर्म झूठे हैं। केवल इस्लाम को माननेवाला स्वर्ग जा सकता है।

ऐसी इस्लामी असहिष्णुता पर सवाल न उठाने वाले शाहरुख असहिष्णुता को मुद्दा बनाते  हैं। रईस के डायलॉग में मियांभाई की डेअरिंग की बात है, पता नहीं डेअरिंग से उनका मतलब क्या है। भारत पर मुस्लिम आक्रमण, उनके द्वारा किए जुल्म, विभाजन के समय हुआ डायरेक्ट एक्शन, पिछले कुछ वर्षों में हुई  आतंकवादी वारदातें और दंगे, कश्मीर से हिन्दुओं का निकाला जाना क्या उन्हें मियांभाई की डेअरिंग लगती है?

 सतीश पेडणेकर

kharkov onlinespanish medical translator certification

Leave a Reply

Your email address will not be published.