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विधायकों के टिकट काट कर कितना महफूज रहेगा पार्टियों का किला

विधायकों के टिकट काट कर  कितना महफूज रहेगा पार्टियों का किला

प्रदेश की पश्चिमी पट्टी में यूं तो मतदान संपन्न हो गया (पहले चरण का) लेकिन पूर्वांचल में हर दल (बसपा को छोड़कर) अभी टिकट की हेराफेरी में जुटा है। सबसे ज्यादा उलटफेर भारतीय जनता पार्टी और सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) में हो रहे हैं। इस वजह से बागी और घोषित उम्मीदवारों के बीच तनाव और असंतोष भी इन्हीं दोनों दलों में ज्यादा दिख रहा है। भाजपा और सपा दोनों ने ही अपने कुछ मौजूदा और अच्छी साख वाले विधायकों के टिकट काट दिये हैं। इसके विरोध में पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर उतर आये हैं। दोनों दलों के ही स्थानीय कार्यकर्ता यह कह रहे हैं कि यदि भूल सुधार नहीं किया गया तो वे जनता के सामने वोट के लिए नहीं जायेंगे। सपा के साथ कांग्रेस का गठबंधन हो गया है, इस वजह से गठबंधन की आड़ में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक हद तक अपना मुंह बचा ले रहा है लेकिन जिन सीटों पर गठबंधन का कोई कारण नहीं है, वहां के अच्छे, कर्मठ और निष्ठावान विधायक का टिकट अंतिम दौर में काटकर किसी एकदम नये उम्मीदवार को टिकट दे देने को सपा के लोग ही पचा नहीं पा रहे हैं। फिलहाल लग रहा है कि भाजपा और सपा दोनों ही दलों को अपनी इस ‘गलती’ का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

वाराणसी में भाजपा की तो पांच विधानसभा सीटें वही हैं जो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में आती है। वाराणसी कैंट, शहर दक्षिणी, शहर उत्तरी, रोहनियां और पिंडरा। इसमें कैंट, दक्षिणी, उत्तरी लंबे समय से भाजपा के कब्जे में है। शहर दक्षिणी पर तो श्यामदेव राय चौधरी पिछले सात बार से लगातार विधायक रहे। उत्तरी पर ज्योत्स्ना श्रीवास्तव  और उनके पति हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव जीतते रहे हैं। लेकिन इस बार पार्टी ने दादा और ज्योत्स्ना का टिकट काट दिया तथा ज्योत्स्ना के बेटे सौरभ श्रीवास्तव को टिकट देकर भरपाई किया। लेकिन दादा श्यामदेव को टिकट न देने से आम भाजपाइयों में बेहद आक्रोश है। पार्टी के 24 पार्षद तो विरोध में धरना पर भी बैठे। शहर के चौराहों पर पुतला दहन, प्रदर्शन भी हुए। पार्टी नेतृत्व की ओर से केन्द्रीय राज्यमंत्री मनोज सिन्हा, महेन्द्र नाथ पांडेय को बनारस के लोगों को समझाने के लिए भेजा गया। लेकिन स्थानीय लोगों ने साफ कह दिया -हम पार्टी के लोग हैं। किस मुंह से वोट मांगने जाएं। यदि नेतृत्व को हमारी इच्छा का खयाल नहीं है, तो हम उसकी इच्छा का ध्यान रखने को बाध्य हैं क्या? खैर, लगता है शहर दक्षिणी और कैंट का परिणाम इस बार भाजपा कार्यकर्ताओं के ही कोप का शिकार हो जाय तो ताज्जुब नहीं। उधर, कांग्रेस ने इन दोनों सीटों पर क्रमश: दक्षिणी पर राजेश मिश्रा और कैंट पर अनिल श्रीवास्तव को टिकट दिया है।

राजेश मिश्रा स्नातक क्षेत्र से एमएलसी और एक बार लोकसभा सदस्य भी रहे हैं। जबकि अनिल श्रीवास्तव कैंट से विधानसभा चुनाव में दो बार दूसरे नंबर पर रहे हैं। दोनों ही बार सपा उम्मीदवार के चलते उनकी हार हुई थी। इस बार सपा से समझौते के कारण सीट पर उन्हें फिर टिकट मिला है। विधानसभा क्षेत्र में उनका काम देख रहे अरविन्द किशोर राय कहते हैं – क्षेत्र की जनता चाह रही है कि अनिल जी को इस बार विधानसभा भेजे। एक तो 27 वर्षों से वही लोग जमे हैं। दूसरे मोदी जी का चढ़ाया मुलम्मा भी उतर गया है। इसलिए हम शहर की तीनों सीटें कैंट, उत्तरी, दक्षिणी भी जीत रहे हैं।

वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार 1991 से लगातार चुनाव जीत रहे हैं। विधानसभा क्षेत्र में भी शहर की दोनों सीटें दक्षिणी और कैंट पर लगातार भाजपा ही जीतती रही है। उत्तरी पर कभी भाजपा और कभी सपा कब्जा करती रही है। लेकिन इस बार टिकट की गड़बड़ी के चलते शायद ये सीटें भाजपा के हाथ से निकल जाएं। कहते हैं ए.के. लारी। लारी जी बनारस के अनुभवी पत्रकार और चुनाव विश्लेषक हैं। वे कहते हैं 26-27 वर्षों के बाद यह मौका आया है जब कांग्रेस उम्मीदवारों के चेहरे पर चमक दिख रही है। कारण यह कि सपा के चलते कांग्रेस का वोट     कट जाता था। और उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर आ जाते थे। इस बार दोनों के संयुक्त उम्मीदवार मैदान में हैं।  दूसरी ओर भाजपा के घर में ही कलह दिख रही है। उनके पार्षद ही नहीं, पदाधिकारी घर से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं। कारण निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और भाई-भतीजावाद के दबाव में गलत उम्मीदवार को टिकट देना है। हालांकि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की बात से मेयर रामगोपाल मोहले सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं – भाजपा में किसी की उपेक्षा नहीं की गई है। सब लोग पार्टी के फैसले को स्वीकार करते हैं। अंतत: एकजुट होकर सब लोग लग जायेंगे और पार्टी का उम्मीदवार ही जीतेगा।


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इसके उलट सपा के जिलाध्यक्ष डॉ. पीयूष यादव का कहना है -भाजपा का दावा इस बार छलावा ही साबित होगा। न केवल कैंट और दक्षिणी बल्कि उत्तरी भी हमारा गठबंधन जीत रहा है। गठबंधन करके हमने (सपा ने) अपनी सीट उत्तरी कांग्रेस को दे दी। यानी गठबंधन में त्याग किया। इसलिए यह सीट हम जीतेंगे। जबकि भाजपा में मारामारी मची है। मोदी जी की वादाखिलाफी से नाराज लोग यूं भी इस बार रुठे हुए थे। 25-26 वर्षों से निगम पर कब्जा जमाए भाजपा के पार्षदों और विधायकों की आपसी कलह ने भंडा फोड़ दिया है। इसलिए इनका हारना तय है।

केवल शहर ही नहीं, बनारस के ग्रामीण क्षेत्र की सीटों पर भी पार्टी की अंतर्कलह साफ दिख रही है। रोहनियां सीट से भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष मनीष टिकट मिलने की पूरी उम्मींद लगाये थे। लेकिन उस सीट को समझौते में अद (अपना दल) को दे दिया गया है। मनीष बागी हो गये हैं। वे कहते हैं कि – पार्टी ने अगर निर्णय बदला नहीं तो मैं बगावत करके लडूंगा। उन्होंने पर्चा भी दाखिल कर दिया है। उधर अपना दल ने भाजपा से तीन सीटों की मांग की है। ये हैं -रोहनियां, सेवापुरी और पिंडरा। इतना ही नहीं, उसने इन तीनों पर अपने उम्मीदवार भी घोषित कर दिए हैं।

भाजपा ने एक अन्य सहयोगी भारतीय समाज पार्टी के साथ भी समझौता करके अजगरा (सुरक्षित सीट) को उसे दे दिया है। वहां से टिकट की उम्मीद लगाये बैठे पार्टी के कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र में जुलूस निकाल कर घोषित प्रत्याशी का विरोध करने का ऐलान किया है। इसी तरह शहर से लगी शिवपुर विधानसभा क्षेत्र में भी प्रत्याशी को लेकर काफी उथल-पुथल है। यहां भी सपा से आये अनिल राजभर के विरोध में लगातार धरना प्रदर्शन जारी है। भाजपा के एक जमे जमाये नेता का कहना है – अगर बाहर के लोगों को ही टिकट देना था तो फिर पहले ही यह घोषित कर देना चाहिए था। अब पार्टी का झंडा लेकर चलने वाले और पुलिस की लाठी डंडा खाने वालों का क्या होगा।

पार्टी के और संघ से जुड़े कुछ लोग तो बगावत पर भी उतर आये हैं। शहर उत्तरी से टिकट की उम्मींद लगाये सुजीत सिंह टीका का कहना है – मुझे पिछले चुनाव में ही आश्वासन दिया गया था कि अगली बार आपको टिकट दिया जायेगा। लेकिन इस बार भी मुझे निराश किया गया। अत: मैं इस बार नहीं मानूंगा। और उन्होंने निर्दल उम्मीदवार के रूप में नामांकन कर दिया है।

बागी उम्मींदवारों और पार्टी के कार्यकर्ताओं को समझाने के लिए भेजे गये केन्द्रीय राज्यमंत्री मनोज सिन्हा से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भाजपा अनुशासित पार्टी है। पार्टी का आदेश ही सर्वोपरि होता है। यहां कोई बागी नहीं है। कुछ असंतोष हो सकता है जो कि समझाने के बाद सामान्य हो जायेगा।

सत्ताधारी समाजवादी पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर कम असंतोष नहीं है। कांग्रेस के साथ गठबंधन में जरूर सपा ने उदारतापूर्वक उन्हें सौ से ज्यादा सीटें दे दी हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अपने लोगों का वलिदान भी देना पड़ गया है। जैसे – पूर्वांचल में मऊ जिले की मधुवन विधानसभा सीट पहले सुमित्रा यादव को दी गयी थी लेकिन  अब उसे गठबंधन के सहयोगी कांग्रेस के खाते में डाल दिया गया। इसी तरह देवरिया की सलेमपुर सीट मनबोध प्रसाद की जगह विजय लक्ष्मी गौतम को दे दी गयी। संत कबीर नगर की खलीलाबाद सीट पर घोषित प्रत्याशी बदल कर जावेद अहमद को नया प्रत्याशी बनाया गया।

इतना ही नहीं, जौनपुर की  सुरक्षित केराकत सीट पर मौजूदा विधायक और कर्मठ कार्यकर्ता गुलाब चन्द सरोज को ऐन नामांकन के समय बदल दिया गया। उल्लेखनीय है कि इस सीट पर सपा कभी भी जीत का स्वाद नहीं चख पाई। यहां से पहले कांग्रेस फिर बसपा या भाजपा ही जीतती रही है।

‘गुलाब की व्यावहारिकता, सहजता और ईमानदारी के चलते ही यह सीट समाजवादी पार्टी की झोली में आई थी। लेकिन आखिरी वक्त में वह  किन कारणों से किसी और को थमा दी गयी बता पाना मुश्किल है। अगर जनता के बीच ईमानदारी, व्यावहारिकता और विकास कार्यों सहित छवि की बात है तो गुलाब का कोई जोड़ नहीं है। लेकिन नेतृत्व ने क्यों यह बदलाव किया समझ में नहीं आ रहा।’ कहते हैं जौनपुर के सपा कार्यकर्ता ज्ञानेन्द्र कुमार यादव।

टिकट निर्धारण में मानदंड क्या थे और क्या उन मानदंडों पर सही न उतरने वालों का ही टिकट कटा ऐसा दावे के साथ कोई भी पार्टी नहीं कह पा रही है। बस जोड़ जुगाड़ यहां भी चली। इसलिए ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ताओं में असंतोष और आक्रोश नजर आ रहा है चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। इस असंतोष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह असंतोष नुकसान पहुंचा सकता है।

वाराणसी से सियाराम यादव

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