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SCAM में कोई सेवा-भाव कैसे देख सकता है?

SCAM में कोई सेवा-भाव कैसे देख सकता है?

आदरणीय अध्यक्षा जी, मैं सोच रहा था कि भूकंप आया क्यों? जब कोई स्कैम में भी सेवा का भाव देखता है, नम्रता का भाव देखता है तो सिर्फ मां ही नहीं, धरती मां भी दुखी हो जाती हंै। तब जाकर भूकंप आता है। और इसलिए राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में जनशक्ति का ब्योरा दिया है। नोटबंदी में नहीं, सबसे ज्यादा 1035 बार मनरेगा में नियम बदले गए। जब हमने कहा कि 2 लाख से ज्यादा की ज्वैलरी खरीदने पर पैन नंबर देना होगा, तो मैं हैरान हूं कि कालेधन के खिलाफ भाषण देने वाले लोग मुझे चिट्ठियां लिखते रहे कि ये फैसला वापस लीजिए। मैं जानता हूं कि इससे कठिनाई हुई होगी, लेकिन देश के लिए यह जरूरी था।

हम इनकम टैक्स डिक्लेरेशन स्कीम भी लाए। अब तक का सबसे ज्यादा पैसा इसमें डिक्लेयर हुआ। हमने 1100 से ज्यादा पुराने कानून खत्म किए। लेकिन यहां कहा गया कि आपने नोटबंदी में बार-बार नियम बदले। ये तो ऐसा काम था, जिसमें हमें जनता की तकलीफ तुरंत समझने के बाद रास्ता खोजना पड़ा था। एक तरफ देश को लूटने वाले थे, दूसरी तरफ देश को ईमानदारी के रास्ते पर लाने वाले थे। लेकिन आप लोगों का जो बड़ा प्रिय कार्यक्रम है, उस पर आप पीठ थपथपा रहे हैं। देश आजाद होने के बाद नौ अलग-अलग नाम से योजना चलीं। आज उसे मनरेगा कहते हैं। देश और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इतने साल से चली योजना के बावजूद मनरेगा में 1035 बार नियम बदले गए। उसमें तो कोई लड़ाई नहीं थी। मनरेगा में भी क्यों 1035 बार परिवर्तन करने पड़े? एक्ट तो एक बार बन गया था। नियम बदले गए। काका हाथरसी की कविता के शब्द सुनाता हूं। इसे यूपी के चुनाव से ना जोड़ें। काका हाथरसी ने कहा था- अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट, मिल जाएगी आपको बिल्कुल सत्य रिपोर्ट। कई लोग सोच रहे थे मैंने नोटबंदी का यह फैसला इस वक्त क्यों लिया? मैं बताता हूं। उस वक्त हमारी इकोनॉमी मजबूत थी। कारोबार के लिए भी वक्त सही था। हमारे देश में सालभर में जितना व्यापार होता है, उसका आधा दिवाली के समय ही हो जाता है।

यह सही समय था नोटबंदी के लिए। जो सरकार ने सोचा था, लगभग उसी हिसाब से सब चीजें चलीं। मैंने जो हिसाब-किताब कहा था, उसी प्रकार से गाड़ी चल रही है। इसलिए मैं बता दूं कि यह फैसला मैंने हड़बड़ी में नहीं लिया।

अपने सीने पर हाथ रखकर पूछिए, सर्जिकल स्ट्राइक के पहले 24 घंटों में नेताओं ने क्या बयान दिए थे। जब उन्होंने देखा कि देश का मिजाज अलग है तो उन्हें अपनी भाषा बदलनी पड़ी। ये बहुत बड़ा निर्णय था। नोटबंदी में तो लोग पूछते हैं कि मोदी जी सीके्रट क्यों रखा, कैबिनेट क्यों नहीं बुलाई। सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में कोई नहीं पूछ रहा। हमारे देश की सेना के जितने गुण-गान करें, उतना कम है। इतनी सफल सर्जिकल स्ट्राइक की है। सर्जिकल स्ट्राइक आपको परेशान कर रही है, मैं जानता हूं। आपकी मुसीबत यह है कि पब्लिक में जाकर बोल नहीं पाते हो। अंदर पीड़ा महसूस कर रहे हो। आप मानकर चलिए कि ये देश और हमारी सेना सीमाओं की रक्षा के लिए पूरी तरह से सक्षम है।

हमारे खडग़ेजी ने कहा कि कालाधन हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी और प्रॉपर्टी में है। मैं आपकी बात से सहमत हूं। लेकिन ये सदन जानना चाहता है कि ये ज्ञान आपको कब हुआ? इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भ्रष्टाचार की शुरुआत नकद से होती थी। परिणाम में प्रॉपर्टी-ज्वैलरी होती है। जरा बताइए कि 1988 में जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे, पंडित नेहरू से भी ज्यादा बहुमत दोनों सदनों में आपके पास था। पंचायत से पार्लियामेंट तक सब कुछ आपके कब्जे था।

1988 में आपने बेनामी संपत्ति का कानून बनाया। आपको जो ज्ञान आज हुआ है, क्या कारण था कि 26 साल तक उस कानून को नोटिफाई नहीं किया गया? क्यों उसे दबोच कर रखा गया? तब नोटिफाई कर देते तो 26 साल पहले की स्थिति ठीक थी। देश को साफ-सुथरा करने में योगदान हो जाता। वो कौन लोग थे, जिन्हें कानून बनने के बाद लगा कि इससे तो नुकसान हो जाएगा। आपको देश को जवाब देना पड़ेगा।

हमने कानून बनाया है। मैं आज इस सदन के जरिए देशवासियों को कहना चाहता हूं कि आप कितने ही बड़े क्यों न हों, गरीब के हक को आपको लौटाना पड़ेगा। मैं इस रास्ते से पीछे लौटने वाला नहीं हूं। इस देश में प्राकृतिक संपदा, मानव संसाधन की कमी नहीं थी, लेकिन एक ऐसा वर्ग पनपा जो लोगों का हक लूटता रहा। इसलिए देश ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाया।

एक चर्चा यह आई कि बजट जल्दी क्यों पेश किया गया। भारत कृषि प्रधान देश है। हमारा पूरा आर्थिक कारोबार कृषि पर आधारित है। कृषि की ज्यादातर स्थिति दीपावली तक पता चल जाती है। हमारे देश की कठिनाई है कि अंग्रेजों की छोड़ी विरासत को लेकर चल रहे हैं। हम मई में बजट की प्रक्रिया से पार निकलते हैं। एक जून के बाद बारिश आती है। तीन महीने बजट का इस्तेमाल नहीं हो पाता। काम करने का समय कब बचता है। जब समय आता है तो दिसंबर से मार्च तक जल्दबाजी में काम होते हैं।

बजट पहले शाम 5 बजे पेश होता था। ऐसा इसलिए होता था, क्योंकि यूके के टाइम के हिसाब से अंग्रेज यहां बजट पेश करते थे। घड़ी उलटी पकड़ते हैं तो लंदन का टाइम दिखता है। ऐसा इसलिए दिखाया, क्योंकि कई लोगों को कई चीजें समझ नहीं आतीं।

जब अटलजी की सरकार आई तो समय बदला गया। जब आपकी (यूपीए) सरकार थी तो आपने भी कमेटी बनाई थी। आप भी चाहते थे कि वक्त बदलना चाहिए। आपके वक्त के प्रपोजल को ही हमने पकड़ा। आप नहीं कर पाए। आपकी प्रायोरिटी अलग थी। आपको बड़े गर्व से कहना चाहिए। फायदा उठाइए ना कि ये हमारे समय हुआ था। रेलवे में भी एक बात समझें कि 90 साल पहले जब रेल बजट आता था, तब ट्रांसपोर्टेशन का मोड रेलवे ही था। आज ट्रांसपोर्टेशन बड़ी अनिवार्यता है। इसके कई मोड हैं। पहले बजट में गौड़ाजी ने बताया था कि करीब 1500 घोषणाएं हुई थीं। लोगों को खुश रखने के लिए एलान होते थे। 1500 घोषणाओं को कागज पर ही मोक्ष प्राप्त हो गया था। ऐसी चीजें ब्यूरोके्रसी को सूट करती थीं। हमने ये बंद किया।

हम ये जानते हैं कि जनशक्ति का मिजाज कुछ और ही होता है। कल हमारे मल्लिकार्जुन जी कह रहे थे कि कांग्रेस की कृपा है कि अब भी लोकतंत्र बचा है और आप प्रधानमंत्री बन पाए। वाह! क्या शेर सुनाया। बहुत बड़ी कृपा की आपने देश पर कि लोकतंत्र बचाया। कितने महान लोग हैं आप। लेकिन उस पार्टी के लोकतंत्र को देश भली-भांति जानता है। एक परिवार के लिए पूरा लोकतंत्र आहत कर दिया गया है।


मोदी सरकार ने देश से झूठे दावे किए


पीएम ने कहा था कि एक लाख करोड़ में अहमदाबाद से बुलेट ट्रेन मुंबई आएगी। अब 2 साल में भी बुलेट ट्रेन नहीं आई।  एक साल में 62 बार ट्रेन डिरेल हुई है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद मोदी जी ने कहा कि जैसे अकबर के दरबार में सात रत्न थे, ऐसे मेरे रत्न मनोहर पर्रिकर हैं। पर्रिकर अगर राजा मान सिंह, जेटली टोडरमल हैं तो बाकी रत्न कहां हैं?

मोदी सरकार ने देश से झूठे दावे किए। ये सरकार सिर्फ भाषण में तेज है। बुलेट ट्रेन का क्या हुआ? रेल हादसों पर सरकार को जवाब देना चाहिए। पहले सरकार ने मनरेगा का मजाक उड़ाया लेकिन अब इसका बजट बढ़ा दिया गया है।

देश में इस वक्त कोई अपनी बात नहीं रख सकता। अपने तरीके से रह नहीं सकता। क्योंकि इस वक्त देश में अघोषित इमरजेंसी है। आम आदमी को इससे बहुत परेशानी हुई। किसानों को परेशानी हुई। छोटे व्यापारियों को नुकसान हुआ। ऐसा किसी देश में नहीं है। कहीं भी नहीं है कि अपने ही पैसे निकालने के लिए लोगों को लाइन में लगना पड़े। पर सरकार को नोटबंदी का फैसला करना था तो पूरी तैयारी के साथ करना चाहिए था। तैयारी क्यों नहीं की गई? मोदी सरकार हर मामले में फेल है। चाहे किसानों का मामला हो, मनरेगा का मामला हो, रेल में भी फेल हुई है। मोदी जी केवल भाषण करना जानते हैं। भाषण से पेट नहीं भरता।

हम नोटबंदी पर चर्चा करना चाहते थे। आज भी तैयार हैं, लेकिन यह सरकार चर्चा नहीं करना चाहती थी। इस सरकार के आने के बाद किसान बहुत परेशान हैं, आत्महत्या बढ़ी है। उनको अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता है। एग्रीकल्चर में ग्रोथ नहीं हुआ है।

आप कहते है कि पिछले 60-70 साल में कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। 70 साल में कांग्रेस ने ही प्रजातंत्र को बचाया है। संविधान को बचाया है। लेकिन आप लोग देश को तोडऩा चाहते हैं, तोड़ रहे हैं। अगर कांग्रेस ने संविधान और प्रजातंत्र की रक्षा न की होती तो नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री न बन पाते, इसी वजह से वे आम परिवार से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बन पाए। बीजेपी ने देश के लिए कुर्बानी नहीं दी, शहादत नहीं दी, जबकि कांग्रेस में चाहे वह इंदिरा गांधी हो या राजीव गांधी, बहुत से लोगों ने शहादत दी है।

(यह लेख मल्लिकार्जुन खडग़े द्वारा राष्ट्रपति के बजट अभिभाषण पर लोकसभा में हुई चर्चा के दौरान दिए उनके अभिभाषण के मुख्य अंशों पर आधारित है)

मल्लिकार्जुन खडग़े


1975 का कालखंड, तब देश पर आपातकाल थोप दिया गया था, हिंदुस्तान को जेलखाना बना दिया गया था। जयप्रकाश बाबू समेत लाखों नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था। अखबारों पर ताले लगा दिए गए थे। किन्तु उन्हें अंदाज नहीं था कि जनशक्ति क्या होती है। लोकतंत्र को कुचलने के ढेर सारे प्रयासों के बावजूद यह जनशक्ति की सामर्थ्य थी कि लोकतंत्र स्थापित हुआ। ये उस सामर्थय की ताकत है कि गरीब मां का बेटा भी प्रधानमंत्री बन सका।

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी का वर्ष है। इतिहास किताबों में रहे तो समाज को प्रेरणा नहीं देता। हर युग में इतिहास को जानने और जीने का प्रयास आवश्यक होता है। उस समय हम थे या नहीं थे, हमारे कुत्ते भी थे या नहीं थे… औरों के कुत्ते हो सकते हैं। …हम कुत्तों वाली परंपरा में पले-बढ़े नहीं हैं। लेकिन देश के कोटि-कोटि लोग थे, जब कांग्रेस पार्टी का जन्म नहीं हुआ था। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम इस देश के लोगों ने जान की बाजी लगाकर लड़ा था। सभी ने मिलकर लड़ा था। संप्रदाय की भेद-रेखा नहीं थी। तब भी कमल था, आज भी कमल है।

शास्त्रीजी की अपनी गरिमा थी। युद्ध के दिन थे। भारत में विजय का भाव था। शास्त्रीजी ने अन्न त्यागने की बात कही थी। ज्यादातर सरकारों ने जन सामर्थ्य को पहचानना छोड़ दिया है। लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ा चिंता का विषय है। मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति ने बातों-बातों में कह दिया था कि जो अफोर्ड कर सकते हैं, वे गैस की सब्सिडी छोड़ दें। 2014 में एक दल इस मुद्दे पर चुनाव लड़ रहा था कि 9 सिलेंडर देंगे या 12 देंगे। हमने कहा कि अफोर्ड करने वाले सब्सिडी छोड़ दें। सिर्फ कहा था। इस देश के 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा लोग गैस सब्सिडी छोडऩे के लिए आगे आए।

एक समानांतर अर्थव्यवस्था बनी थी। ये बात भी आपके (कांग्रेस) संज्ञान में थी। जब इंदिराजी थीं, तब यशवंतराव चह्वाण उनके पास गए थे। तब इंदिराजी ने कहा था कि चुनाव नहीं लडऩा है क्या। आपका निर्णय गलत नहीं था, लेकिन आपको चुनाव का डर था। आपने कैसे देश चलाया?

चार्वाक का सिद्धांत विपक्ष ने मान लिया। चार्वाक ने कहा था- ”यावत जीवेत, सुखम जीवेत। ऋणं कृत्वा, घृतं पीवेत’’। यानी जब तक जियो सुख से जियो, उधार लो और घी पियो। उस समय ऋषियों ने घी पीने की बात कही थी। शायद उस वक्त भगवंत मान नहीं थे। नहीं तो कुछ और पीने को कहते।

नीतियों की ताकत नियम से जुड़ी होती है। इसलिए हमारे देश में उस कार्य-संस्कृति को समझने की जरूरत है। हम कुछ भी कहते हैं तो आप कहते हैं कि ये हमारे समय था। धर्म क्या है, वो तो आप जानते हैं, लेकिन वह आपकी प्रवृत्ति नहीं थी। अधर्म क्या है, वो भी आप जानते हैं, लेकिन उसे छोडऩे का आपका सामर्थ्य नहीं था। 2007 के बाद मैंने जितनी चुनावी सभाएं सुनीं, आपके नेता कहते रहे कि राजीव गांधी कम्प्यूटर क्रांति लाए। जब आज मैं कह रहा हूं कि मोबाइल फोन का इस्तेमाल बैंकिंग नेटवर्क में किया जा सकता है तो आप कह रहे हैं कि मोबाइल ही कहां हैं। तो आप क्या समझाना चाहते हैं?

अगर 40 फीसदी के पास भी मोबाइल है तो क्या उन्हें आधुनिक व्यवस्था की दिशा से जोडऩे का प्रयत्न नहीं होना चाहिए? करंसी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए काफी खर्च होता है। इसलिए जो लोग डिजिटल करंसी से जुड़ सकते हैं, उन्हें जोडऩा चाहिए।

आप मोदी का विरोध करें, कोई बात नहीं। आपका काम भी है। करना चाहिए। लेकिन जो अच्छा काम हो रहा है, उसे तो बढ़ावा दें।

(यह लेख लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रपति के बजट अभिभाषण पर दिये धन्यवाद प्रस्ताव के मुख्य अंशों पर आधारित है।)

 नरेन्द्र मोदी

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