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राहुल बाबा की जलेबी

राहुल बाबा की जलेबी

राहुल बाबा ने अखिलेश के साथ मिलकर गठबंधन की जलेबी बनाई है। लेकिन जलेबी का स्वाद कांग्रेसियों को कसैला लग रहा है। पहला तो यह कि गठबंधन में मिली 105 सीटों में से 14 प्रत्याशी सपाई पंजे के निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं। दूसरे तमाम डमी सपाई खेल बिगाड़ रहे हैं। यहां तक तो ठीक था। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कांग्रेसी तो सपाइयों को जिता रहे हैं, लेकिन सपाई कांग्रेस प्रत्याशियों को घास तक नहीं डाल रहे हैं। वहीं राहुल बाबा यूपी को ‘यह साथ पसंद है’ की जलेबी बना रहे हैं।



पत्ता काट देगा


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टीपू की तलवार चर्चा में है। अब कोई चूं-चपड़ नहीं कर रहा है। शिवपाल भी नहीं। टीपू (अखिलेश) को बारे में यह आम है कि जो भी नया-पुराना सपाई रंग-ए-जौहर दिखाने की कोशिश करेगा, टीपू उसका पत्ता काट देगा। सूची जारी होने के बाद पिछले एक हफ्ते में कई उम्मीदवारों के पत्ते कट गए हैं, वह भी मुलायम के खास वफादारों के। बताते हैं कि इसे मुलायम, बेनी, राम गोपाल, नरेश अग्रवाल सब समझ गए हैं। एक सपाई भाई तो यहां तक कहते हैं कि हुआ नहीं बाप का तो क्या होगा आप का?



बेचारे नेता जी


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नेता जी (मुलायम) अब बेचारे हो गए हैं। स्वास्थ्य खराब, बुढ़ापा, ऊपर से शुभचिंतकों, प्रियजनों, लक्ष्मण जैसे भाई शिवपाल से भी दूर। अमर सिंह का पुत्र-प्रेम का ताना भी। इतना तक तो ठीक था, लेकिन अब वह पार्टी-गठबंधन के चुनाव-प्रचार के लिए तैयार हैं तो कोई बुला ही नहीं रहा है। लोग-बाग डर रहे हैं कि चुनाव-प्रचार के दौरान नेता जी कहीं अपने ही पाले में गोल न मार दें।



आखिर पीयूष हैं


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लो प्रोफाइल रहकर हाई प्रोफाइल फिगर हैं। 18 घंटे की मेहनत के बाद भी तरो-ताजा मुस्कान। पार्टी और सरकार दोनों में परफार्मर। लेकिन कहते हैं कि नाम होगा तो क्या बदनाम न होंगे। यही हाल पीयूष गोयल का है। सफलता ने विरोधी बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। पार्टी में भी और सरकार में भी। वहीं पीयूष बाबू हैं कि कोई चाहे जो कहे, वह बस मुस्करा देते हैं।



केजरीबाबू


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गोवा और पंजाब में मतदान के बाद दिल्ली के सीएम केजरी बाबू आराम फरमा रहे हैं। खबर है कि केजरी बाबू ऊर्जा ग्रहण करने में जुटे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि 11 मार्च को ईवीएम से कौन-सा जिन्न निकलने वाला है। वैसे सभी पांच राज्यों के चुनाव में उनकी तमाम कोशिश खास कमाल नहीं कर पाई हैं। इसलिए वह आराम के बहाने मोदी जी पर अटैक का नया तरीका निकालने के लिए गूगलबाजी कर रहे हैं।



हाथी मेरे साथी


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हाथी वाली पार्टी की बहन जी ने सीएम बनने का सपना देख लिया है। बहन जी का हाथी चल भी रहा था कि अचानक अखिलेश-कांग्रेस हो गया। हाथी ने चुप-चाप राह बदल दी और पीठ पर 100 अल्पसंख्यक उम्मीदवार बिठा लिए। खबर है इससे लड़ाई दिलचस्प हो गई है। सपा की अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिश को तगड़ा झटका लगा है। वोटों के इस बंटवारे ने कमल में चमक ला दी है, वहीं हाथी को अब कुछ समझ में नहीं आ रहा है।


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