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सुपरपावर बनने का सुपर मंत्र : दीपक कुमार रथ

सुपरपावर बनने का सुपर मंत्र : दीपक कुमार रथ

किसी देश का अतीत और वर्तमान, उसका भविष्य तय करता है। पृथ्वी पर प्राचीनतम सभ्यताओं में एक भारत आज फिर विश्व मंच पर चर्चा का विषय बन गया है। सदियों पहले भारत अपनी समृद्धि के लिए प्रसिद्ध था। हर कोई इस स्वर्ग की खोज में लगा रहता था। धन-संपदा की लालच में यहां दूर-दूर से लोग आए। कोलंबस भी भारत की खोज में ही चला था। यह दीगर बात है कि वह अमेरिका पहुंच गया। जो यहां आया, वह अपने साथ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह की समृद्धियों की अनगिनत कथाएं अपने साथ ले गया। यहां आक्रांता और विद्वान दोनों ही आए। कुछ संपत्ति बटोर ले गए तो कुछ अपार विद्वता अपने साथ ले गए।

अतीत की कलाकृतियों और वास्तुशिल्प के नमूने आज भी कायम हैं। हमारा प्राचीन साहित्य हमें गौरवान्वित करता है और हमारे अतीत का यही गौरव आज के युग में भी हमारी पूंजी बना हुआ है। प्राचीन समय में करीब डेढ़ सहस्राब्दि तक भारतीय उपमहाद्वीप विश्व में सबसे खुशहाल और समृद्ध स्थान बना हुआ था।

हमारे पास ज्ञान और विकास का ही अकूत भंडार नहीं था, बल्कि प्राचीन भारत सुंदर जलवायु और उर्वर मिट्टी के चलते समृद्धि का सागर था। ज्ञान और विकास की गहराइयां उसकी दूसरी समृद्धि थी। इसी वजह से दुनिया भर के आक्रांताओं की भारत विजय की लालसा मिटती नहीं थी और हम वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहे।

17-01-2015अब यह सब बदलने वाला है। फिर भारत का दौर आने वाला है। पिछले छह महीने से नई सरकार के आने के बाद भारत का वही जादुई स्पर्श फिर दुनिया को दीवाना बनाने लगा है। दुनिया सांस रोककर इंतजार कर रही है। जानकारों का अनुमान है कि भारत 2035 तक महाशक्ति के रूप में उभर कर आएगा। भारत अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था और तेजी से विकसित होते सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योग के चलते भविष्य में ‘मानव संसाधन’ का सबसे बड़ा भंडार बनने जा रहा है।

मिस्र के राजाओं ने जब महान पिरामडों का निर्माण किया या पर्सिया के ताकतवर राजा ने जब बेबीलोन को जीता, या महान सिकंदर ने जब दारा की फौज को हराकर अपना साम्राज्य स्थापित किया, या चीन के सम्राटों ने जब सबसे ऊंची दीवार बनाई या जब रोमन साम्राज्य का वर्चस्व स्थापित हुआ, उससे काफी पहले भारत अपनी विकसित सभ्यता और महान वैज्ञानिक ज्ञान से स्वर्णिम युग में जी रहा था।

उस समय सिर्फ भारत में ही सिंधु नदी के किनारे ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ एकमात्र शहरी सभ्यता थी। यह पृथ्वी पर पहली सभ्यता थी जिसके पास शहरी नियोजन और धातुकर्म का ज्ञान था। और हां, उस समय भी हर घर में शौच और स्नान घर हुआ करता था।

जो भारत में नहीं है, वह जगत में भी नहीं है: जुअल ओराम

17-01-2015

असम में जो दुखद घटना हुई उसमें 52 जनजातियों की (संथाल लोगों की) हत्या कर दी गई। माननीय राजनाथ सिंह जी के साथ मुझे भी वहां जाने का प्रधानमंत्री से निर्देश मिला है। मेक इन इंडिया पर कुछ बताने से पहले उडिय़ा का एक कहावत हिंदी में बताना चाहता हूं। हिंदी में उसका अर्थ है, जो भारतवर्ष में नहीं है, वो जगत में कहीं भी नहीं है। यानि भारत में सब कुछ है। यहां का भूभाग, मौसम, 6 ऋतु, पर्व, त्योहार, रीति-रिवाज सब कुछ अलग अनोखा है। ऐसा विश्व में कहीं अन्य जगह नहीं है। भारत में ही साइंटिफिक रीजन को धर्म से जोड़ा गया हैं। यह भारत की परम्परा है कि सुबह तुलसी को पानी देते हैं और शाम को उसके आगे दिया जलाते हैं। एक दिन मैंने एक व्यक्ति से पूछा कि तुलसी के पौधे के साथ ही ऐसा क्यों होता है तो पता चला कि वही एक ऐसा पौधा है जो सुबह-शाम ऑक्सीजन छोड़ता है। मैं आप लोगों को एक चुटकुला सुनाता हूं। एक बार अमेरिका में रॉकेट लॉन्च के समय इग्निशन करने के बाद भी वो स्टार्ट नहीं हुआ। फिर सभी देशों के वैज्ञानिकों को बुलाया गया। इंडिया से एक सरदार जी को भेजा गया। उन्होंने रॉकेट को टेढ़ा किया और फिर इग्निशन के बाद वो लॉन्च हुआ। सरदार जी ने बताया कि स्कूटर जब स्टार्ट नहीं होती है तो हम उसे टेढ़ा करके स्टार्ट करते हैं। वही लॉजिक रॉकेट लॉन्च करने में भी लगाया। इंडिया में जुगाड़ भी चलता है। इंडिया में कुछ भी बनाया जा सकता है। हम आगे बढ़ सकते है। प्रधानमंत्री जी का जो मेक इन इंडिया प्रोग्राम है, उसमें हम सफल हो सकते हैं। इसके लिए हम सबको साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। सरकार भी इस पर ध्यान दे रही है और उम्मीद करता हूं कि इसमें हम सब सफल भी होंगे।
(केन्द्रीय जनजातीय कल्याण मंत्री, भारत सरकार)

भारतीय वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने ही शून्य का आविष्कार किया, जिससे मानव समाज गिनती करना सीख पाया। उन्होंने ही सबसे पहले सूर्य से धरती की दूरी की सही-सही गणना की और बताया कि धरती अपनी धुरी पर घूमती है। वे ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या करने वाले भी पहले व्यक्ति थे। भारत ने ही बीजगणित, त्रिकोणमिति और कलकुलस का ज्ञान दिया। इसी धरती से दर्शन, धर्म, भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र का उदय हुआ। सभी भाषाओं की जननी संस्कृत का मूल स्थान भी भारत ही है।
शल्य-चिकित्सा के जनक सुश्रुत ने हजारों साल पहले कॉस्मेटिक सर्जरी सहित कई कठिन सर्जरी करने में सफलता पाई थी। उनकी शल्य चिकित्सा के अनुभवों का संग्रह ‘सुश्रुतसंहिता’ शल्य चिकित्सा का सबसे पुराना शास्त्र है, जो आज भी उपलब्ध है।

17-01-2015

मानसिकता बदलने की जरूरत: एम.एच. डालमिया

17-01-2015

‘मेक इन इंडिया’ का स्लोगन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत उचित समय पर दिया है। जैसा कि सभी वक्ताओं ने कहा कि जीडीपी में हमारा इंडस्ट्रियल कॉन्ट्रिब्यूशन 15 प्रतिशत है, जबकि चीन में 30 प्रतिशत है। यूपीए की सरकार ने भी इसे बढ़ाने की बहुत चेष्टा की या कम से कम कागज पर ही सही बहुत सारी बातें कीं, लेकिन आगे कुछ नहीं हो पाया। मेरी समझ से दो-चार चीजों पर हमें विचार करने की जरूरत है। बहुत बड़े देशों में भी हजारों करोड़ों रूपए के निवेश के बावजूद भी उनका समेकित विकास शायद नहीं हो पाता है, क्योंकि उसमें रोजगार का सृजन नहीं हो पाता। सरकार को सेल्स टैक्स, एक्साईज आदि के रूप में आय अधिक जरूरत होते हैं, लेकिन रोजगार के हिसाब से समेकित विकास नहीं हो पाता है। इसलिए हमें एक संतुलन की दरकार है। आज जर्मनी में लघु एवं मध्यम उद्योग उन्हीं को कहा जाता है जो वहां की अर्थव्यवस्था के रीढ़ हैं। हालांकि बड़ उद्योग भी हैं, लेकिन वो समाज के लिए लघु एवं मध्यम उद्योग ही हैं। आज सब उद्योगपतियों का माइंडसेट है, एक कंपनी से दूसरी कंपनी बनाना, चाहे इसके लिए कितनी भी कैपिटल लगानी पड़े। अब इसको परिवर्तित करने की आवश्यकता है। इसके लिए बहुत सारी चीजें करनी है, करने की आवश्यकता हो सकती है, जिससे कि समेकित विकास के लिए अधिक से अधिक एम्प्लॉयमेंट दे सकें। क्वालिटी सब से महत्वपूर्ण चीज है। ‘मेक इन इंडिया’ या ‘मेड इन इंडिया’ के जरिए हम अपने सामान को बाहर भेज सकेंगे। अभी तक हमारे उद्योगपतियों में, हमारी लेबरफार्स में, हमारे सुपरवाईजर्स में क्वालिटी का उतना बड़ा एमफैसिस नहीं है, जिसकी आवशयकता अंतर्राष्ट्रीय जगत में है। भारत एक अद्वितीय देश है, जहां एयरबस चलाने पायलट भी हैं और बैलगाड़ी चलाने वाले गाड़ीवान भी। एयरबस मेन्टेन करने वाले इंजीनियर भी हैं और बैलगाड़ी ठीक करने वाला मैकेनिक भी है। इसी तरह यहां बहुत अच्छी क्वालिटी बनाने वाले उद्योग भी हैं, लेकिन एक एवरेज के अंदर में। सस्ती चीजों को बनाने को लेकर विदेशों में भारत की अलग मान्यता है, जैसा कि चीन के बारे में कभी थी। लेकिन, चीन सभी चीजें सस्ती बना देता है और इस कारण उसे हर जगह एंट्री भी मिल जाती है। उसमें कुछ चीजें अच्छी भी हैं और कुछ बेकार भी। चीन के उभार से भारत को सीखने की जरूरत है। उत्पादकता में सिर्फ मैनपावर की लागत का ही सवाल नहीं होता। उसी मशीन अगर दुगने माल निकाला जाए तो उसकी लागत आधी हो जाती है। हमारा 100 यूनिट मशीन लगाने की जगह 50 मशीन में काम हो जाता है। उसमें हमारी लागत ज्यादा बचती है, बनिस्पत कि लेबर सेविंग के। एक अपना अनुभव बताता हूं। हमलोग किसी एक्सपोर्ट मार्किट में गए। एक प्रोजेक्ट का काम था। हमारा दाम यूरोपियन प्रोड्यूसर से 20 प्रतिशत कम था, लेकिन हम उन प्रोजेक्ट वालों का विश्वास नहीं जीत पाए। उन्हें लगा कि हम समय पर माल सप्लाई नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि अगर हम एक वीक भी डिले कर देंगे तो उनका उससे ज्यादा का नुकसान हो जाएगा, जितना कि वो ऑर्डर देकर बचाते। अपने यहां टाइम से काम करने का कल्चर नहीं है। कई-कई जगहों पर है, लेकिन हर जगह नहीं है। इसका एक और अपोजिट चीज आपको बताता हूं। मान लीजिए एक कस्टमर ने हमें ऑर्डर दिया और दिसंबर में डिलीवरी देनी है। दिसंबर में हमारा माल है, लेकिन उसके प्रोजेक्ट में डिले हो जाने के कारण उसने कहा कि मैं आपको न केवल पूरे पैसे दूंगा, बल्कि स्टोरेज का भी आपको पैसे दूंगा। बाद में उसे मंगा लूंगा। ये चिंतन हमारे यहां के कस्टमर के पास नहीं है। ठीक है, डिले हो गया तो क्या हुआ? ऐसी स्थिति को हमें बदलने की जरूरत है।

(अध्यक्ष, ओसीएल इंडिया लिमिटेड)

चिकित्सा का प्राचीन शास्त्र आयुर्वेद की मान्यता है कि भौतिक शरीर और मानसिक विचारों की प्रक्रिया में अटूट संबंध है। ध्यान केंद्रित करने की विधि योग का विकास भी प्राचीन भारत में हुआ। अनुसंधानों से यह साबित हुआ है कि योग कई असाध्य रोगों से बचाव का बेहतर तरीका है।

विश्व का पहला विश्वविद्यालय ‘तक्षशिला’ हजारों साल पहले भारत में था। इस विश्वविद्यालय से कई महान विद्वान निकले, जिनमें सुप्रसिद्ध चाणक्य भी थे, जिन्होंने अर्थव्यवस्था पर सबसे प्राचीन ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की थी।

विकास में पशुधन का भी ध्यान रहे: वल्लभभाई कथीरिया

17-01-2015

मेक इन इंडिया के कांसेप्ट पर आधारित इस सेमीनार में मैं दो बातें अलग तरीके से रखना चाहता हूं। आजकल इंडस्ट्रियल मेक इन इंडिया की बात हो रही हैं, लेकिन पिछले कुछ साल से गुजरात में गौसेवा आयोग का अध्यक्ष होने के नाते आज मैं एक अलग डायवर्सिफिकेशन की बात कहूंगा। मैं बात करना चाह रहा हूं लाइवस्टॉक के डेवलपमेंट की। वह भी हमारा एक रॉ-मटेरियल है। आने वाले दिनों में मेक इन इंडिया कांसेप्ट में हमे एग्रीकल्चर और लाइवस्टॉक पशुपालन, एनिमल हसबेंडरी, डेयरी डेवलपमेंट आदि पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत के लाइवस्टॉक में विभिन्नता है। गाय की घरेलू जाति, साहिवाल है, हरियाणवी है, गुजरात के गिर या कांकरेज, पोंगल हैं। भारत में ऐसे 37 प्रजातियां हैं। इन प्रजातियों की विश्व में बहुत डिमांड है। हमारे यहां की विभिन्न नस्लों की गायों की दूध को अमृत माना जाता है। यह साइंटिफिकली प्रूव भी हो चुका है। न्यूजीलैंड, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने प्रूव किया है कि भारतीय नस्ल की गायों का दूध कैंसर से बचाता है। उसमें जो तत्व है वो विदेशी नस्ल की गायों में नहीं है। विदेशी नस्ल की गायों में तो बीसीएम 7 नामक टॉक्सिन पाया जाता है। उसके कारण कैंसर, मानसिक बिमारियां, बच्चों में बहरापन, मधुमेह जैसी कई तरह की बिमारियां हो जाती हैं। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में ऐसी बीमारियां बहुत दिखाई दीं। आजकल विदेशी नस्ल की गायों के दूध का कॉरपोरेशन गया है वहां। मैं यह चाहूंगा कि हमारी जितनी भी नस्ल की गाएं हैं उन्हें आनुवांशिकीय रूप से डेवलप किया जाए। कुछ समय पहले मैंने एक नेशनल सेमिनार किया था। उसमें यह बात सामने आई कि देशी नस्ल की गायों को निगलेक्ट किया गया, इसलिए वो 2-3 लीटर दूध दे रही हैं। अगर उनका जेनेटिकली डेवलपमेंट हो और अच्छा गोपालक हो तो वो 20 से लेकर 50 लीटर तक दूध दे सकती हैं। आने वाले समय में दूध का वैश्विक बाजार होगा। इसीलिए मैं चाहूँगा कि डाईवर्शिफिकेशन की बिजनेस के लिए बड़ी मात्रा में सेलेक्टेड गायों का ब्रिडिंग का काम हो। दूसरे चरण में इजरायल, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क की 1,000, 2,000, 10,000 की संख्या में गाय रखकर उनके दूध का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो। इस दूध का हम पूरी दुनिया में सप्लाई कर सकते हैं। इसके अलावा भी कई फायदे हैं। मिल्क प्रोडक्शन के साथ-साथ उनकी जितने भी आइटम बनेंगे उनका आने वाले दिनों में विश्व में डिमांड बढऩे वाला है। ये बिजनेस भी मेक इन इंडिया की तरह एक प्रोडक्शन है। गौ-मूत्र से बनने वाले मेडिसिन की मांग बढऩे वाली है। अब इन्टिग्रेटेड मेडिसिन, होलिस्टिक लाइफ, होलिस्टिक मेडिसिन का जमाना आने वाला है। ऐसे समय में यह व्यवसाय इफेक्टिव है। साथ यह प्रोडक्ट टॉक्सिक भी नहीं है और अफोर्डेबल भी है। इन पर भी इंडस्ट्री डेवेलप कर सकते हैं। आजकल सभी चिंतित हैं ऑयल प्राईसेस से, जोकि कम हो गया है, लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार अगले 25 सालों में भूतल में जितने भी तेल हैं वो खत्म होने वाले हैं। तब हम क्या करेंगे? हमारी लाइट कैसे जलेंगी? हमारे गैस कैसे जलेंगे? हमारे पेट्रोल के वाहन कैसे चलेंगे? तब गाय का गोबर ही एकमात्र विकल्प होगा। गोबर से बायो फर्टिलाइजर, इलेक्ट्रिसिटी और गैस बनने के कारण इसकी डिमांड बढ़ेगी। हमारे देश में जो पशुधन है उसका सही उपयोग किया जाये तो दूध के आलावा भी गाय का गोबर और गौमूत्र से फायदे होने वाले हैं। ये रॉ मटेरियल कायम रहने वाला है। डिमांड बढऩे वाला है। इससे बिजनेस ही नहीं वेलफेयर ऑफ मैनकाइंड और वेलफेयर ऑफ यूनिवर्स भी होगा। क्लाइमेट चेंज में भी गौ माता सहायक होंगी। इसके माध्यम से हम देश का भी कल्याण कर सकेंगे, अपनी संस्कृति के अनुरूप।

(पूर्व केन्द्रीय एचआरडी मंत्री, भारत सरकार)

प्राचीन भारत कई धर्मों की भी जन्मभूमि है। हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म सभी आज भारत में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के साथ स्थापित हैं।

प्राचीन भारत में स्त्रियों को भारी महत्ता हासिल थी। दरअसल, तब उनकी पुरुषों के साथ बराबरी की हैसियत थी। विद्वानों का मानना है कि कई सभ्यताओं में उस दौर में औरतों को समान अधिकार हासिल नहीं था। वैदिक काल में स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था थी।
कपास की खेती पहली दफा प्राचीन भारत में करीब 7,000 वर्ष पहले शुरू हुई थी। यहां उस दौर सबसे मुलायम सूत का उत्पादन होता था, जिसे कई लोग तो रेशम जैसा मानते थे। प्राचीन भारत में करघा और चरखे का भी विकास हुआ। भारत में कृषि ईसा पूर्व 9,000 साल से पाई जाती है। प्राचीन भारतीयों ने पौधों और जानवरों को पालतू बनाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि कपड़ा बुनाई का पहला करघा भारत में ही विकसित हुआ।

शोध विकास की कुंजी है: एल. एल. झुनझुनवाला

17-01-2015

मोदीजी के मेक इन इंडिया आह्वान पर आयोजित यह कार्यक्रम में अपने 60 बरस के व्यापारिक जीवन में पहली बार किसी उद्योगपति या व्यापारी के लिए अच्छे शब्द कहते हुए सुना हूं। अगर मैं 1990 के पहले के अपने जीवन को देखूं तो 80 प्रतिशत मेरा समय दिल्ली के सेक्रेटेरिएट में या बॉम्बे के टेक्सटाइल कमिश्नर के ऑफिस में बीता है। काम में केवल 20 प्रतिशत समय बीतता था, लेकिन आज मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है कि अब वातावरण बदल रहा है। 1880-82 की बात है। जमशेदजी के मन में आया कि एक स्टील प्लांट भारत में लगाऊं। 6-7 बरस तक वो प्रयास करते रहे, लेकिन ब्रिटिश गवर्नमेंट ने उन्हें सहयोग नहीं दिया। जब वो गहराई में गए तो उनको लगा कि अगर अनुसन्धान नहीं होगा, अगर इनोवेशन नहीं होगा तो स्टील प्लांट सफल नहीं होगा। उन्होंने बैंगलोर में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च स्थापित करने की योजना बनाई। दुर्भाग्य की बात है कि 4 बरस तक जमशेदजी भारत सरकार से बातें करते रहे, पर उनको सफलता नहीं मिली। संयोग की बात है कि 1893 में स्वामी विवेकानंद विश्वधर्म सम्मलेन के लिए अमेरिका जा रहे थे। जमशेदजी जापान में किसी काम से गए हुए थे। उस वक्त कोई हवाई जहाज नहीं था। सारी यात्राएं पानी के जहाज से होती थी। जमशेद जी जापान से अमेरिका जा रहे थे। रास्ते में स्वामीजी से बात हुई।

स्वामीजी 30 साल के और जमशेदजी 46 साल के। एक संन्यासी और एक उद्योगपति। जमशेदजी स्वामीजी से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने स्वामीजी को पत्र लिखा की आप लोगों में जो संन्यास की भावना है, त्याग की भावना है, इस काम का जिम्मा अगर आप लें ताकि भारत का उद्धार हो सके। स्वामीजी की एक आयरिश शिष्या थी मिस नोबेल। उन्होंने उससे कहा कि तुम इंग्लैंड जाकर बैठो और इनकी जो तकलीफ है उसे दूर करने का प्रयास करो। भगिनी निवेदिता लंदन गईं। उस समय के ब्रिटिश सरकार का रुख अच्छा नहीं था। उन्होंने वहां के सभी पार्लियामेंट के मेंबर्स को अपील भेजी और उनको उत्साहित किया। 5 वर्ष लगे और जमशेदजी चले गए। विवेकानंद भी चले गए। पर सौभाग्यवश जमशेदजी का यह काम आगे बढ़ा। जमशेदजी के जाने के बाद सारा बागडोर जेआरडी टाटा के पास आ गई। जेआरडी टाटा इसका विस्तार चाहते थे, लेकिन भारत सरकार ने उनको विस्तार करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता थी कि स्टील प्लांट हम पब्लिक सेक्टर में लगाएंगे। हमने ये देखा नहीं कि विश्वयुद्ध में हारा हुआ जापान किस प्रकार स्टील एक्सपोर्ट करके इतना धनी बन गया। लेकिन, यह काम नहीं किया। आज मुझे बहुत खुशी हो रही है कि हम उद्योगपतियों की उपलब्धियों की सराहना मिल रही है। 500 साल पहले की बात है, जब राजस्थान में महाराणा प्रताप अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए युद्धरत थे। संपत्ति का अभाव था और वह जंगलों में घूम रहे थे। उद्योगपतियों में अच्छे लोग हुए हैं जो हमारे श्रद्धा के पात्र हैं। मैं हाल की बात करता हूं घनश्याम दासजी बिरला का। आप बिरला परिवार के जितने भी विवाद हैं सब भूल जाइए। गांधीजी उनको अपना पुत्र की तरह मानते थे। जब-जब गांधीजी ने उनसे रुपए मांगे तो उन्होंने ब्लैंक चेक भेज दिया। गांधीजी की जब हत्या बिरला पार्क में हुई उस समय भारत सरकार का व्यवहार था उस बिरला हाउस को लेकर पब्लिक प्लेस बनाने की।

आज भारत में योग्यता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मंगल पर अगर भारत पहले प्रयास में सफल हो सकता है तो कोई कारण नहीं है कि हम लाखों करोड़ रुपये के हवाई जहाज इम्पोर्ट करें। क्यों नहीं हम बोइंग यहां बना पाते? क्यों नहीं एयरबेस हम बना पाते? अगर हम मंगलयान पर जा सकते हैं तो ये सब भी बना सकते हैं। उद्योगपतियों के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती है। अभी भारत का स्थान विश्व में बहुत ऊंचा नहीं है। हमें बहुत दूर जाना है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमको नरेंद्र मोदी जैसे डायनेमिक प्रधानमंत्री मिले है। हमें गौरव है कि आज हमको अपमानित नहीं किया जाता है। हालांकि सम्मानित तो आज भी नहीं किया जाता है। प्रधानमंत्री जी ने दावा किया है कि यहां गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 30 करोड़ लोगों के पास 2022 तक भूखे नहीं रहेंगे और उनके पास मकान होगा। 2022 अभी बहुत दूर है। जो अभी पेशवर में हुआ है, जिस प्रकार बच्चों की हत्या हुई है, मुझे बहुत भय लगता है। आज के उद्योगपति अगर अपना रवैया चेंज नहीं करेंगे तो नक्सलियों के हाथ में हम हिंसा का औजार थमा देंगे। आज मैं देखता हूं कि एक-एक परिवार में 8 सदस्य हैं वहां 24 नौकर हैं। एक-एक बच्चे पर तीन-तीन आया है। ड्राइवर है। रात का ड्राइवर, दिन का अलग ड्राइवर है। अगर इतना भेद रहा कि एक तरफ 30 करोड़ भूखे आदमी है और एक तरफ इतना वैभव और उसका दुरूपयोग। मुझे भय लगता है कि जो पेशवर में हुआ, वह भारत के विद्यालयों में ना हो। मैं दीपक रथ को बहुत-बहुत साधुवाद देता हूं कि उन्होंने प्रधानमंत्री के आह्वान को गति देने के लिए ये आयोजन किया।

(एल.एन.जे. भीलवाड़ा ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के संस्थापक)

ये तो विशाल विकास कथा का एक छोटा-सा हिस्सा है। विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत के अनेक अविष्कारों का तो अभी पता लगाना बाकी है। कुल मिलाकर, भारत ने हजारों साल पहले हमारी आधुनिक सभ्यता की नींव रखी और दुनिया को अंधेरे से प्रकाश दिखाकर मनुष्य जाति के प्रति अनोखा योगदान दिया।

मई 2014 में दिल्ली में नई स्थायी सरकार के गठन के साथ ही हर भारतीय के दिल में उम्मीद की नई धड़कन पैदा हो गई है। नई सरकार ने अनेक घोषणाएं कीं, जो सुर्खियां बनीं। उनमें सबसे नायाब ‘मेक इन इंडिया’ अभियान है। प्रधानमंत्री भारत को उत्पादन का अनोखा ठिकाना बना देना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ नामक विशाल पहल का प्रारंभ किया।

आज भारत वैश्विकरण की नई ताकतों, प्रतिस्पर्धा, ऊंचे मानकों वाले उत्पादन से मुकाबिल है। स्मार्ट फोन से लेकर तेज रफ्तार कार तक की भारत में उत्पादन की तैयारी चल रही है और जल्दी ही हम इन पर ‘मेड इन ताइवान’ या ‘मेड इन जर्मनी’ के बदले ‘मेड इन इंडिया’ लिखा पाएंगे।

भारत अपनी विविधता की प्रचुर संपत्ति, अनोखी लगन और होड़ की अद्भुत क्षमता से हर सामान पर यह लिखावट हासिल कर सकता है। लेकिन, इसके लिए उसके पास प्रौद्योगिकी का होना बेहद जरूरी है।

17-01-2015

‘मेक इन इंडिया’ कोई कपोल कल्पना नहीं है। इसे हासिल करने में कई साल नहीं लगेंगे, बल्कि इसे फौरन, मेरे इन पंक्तियों के पढऩे के साथ ही हासिल किया जा सकता है। आइए हम प्रौद्योगिकी की ताकत को दुनिया की नई महाशक्ति की महान यात्रा में उत्प्रेरक का काम करने दें। भारत का विश्व मंच पर आगमन हो रहा है।

‘मेक इन इंडिया’ अभियान का जितना संबंध नई पहल से है, उतना ही लोगों से भी है। इसलिए मैं देश के बुद्धिजीवियों से अपील करना चाहता हूं कि वे आगे आएं और इस संदेश को आगे बढ़ाएं कि देश के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है। मैं उनसे अपील करता हूं कि वे इसे खुलकर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाएं। पत्रकारिता जगत का एक अदना-सा सदस्य होने के नाते मैं उनकी आवाज और जोरदार ढंग से सुनना चाहता हूं। उनकी बेहतरीन बहस सुनने को मेरे कान लालायित हैं।

17-01-2015

मेरे मन में अभी भी यह शंका है कि शायद मैं अपने जीवन में भारत को समृद्धि की धरती के रूप में न देख पाऊं, जहां हमारा गरीब से गरीब भाई भी खुशनुमा, सार्थक जिंदगी जी सके। ऐसा भारत बन सके जहां भूख, भय और निराशा की कोई जगह न हो, जहां कोई बेघर न हो। यह मेरे सपने का भारत है और उदय इंडिया के जरिए मैं इस लक्ष्य में अदना-सा योगदान भी कर पाया तो मैं समझूंगा कि मेरा जीवन धन्य हो गया।

मेरी बातों को ध्यान से सुनने के लिए मैं आप सबका आभारी हूं और धन्यवाद अर्पित करता हूं।и другие рекомендуемые вами смежные и производные от этих ключейоперации на простате в германии

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