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जीवन का गीत-संगीत

जीवन का गीत-संगीत

 ‘धूप के सिक्के’भारत के प्रसिद्ध  गीतकार और एडवर्टाइजिंग प्रोफेशनल के रूप में विख्यात प्रसून जोशी के द्वारा लिखी गई है। यह पुस्तक उनके द्वारा लिखे गीतों का संकलन है, जहां हम अक्सर सुनते हैं कि फिल्मी गीतों के बोल की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, एक नाम है जो इस धारा को चुनौती देता है। प्रसून जोशी, वर्तमान गीत-लेखकों के मध्य एक मशालवाहक, एक पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाते हैं। प्रसून ने भारतीय फिल्मी गीतों में काव्य की परंपरा को जीवित रखा है। उनके गीत, ताजगी भरे विचारों और अद्भुत शिल्प का अनुपम उदाहरण है। उनकी कविताएं और गीत रचनाएं श्रोताओं से एक गहरा नाता तो जोड़ती ही हैं, साथ ही कलापारखियों द्वारा भी सराही जाती हैं।

धूप के सिक्के एक काव्यमय यात्रा है, जो उन विचारों की झलक देती है जो इस गीतकार की लेखनी को प्रेरित करते हैं जब वह एक गीत के माध्यम से मन के भावों व अनुभूतियों को साकार करने का प्रयास करता है। गीत और संगीत भारतीय सिनेमा की आत्मा रहे हैं। अनेक दशकों से ये हमारी फिल्मों की कथा-कहानियों को समृद्ध करते रहे हैं, उनकी सुन्दरता और अर्थ में वृद्धि करते रहे हैं। एक गीत को कहानी की संरचना में समाहित करने का दायित्व अक्सर गीतकार का ही रहता है।

धूप के सिक्के

एक काव्यमय यात्रा

लेखक     : प्रसून जोशी

       प्रकाशक  : रूपा  पब्लिकेशंस

मूल्य  : 295 रु.

पृष्ठ : 200

यह पुस्तक प्रसुन जोशी के विचारों  और उनकी भावनाओं को समझाने का अवसर देती है- चाहे वह तारे जमी पर का कोमल, ‘मां’हो या रंग दे बसंती का प्रेरणादायी ‘खून चला’या देल्ही 6 का मस्ती भरा ‘मसक्कली’और आस्था भरा ‘अर्जियां’, प्रसून जोशी के गीतों ने सदैव ही सुनने वालों के दिलों को गहरे छुआ है। इस गीतकार के कुछ श्रेष्ठ गीत और सृजन प्रक्रिया की विचारप्रेरक जानकारी समेटे यह पुस्तक उन सभी के लिए पठनीय और संग्रहणीय है, जो गीतों और कविताओं से प्रेम करते हैं।

प्रसून जोशी के पुरस्कारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। गीत लेखन के लिए वे दो बार प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। प्रसून जोशी एक पे्ररणादायी, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वर भी हैं और उन्होंने जनहित से जुड़े अनेक कैंपेनों पर कार्य किया है। यदि उनके द्वारा लिखे गये गीतों को भी ध्यान से पढ़ें तो हमें उनकी उदार प्रवृति स्पष्ट रूप से प्रतीत होगी, जो हमेशा मन को शान्ति प्रदान करती है।

लेखक लिखता है कि ‘देखो ना’एक प्रेम गीत था जो लोकप्रिय हुआ। पर यहां वो डमी शब्दों को लेकर अपनी निराशा व्यक्त करने से स्वयं को नहीं रोक पाते। कभी-कभार, कुछ साधारण सा प्रयोग कर एक गीत को एक ढांचा दिया जाता है, ताकि धुन को आगे विकसित किया जा सके। इनका व्याकरण की दृष्टि से उचित होना या काव्यात्मक होना आवश्यक नहीं। बस एक विचार की झलक या शब्द, कभी-कभी तो अर्थहीन पद से भी काम चल जाता है।

विभिन्न गीतों से भरी यह पुस्तक हमें लेखक की भावनाओं को टटोलने का मौका देती है। हमें संगीत के माध्यम से ऊर्जावान बनाती है। उनके द्वारा लिखी गई यह पुस्तक इस भागदौड़ भरे जीवन में हमें शीतल और मन को सुकून देने वाले शब्दों के मेल-मिलाप से मन को संचित करती हैं। अत: यह पुस्तक पाठकों को भरपूर मनोरंजन प्रदान करेगी और पाठक भी इसका अत्यधिक लुत्फ उठायेंगे।

रवि मिश्रा

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