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नये भारत का आगाज

नये भारत का आगाज

हाल  में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों से अगर कोई एक चीज सामने आती है, वह यह कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की  पूरे देश में  स्वीकार्यता है। अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में मोदी की देश के हर कोने में स्वीकार्यता है, चाहे वह पूर्वोत्तर राज्यों का कोई कोना हो या फिर पश्चिमी तट या फिर देश के मैदानी भूभाग। किसी भी नजर से देखा जाए तो यह जनादेश मोदी के लिए ज्यादा है बनिस्बत भाजपा के। इन नतीजों ने यह बात फिर साबित की है कि विविधताओ भरे इस देश में ऐसे नेताओं की जगह अभी भी बची है, जो समूचे देश को समेट सकें। सच्चाई यही है कि भारतीय चुनावी इतिहास में मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए, जिसमें उन्होंने लोक-लुभावन फैसले लेने से परहेज किया मगर गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं भी ले आए, ऐसा कहा जा सकता है मोदी भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में वास्तविक बदलाव लाने वाले साबित होंगे।

मोदी के जनाधार को किसी भी क्षेत्रीय या पहचान की राजनीति से जोडक़र देखना बेमानी होगा। अगर इस जनाधार को जोडऩा ही है तो यह वर्ग से जोड़ा जा सकता है, न कि जाति या क्षेत्र से। और इस वर्ग संघर्ष में यह साफ है कि गरीब, जो इस देश में बहुसंख्यक हैं, वे मोदी के साथ हैं। इसी वजह से मोदी उस परिकल्पना  को ध्वस्त कर पाए कि उत्तर प्रदेश में जीत के लिए जाति-धर्म की राजनीति ही काम आती है, न कि प्रशासनिक और विकास के मुद्दे। जैसा कि 2014 के आम चुनावों में हुआ था, इन विधानसभा चुनावों के नतीजों ने फिर साबित किया कि लोगों ने जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं दिए हैं। और इस बार तो ऐसा लगता है कि मुसलमानों, खासकर मुस्लिम महिलाओं और युवाओं ने भी मोदी को अपना समर्थन दिया है।

अगर मोदी की जीत हुई है तो यह उनके विकासपरक रवैये की वजह से हुई है। यह उनके समाज के वृहत्तर कोने तक पहुंचने की कोशिशों का नतीजा है। लोग बदलाव चाहते थे, बदलाव जो उनके बेहतर भविष्य की कुंजी है। असल में जीत के बाद भाजपा मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मोदी ने एक नया भारत बनाने की बात की। एक ऐसा नया भारत, जहां कोई भेदभाव नहीं होगा और सभी नागरिक राष्ट्र के निर्माण में भागीदार होंगे चाहे वे किसी भी विचार को मानने वाले हों। मोदी के इस नए भारत में गरीब अधिक अधिकार संपन्न  होगा, जिससे मध्यम वर्ग के ऊपर से बोझ घटेगा। मोदी का नया भारत अधिक विकासपरक होगा, जिसमें काफी वित्तीय सुधारों की गुंजाइश होगी और जिसमें लालफीताशाही, लाइसेंस राज और भ्रस्टाचार जैसे मुद्दों का खात्मा हो सकेगा।

मोदी के हाल के सभी भाषणों को देखा जाए तो एक बात गौर करने वाली है। सभी भाषणों में उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि कैसे उनकी सरकार देश के गरीबों के प्रति प्रतिबद्ध है और किस तरह सरकार उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं ला रही है। अब यह बात तो जगजाहिर है गरीबों के देश में कोई भी प्रधानमंत्री उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता। लेकिन मोदी ने साथ ही यह भी कहा है कि वे ऐसी स्थिति ले आएंगे, जहां कोई गरीब रहेगा ही नहीं। मोदी गरीबों को और अधिकार संपन्न करने की बात करते हैं, जो देश में अब तक चले आ रहे नेहरूवादी मॉडल से एकदम भिन्न है। नेहरूवादी मॉडल गरीबों को सब्सिडी के नाम पर गरीब बनाये रखने की कवायद है, न कि गरीबी खत्म करने की।

मोदी ने देश को इस नेहरूवादी मॉडल से हटाने का वादा करने के साथ एक नए मॉडल की तरफ इशारा किया है। लोगों ने इस मोदी  मॉडल को खुले दिल से स्वीकार किया है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि लोगों ने मोदी में अपना भरोसा जताया है, न कि भाजपा पर, जो खुद नेहरूवाद की मानसिकता से ग्रसित है। मोदी के लिए सबसे बड़ी समस्या अपनी पार्टी और संघ परिवार से ही निबटना है, जिसका नजरिया भूमंडलीकरण के खिलाफ है। ऐसा लगता है कि संघ मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ की अवधारणा में ज्यादा विश्वास नहीं रखता और ऐसे में वह मोदी कीनया भारत बनाने की कोशिश में साथ होगा, यह एक कल्पना मात्र लगती है।

असल में मोदी के लिए दो सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियां आज दिखती हैं। एक, उनका अपना संघ परिवार और दूसरे, दिल्ली दरबार, जिसमें दिल्ली की नौकरशाही, बुद्धिजीवी और मीडिया के लोग शामिल हैं। बहुत से संघ और भाजपा के लोग इस दिल्ली दरबार का हिस्सा हैं जो नेहरूवाद की मानसिकता से ग्रसित हैं और अभी तक मोदी जैसे बाहरी आदमी का प्रधानमंत्री बनना पचा नहीं पाए हैं। आने वाले दिनों में मोदी के प्रति दिल्ली दरबार की दुश्मनी बढऩे वाली है, जब मोदी एक नए भारत के निर्माण की बात कहने लगे हैं। लेकिन मोदी भाग्यशाली हैं कि उनके पास देशव्यापी जनाधार है जो समय के साथ भाजपा के भीतर और बाहर उनके विरोधियों को शांत करने में सहायक होगा।

 प्रकाश नंदा

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