ब्रेकिंग न्यूज़ 

शहीद पुत्री ने बनाई अपनी पहचान

शहीद पुत्री ने बनाई अपनी पहचान

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा

बेटा: पिताजी, गुरमेहर तो बहुत दिलेर विद्यार्थी निकली।

पिता: हां बेटा। ऐसी क्यों न निकलती। आखिर वह एक बहादुर सेना अधिकारी की बेटी है जिसने 1999 के कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के विरुद्ध अभियान में देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी।

बेटा: तो क्या उसके पिता की मौत पाकिस्तान के हाथों हुयी थी?

पिता: और किसके हाथ हो सकती थी जब युद्ध ही पाकिस्तान के साथ हो रहा था और भारत घुसपैठियों को मार भगाने के लिये कटिबद्ध था?

बेटा: पर पिताजी, गुरमेहर तो कहती हैं कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा था।

पिता: बेटा, यह तो ठीक है कि ऐसा उसने कहा।

बेटा: फिर गुरमेहर ऐसा क्यों कह रही हैं?

पिता: बेटा, वह बच्ची है, उम्र की कच्ची है। जब उसके पिता की शहादत हुयी तब तो वह मुश्किल से एक-आध साल की रही होगी। चलो, यही मान लेते हैं कि उसके पिता को युद्ध ने मारा। पर वह युद्ध किसके साथ हो रहा था? पाकिस्तान के साथ नहीं था क्या? जिस युद्ध में उसके पिता लड़ रहे थे, उसमें भारत के विरुद्ध तो पाकिस्तान ही लड़ रहा था न?

बेटा: यही तो बात है।

पिता: पर यह भी तो सच है कि उसके दादा का ही कहना है कि उनके सपूत ने अपनी शहादत से पूर्व पाकिस्तान के 21 सिपाहियों को मार गिराया था। यदि गुरमेहर के पिता भारत के लिए पाकिस्तान के खिलाफ नहीं लड़ रहे थे तो उन्होंने इतने पाकिस्तानियों को क्यों मार दिया?

बेटा: इस कथन से तो दादा और पोती ही एक-दूसरे की बात को काटते दिखते हैं।

पिता: गुरमेहर के इसी कथन से दु:खी होकर ही तो क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने ट्विटर पर कह दिया था कि दोहरा शतक उन्हों ने नहीं उनके बल्ले ने मारा था।

बेटा: पर यह तो एक प्रकार का कटाक्ष ही हुआ न। गुरमेहर ने सहवाग को तो कुछ नहीं कहा था।

पिता: बेटा, यह तो ठीक है। पर गुरमेहर ने भी  तो अपनी टिप्पणी देश पर ही कर दी थी। फिर कोई भी भारतीय यह सुनकर कैसे चुप रह सकता था?

बेटा: गुरमेहर ने अपने सामने एक तख्ती पकड़ रखी थी जिसमें बड़ी दिलेरी से लिखा  था कि वह एबीवीपी से नहीं डरती। सारे विद्यार्थी उसके साथ हैं।

पिता: यह है तो हिम्मत की बात। पर एक बात समझ नहीं आयी एबीवीपी का मतलब अखिल विद्यार्थी परिषद् ही है न? तो जब सारे विद्यार्थी उसके साथ हैं  तो फिर इसका अर्थ है कि एबीवीपी भी उसके साथ है। तो फिर उससे डरने या न डरने का तुक और तर्क समझ नहीं आया।

बेटा: यह तो पिताजी आपने बड़ी गूढी की बात कही।

पिता: इसीलिये तो मैं कहता हूं कि बेटा अभी उसकी उम्र कच्ची है। इतनी बड़ी और गहरी बातें करने का उसके लिये अभी समय नहीं आया।

बेटा: पर पिताजी, सहवाग और दूसरों को तो इतनी तल्ख टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी।

पिता: क्यों?

बेटा: आखिर वह कम उम्र की है। इसका तो लिहाज रखना चाहिये था।

पिता: जब कम उम्र में कोई बड़ी बातें करने लगेगा तो ऐसा होगा ही।

बेटा: चाहे वह कम उम्र की ही है, फिर भी विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तो उसे है ही न?

पिता: तो वही अधिकार सहवाग तथा अन्य को भी है न? उस पर टिप्पणी व प्रतिकार का अधिकार तो उन्हें भी है।

बेटा: तो फिर लोग क्यों सहवाग व अन्य की आलोचना कर रहे हैं?

पिता: वह समझते है कि विचार व उसकी अभिव्यक्ति का अधिकार एक तरफा ही होता है। यह कैसे हो सकता है कि एक अधिकार एक को तो हो पर दूसरे को न हो? तब क्या हमारा देश जनतंत्र कहलाने लायक रह जायेगा?

बेटा: बात तो आपकी ठीक है पिताजी।

पिता: इसीलिये तो मैं कहता हूं कि बड़ों की बातें बड़ी होती हैं। जब हमारे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को इस विवाद पर टिप्पणी करने के लिए किसी ने कहा तो उन्होंने सीधे तो इस पर कुछ कहने से इंकार कर दिया पर सन्देश वह पूरा दे गए। उन्होंने कहा कि जब वह फेसबुक या ट्विटर पर कुछ लिखते हैं तो वह पहले अपने आपको इस बात के लिये पहले ही तैयार कर लेते हैं कि लोग उनकी आलोचना भरपूर करेंगे। वह तो गाली खाने के लिए भी तैयार हो कर बैठते हैं।

बेटा: अमिताभ जी की यह बात तो सिक्केदार है। अगर पिताजी मैं किसी की आलोचना करूं या किसी को गाली दूं तो मुझे भी जवाबी आलोचना व गाली खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। हो सकता है कि जवाब में दूसरा मेरी आलोचना ज्यादा सख्त कर दे या मेरी एक गाली के जवाब में दो या चार गाली दे दे।

पिता: बेटा, वास्तव में असहिष्णु वह नहीं जो किसी की बात का जवाब देते हैं। यह तो उनका अधिकार होता है। असहिष्णु तो असल में वह हैं जो स्वयं तो सब कुछ कहने का अपना अधिकार समझते हैं पर दूसरे को उसका जवाब या उस पर टिप्पणी करने पर उसके असहिष्णु होने का छाती पीट-पीट कर विरोध करते हैं। असल तानाशाह तो वह हैं। इसे ही तो फासीज्म कहते हैं।

बेटा: पर पिताजी, इतना तो आप मानते हैं न कि जिन लोगों ने उसे जान से मार देने या उस से बलात्कार कर देने की धमकी दी है वह सरासर गलत और अमानवीय है।

पिता: बिल्कुल। सभ्य समाज मैं इसे कोई उचित नहीं ठहरा सकता। यह नितांत निंदनीय है, जनतंत्र की भावना के विरूद्ध। पुलिस इसकी जांच भी कर रही है पर अभी तक अपराधियों की शिनाख्त नहीं हो पाई है।

बेटा: पर हो कौन सकता है?

पिता: होने को तो यह एबीवीपी के लोग भी हो सकते हैं और उसके विरोधी भी।

बेटा: उसके विरोधी कैसे?

पिता: तेरे को पता नहीं। यहां पॉलिटिक्स में सब संभव है, कुछ असंभव नहीं।

बेटा: अच्छा! तभी पुलिस का काम कठिन हो गया लगता है

पिता: कुछ भी हो। जिसने भी यह शर्मनाक काम किया है उसे सजा तो अवश्य मिलनी चाहिए।

बेटा: पिताजी, मैं तो विश्वविद्यालयों में पढ़ा नहीं पर आजकल तो रोज समाचारों में पढता व सुनता हूं कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व ऐसे ही अनेक विश्वविद्यालय में हर दिन विरोध प्रदर्शनों व हड़ताल पर होते हैं। वहां बच्चे पढ़ते कब हैं? क्या वहां डिग्री ऐसे ही मिल जाती है?

पिता: यह धारणा बना लेना तो सरासर गलत है। पर जैसे तेरे मन में प्रश्न उठ रहे हैं ऐसे ही प्रश्न जनता के मन में भी उठने स्वाभाविक हैं। इससे हमारे इन शिक्षा के मन्दिरों की छवि धूमिल हो रही है। सरकार, शिक्षकों व विद्यार्थियों को तो इस पर गम्भीरता से विचार करना ही होगा।

बेटा: पर पिताजी, कुछ भी कहो। गुरमेहर ने इतनी छोटी उम्र में अपना नाम बना लिया है।

पिता: बेटा, अगर तू अखबार पढ़ें तो तुझे पता चल जायेगा कि इसके पीछे भी पालिटिक्स है। इसके पीछे भी कुछ लोग व राजनीतिक दल हैं जो उसे मोहरा बना कर, उसे शह देकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।

बेटा: उसके पिता ने तो देश के लिये अपनी कुर्बानी दे दी और कुछ लोग उसे उल्टा पाठ पढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि उसके परिवार ने उसे दिल्ली से वापस बुला लिया है। वह अब मीडिया को भी नहीं मिल रही है।

पिता: बेटा, उसके भविष्य की चिन्ता उसके परिवार को ही होगी किसी और को नहीं। अन्य लोग तो अपनी स्वार्थपूर्ति व अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिये उसका शोषण ही करेंगे। उसका तो अभी कॉलेज जीवन शुरू ही हुआ है। बेटा, हर काम अपने समय पर ही होना चाहिये।

बेटा: जैसे?

पिता: पहले पढ़ाई करो, अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। कुछ कर के दिखाओ। फिर प्रेम व शादी। बड़ी सीधी बात है। या तो शुरू के जीवन में ऐश कर लो और बाकी जीवन रो लो। या फिर शुरू में कष्ट सह लो, संघर्ष कर लो और बाकी के जीवन में आनन्द कर लो। तू भी तो इसी गलती का फल भोग रहा है।

बेटा: पिताजी, आप घिरा-फिरा कर हर बात में मुझे ही कोसने लगते हें।

पिता: मैं तेरा उदाहरण इस लिये देता हूं ताकि अन्य तेरी गलती न दोहरायें।в какие каталоги добавить сайтИнгейт

Leave a Reply

Your email address will not be published.